NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
मानवता की राह में बाधक जाति-धर्म की दीवारें
आज कबीर जैसे लोगों की जरूरत है जो जाति-धर्म की दीवार उठाने वालों को फटकारते थे। वे कहते थे – “अरे इन दोनों राह न पाई...”
राज वाल्मीकि
29 Dec 2020
मानवता की राह में बाधक जाति-धर्म की दीवारें
'प्रतीकात्मक तस्वीर' फोटो साभार : द डेली ऑरेंज

तमिलनाडु के कोयम्बटूर ज़िले के नादुर गांव में पिछले साल दिसंबर में भारी बारिश के कारण 20 फीट ऊंची दीवार गिरने से दलित समुदाय के 17 लोगों की मौत हो गई थी। दलित बस्ती से अपने मकान को अलग रखने के लिए कथित उच्च जाति के एक व्यक्ति ने यह दीवार बनाई थी। हाल ही में इसके दोबारा बनने के बाद इसे ‘अस्पृश्यता की दीवार’ कहकर आपत्ति जताई गई है।

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर का दलित सोमदत्त कुछ दिन पहले ऊँची जाति की अपनी प्रेमिका के साथ फरार हो गया था। परिजनों ने पकड़ कर दोनों को पुलिस के सुपुर्द कर दिया। अगले दिन कोर्ट में प्रेमिका ने सोम के पक्ष में बयान दिया। परिजनों के मुताबिक अगली सुबह पुलिस सोम की लाश लेकर आई और उसकी जबरन अंतिम क्रिया कर दी। परिजनों के अनुसार पुलिस ने बताया कि सोमदत्त ने हवालात में अपने पजामे के नाड़े से फांसी का फंदा बनाया और आत्महत्या कर ली। शव को आग देने के बाद पुलिस चली गई। परिजनों ने हंगामा मचाया। उनका कहना है कि ऊंची जाति वालों से सांठगांठ कर के सोम को पुलिस ने मार डाला।

दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के ही मैनपुरी जिले की है जिसमे उच्च जाति के भाइयों ने दिल्ली में काम कर रही अपनी बहन को फोन कर घर पर बुलाया और गोली मारकर हत्या कर दी। पिता की सहमति लेने के बाद बहन की लाश को जमीन में गाड़ दिया। उच्च जाति की इस लड़की का कसूर यह था कि उसने एक दलित युवक के साथ अपनी मर्जी से शादी कर ली थी।

विगत 2 दिसम्बर को लखनऊ के डूडा कॉलोनी में एक हिन्दू लड़की मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती थी। माता-पिता की सहमति के बाबजूद हिन्दुत्व युवा वाहिनी ने यह शादी रुकवा दी और “लव जिहाद” के नाम पर पहले जिला अधिकारी से अनुमति लेने को कहा। लड़की ने कहा कि वह बालिग़ है और बिना किसी दबाब के वह मुस्लिम लड़के से शादी कर रही है। पर उसकी बात नहीं मानी गई।

कौन हैं ये दीवार उठाने वाले?

हमारे संविधान के अनुसार दो बालिग़, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, सहमति से शादी कर सकते हैं, यह उनका अधिकार है।

देश का संविधान हर वयस्क नागरिक को चाहे वह पुरुष हो या स्त्री सभी को अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनने का अधिकार देता है। उसका यह मानवीय अधिकार है कि वह अपनी पसंद का जीवन साथी चुने। अपनी पसंद का जीवन जिए। वह तय करे कि वह किसके साथ अपना जीवन यापन करेगा। पर हम और आप जानते हैं कि हमारे समाज में ये स्वतंत्रता हमारे युवाओं को प्राप्त नहीं है। क्योंकि समाज के लोगों ने  जाति और धर्म की दीवारें दो दिलों की बीच खड़ी कर रखीं हैं।

लोगों ने जाति और धर्म को इतनी अहमियत दे रखी है कि वे अपने बच्चों की ख़ुशी भी इन पर कुर्बान करने को तैयार रहते हैं। उनके लिए ये आन-बान और शान का प्रश्न बन जाता है। शादी-विवाह करेंगे तो अपनी ही जाति में  या अपने ही धर्म में। इसके बाहर किया तो वह घोर पाप होगा। गुनाह होगा।

जाति के झूठे दंभ में रहने वाले हैं ये लोग। धर्म से डरने वालें हैं ये लोग। ये लोग नहीं जानते कि ये जाति इंसानों की ही बनाई हुई है। धर्म भी इन्सान ने अपनी सुविधा के लिए ही बनाया था। आज ये लोग जाति और धर्म के बंधन में बंधे हुए हैं। अपनी सोच को सीमित किए हुए हैं। ऐसे सोच के लोगों के बारे में कवि ने ठीक ही लिखा है-

“घरोंदे तुमने देखे होंगे लेकिन घर नहीं देखा

हवा देखी है आंधी का मगर तेवर नहीं देखा

बड़ी हैं और भी चीजें जहां में तुम ये क्या जानो

कुएं के मेंढकों तुमने अभी सागर नहीं देखा।” 

कहां हैं दीवार गिराने वाले?

आज कबीर जैसे लोगों की जरूरत है जो जाति-धर्म की दीवार उठाने वालों को फटकारते थे। वे कहते थे – “अरे इन दोनों राह न पाई...”  हिन्दुओं से वे कहते थे –“पाथर पूजें हरि मिलें तो मैं पूजूं पहार, या ते तो चाकी भली पीस खाए संसार। ”  मुसलमानों से कहते थे – “कांकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ी मुल्ला बांग दें क्या बैरा हुआ खुदाय। ”  कबीर जैसी निर्भीकता की आज बहुत जरूरत है।

यूं तो मानवता की मिसाल भी देखने को मिलती रही है। अभी जो किसान आंदोलन चल रहा है। दिल्ली के आसपास किसान डेरा डाले हुए हैं। वहां मानवता के कई अच्छे उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। वहाँ मुसलमान, सिख और हिन्दू किसानों को मुफ्त में खाना खिला रहे हैं। सिंघु बॉर्डर पर आप उन्हें वेज-बिरयानी बांटते हुए देख सकते हैं। नाई वहाँ मुफ्त में लोगों के बाल काट रहे हैं। वहां शिक्षित युवा स्थानीय बच्चों को फ्री में पढ़ा रहे हैं।

जाति-धर्म की मानसिकता से कैसे मुक्त हुआ जाए?

मान लीजिए कि ऐसी मानसिकता के लोग हों जो कहें - मेरी जाति है इंसान और धर्म है इंसानियत। लोग ऐसा कहने लगें तो समझिए वे जाति-धर्म से मुक्त हो गए। पर अभी तो यह कल्पना मात्र है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जाति तोड़ने के लिए प्रयास किए। उन्होंने “जाति का विनाश” नाम की पुस्तक भी लिखी। लेकिन जाति जन्म के आधार पर बाई डिफाल्ट जनरेट होती है उसका विनाश इतना आसान नहीं है। पर कहते हैं कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिये। इसी प्रकार धर्म का मामला है। दरअसल ये इतने संवेदनशील मामले हैं कि इन पर लोग तर्क के साथ बात नहीं करते। भावुक होकर सोचते हैं। इसे आस्था का प्रश्न बना लेते हैं। कहने को लोग भले कहें कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। पर हिंसा की अधिकतर वारदातें मज़हब या धर्म के नाम पर ही होती  हैं। दिल्ली में जो हिंसा हुई वह धर्म के नाम पर ही हुई। यानी धर्म के नाम पर लोग एक दूसरे की जान लेने और जान देने पर तत्पर हो जाते हैं। ऐसे में वे अपनी इंसानियत को भूल बैठते हैं। वे भूल जाते हैं कि जिन पर हिंसा की जा रही है या जिनकी हत्या की जा रही है। वे उनकी तरह ही इंसान हैं। ऐसे में कवि को कहना पड़ता है कि –“अब तो मज़हब कोई ऐसा चलाया जाए, जहां इंसान को इन्सान बनाया जाए।”

अगर हमारे देश के सभी नागरिक संविधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दें तो काफी हद तक लोग जाति और धर्म से ऊपर उठ जायेंगे। उन्हें इनकी निरर्थकता समझ आएगी। और धीरे-धीरे ये समझ आएगा कि एक इज्जतदार जिंदगी जीने के लिए जाति और धर्म की जरूरत नहीं है।

फिर लोगों में रोटी-बेटी के रिश्ते होने लगेंगे। जाति और धर्म इन रिश्तों में अवरोधक नहीं होंगे। फिर धीरे-धीरे जाति धर्म की सीमा के साथ-साथ देश भी इंसानों को सीमा में नहीं बांधेंगे। और पूरा विश्व इंसान और इंसानियत का कायल हो जाएगा। सही अर्थों में तभी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना विकसित होगी।

अभी जो स्थिति है वह काफी भयावह है। लोगों ने अपने दिलों में जाति के नाम पर धर्म के नाम पर दीवारें बना रखी हैं। ये इस जाति का है। यह छोटी जाति का है। बड़ी जाति का है। इससे भेदभाव करो। उससे छुआछात करो। ये इस धर्म का है। वो उस धर्म का है। उसका धर्म हमारे धर्म से छोटा है। हमारा धर्म महान है। जो हमारे धर्म का नहीं है वह हमारा दुश्मन है।

यहीं प्रगतिशील विचारधारा की जरूरत है। जो मानवता को प्राथमिकता दे। संविधान को प्राथमिकता दे। सभी के मानवाधिकारों का सम्मान करे। सबको गरिमा के साथ जीने का अधिकार दें और खुद भी गरिमा से जीयें। “जीओ और जीने दो” को शब्दश: अपनाएं। इसका पालन करें। जब हम एक इंसान को उसके आत्मसम्मान से जीने देंगे। उसकी मानवीय गरिमा और मानवाधिकारों को तबज्जो देंगे तो जाति और धर्म की दीवारें स्वतः धराशायी हो जाएंगीं। पर क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

(लेखक सफाई कर्मचारी आन्दोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Caste
religion
Casteism
caste discrimination
Religion Discrimination
Unequal society
Constitution of India
Fundamental Rights
Religion Politics
hindu-muslim

Related Stories

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

बनारस में ये हैं इंसानियत की भाषा सिखाने वाले मज़हबी मरकज़

बढ़ती नफ़रत के बीच भाईचारे का स्तंभ 'लखनऊ का बड़ा मंगल'

बिहार में विकास की जाति क्या है? क्या ख़ास जातियों वाले ज़िलों में ही किया जा रहा विकास? 

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार

एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता

हम भारत के लोग: देश अपनी रूह की लड़ाई लड़ रहा है, हर वर्ग ज़ख़्मी, बेबस दिख रहा है

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है

हम भारत के लोग : इंडिया@75 और देश का बदलता माहौल


बाकी खबरें

  • राज वाल्मीकि
    भारतीय रंगमंच का इतिहास वर्ग संघर्षों का ही नहीं, वर्ण संघर्षों का भी है : राजेश कुमार
    10 Apr 2022
    आज विपक्ष की तरह रंगमंच भी कमजोर हो गया है। शहरी रंगमंच इतना महंगा हो गया है कि सरकारी ग्रांट या अनुदान लेना उसकी मजबूरी हो गयी है। जो प्रतिरोध की धारा से जुड़ कर नाटक कर रहे हैं, उन पर सत्ता का दमन…
  • bhasha
    न्यूज़क्लिक टीम
    “नंगा करने का दुख है लेकिन सच्ची पत्रकारिता करने का फ़ख़्र”: कनिष्क तिवारी
    09 Apr 2022
    ख़ास बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने मध्यप्रदेश के सीधी ज़िले के पत्रकार कनिष्क तिवारी से बातचीत की और उनकी पीड़ा को जाना। कनिष्क तिवारी वही पत्रकार हैं, जिन्हें एक अन्य पत्रकार और कई…
  • sdmc
    न्यूज़क्लिक टीम
    CR Park: SDMC मेयर के बयान के बाद मछली विक्रेताओं पर रोज़ी रोटी का संकट?
    09 Apr 2022
    दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के मेयर के बयान के बाद दशकों से मछली बेच रहे विक्रेताओं के लिए रोज़ी रोटी का संकट पैदा हो गया है. विक्रेता आरोप लगा रहे है कि वे SDMC और DDA की बेरुख़ी का शिकार हो रहे है जबकि…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पत्रकार-पत्रकारिता से नाराज़ सरकार और राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार
    09 Apr 2022
    भारत प्रेस फ्रीडम की रिपोर्ट में उन देशों में शामिल है जहाँ पर पत्रकारों की हालत बहुत खराब मानी जाती है। हाल ही के दिनों में हुई कुछ घटनाएं इस रिपोर्ट को सही साबित करती हैं. पिछले कुछ दिनों में…
  • सोनिया यादव
    यूपी: खुलेआम बलात्कार की धमकी देने वाला महंत, आख़िर अब तक गिरफ़्तार क्यों नहीं
    09 Apr 2022
    पुलिस की मौजूदगी में मुस्लिम महिलाओं को सरेआम बलात्कार की धमकी देने वाला महंत बजरंग मुनि दास अभी भी पुलिस की गिरफ़्त से बाहर है। वहीं उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे छात्र और नागरिक समाज के लोग दिल्ली…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License