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आंदोलन
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हम देश बचाने निकले हैं, चलो हमारे साथ चलो
यास्मीन ने कहा कि सीएए लाकर सरकार ने देश में जिस भेदभाव की नींव डाली और एक समुदाय को अलग थलग करने की साज़िश रची उसी भेदभाव को हमारे आंदोलन के मंच जड़ से उखाड़ फेंक रहे हैं
सरोजिनी बिष्ट
01 Feb 2020
shaheen bagh

"असल में सरकार चाहती कुछ और थी और हो कुछ और रहा है," जब उनसे पूछा गया कि सरकार चाहती क्या थी और क्या हो रहा है तो एक हल्की सी मुस्कान उसके होंठो पर तैरने लगी बोली देखो इस दृश्य को जहां हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सब एक साथ एक शामियाने के नीचे एकजुट होकर एक मजबूत और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने की गवाही दे रहे हैं। वहीं न केवल यहां बल्कि देश के जिन भी हिस्सों में सीएए एनआरसी एनपीआर के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं वहां भी कुछ ऐसी बानगी देखने को मिल रही है।

जब ये इल्ज़ाम मढ़ दिया गया हो कि ये केवल मुस्लिमों का आंदोलन बनकर रह गया है, ऐसे में जब सब कम्यूनिटी के लोग आकर साथ दें और इसे अपना भी आंदोलन बताए तो अनेकता में एकता का सपना साकार सा हो उठता है। पहले ही दिन से धरने में शामिल यास्मीन अली की इन बातों ने दिल को गहराई तक छू लिया। उसने कहा वे लोग बुद्धि विहीन हैं जो शाहीन बाग़ को मिनी पाकिस्तान बोल रहे हैं आज शाहीन बाग़ मिनी भारत की तस्वीर पेश कर रहा है और संविधान की प्रस्तावना को साकार कर रहा है।

यास्मीन ने कहा कि सीएए लाकर सरकार ने देश में जिस भेदभाव की नींव डाली और एक समुदाय को अलग थलग करने की साज़िश रची उसी भेदभाव को हमारे आंदोलन के मंच जड़ से उखाड़ फेंक रहे हैं, हर धर्म हर समुदाय के अमन पसंद लोग यहां आकर भाईचारे धर्मनिरपेक्षता और इंसानियत का संदेश दे रहे हैं जो हमारे संविधान की मूलभूत आत्मा भी है।

यास्मीन उन लोगों में से हैं जिन्होंने शाहीन बाग में खुले आसमान के नीचे मुट्ठी भर महिलाओं के बल पर आंदोलन शुरू किया था पर आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रहे समर्थन से बेहद खुश है। जब उनसे पूछा गया कि, इस पूरे आंदोलन के दौरान हम देख रहे हैं कि किस कदर एक स्वत: स्फूर्त आंदोलन को राजनैतिक पार्टियों का आंदोलन बताकर ख़ारिज करने की कोशिश चल रही है आख़िर क्यों तो उनका जवाब था "सिर्फ इसलिए कि इन आंदोलनों की बागडोर महिलाओं ने संभाली और उनकी सोच यह कहती है कि महिलाओं में इतनी ताकत नहीं कि वे अपने बूते किसी आंदोलन को इतने लंबे समय तक टिका कर रख सके" जानने की प्रबल इच्छा थी कि आख़िर धरने पर बैठने से पहले उन महिलाओं के दिल दिमाग में क्या विचार आया जो कभी न तो किसी धरने प्रदर्शन का हिस्सा रहीं और न कभी किसी राजनैतिक पार्टियों की रैलियों में गईं।

इस पर नाज़नीन ने बताया कि जिस दिन जामिया में पुलिस दमन की नृशंस घटना हुई उसी दिन शाम के वक़्त इलाके की कुछ महिलाओं ने इस मुद्दे पर बात की और पुलिसिया ज्यादती के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट करने का फैसला किया। उन्होंने कहा चूंकि हमने स्वयं अपनी आंखों से पुलिस का अत्याचार देखा और यह भी देखा कि किस कदर पुलिस निहत्थे और निर्दोष छात्रों को बुरी तरह पीट रही है। माहौल बिगाड़ने में पुलिस की भूमिका थी बावजूद इसके पुलिस को निर्दोष और छात्रों को दोषी करार दिया जा रहा है तब हम इलाके की महिलाओं ने निर्दोष छात्रों के हक़ और देश में लाए जा रहे काले कानून के विरोध में धरने पर बैठने का फैसला किया।

इंसाफ के लिए धरने पर बैठी इन महिलाओं ने शायद ही सोचा होगा की बीस की संख्या से शुरू हुआ ये आंदोलन जल्दी ही बीस लाख और बीस करोड़ या उससे भी आगे पहुंच जाएगा। इसमें दो राय नहीं कि पूरे देश में शुरू हुए आंदोलनों को प्रेरणा शाहीन बाग ने ही दी और केवल प्रेरणा नहीं दी बल्कि उन महिलाओं को भी घर से निकलने की हिम्मत और जज्बा दिया जिनकी दुनिया चारदीवारी और परिवार तक ही सिमट कर रह गई थी। शाहीन बाग में जब महिलाएं धरने पर बैठी तो उनके सिर पर एक अदद ढंग का शामियाना तक नहीं था। यास्मीन ने बताया कि पन्नी बांधकर हम लोग बैठे थे धीरे धीरे हम लोग बीस से चालीस हुए फिर चालीस से अस्सी और अब तो गिनती भी संभव नहीं।

सचमुच अब तो गिनती भी संभव नहीं देश के हर कोने कोने से इंकलाब की मुट्ठियां तन उठी हैं दमन जारी है बावजूद इसके हर आंदोलनकारी की जुबां पर बस यही हैः-

हम देश बचाने निकले हैं चलो हमारे साथ चलो
संविधान बचाने निकले हैं चलो हमारे साथ चलो

CAA
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