NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अ-दीदी नि-र्ममता और बंगाल को गुजरात बनाने का "आह्वान"
जादवपुर में सीपीएम और संयुक्त मोर्चे के समर्थकों पर शुरू हुए हमलों की अगुवाई वहां से जीता टीएमसी विधायक देबब्रत मजूमदार कर रहा है। यह देबब्रत चुनाव में टीएमसी की टिकट मिलने से पहले तक इस इलाके में आरएसएस का मुख्य संगठनकर्ता था।
बादल सरोज
05 May 2021
अ-दीदी नि-र्ममता और बंगाल को गुजरात बनाने का "आह्वान"
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

ममता के पुनराभिषेक की शुरुआत जमालपुर की वामपंथी महिला नेत्री काकोली खेत्रपाल (52 वर्ष) की बलि के साथ हुई। महिला सशक्तीकरण की स्वयंभू बड़ी अम्मा ममता की टीएमसी के शूरवीरों ने इस अकेली महिला को मारकर जश्न मनाया। काकोली वर्दमान के नबग्राम में सीपीएम की पोलिंग एजेंट थी। (उनकी मृत शरीर का फोटो नहीं दे रहे - वह विचलित कर सकता है) वे यहीं तक नहीं रुके; उत्तर चौबीस परगना जिले के देगंगा में उन्होंने इंडियन सेक्युलर फ्रंट के हसनुज्जमा को मार डाला।

डायमंड हार्बर से संयुक्त मोर्चा - सीपीएम के उम्मीदवार और एसएफआई के प्रदेश अध्यक्ष प्रतीक उर रहमान के घर और चुनाव कार्यालय पर ममता की पार्टी के गुंडों ने हमला बोल दिया। यहां 100 अन्य घरों को भी निशाना बनाया गया - अनेक दुकाने भी लूट ली गयीं। दुकाने किनकी लूटी गयीं? यह जानना उन भले मानुषों के लिए अत्यंत आवश्यक है जो ममता को धर्मनिरपेक्षता की जॉन ऑफ आर्क मानते हैं।

जादवपुर में सीपीएम और संयुक्त मोर्चे के समर्थकों पर शुरू हुए हमलों की अगुवाई वहां से जीता टीएमसी विधायक देबब्रत मजूमदार कर रहा है। यह देबब्रत चुनाव में टीएमसी की टिकट मिलने से पहले तक इस इलाके में आरएसएस का मुख्य संगठनकर्ता था।

उत्तर दिनाजपुर में तो टीएमसी के सूरमा सीपीएम दफ्तरों पर जेसीबी लेकर पहुंचे और हमला बोल दिया। केन्या खमरपारा में 10 घर तोड़कर 51 लोगों को बेघर कर दिया। कोरोना पीड़ितों के लिए ऑक्सीजन, बेड और जरूरी दवाओं के इंतजाम में जुटे रेड वालंटियर्स को भी टीएमसी के गुंडों ने अपने हमले का निशाना बनाया।

ये कुछ घटनाएं हैं। ऐसी अनेक घटनाएं हैं जिनका ब्यौरा गणशक्ति की साइट पर जाकर देखा जा सकता है।

जब मुख्य लड़ाई ममता-मोदी, भाजपा-टीएमसी के बीच थी तो फिर हमले का निशाना लेफ्ट और सीपीएम ही क्यों है?

कहते हैं कि लेफ्ट तो इस चुनाव में खत्म ही हो गया। संयुक्त मोर्चा और वाम गठबंधन शायद की कहीं मुख्य मुकाबले में रहा हो, फिर लेफ्ट पर हमला क्यों ? यह सवाल ममता से नहीं है क्योंकि उनके बारे में वाम को कभी कोई गलतफहमी नहीं थी। संयुक्त मोर्चा और वामपंथ ने हमेशा ही कहा; कि बंगाल में भाजपा को लाने और बिठाने वाली यही ममता बनर्जी हैं। इनके बूते धर्मनिरपेक्षता की रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि नमक से नमक नहीं खाया जा सकता।

बर्बर हिंसा और टीएमसी की गुंडावाहिनी की अगुआ के भरोसे बंगाल में लोकतंत्र की बहाली नहीं हो सकती; क्योंकि लोमड़ी की अगुआई वाले भेड़ियों के दल को बच्चों और शिशुओं की हिफाजत का जिम्मा नहीं सौंपा जा सकता।

यह भूलना बहुत महंगा पडेगा कि ममता बनर्जी जैसी तानाशाह व्यक्तियों की अगुआई वाली पार्टियां क्षेत्रीय शासकवर्गों की आकांक्षाओं और राज चलाने की इच्छाओं की प्रतिनिधि नहीं होतीं। इनमें लोकतंत्र एक विजातीय चीज होती है। तानाशाही इनके डीएनए में होती है। उस पर कहीं अगुवाई किसी मनोरोगी के हाथ में हो तो जनतंत्र का कबाड़ा ही मानिए। इस तानाशाही को पिछली 10 वर्षों में बंगाल ने भुगता है और पूरे देश ने देखा है। ममता और भाजपा में एक ही अंतर है और वह तनिक सा मात्रात्मक अंतर यह है कि वे एक प्रदेश में वह सब कर रही हैं जो भाजपा पूरे देश में करना चाहती है।

त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव परिणामों के बाद इसी भाजपा ने एक हत्यारी मुहिम छेड़ी थी

तीन साल पहले मार्च 2018 का पहला पखवाड़ा याद कीजिए जब त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव परिणामों के बाद इसी भाजपा ने एक हत्यारी मुहिम छेड़ी थी और सीपीएम तथा मेहनतकश जनता के संगठनों के नेताओं, कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया था। आज भी तानाशाही का कहर त्रिपुरा में रुका नहीं है। बाकी राज्यों में भी जहां जहां भाजपा जीती वहां वहां थोड़ी बहुत कम तीव्रता के साथ यही हुआ। आज ठीक वही काम ममता और उनकी टीएमसी के गुंडे बंगाल में कर रहे हैं। इसलिए भाजपा के शहीद बनने के पाखण्ड का कोई अर्थ नहीं है।

निस्संदेह फासीवादी रफ्तार के खिलाफ व्यापक संभव एकता चाहिए मगर हिटलर के खिलाफ मुसोलिनी और गोयबल्स और हिमलर और तोजो को जिताकर फासीवाद नहीं रोका जा सकता।

चुनावी तौर पर इतने कमजोर दिखने के बाद भी यदि हमले का निशाना सीपीएम- वाम और संयुक्त मोर्चा है तो इसलिए क्योंकि ममता और उनके सरपरस्त शासक वर्ग को पता है कि सिर्फ यही ताकत है जो उनकी और उनके जैसों की राजनीतिक कब्र का शिलालेख लिख सकती है।

बंगाल के जनादेश को समझने की ज़रूरत

बंगाल के जनादेश को समझने की जरूरत है। सदियों की परवरिश में सुसंस्कृत हुई बंगाल की स्वभाव से ही धर्मनिरपेक्ष जनता ने ममता को नहीं जिताया, भाजपा को हराया है। भाजपा इतनी बढ़ी भी है तो ममता की मेहरबानी से - इसलिए जो झांझ-मंजीरे बजा रहे हैं उन्हें अपना यह बाल सुलभ कौतुक बंद करके और बंगाल की इस हिंसा के खिलाफ आवाज उठानी ही होगी। इन चुनाव नतीजों की साम्प्रदायिक व्याख्या कर अब भाजपा और आरएसएस जितनी धूर्तता के साथ बंगाल को साम्प्रदायिक टकरावों की ओर धकेल रहे हैं वह हाल के समय की सबसे गंभीर आशंका है। यह बंगाल की कई हजार वर्ष पुरानी मेलमिलाप और सद्भाव की जड़ों में एसिड डालने की तैयारी है।

संघी आईटी सेल का जहरीला अभियान

संघी आईटी सेल ने जहरीले अभियान के जरिये बंगाल की जनता पर विष-वर्षा शुरू कर दी है। मोदी और आरएसएस की जहरीली ब्रिगेड की कंगना राणावत की ट्वीट को इस महिला का निजी प्रलाप मानना गलत होगा। उनके द्वारा मोदी "जी" से सुपर गुंडई दिखाने और 2002 के गुजरात नरसंहार की तरह अपना "विराट रूप" दिखाने का आह्वान अकेली कंगना का युध्दघोष नहीं है। भेड़िये निकल चुके हैं पश्चिम बंगाल को गुजरात बनाने। यह बंगाल के मेहनतकशों और भद्रलोक दोनों की परीक्षा की घड़ी है। चुनाव हो गया - उसमें जो होना था हो गया अब उन्हें बंगाल की हिफाजत के लिए एकजुट होना होगा।

लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पहरुओं की परीक्षा का समय

यह लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पहरुओं की परीक्षा का समय है। इस वक़्त में कौन कहां है यह देखना बहुत जरूरी होगा। एक कोई महुआ मोइत्रा जी हैं, सुनते हैं लोकतंत्र और सेक्युलरिज़्म पर बढ़ा धांसू बोलती हैं !! कहां हैं इन दिनों - काकोली खेत्रपाल के लिए मुंह कब खोलेंगी? लोकतंत्र के इस टीएमसी उत्सव पर कुछ बोलेंगी? एक कोई आत्ममुग्ध प्रखर वाम हैं जिन्हें इस जनादेश में लोकतंत्र की बहाली की ढेर उम्मीदें नजर आ रही हैं, वे इन हमलों और हत्याओं पर चुप क्यों हैं ?

साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई कॉरपोरेट के खिलाफ लड़े बिना न लड़ी जा सकती है न जीती जा सकती है। इटली के कम्युनिस्ट नेता तोगलियाती ने कहा था कि जो पूंजीवाद को नहीं जानते वे फासीवाद की किस्मों के बारे में कुछ नहीं समझ सकते। वाम और सीपीएम इन दोनों- कॉरपोरेटी पूंजी और सांप्रदायिकता के विविध रूपों- के मेल की तासीर समझती है और उनसे लड़ना भी जानती है। इसलिए आख़िरी बात "अब का हुइये" पूछने वाले शुभचिंतक और सलाहकारों के लिए ; और वह यह कि जनता को साथ लेकर इस हिंसा का मुकाबला किया जाएगा। असली खेला तो अब शुरू हुआ है ।

लेखक लोकजतन के संपादक हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी है।

West Bengal
West Bengal Violence
TMC
BJP
mamta banerjee
Narendra modi
RSS
left parties

Related Stories

राज्यपाल की जगह ममता होंगी राज्य संचालित विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति, पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने पारित किया प्रस्ताव

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    कड़ी कार्रवाई के बावजूद सूडान में सैन्य तख़्तापलट का विरोध जारी
    18 Jan 2022
    सुरक्षा बलों की ओर से बढ़ती हिंसा के बावजूद अमेरिका और उसके क्षेत्रीय और पश्चिमी सहयोगियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र भी बातचीत का आह्वान करते रहे हैं। हालांकि, सड़कों पर "कोई बातचीत नहीं, कोई समझौता…
  • CSTO
    एम. के. भद्रकुमार
    कज़ाख़िस्तान में पूरा हुआ CSTO का मिशन 
    18 Jan 2022
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बुधवार को क्रेमलिन में रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु के साथ कज़ाख़िस्तान मिशन के बारे में कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीट ऑर्गनाइजेशन की “वर्किंग मीटिंग” के बाद दी गई चेतावनी…
  • election rally
    रवि शंकर दुबे
    क्या सिर्फ़ विपक्षियों के लिए हैं कोरोना गाइडलाइन? बीजेपी के जुलूस चुनाव आयोग की नज़रो से दूर क्यों?
    18 Jan 2022
    कोरोना गाइडलाइंस के परवाह न करते हुए हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से प्रचार में जुटे हैं, ऐसे में विपक्षी पार्टियों पर कई मामले दर्ज किए जा चुके हैं लेकिन बीजेपी के चुनावी जुलूसों पर अब भी कोई बड़ी…
  • Rohit vemula
    फ़र्रह शकेब
    स्मृति शेष: रोहित वेमूला की “संस्थागत हत्या” के 6 वर्ष बाद क्या कुछ बदला है
    18 Jan 2022
    दलित उत्पीड़न की घटनायें हमारे सामान्य जीवन में इतनी सामान्य हो गयी हैं कि हम और हमारी सामूहिक चेतना इसकी आदी हो चुकी है। लेकिन इन्हीं के दरमियान बीच-बीच में बज़ाहिर कुछ सामान्य सी घटनाओं के प्रतिरोध…
  • bank
    प्रभात पटनायक
    पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय बाज़ारों के लिए बैंक का निजीकरण हितकर नहीं
    18 Jan 2022
    बैंकों का सरकारी स्वामित्व न केवल संस्थागत ऋण की व्यापक पहुंच प्रदान करता है बल्कि पूंजीवाद की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License