NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?
मौजूदा वक़्त की हालत यह है कि वित्तीय बाजार की पूरी दुनिया पर डॉलर का दबदबा है। लंदन, न्यूयॉर्क से वित्तीय बाजार नियंत्रित हो रहा है लेकिन दुनिया के उत्पादन श्रृंखला पर अमेरिका का दबदबा नहीं है।
अजय कुमार
10 May 2022
dollar

ढाई महीने से ज्यादा हो चुके रूस और यूक्रेन की लड़ाई दुनिया के सामने हर दिन कई तरह के सवाल खड़ा कर रही है। एक अहम सवाल डॉलर की ग्लोबल करेंसी के तौर पर मान्यता से जुड़ा है। रूस के तकरीबन 300 बिलियन डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। रूस के सेंट्रल बैंक पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। यानी रूस चाहकर भी  डॉलर में जमा किये गए अपने पैसे का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। रूस अपने सेंट्रल बैंक के जरिये दूसरे देश के साथ लेन देन नहीं कर सकता है।

इसका मतलब यह है कि रूस का पैसा रूस ही इस्तेमाल नहीं कर सकता है। जबकि किसी देश द्वारा डॉलर में विदेशी मुद्रा भंडार रखने का मतलब है कि जब उस देश को डॉलर की जरूरत पड़े तो उसे डॉलर मिल जाए। डॉलर जारी करने वाला देश भी यही वायदा करता है कि जब भी कोई देश अपनी विदेशी मुद्रा से डॉलर की मांग करेगा तो उसे डॉलर मिल जायेगा।

लेकिन रूस पर लगे प्रतिबन्ध से यह सवाल उठता है कि क्या वाकई विदेशी मुद्रा भंडार के तौर पर डॉलर का इस्तेमाल करना उचित है? डॉलर को  विदेशी मुद्रा भंडार के तौर पर इस्तेमाल करने का मतलब कहीं अप्रत्यक्ष तौर पर अमेरिका की गुलामी स्वीकारना तो नहीं है? 

यह कैसे जायज हो सकता है कि कोई देश अपने ही पैसा का इस्तेमाल नहीं कर पाए? मान लिया जाए कि भारत और पाकिस्तान के बीच लम्बे समय तक युद्ध चले, भारत के विदेशी भंडार पर अमेरिक प्रतिबन्ध लगा दे, तब क्या होगा? यह कुछ जरूरी सवाल है जो डॉलर को ग्लोबल करेंसी के तरह इस्तेमाल करने पर खड़ा हुए हैं? इन सभी सवालों पर सही दिशा में सोचने से पहले थोड़ा इस पहलू को समझ लेते हैं कि डॉलर को ग्लोबल करेंसी के तौर पर क्यों माना जाता है?

ग्लोबल करेंसी उस करेंसी को कहा जाता है, जिसके जरिये पूरी दुनिया के देशों के बीच सबसे अधिक लेन देन होता है। अंतर्राष्ट्रीय लेन देन में जिसे सबसे अधिक स्वीकार किया जाता है। पिछले कुछ सालों का ट्रेंड देखा जाए तो वैश्विक स्तर पर देशों के सेंट्रल बैंक के बीच तकरीबन 60 प्रतिशत लेन देन डॉलर में हो रहा है। पूरी दुनिया के विदेशी विनमय  बाजार यानी फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में डॉलर की तूती बोलती है। तकरीबन 90 प्रतिशत विदेशी विनिमय यानी विदेशी लेन-देन डॉलर में होता है। दुनिया के 185 देशों की अपनी-अपनी करेंसी है। इनकी साख देश के सीमा के भीतर है लेकिन देश की सीमा के बाहर यानी विदेशी व्यापार के लिए दुनिया के सभी देश डॉलर का इस्तेमाल करते है। दुनिया का तकरीबन 40 प्रतिशत कर्ज डॉलर में दिया और लिया जाता है। पूरी दुनिया में डॉलर की इस तरह की स्वीकृति करना अमेरिका की मजबूत अर्थव्यवस्था  है।

साथ में अगर तकनीकी तौर पर देखा जाए तो साल 1944 में ब्रेटनवुड समझौते के बाद पूरी दुनिया में डॉलर को मानक के तौर अपनाने की शुरुआत हुई। साल 1944 से पहले सोने की मांग के आधार पर देश अपनी मुद्रा की कीमत तय करते थे। साल 1944 के बाद ने देशों अपनी मुद्रा के पीछे डॉलर को अपनाना शुरू कर दिया। यह सब बताता है कि पूरी दुनिया में ग्लोबल करेंसी के तौर पर डॉलर का राज चलता है। कुल डॉलर के 65 फ़ीसदी डॉलर का इस्तेमाल अमरीका के बाहर होता है। देशों के केंद्रीय बैंक में जो विदेशी मुद्रा भंडार है उसका 60 फीसदी से फीसदी से अधिक हिस्सा अमेरिकी डॉलर में है।

डॉलर की यह मजबूती बताती है कि किसी देश के लिए डॉलर की अहमियत क्या है? अगर किसी देश को डॉलर से काट दिया जाए तो इसका मतलब  यह हुआ कि उसे आयात और निर्यात से काट दिया गया। उसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से काट दिया गया। वह अपने माल और सेवाएं दूसरे देश में इस तरह से नहीं बेच और खरीद सकता है, जिस तरह से दूसरे देश बेच और खरीद सकते हैं।

केवल रूस पर ही नहीं बल्कि ईरान, वेनेजुएला और अफ़ग़ानिस्तान सहित कई ऐसे देश हैं, जिन पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाकर उन्हें डॉलर का इस्तेमाल करने से रोका गया। जब इस तरह की कार्रवाई की जाती है तो उस भरोसे को तोड़ा जाता है, जिसके ऊपर वैश्विक व्यापार काम करता है। चाहे जो भी कारण हों लेकिन इस भरोसे को तोड़ना कि कोई अपने ही पैसे का इस्तेमाल न कर पाए, यह दुनिया की अब तक की व्यवस्था पर कड़े सवाल उठाता है।

डॉलर के केंद्र में घूमती दुनिया के वित्तीय बाजार पर खड़े  किये गए इन सवालों का यह मतलब नहीं है कि रूस की पक्षधरता की जा रही है या अमेरिका का विरोध किया जा रहा है।  इसका मतलब यह है कि दुनिया में किसी एक करेंसी की स्वीकार्यता से ज्यादा कई करेंसी की स्वीकार्यता को बढ़ाने की जरूरत है।  अगर ऐसा नहीं होगा तो अमेरिका की दादागिरी और गुलामी की तलवार हमेशा लटकती रहेगी। डॉलर से जुडी इस प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर एशियन डेवेलोपमेंट बैंक ने एक बार प्रस्ताव दिया था कि रूस, चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्था को डॉलर के इर्द-गिर्द घूमती दुनिया को चुनौती देने पर विचार करना चाहिए। दुनिया का वित्तीय बाजार पूरी तरह से डॉलर के कब्जे में जाने से रोकने पर विचार करना चाहिए। थाईलैंड को वियतनाम के साथ व्यापर करने के लिए अमेरिका के डॉलर का इंतज़ार करने का मतलब डॉलर की प्रभुता को स्वीकार करना है।  

मौजूदा वक्त की हालत यह है कि वित्तीय बाजार की पूरी दुनिया पर डॉलर का दबदबा है। लंदन, न्यूयॉर्क से वित्तीय बाजार नियंत्रित हो रहा है लेकिन दुनिया के उत्पादन श्रृंखला पर अमेरिका का दबदबा नहीं है। सबसे अधिक निर्यात अमेरिका से नहीं होता है। यह एशिया की तरफ झुका हुआ है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो माल और सेवाओं का उत्पादन दुनिया का जो हिस्सा कर रहा है, उस हिस्से के पास दुनिया के वित्तीय बाजार का नियंत्रण नहीं है। जो कोयला और पेट्रोल का उत्पादन का करता है, उसके देश की करेंसी में वित्तीय लेन-देन नहीं होता बल्कि उस देश की करेंसी में होता है, जिसका वित्तीय बाजार पर  नियंत्रण है।  

चीन की मुद्रा रेनमिनबी से दुनिया का महज 2 प्रतिशत व्यापार होता है। इसलिए अचानक डॉलर के दबदबे को नहीं तोडा जा सकता है। ऐसा करना किसी भी तरह से जायज भी नहीं है। डॉलर की साख भी दुनिया में सबसे अधिक मजबूत है। दुनिया के देशों का भरोसा भी इसमें सबसे ज्यादा है। जब तक इतनी बड़ी साख और मजबूती किसी करेंसी पर नहीं होती तब तक दुनिया से डॉलर की केंद्रीय भूमिका नहीं जाने वाली। लेकिन इसके बावजूद दुनिया के देशों को इस पर तो विचार करना चाहिए कि दुनिया का वित्तीय बाजार केवल डॉलर के इर्द गिर्द न घूमे बल्कि बहुध्रुवीय बने। चीन, भारत और रूस जैसे देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो ऐसा किया जा सकता है। डॉलर के जरिये दुनिया में बनी अदृश्य गुलामी की सम्भावना को तोडा जा सकता है।  

( इस लेख की सामग्री न्यूज़क्लिक यू ट्यूब चैनल पर उपलब्ध वीडियो what is happening in global currency market से ली गयी है। इस वीडियो में न्यूज़क्लिक के चीफ़ एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ ने एशियन डेवेलोपमेंट बैंक के भूतपूर्व डायरेक्टर रजत नाग से बात की है।)

dollar
global currency
America
Russia
China
What is happening in global currency  

Related Stories

डेनमार्क: प्रगतिशील ताकतों का आगामी यूरोपीय संघ के सैन्य गठबंधन से बाहर बने रहने पर जनमत संग्रह में ‘न’ के पक्ष में वोट का आह्वान

रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने के समझौते पर पहुंचा यूरोपीय संघ

यूक्रेन: यूरोप द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाना इसलिए आसान नहीं है! 

पश्चिम बैन हटाए तो रूस वैश्विक खाद्य संकट कम करने में मदद करेगा: पुतिन

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

90 दिनों के युद्ध के बाद का क्या हैं यूक्रेन के हालात

यूक्रेन युद्ध से पैदा हुई खाद्य असुरक्षा से बढ़ रही वार्ता की ज़रूरत

खाड़ी में पुरानी रणनीतियों की ओर लौट रहा बाइडन प्रशासन

फ़िनलैंड-स्वीडन का नेटो भर्ती का सपना हुआ फेल, फ़िलिस्तीनी पत्रकार शीरीन की शहादत के मायने


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब पहुंची 
    05 May 2022
    देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 3,275 नए मामले सामने आए हैं | देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 19 हज़ार 719 हो गयी है।
  • Bharat Ek Mauj
    न्यूज़क्लिक टीम
    भारत एक मौज: बॉलीवुड जनता की हिंदी पार्टी
    05 May 2022
    भारत एक मौज के इस एपिसोड में आज संजय सवाल उठा रहे हैं कि देश में जनता के मुद्दों को उठाने के बजाए हमेशा ध्यान भटकाने वाले मुद्दे ही क्यों उठाए जाते हैं।
  • VOILENCE
    रवि शंकर दुबे
    चुनावी राज्यों में क्रमवार दंगे... संयोग या प्रयोग!
    05 May 2022
    ईद वाले दिन राजस्थान में हुई हिंसा ये बताने के लिए काफी है कि आगे आने वाले चुनावों में मुद्दे क्या होंगे। इतना तो तय है कि विकास की बात भूल जाइए।
  • urmilesh
    न्यूज़क्लिक टीम
    प्रेस फ्रीडम सूचकांक में भारत 150वे स्थान पर क्यों पहुंचा
    04 May 2022
    रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स के वैश्विक प्रेस फ्रीडम सूचकांक में इस बार भारत पिछले साल के मुकाबले आठ अंक और नीचे गिरा और 180 देशो की सूची में 150 वे पर आ गया. पिछले दिनो भारत डेमोक्रेसी के वैश्विक…
  • शलका चौहान
    कैसे जहांगीरपुरी हिंसा ने मुस्लिम रेहड़ी वालों को प्रभावित किया
    04 May 2022
    महामारी और उसके बाद लगाए गए लॉकडाउन ने मुस्लिम रेहड़ी वालों की आर्थिक गतिविधियों का काफ़ी कम कर दिया है, अब सांप्रदायिक नफ़रत ने उनके ख़िलाफ़ हमले और भेदभाव की घटनाओं में भी इज़ाफ़ा किया है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License