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क्या है बिजली बिल? जिसकी वापसी की मांग नए कृषि कानूनों के साथ की जा रही है.!
साल 2003 के बिजली कानून में जो कमियां है उसे साल 2020 में प्रस्तावित बिजली बिल के जरिए दूर नहीं किया जा रहा है, बल्कि साल 2003 के बिजली कानून के जरिए बिजली क्षेत्र में जो सरकारी दखल थी, उसे पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश की जा रही है। यानी बिजली क्षेत्र को पूरी तरह बाज़ार के हवाले किए जा रहा है।
अजय कुमार
05 Dec 2020
बिजली
Image courtesy: ETEnergyworld

जैसे कंपनी राज में जनहित को किनारे कर मुनाफे के लिए कानून बनाए जाते थे, ठीक वैसे ही लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर पैसे और मीडिया के दम पर बहुमत से अधिक सीटों के साथ बैठी सरकारें करती हैं। सत्ता पर काबिज होने का घमंड और मीडिया के दम पर झूठ को सच की तरह प्रस्तुत करने के पैतरों की वजह से कोरोना महामारी के दौर में भाजपा सरकार ने खेती किसानी से जुड़े तीन नए कानून लागू कर दिए और बिजली अधिनियम में संशोधन करने के लिए बिजली बिल भी प्रस्तुत कर दिया। अब आलम यह है कि भारत की जनता भी इन कानूनों और बिलों को खारिज करने के लिए सड़क पर सरकार से जमकर मुठभेड़ कर रही है। खेती किसानी से जुड़े कानून के बारे में तो आपने बहुत कुछ पढ़ा होगा। लेकिन बिजली बिल के बारे में पब्लिक में चर्चा नहीं हुई है तो चलिए इस समझने के सफर पर चलते हैं-

तकरीबन 30 सालों से बिजली क्षेत्र में एक कार्यकर्ता की तरह सक्रिय के अशोक राव न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहते हैं कि साल 1991 के बाद भारत में जितने भी आर्थिक सुधार हुए हैं उन सब पर वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक की रणनीतियों की छाप है। भारत जैसे देश को अपने यथार्थ को देखकर फैसले लेने चाहिए लेकिन सारे फैसले वर्ल्ड बैंक की बनाई गई नीति के तहत होते हैं। बिजली क्षेत्र में भी यही हुआ। साल 2003 के बिजली कानून में जो कमियां है उसे साल 2020 में प्रस्तावित बिजली बिल के जरिए दूर नहीं किया जा रहा है, बल्कि साल 2003 के बिजली कानून के जरिए बिजली क्षेत्र में जो सरकारी दखल थी, उसे पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश की जा रही है। ऐसी नीति के पीछे आधारभूत दर्शन यही है की विधायन यानी सरकारी नियंत्रण को बिजली क्षेत्र से पूरी तरह हटा दिया जाए। प्राइवेट इन्वेस्टर्स को खुली इजाजत दी जाए। आपसी प्रतियोगिता हो। और सरकारी नियंत्रण से मुक्त एक रेगुलेटर बॉडी हो, जो बिजली क्षेत्र को नियंत्रित करने का काम करें। 

साल 2003 के बाद बिजली क्षेत्र को बाजार के लिए आजाद कर देने के बावजूद बिजली क्षेत्र में इन्वेस्टमेंट नहीं हुए। बिजली क्षेत्र में देश के अंदर जिन्होंने पैसा लगाया उन्हें बहुत अधिक नुकसान सहना पड़ा। बिजली उत्पादन की जगह घरों तक बिजली पहुंचाने वाली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी का बैंकों से लिया हुआ कर्ज बढ़ता चला गया, बैंक कर्ज के बोझ तले डूबते चले गए। के अशोक राव कहते हैं कि इन सब से उबार पाने के लिए साल 2014 में और उसके बाद अब साल 2020 के प्रस्तावित बिजली बिल में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह कहा जाए कि सरकार बिजली क्षेत्र के उन खामियों पर हमला कर रही है जो बिजली क्षेत्र को बाजार के हवाले कर देने पर पैदा हुई हैं।

बिजली क्षेत्र के बारे में सबसे बेसिक बात यह होती है कि इसका इस्तेमाल सभी करते हैं। यानी बिजली क्षेत्र में कोई भी परिवर्तन किया जा रहा है तो इसका प्रभाव सभी पर पड़ेगा। जहां पर भारत का पूरा समाज प्रभावित होता हो वहां पर राज्य का रहना और राज्य की दखलंदाजी की जरूरत बहुत अधिक है। वजह यह कि भारत की बहुत बड़ी आबादी गरीबी में रहती है। जैसे मुंद्रा नाम की कंपनी पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की तौर पर काम कर रही है। इंडोनेशिया से कोयले का आयात कर बिजली का उत्पादन किया जाता है। उत्पादन की लागत बढ़ती है तो वह डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी को ट्रांसफर की जाती है। यह सब ध्यान में रखकर मुंद्रा डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी बिजली की दर तय करती है। बिजली की दर का भुगतान जनता को करना है। अगर यह दर अधिक होती है तो इसे कम कैसे किया जाए? इसका जवाब है कि पावर सेक्टर में हर राज्य की दखल हमेशा रहे, तभी जनहित को मकसद बना कर फैसले लिए जाने की संभावना बची रहती है।

के अशोक राव कहते हैं कि अभी तक केवल दिल्ली को छोड़कर तकरीबन हर राज्य में पावर डिस्ट्रीब्यूशन का काम राज्य सरकार करती है। लेकिन फ्रेंचाइजी बनाकर बहुत सारे शहरों में पावर डिस्ट्रीब्यूशन का काम प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां भी कर रही हैं। केंद्र सरकार यह कहते आ रही है कि वह राज्यों को होने वाले पावर डिस्ट्रीब्यूशन के नुकसान की भरपाई के लिए कर्ज तभी देगी जब राज्य पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों का प्राइवेटाइजेशन शुरू कर देंगे। यानी पावर डिस्ट्रीब्यूशन का काम जब प्राइवेट क्षेत्र की कंपनियां करने लगेंगी। कानूनी तौर पर राज्य सरकार को मिले इस अधिकार को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने बिजली बिल लाया है। ताकि पावर सेक्टर का भरपूर प्राइवेटाइजेशन किया जा सके। यह सब साल 1990 के बाद वर्ल्ड बैंक ऑफ एशियन डेवलपमेंट बैंक के पावर सेक्टर की योजना के तहत हो रहा इन संस्थाओं का कहना है कि वह भारत को कर्जा तभी मुहैया कराएगी जब पावर सेक्टर का प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा।

के अशोक राव कहते हैं कि पावर सेक्टर को समझने के लिए इसे तीन भागों में बांटा जा सकता है। जनरेशन ट्रांसमिशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन। जनरेशन का मतलब होता है बिजली का उत्पादन करना, ट्रांसमिशन का मतलब होता है कि तारों के जरिए बिजली को किसी अमुक इलाके तक पहुंचाना और डिस्ट्रीब्यूशन का मतलब होता है बिजली को ट्रांसफार्मर से घरों तक पहुंचाना। साल 2003 के बिजली कानून से ऐसा लगता है कि सरकार ट्रांसमिशन वाले हिस्से को अपने पास रखना चाहती है जबकि जनरेशन और डिस्ट्रीब्यूशन का पूरी तरह से प्राइवेटाइजेशन करना चाहती है।

बिजली संविधान के तहत समवर्ती सूची का विषय है। यानी इस पर केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का हक है। लेकिन साल 2020 का बिल ऐसा है जो राज्य के हक को मार रहा है। साल 2003 के कानून में भी कुछ ऐसा ही हुआ। सरकार ने बिजली की कीमत निर्धारित करने के लिए एक नीति बनाई और सभी राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया कि उनकी रेगुलेटरी कमीशन इस नीति का पालन करें। जबकि संविधान के अनुसार यह होना चाहिए था कि सरकार कीमत निर्धारित करने के लिए नेशनल टेरिफ पॉलिसी बनाएं और राज्य सरकारें अपनी परिस्थितियों के हिसाब से उस नेशनल टेरिफ पॉलिसी को संशोधन कर अपनाएं या ना अपनाएं।

बिजली क्षेत्र की पृष्ठभूमि के बाद अब बिजली संशोधन बिल 2020 से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु और उनकी आलोचना से रूबरू होते हैं।

1. बिजली उत्पादन कंपनियों और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट को सही तरीके से लागू करवाने के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट इन्फर्समनेट अथॉरिटी बनाई जाएगी। यह बात समझ में आती है कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों और जनरेशन कंपनियो के बीच कीमत तय करने और कीमत वसूलने को लेकर समय-समय पर मतभेद आ सकते हैं। इन्हें ठीक करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट इंफोर्समेंट अथॉरिटी भी हो। लेकिन सवाल यह है कि इसमें तीसरा पक्ष जनता का है। जनता के पक्ष को रखने के लिए स्टेट का होना जरूरी है। ताकि कभी भी अगर कॉन्ट्रैक्ट ऐसा बने जो जनता के खिलाफ जाता हो तो उसे खारिज किया जा सके। जैसे कि पावर जनरेशन कंपनी और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां अधिक कीमत पर बिजली बेचने के लिए राजी हो जाए लेकिन यह अधिक कीमत इतनी हो जिससे आम जनता पर बोझ पड़े. तब क्या हो? ऐसी स्थिति से निपटने के लिए राज्य की दखलअंदाजी होना बहुत जरूरी है. और यह दखलअंदाजी इस बिल में नहीं दिखती।

2. इस बिल के तहत यह प्रावधान है कि एक सेंट्रल सलेक्शन अथॉरिटी बनाई जाएगी। यह सेलेक्शन बॉडी कॉन्ट्रैक्ट इंफोर्समेंट अथॉरिटी के सदस्यों, सभी राज्यों की स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन के सदस्यों का चुनाव करेगी। इसकी प्रखर आलोचना यही है कि यह भारत जैसे बड़े भूगोल में फैले देश में सेंट्रलाइजेशन की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। बिजली क्षेत्र की जिस तरह की परेशानी से अरुणाचल प्रदेश का कोई इलाका गुजर रहा हो ठीक वैसे ही परेशानी से बिहार का कोई इलाका नहीं गुजरता। चूंकि परिस्थितियां बदलते ही परेशानियां बदल जाती हैं, इसलिए ऐसी किसी भी चयन समिति पर राज्य सरकार का अधिकार होना चाहिए। लेकिन ऐसा अधिकार प्रस्तावित बिजली बिल में केंद्र सरकार को दिया गया है। इसका सीधा मतलब है कि पूरे देश को केंद्र अपनी देखरेख में चलाना चाहता है। जो पूरी तरह से नामुमकिन है। इसके साथ केंद्र स्तर पर बनाई जाने वाली इस चयन समिति का चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट का कोई रिटायर्ड जज होगा। यह बात भी समझ से परे है। सवाल यही है कि आखिरकार किसी नयायिक क्षेत्र के व्यक्ति को बिजली क्षेत्र की कितनी समझ होती है।

3. अब बात करते हैं सब्सिडी और प्रॉस सब्सिडी की। प्रस्तावित बिल के तहत प्रावधान है कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को सब्सिडी देने की बजाय सीधे उपभोक्ताओं के खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से सब्सिडी दी जाए। साथ में क्रॉस सब्सिडी खत्म कर दी जाए। सब्सिडी यानी सरकार द्वारा आर्थिक मदद ताकि जनता पर कम भार पड़े। क्रॉस सब्सिडी यानी उन लोगों और संगठनों को ऊंची कीमत पर बिजली बेचना जिनकी हैसियत अच्छी है और यहां से हुई कमाई के जरिए उन लोगों की बिजली की दर को कम करना जिनकी हैसियत कमजोर है। जैसे औद्योगिक क्षेत्र में बिजली की दर ऊंची रखकर किसानी क्षेत्र में बिजली की दर कम करना। 

क्रॉस सब्सिडी खत्म करने वाले प्रावधान की सराहना करने वालों का कहना है कि मुफ्त खोरी की वजह से किसान बहुत अधिक बिजली का उपभोग करता है और झेलना मेहनत करने वाले इंडस्ट्री सेक्टर को पड़ता है। इसलिए यह प्रावधान अच्छा है। एक तर्क और है कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां कम कीमत पर बिजली बेचकर खुद को घाटे में रखती हैं। सरकार सही से उन्हें सब्सिडी नहीं दे पाती है। जिसकी वजह से वह बैंकों से कर्ज लेते हैं। बैंकों पर बोझ बढ़ता चला जाता है।

के अशोक राव कहते हैं कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कृषि क्षेत्र में सिंचाई की जरूरत होती है बिजली की नहीं। जब नहरों का फैलाव ठीक से नहीं हुआ है तो बिजली के जरिए ही जमीन के अंदर से पानी निकाला जाता है। खेतों में इस्तेमाल किया जाता है। और दुनिया में अनाज की क्या जरूरत है? इसे दुनिया का हर इंसान समझता है। इसलिए मुफ्तखोरी वाला तर्क तो बिल्कुल ठीक नहीं। बिजली का उत्पादन इसलिए किया जाता है ताकि उसे जनकल्याण के काम में इस्तेमाल किया जा सके। अगर खेती किसानी में बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा है तो इससे अच्छा क्या हो सकता है। सरकार कह रही है कि वह डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए लोगों के खाते में सब्सिडी पहुंचा देगी। लेकिन जरा सोचिए अगर एक किसान के पास बिजली का बिल ही 8000 से 10,000 रुपये का आएगा तो बाद में मिलने वाली सब्सिडी का क्या मतलब। किसान बिजली बिल को कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। यह उनसे बिजली का हक छीनने जैसा है।

अब क्रॉस सब्सिडी की बात करते हैं। अगर क्रॉस सब्सिडी मिलना बंद हो जाएगा तो सब्सिडी का भार सरकार पर और अधिक बढ़ेगा। ब्रुकिंग रिसर्च सेंटर का अध्ययन है कि साल 2018-19 में तकरीबन 90 हजार करोड रुपए बिजली सब्सिडी पर खर्च हुआ। अगर क्रॉस सब्सिडी हटा दी जाएगी तो इस खर्चे में तकरीबन 130 फ़ीसदी का इजाफा हो सकता है।

बाकी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का तरीका तो बढ़िया है लेकिन जरा सोचिए जो लोग किरायों के मकानों में रहते हैं उनका क्या होगा? भारत के जिन 86 फ़ीसदी लोगों की आमदनी 10,000 रुपये से कम है, अगर उनकी बिजली का बिल महीने में 3000 से 4000 रुपये आने लगे तब क्या होगा?

4. इस बिल में फ्रेंचाइजी के साथ-साथ अब सब लाइसेंसी शब्द का भी इस्तेमाल किया गया है, लेकिन फ्रेंचाइजी और सब लाइसेंसी में क्या अंतर होगा? इसके बारे में कोई साफ तस्वीर प्रस्तुत नहीं होती। फ्रेंचाइजी का मतलब यही कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनिया जिस इलाके में बिजली पहुंचाने की जिम्मेदारी ले लेती हैं तो उन्हें उस इलाके का फ्रेंचाइजी कहा जाने लगता है। ठीक है ऐसा ही कांसेप्ट सब लाइसेंसी के बारे में भी है, लेकिन यह भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि बिजली डिस्ट्रीब्यूट करने की जिम्मेदारी इन्हीं के सहारे बाजार को सौंप दी गई है। खुलकर प्राइवेटाइजेशन की बात की गई है।

5. अभी तक स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमिशन राज्यों में बिजली की कीमत निर्धारित करता आया है। लेकिन प्रस्तावित बिल के जरिए या जिम्मेदारी नेशनल टेरिफ पॉलिसी को दे दी गई है। यानी केंद्र यह संस्था सभी राज्यों के लिए बिजली की दरें तय करेगी। बहुत सारे राज्यों ने इसके खिलाफ जमकर आवाज बुलंद की है। जम्मू कश्मीर की पहाड़ों में बिजली पहुंचाने में जो खर्चा आता है वही खर्चा दिल्ली के कंक्रीट के जंगलों में पहुंचाने में नहीं आता। सब जगह अलग-अलग परिस्थितियां हैं। यह प्रावधान भारतीय संघवाद के खिलाफ है।

बिजली बिल में और भी कई छोटे-छोटे बिंदु हैं जिस पर असहमतियां है। लेकिन उन सब की प्रवृतियां इन्हीं पांच बिंदुओं में समेटी जा सकती हैं।

चलते-चलते एक अंतिम बात। बहुत सारे लोग बिजली क्षेत्र की तुलना टेलीकॉम सेक्टर से करते हुए कहते हैं कि जिस तरह से टेलीकॉम सेक्टर में कंपटीशन बढ़ने की वजह से दरें कम हो गई ठीक उसी तरह से बिजली सेक्टर में भी बाजार के आने और प्राइवेट कंपटीशन की वजह से बिजली की दरें कम हो जाएंगे। लोगों को सुविधा मिलेगी। लेकिन वह भूल जाते हैं कि बिजली तारों के जरिए लोगों तक पहुंचती है और हाथ के मोबाइल में आने वाला सिग्नल बेतार होता है।

बिजली सेक्टर बहुत ही जटिल सेक्टर है। इस आर्टिकल का लेखक भी बिजली सेक्टर को अच्छे से नहीं समझता। बिजली सेक्टर की बहुत सारे हिस्से ऐसे हैं जिन्हें अगर समग्रता से समझा जाए तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि टेलीकॉम और बिजली सेक्टर की तुलना नहीं की जा सकती। और टेलीकॉम सेक्टर में भी आज क्या हो रहा है ये सबके सामने है। किस तरह सरकारी और अन्य कंपनियां बर्बाद हो रही हैं और कैसे एक कंपनी का एकाधिकार होता जा रहा है, और कैसे फ्री-फ्री के नारे के बाद वसूली शुरू हो चुकी है, वो सबके सामने है।

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