NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
बाइडेन प्रशासन अफ़ग़ानों के साथ जो कर रहा है वह क्रूरता है!
निश्चित रूप से अमेरिका के लिए प्रायश्चित का काम यही हो सकता है कि राष्ट्रपति बाइडेन अफ़ग़ानों की तत्काल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 9 बिलियन डॉलर लौटा दें, और विश्व बैंक और आईएमएफ़ को देश की सहायता करने की इजाज़त दे दें, तभी अफ़ग़ान नागरिक अपने देश के गौरवपूर्ण इतिहास के सबसे निचले स्तर से ऊपर उठ सकते हैं।
एम. के. भद्रकुमार
14 Sep 2021
Translated by महेश कुमार
बाइडेन प्रशासन अफ़ग़ानों के साथ जो कर रहा है वह क्रूरता है!
Image Courtesy: AFP

रूसी फ़ैडरेशन की सुरक्षा परिषद के सचिव, निकोले पेत्रुशेव द्वारा 7-8 सितंबर को की गई नई दिल्ली की यात्रा का सबसे अच्छा हिस्सा यह हो सकता है कि दोनों देश अपनी दोस्ती के चरण  की खोज कर सकते हैं, तब, जब अमेरिका के नेतृत्व वाला क्वाड (चार देशों का गठबंधन) अपरिवर्तनीय रूप से उन्हें जुदा करता है और दिल्ली समुद्र तटों, पहाड़ों और हवा में चीनियों के खिलाफ मोर्चा लड़ने के लिए अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति पर सवार है।

अमेरिकी, निश्चित रूप से, शीत युद्ध की दुनिया में वापस लौट आए हैं, जो खुद की 'परमाणु श्रेष्ठता' के मायावी सपने को साकार करने के लिए रूस को कमज़ोर और संभवत: खंडित करने  के जुनून में सवार हैं।

समकालीन विश्व हालात में विरोधाभास काफी मात्रा में मौजूद हैं और भारत-रूस संबंध इसका कोई अपवाद नहीं हैं। शनिवार को दिल्ली में काफी जोशीला मिज़ाज देखने को मिला जब ऑस्ट्रेलियाई मंत्रियों को दिल्ली बुलाया गया और काबुल में तालिबान सरकार को धमकाने के तरीकों और साधनों के बारे में उनसे बातचीत की गई।  

हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर को इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऑस्ट्रेलियाई सैनिक रातों-रात अफ़ग़ानिस्तान से भाग गए थे, जब यह पता चला कि उन्होंने लक्ष्य साधने के अभ्यास के लिए अफ़ग़ान नागरिकों का इस्तेमाल किया था और अपने मेजबान देश में कई जघन्य  अपराध थे! फिर भी, भारत और ऑस्ट्रेलिया आज तालिबान के अधीन अफ़ग़ान महिलाओं की दुर्दशा से चिंतित नज़र आता हैं!

संक्षेप में कहें तो, भारत और रूस के सुरक्षा ज़ारों के बीच महान संमिलन यह है कि वे बड़ी अशांत मुस्लिम आबादी वाले राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दमन से व्यथित महसूस करते हैं। दिल्ली और मॉस्को को इस बात की चिंता है कि उनके बाहरी वातावरण में राजनीतिक इस्लाम के प्रभुत्व से उनकी अपनी मुस्लिम आबादी कट्टरपंथी बन सकती है।

फिर भी, छोटी सी बात यह है कि पेत्रुशेव वास्तव में सप्ताह के भीतर आने वाले तीसरे ज़ार हैं  - जो यूके सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस या एमआई 6 के प्रमुख रिचर्ड मूर और यूएस सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के प्रमुख विलियम बर्न्स के बाद आए हैं। पश्चिमी शक्तियाँ इस असाधारण समय में दिल्ली को इस क्षेत्र में सबसे तार्किक गंतव्य स्थान के रूप में मानती हैं – उपरोक्त देशों के बीच इस किस्म की आपसी वार्ताएं राजनीतिक इस्लाम के उदय और अफ़ग़ानिस्तान के ललाट पर  उभरते लाल सितारे के प्रतिरोध में है। 

अफ़ग़ानिस्तान पर बीबीसी के प्रसारण कुछ महीने पहले म्यांमार और बेलारूस के बारे में किए गए उसके भयानक प्रसारण के समान हैं – यह सब सोशल मीडिया के कुशल इस्तेमाल के माध्यम से एक 'रंग क्रांति' के जरिए चीन और रूस में मौजूदा शासन को उखाड़ फेंकने और इन शत्रुतापूर्ण शक्ति केंद्रों को घेरने का प्रयास है। पश्चिम देशों के लिए मानवाधिकार के मुद्दों को हथियार बनाना आसान हो गया है।

क्या ठाठ-बाट से अंग्रेजी बोलने वाली अफ़ग़ान महिलाएं वास्तव में अपने देश का प्रतिनिधित्व करती हैं? "द अदर अफ़ग़ान वीमेन" जो न्यू यॉर्कर पत्रिका में एक शानदार निबंध का शीर्षक है जिसे आनंद गोपाल ने लिखा है जोकि पश्चिमी दुनिया में अफ़ग़ान युद्ध के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकारों में से एक है और जो प्रशंसित 2014 की पुस्तक के लेखक हैं, जिसका शीर्षक ‘नो गुड मेन अमंग द लिविंग: अमेरिका, तालिबान एंड द वॉर थ्रू अफ़ग़ान आइज़' है?

गोपाल ने खुलासा किया कि सोशल मीडिया के कारण उत्साहित शहरी लोगों की तुलना में अफ़ग़ान ग्रामीण इलाकों में बताने वाली कहानियां पूरी तरह से अलग है। 70 प्रतिशत से अधिक अफ़ग़ान शहरों में नहीं रहते हैं। गोपाल लिखते हैं कि ग्रामीण इलाकों में, बीबीसी की रज़िया इकबाल और लिस डौसेट द्वारा दिखाई जाने वाली वास्तविकता पूरी तरह से अलग है।

अमेरिकी सेना और अमरुल्ला सालेह के नाटो-प्रशिक्षित अफ़ग़ान विशेष बलों के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन पूरी तरह से "खतरे” से खाली नहीं था; यहाँ तक कि धूप में चाय पीना या अपनी बहन की शादी में गाड़ी चलाना भी एक संभावित खतरा होता था।” यहाँ गोपाल के निबंध का एक अंश दिया जा रहा है:

"जमीन पर कुछ ब्रिटिश अधिकारी चिंतित दिखे कि अमरीका बहुत से नागरिकों को बेवजह मार रहा था, और उन्होने इस क्षेत्र से अमेरिकी विशेष बलों को हटाने के नाकाम प्रयास किए थे। इसके बजाय, दुनिया भर से सैनिकों ने हेलमंड में प्रवेश किया, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई, कनाडाई और डेन सैनिक शामिल थे। लेकिन ग्रामीणों को इनके बीच का अंतर नहीं पता था - उनके लिए कब्जा करने वाले केवल "अमेरिकी" थे। पास के एक गाँव की महिला पज़ारो याद करती है, “दो तरह के लोग थे- एक काले चेहरे वाले और दूसरे गुलाबी चेहरे वाले। जब हम उन्हें देखते हैं, तो हम घबरा जाते हैं।" गठबंधन सेना ने स्थानीय लोगों में तालिबान से मुक्ति पाने की भूख को चित्रित किया था, लेकिन 2011 की एक क्लासिफाइड खुफिया रिपोर्ट में पाया गया कि गठबंधन बलों की सामुदायिक धारणाएं जनता की समझ के "प्रतिकूल" थी,  ग्रामीणों ने चेतावनी दी थी कि, यदि गठबंधन सेनाएं "क्षेत्र नहीं छोड़ती है, तो स्थानीय नागरिकों को इलाका खाली करने पर मजबूर होना पड़ेगा।”

यह स्थिति 10 साल पहले ही पहुँच चुकी थी - और अभी भी पश्चिमी कब्जे के 10 साल बाकी थे। मानव सुरक्षा, एक देश के विपरीत, पूर्ण है - केवल इसलिए नहीं कि आप केवल एक बार जीते हैं या आपकी बेटी केवल एक बार ही अपनी मासूमियत खो सकती है। यदि आपके युवाओं का इस्तेमाल नशे में धुत ऑस्ट्रेलियाई सैनिक लक्षित अभ्यास के लिए करते हैं या अपने ही देश के सुरक्षा बल युवाओं के साथ अभद्रता या उनका यौन शोषण करते हैं तो आपके जीवन का फिर क्या मूल्य रह जाता है?

मिसाल के तौर पर, 31 अगस्त को कब्जा खाली करने से ठीक पहले, अमेरिकी सैनिकों ने अंतिम अपराध को अंजाम दिया – जघन्य अपराध की अंतिम छाप – यानि अमरीकियों ने ड्रोन के जरिए सहायता का काम करने वाले एक कार्यकर्ता और सात छोटे बच्चों के परिवार को मार दिया था, और फिर बड़ी ही क्रूरता से झूठ बोला गया कि वह आदमी आईएसआईएस आतंकवादी था। .

क्या इन अंग्रेजों के हाथ आधुनिक इतिहास में मानव रक्त से सने हुए नहीं हैं? लेकिन अमेरिकी इतने प्रतिशोधी हैं कि वे अफ़गानों को अपना पैसा भी खर्च नहीं करने देंगे। क्या अमेरिका को अन्य लोगों को डराने-धमकाने के बजाय अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं नहीं करना चाहिए? एक छोटे से वायरस ने पिछले डेढ़ साल में 6,77,737 अमेरिकियों की जान ले ली है... दुखों से भरे ऐसे देश की आत्मा में इतना लोहा कैसे हो सकता है?

बाइडेन प्रशासन ने अफ़ग़ानों के साथ जो किया वह क्रूरता है। कोई गलती न हो, प्रोमेथियस, सिसिफस, कोरिंथ, एक्टन - उन्हें प्राचीन ओलंपियन देवताओं ने बहुत कम अपराधों के लिए भयानक उदाहरण के रूप में माना था।

यह एक ईसाई गुण हो सकता है और निश्चित रूप से प्रायश्चित का काम भी हो सकता है यदि राष्ट्रपति बाइडेन अफ़ग़ानों की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए 9 बिलियन डॉलर लौटा देते हैं, और विश्व बैंक और आईएमएफ को उस देश की सहायता करने की इजाज़त दे देते हैं तो वे अपने देश के गौरवपूर्ण इतिहास के सबसे निचले बिंदु से ऊपर उठ सकते हैं। अच्छा या बुरा, आगे का रास्ता निकालने की जिम्मेदारी तालिबान और साथी अफ़ग़ानों पर छोड़ दें तो बेहतर होगा।

एमके भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Reflections on Events in Afghanistan -16

Security Council of the Russian Federation
S. Jaishankar
Nikolay Patrushev
Afghanistan
Biden administration

Related Stories

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

सीमांत गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष: सभी रूढ़िवादिता को तोड़ती उनकी दिलेरी की याद में 

भारत ने खेला रूसी कार्ड

भारत को अफ़ग़ानिस्तान पर प्रभाव डालने के लिए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की ज़रूरत है

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

अगर तालिबान मजबूत हुआ तो क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ेगा असर?

150 से अधिक प्रतिष्ठित नागरिक जावेद अख़्तर और नसीरुद्दीन शाह के समर्थन में उतरे

अफ़ग़ानिस्तान को पश्चिमी नजर से देखना बंद करे भारतीय मीडिया: सईद नक़वी

‘भारत एक पड़ोसी भी है, महज़ अमेरिकी समर्थन के सहारे नहीं रहा जा सकता'–एएस दुलता

कोलकाता : वाम दलों ने द्वितीय विश्व युद्ध को याद कर अंतर्राष्ट्रीय शांति और एकजुटता दिवस मनाया


बाकी खबरें

  • Cuba
    ऋचा चिंतन
    वैश्विक एकजुटता के ज़रिये क्यूबा दिखा रहा है बिग फ़ार्मा आधिपत्य का विकल्प
    11 Jan 2022
    दुनिया को बिग फ़ार्मा के एकाधिकारवादी चलन का एक विकल्प सुझाते हुए क्यूबा मुनाफ़े से कहीं ज़्यादा अहमियत लोगों को देता है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, राज्य से वित्त पोषित अनुसंधान को बढ़ावा देता…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1,68,063 नए मामले, 277 मरीज़ों की मौत 
    11 Jan 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 2.29 फ़ीसदी यानी 8 लाख 21 हज़ार 446 हो गयी है।
  • kashi
    विजय विनीत
    काशी विश्वनाथ कॉरिडोर: कैसे आस्था के मंदिर को बना दिया ‘पर्यटन केंद्र’
    11 Jan 2022
    काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप सड़क के किनारे श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का न्यास सुविधा केंद्र है। यहां एक हेल्प डेस्क है, जिसके बाहर कांच के गेट पर 300 रुपये में सुगम दर्शन का पोस्टर चस्पा किया गया है।…
  • security lapse
    शिव इंदर सिंह
    “मोदी की सुरक्षा में चूक या राजनीतिक ड्रामा?” क्या सोच रहे हैं पंजाब के लोग! 
    11 Jan 2022
    जिला लुधियाना के नौजवान किसान जगजीत सिंह का कहना है, “पहली बात तो किसान मोदी के काफिले से करीब एक किलोमीटर दूरी पर थे। दूसरी बात उनके पास कोई हथियार नहीं थे। वह कम से कम मोदी को काले झंडे दिखा सकते…
  • Rahul and Modi
    ओंकार पूजारी
    2022 तय कर सकता है कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का भविष्य
    11 Jan 2022
    कमज़ोर कांग्रेस इतनी कमज़ोर नहीं है कि औपचारिक मोर्चे या भाजपा विरोधी ताक़तों की अनौपचारिक समझ के मामले में किसी भी अखिल भारतीय भाजपा विरोधी परियोजना से बाहर हो जाए।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License