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जब कॉर्पोरेट का कृषि में दख़ल बढ़ेगा
किसानों को संदेह है कि एमएसपी की सुरक्षा नहीं होने के बाद, कुछ ऐसा ही होगा, जब बड़े पूंजीपति कृषि क्षेत्र में प्रवेश करेंगे।
अजीत पिल्लई
24 Dec 2020
Translated by महेश कुमार
जब कॉर्पोरेट का कृषि में दख़ल बढ़ेगा

सितंबर महीने में जब सरकार ने संसद में अनुचित जल्दबाजी के साथ तीन कृषि-कानूनों को पारित किया तो उसके कुछ बड़े उद्देश्य थे: न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को ध्वस्त करना, अनुबंध/ठेके की खेती को वैध बनाना, भूमि अधिग्रहण को वैध बनाना, छोटे किसानों का रक्षा कवच उतारना, और संतों (यानि कॉरपोरेट्स) को कृषि के अंदर आने की अनुमति देना था। 

इनमें से, एमएसपी की अवधारणा को ध्वस्त करने की इच्छा लंबे समय से रही है ताकि ग्रामीण भारत में एक कॉर्पोरेट राष्ट्र की स्थापना की जा सके। वास्तव में जो लॉबी एमएसपी को एक खतरनाक जानवर के रूप में देखती है और वही लॉबी चाहती है कि उसे तुरंत मार देना चाहिए, क्योंकि उसे डर है कि अगर इस पर कार्रवाई नहीं की जाती है, तो यह एमएसपी रूपक राक्षस उन 22 फसलों से भी परे अपने तंबू गाड़ेगा, जिन वस्तुओं को यह वर्तमान में कवर करती है।

एमएसपी विरोधी लॉबी का तर्क स्पष्ट रूप से या खुले तौर पर व्यक्त नहीं किया गया है,जोकि  यह है: यदि मूल्य की सुरक्षा को अब दूर नहीं किया जाता है, तो वह दिन दूर नहीं जब फलों और सब्जियों की खेती करने वाले किसान भी राष्ट्रीय स्तर पर एमएसपी कवरेज की मांग करेंगे। यदि ऐसा होता है, तो कॉर्पोरेट का खरीद, भंडारण और खुदरा बिक्री तथा हमारे द्वारा खाए जाने वाले हर निवाले की बिक्री का सपना उनके लाभ के मामले में सीमित हो जाएगा। 

सबसे खराब स्थिति में भी अगर एमएसपी को संसद के एक अधिनियम द्वारा पारित किया जाता है और ये प्रावधान किया जाता है कि सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य से नीचे खरीद करना अवैध होगा, फिर भी फसल के समय पर बाजारों में हेरफेर किया जा सकता है। जो लोग इस घटना के घटने से डरते हैं, वे कहेंगे कि एमएसपी को पूरी तरह से पॉलिसी शब्दावली से हटा दिया जाना चाहिए।

वास्तव में, अगर कॉर्पोरेट इंडिया और उनके सुधारवादी मित्र एमएसपी से सहमत हैं, जिसके  नीचे की खरीद पर भंडारण अवैध माना जाएगा, तो तत्काल समस्या हल हो जाएगी। कड़ाके की ठंड में दिल्ली की सीमा पर विरोध कर रहे किसान खुशी-खुशी घर लौट जाएंगे, क्योंकि एमएसपी को कानूनी जामा पहना दिया जाएगा और न केवल मौखिक आश्वासन, जिससे आसानी से मुह मोड़ा जा सकता है। उनकी अन्य सभी मांगों और मुद्दों को बाद में सुलझाया जा सकता है। 

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कॉर्पोरेट और बाज़ार सुधारक इस फॉर्मूले से सहमत होंगे? एक बात तो समझ आती है कि कॉर्पोरेट तो इससे सहमत नहीं होंगे। बाज़ार सुधारक भी इस पर अपनी ओर से आपत्ति करेंगे, क्योंकि व्यापार के रास्ते में आने वाला कोई भी विनियमन, जो लाभ कमाता है, मुक्त बाज़ार के नियम के खिलाफ जाता है, जिसकी वे कसमें खाते हैं।

लेकिन वे किसानों के भविष्य के बारे में भी रंगीन तस्वीर पेश करते हैं। सुधारों के बुद्धिमान व्यक्ति जो हम सुनते रहे हैं उसका लब्बोलुबाब यह है कि बाजार खुलने से किसान जहां चाहे अपनी उपज बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे और उसे बेचेंगे जो उनकी उपज की सबसे ज्यादा बोली लगाएगा। इस प्रकार, एक बार जब एमएसपी और सरकारी मंडियों से मुक्त मिल जाएगी तो उन्हे ऊंचे लाभ मिलेंगे। 

वास्तव में, यह साबित करने के लिए ऐसा कहा जा रहा है कि नया कानून किसान-समर्थक है, इस बात की पूरी संभावना है कि शुरू में एमएसपी की तुलना में अधिक दाम दिए जाएंगे। किसी बाजार पर एकाधिकार जमाने की रणनीति के तहत, बड़े खिलाड़ी नुकसान भी उठा सकते हैं और बेहतर दाम से सकते हैं। वे किसानों के साथ दीर्घकालिक अनुबंध भी कर सकते हैं जिसमें लचीले मूल्य निर्धारण की व्यवस्था को बड़ी चतुराई से शामिल कर सकते है।

इस तरह की ख़ुशामदी और धोखा देने वाली नीति का इस्तेमाल कैब एग्रीगेटर कंपनियों ने भारतीय बाजार में प्रवेश करने के समय किया था। शुरुआत में, ड्राइवरों द्वारा नई गाड़ियां हासिल करने और अपने वाहनों की ईएमआई चुकाने के बाद भी एक महीने में 70,000 रुपये के करीब कमाने की कहानियां जंगल की आग की तरह फैलती थी। यहां तक कि उन लोगों को भी  कैबियों के रूप में साइन किया गया जो पहले से रोजगार में थे। ऑटो के किराए में कैब का आनंद उठाने से यात्रियों को भी लाभ हुआ। वे 7 या 8 रुपए प्रति किलोमीटर से कम का भुगतान करते जबकि कैबी प्रति किमी पर 18 रुपये कमाते थे। हालांकि, यह फ्री रन बहुत जल्द ही समाप्त हो गया, और कैब ड्राइवर अब घटती आय और उच्च ईएमआई के कर्ज के जाल में फंसने की शिकायत करने लगे। और इसके साथ किराए भी बढ़ गए। 

एक बार जब बड़े खिलाडी कृषि में घुस गए तो किसानों के साथ कुछ ऐसा ही होगा। एमएसपी का संरक्षण नहीं होने से, सीमांत किसानों को कॉर्पोरेट के हावाले कर दिया जाएगा और वे उनके साथ बाजार में हेरफेर करेंगे, जो मानते हैं कि सस्ती खरीद से मुनाफा बढ़ता है। यह किसी भी तरह से समान खेल का मैदान नहीं होगा।

लेकिन जो लोग एमएसपी के खिलाफ तर्क देते हैं, वे आपको बताएंगे कि यद्द्पि न्यूनतम समर्थन मूल्य दशकों से चल रहा है, फिर भी किसान आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आई है। इस पर, वे कहेंगे, कि यह सबूत है कि सरकारी हस्तक्षेप काम नहीं करता है। उसी ही सांस में, वे आपको बताएंगे कि सरकार द्वारा की गई खरीद से बड़े किसानों को फायदा हुआ है। कथित तौर पर, इसलिए ये बड़े किसान हैं जो कृषि-कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

इस तथ्य को कोई झुठला नहीं सकता कि एमएसपी को प्रभावी रूप से प्रशासित नहीं किया गया है। शांता कुमार समिति ने 2015 में निष्कर्ष निकाला था कि समर्थन मूल्य योजना से केवल 6 प्रतिशत किसान लाभान्वित होते हैं। ऐसा लगता है कि यह अंदाज़ा कमतर है और इसलिए  लाभार्थियों का वर्तमान प्रतिशत 15-20 प्रतिशत के बीच कहीं भी हो सकता है।

लेकिन क्या वे सभी अमीर किसान हैं जो एमएसपी से लाभान्वित हुए हैं? धान का मामला लें। इस फसल को एमएसपी के तहत सरकार को बेचने वालों में से सत्तर प्रतिशत छोटे किसान हैं। यही कहानी गेहूं और अन्य फसलों की भी है। “पंजाब में, उत्पादित गेहूं का लगभग 95 प्रतिशत एमएसपी के तहत खरीदा जाता है। यह गलत प्रचार है कि एमएसपी अमीरों के लिए है। यह भी असत्य है कि गरीब किसान कृषि-कानूनों का समर्थन करते हैं। कृषि और व्यापार विश्लेषक देविंदर शर्मा कहते हैं कि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री जो यह बात कहते हैं उन्हे एक बार आकर प्रदर्शनकारी किसानों से मिलना चाहिए।

उनके अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में दशकों पहले पेश किए गए इस तरह के समान कानून को इंडिया में "कट एंड पेस्ट" कर दिया गया हैं। “इन कानूनों ने वहां के किसानों को असफल कर दिया है। तो फिर हम उन क़ानूनों को यहां क्यों ला रहे हैं? ” उन्होने सवाल किया। पूरी रणनीति कृषि में लगे लोगों की संख्या में भारी कटौती करने और बड़े किसानों और कॉरपोरेट्स को खुला मैदान मुहैया कराने के लिए डिज़ाइन की गई है। शर्मा नोट करते हैं कि: "हमारे कृषि क्षेत्र के लिए अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान ने जो नीति लागू करने की सिफ़ारिश की वह या तो “ऊपर बढ़ो या फिर बाहर जाओ” की है?" किसानों को खेती छोड़ शहरों में सस्ते श्रम में जाने के लिए मजबूर करने का प्रयास किया जा रहा है।”

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जब भी सरकार किसानों की ओर से हस्तक्षेप करती है सुधारकों को उसमें कुछ लाल दिखाई देने लगता हैं। हालाँकि वे तब कुछ गलत नहीं देख पाते हैं जब करदाताओं के पैसे से कॉर्पोरेट के कर्ज़ को समय-समय पर माफ किया जाता हैं। इस संदर्भ में, केरल सरकार द्वारा 16 फलों और सब्जियों के लिए एमएसपी लागू करने के कदम को संदेह की दृष्टि और प्रतिगामी कदम के रूप में देखा जाएगा। 15 एकड़ से कम भूमि पर खेती करने वाले किसानों के लिए लागू यह योजना सुनिश्चित करेगी कि उन्हें उत्पादन लागत से कम से कम 20 प्रतिशत ऊपर की कीमत हासिल हो।

ऐसा नहीं है कि कृषि क्षेत्र में निवेश करने वाले कॉरपोरेट्स में कुछ गड़बड़ है। वे पहले से ही वहां मौजूद हैं। लेकिन बड़े व्यवसायों की वृद्धि को आगे बढ़ाने या उसे मुकम्मल करने के लिए किसानों के हितों का त्याग करना ऐसे देश के लिए अच्छा नहीं है, जहाँ 56 प्रतिशत कामकाजी आबादी कृषि पर निर्भर है। किसान उस स्क्रिप्ट की बारीकियों को समझ सकता है, जो उसकी बेहतरी के लिए जानबूझकर लिखी गई है। यही कारण है कि वह कृषि-कानूनों का विरोध कर रहा है, क्योंकि वह पूरी तरह से और अच्छी तरह से जानता है कि यह बड़ी जेब वाले बड़े कॉर्पोरेट के पक्ष में है।

लेखक, एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

When the Corporates Come Marching into Farms

Corporate farming
Farm Laws
Agriculture
MSP

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