NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लापता हो गया कोसी पीड़ितों के विकास के लिए बना प्राधिकार!
आम लोगों को तो क्या खुद सरकार को भी नहीं पता चल पा रहा है कि यह कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार आखिर गया कहां। इसका दफ्तर कहां है, इसके अध्यक्ष कौन हैं, यह बिहार सरकार के किस विभाग से संबद्ध था, कुछ भी पता नहीं चल रहा?
पुष्यमित्र
08 Sep 2020
कोसी
कोसी तटबंध के बीच का इलाका। फोटो : अजय कुमार

यह खबर सुनने में आपको अजीब लग सकती है, मगर यह सोलह आने सच है। बिहार में कोसी के पीड़ितों के विकास के लिए 1987 बना प्राधिकार कई सालों से गुम है। आम लोगों को तो क्या खुद सरकार को भी नहीं पता चल पा रहा है कि यह कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार आखिर गया कहां। इसका दफ्तर कहां है, इसके अध्यक्ष कौन हैं, यह बिहार सरकार के किस विभाग से संबद्ध था, कुछ भी पता नहीं चल रहा? एक आरटीआई का जवाब देने के लिए बिहार सरकार के अधिकार पिछले आठ महीने से इसकी ढुंढाई राजधानी पटना से लेकर सहरसा जिले के सरकारी दफ्तरों तक में कर चुके हैं। मगर प्राधिकार लापता हो गया है। इस खबर से आप बाढ़ पीड़ितों और खासकर कोसी पीड़ितों के प्रति बिहार सरकार की गंभीरता को समझ सकते हैं।

इस संबंध में 11 जनवरी, 2020 को कोसी नव निर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव ने आरटीआई कानून के तहत मंत्रिमंडल सचिवालय से सूचना मांगी थी। उन्होंने 1987 में बिहार कैबिनेट की स्वीकृति से गठित कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार के वर्तमान अध्यक्ष, सदस्य और कर्मियों की सूची मांगी थी, उन्होंने इस प्राधिकार द्वारा अब तक किये गये कार्यों के बारे में भी जानकारी मांगी थी और यह भी पूछा था कि क्या इस फैसले में कोई बदलाव या संशोधन भी हुआ है। यानी क्या यह प्राधिकार स्थगित या बंद भी किया गया है।

महेंद्र यादव कहते हैं कि मेरे आवेदन को मंत्रिमंडल सचिवालय ने जल संसाधन विभाग को, विभाग ने मुख्य अभियंता को, अधीक्षण अभियंता ने कोसी कमिश्नर को, कमीश्नर ने सहरसा के डीएम को, डीएम ने जिला आपदा प्रबंधन कार्यालय को और आपदा प्रबंधन विभाग ने उसे उप विकास आयुक्त सहरसा को भेज दिया। यानी 22 जून, 2020 तक यह आवेदन कई अधिकारियों के दफ्तर में घूमता रहा और प्राधिकार का पता नहीं चल पाया। इस बीच महेंद्र यादव ने प्रथम अपील की वह आवेदन भी इसी तरह घूम रहा है। वे कहते हैं, इसका अर्थ तो यही निकलता है कि पटना के सचिवालय से लेकर सहरसा के समाहरणालय तक किसी को इस प्राधिकार के बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं है। अगर होती तो मुझे इसका जवाब मिल गया होता।

बिहार की कोसी व दूसरी नदियों पर शोध करने वाले जानकार दिनेश कुमार मिश्र के मुताबिक उन्होंने भी 2005 में अपनी पुस्तक दुई पाटन के बीच के शोध के दौरान तलाशने की कोशिश की थी। तब उन्हें वह सहरसा के विकास भवन में मिला था। वहां कुछ कर्मचारी उन्हें ऊंघते हुए मिले थे, उन्होंने बताया कि वे यहां डेप्युटेशन पर भेजे गये हैं, इस प्राधिकार के पास न कोई कर्मचारी है, न बजट इसलिए कोई काम भी नहीं होता है। उन्होंने बताया कि अमूमन इस प्राधिकार का अध्यक्ष महिषी का विधायक हुआ करता था। उस वक्त महिषी के विधायक अब्दुल गफूर इसके अध्यक्ष थे। मगर वे कब तक इसके अध्यक्ष रहे यह कहना मुश्किल है।

अब्दुल गफूर की इसी साल जनवरी माह में दुखद मृत्यु हो गयी है। अभी महिषी के विधायक वही थे। उनके निधन के बाद चुनाव नहीं हुए हैं। इसलिए उनसे भी इस बारे में जानकारी नहीं ली जा सकती।

ऐसी जानकारी है कि 30 जनवरी, 1987 को बिहार मंत्री परिषद के फैसले से इस प्राधिकार का गठन हुआ था। यह प्राधिकार हर साल बाढ़ और कटाव की विभीषिका झेलने के लिए मजबूर कोसी तटबंध के बीच में रहने वाले लोगों की मदद के लिए गठित हुआ था और इसके पहले अध्यक्ष महिषी के तत्कालीन विधायक लहटन चौधरी थे। उन्हीं के प्रयासों से इस प्राधिकार का गठन हुआ था।

इस प्राधिकार के गठन के वक्त इसके प्रस्ताविक कार्यकर्मों के बारे में एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी, वह पुस्तिका बिहार में नदियों के सवाल पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रंजीव के पास उपलब्ध थी। बाद में उसे कोसी नव निर्माण मंच के द्वारा प्रकाशित कर लोगों में बंटवाया गया।

20200908_074553_0.jpg

रंजीव कहते हैं कि दरअसल कोसी की विभीषिका को कम करने के ख्याल से 1962 में कोसी बराज और इस नदी के दोनों किनारे तटबंधों का निर्माण कराया गया था। मगर तीन सौ से अधिक गांव उन तटबंधों के बीच फंस गये, जो हर साल भीषण बाढ़ को झेलते और इस वजह से वहां विकास कार्य पूरी तरह ठप हो गया था। इन्हीं तीन सौ से अधिक गांव के लाखों लोगों की वर्षों पुरानी मांग को लेकर यह प्राधिकार गठित हुआ था। मगर फंड के अभाव में इस प्राधिकार की योजनाएं कभी ठीक से लागू ही नहीं हो पायी। और आखिरकार 2005 के बाद किसी रोज यह लापता भी हो गया। यह कब, कैसे और किसके आदेश से लापता हो गया, यह पता नहीं चल रहा है। 

इस प्राधिकार की पुस्तिका पढ़कर मालूम होता है कि इसकी योजनाएं काफी दूरदर्शी थी। इसमें अमूमन हर विभाग को शामिल किया गया था। किसानों को हर साल दो फसल मिलें, उन्हें आर्थिक सहायता मिले, पशुपालकों के लिए दुग्ध उत्पादक सहकारिता समिति का गठन हो, वहां लघु एवं कुटीर उद्योग की संभावना तलाशी जाये, वहां बैंकों की पहुंच हो, तीन वर्षों के भीतर उस क्षेत्र में विद्युतीकरण हो, बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनके एक किमी के दायरे में ही मिले, पांच पंचायतों पर प्राइमरी हेल्थ सेंटर हो, बाढ़ के वक्त चलते-फिरते औषधालय हो, वहां की जमीन लगानमुक्त हो, उस पर एक ही सेस लगाया जा सके, तटबंधों के किनारे स्थायी बाढ़ राहत केंद्र स्थापित हो, नाव पर यात्रा मुफ्त हो आदि।

एक सबसे क्रांतिकारी प्रस्ताव यह था कि चूंकि पूरे कोसी और पूर्णिया प्रमंडल के लोगों को कोसी तटबंध की वजह से बाढ़ से मुक्ति मिल रही है और इसकी सजा तटबंध के बीच बसे तीन सौ गांव के लोग भुगत रहे हैं। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में सरकारी नौकरियों में तटबंध के बीच फंसे पीड़ितों को 15 फीसदी आरक्षण मिले।

इनमें से ज्यादातर सुविधाएं अभी तक कोसी तटबंध के बीच फंसे पीड़ित गांवों तक नहीं पहुंची है, जबकि इसके गठन के 33 साल हो चुके हैं। उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक प्राधिकार फंड के अभाव में शायद ही कोई ढंग का काम कर पाया, सिर्फ कुछ हैंडपंप लगवाने के सिवा। आज भी इन तटबंधों के बीच सड़कों का और स्कूल, कालेजों का घोर अभाव है। बिजली भी ठीक से नहीं पहुंची है। वह 19वीं सदी की कोई छूटी हुई दुनिया लगती है।

महेंद्र यादव कहते हैं, इस प्राधिकार की तलाश का एक मकसद सरकार को यह याद दिलाना भी है कि कोसी तटबंधों के बीच छूटे हुए तीन सौ से अधिक गांवों के बारे में वह भूले नहीं। बाढ़ से सुरक्षा के नाम पर 58 साल पहले उनके साथ जो अन्याय हुआ था, उसकी क्षति-पूर्ति अभी बाकी है। महेंद्र न सिर्फ सरकार से प्राधिकार का पता ढुंढवा रहे है, बल्कि इसकी पुस्तिका का भी कोसी पीड़ितों के बीच वितरण करवा रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

kosi river
Kosi victim development
Bihar
Bihar government
rajiv gandhi
Narendra modi
Nitish Kumar
Congress
BJP
jdu

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर


बाकी खबरें

  • kisan
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसानों ने देश को संघर्ष करना सिखाया - अशोक धवले
    25 Dec 2021
    किसान आंदोलन ने इस देश के मजदूरों और किसानों को नई हिम्मत दी है। ऑल इंडिया किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक धवले ने न्यूज़क्लिक के साथ ख़ास बातचीत में कहा कि आंदोलन के कामयाब होने की बुनियादी शर्त…
  • yogi
    अजय कुमार
    योगी सरकार का काम सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाना है या नौजवानों को बेरोज़गार रखना?
    25 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल हिंदू-मुस्लिम धार पर बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है। तो आइए इस नफ़रत के माहौल को काटते हुए उत्तर प्रदेश की बेरोज़गारी पर बात करते हैं।
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर : ड्रग्स का कनेक्शन, भाजपा और इलेक्शन
    25 Dec 2021
    मणिपुर में ड्रग कार्टेल और भाजपा नेताओं की उसमे संलिप्तता की कई खबरें आ चुकी हैं। टेररिस्ट संगठन से लिंक के आरोपी, थोनाजाम श्याम कुमार सिंह, 2017 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं। विधायकी की…
  • up
    सत्येन्द्र सार्थक
    यूपी चुनाव 2022: पूर्वांचल में इस बार नहीं हैं 2017 वाले हालात
    25 Dec 2021
    पूर्वांचल ख़ासकर गोरखपुर में सभी प्रमुख पार्टियां अपनी जीत का दावा कर रही हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में गोरखपुर ज़िले की 9 सीटों में से 8 पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, लेकिन जानकारों का मानना है कि…
  • bhasha singh
    भाषा सिंह
    बात बोलेगी : दरअसल, वे गृह युद्ध में झोंकना चाहते हैं देश को
    24 Dec 2021
    हरिद्वार में 17 से 19 दिसंबर 2021 तक चली बैठक को धर्म संसद का नाम देने वाले वे सारे उन्मादी मारने-काटने की बात करने वाले, ख़ुद को स्वामी और साध्वी कहलाने वाले शख़्स दरअसल समाज को उग्र हिंदु राष्ट्र के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License