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राजनीति
इस देश को कहां ले जाएगा केसरिया नवउदारवाद का मोदी-दर्शन?
‘‘एक स्तर पर मोदी सरकार महामारी के संकट का इस्तेमाल कर विनाशकारी निजीकरण का एजेंडा लायी है। दूसरे स्तर पर ये एक संपूर्ण दर्शन की घोषणा है। यह पूंजीपतियों को आश्वस्त करेगा कि उनके स्वार्थों की सेवा होती रहेगी, भले ही हमें देश को कौड़ी के दाम बेचना पड़े। यह भविष्य के संकट को हल करने हेतु केसरिया नवउदारवाद का घोषणापत्र है।”
बी सिवरामन
17 Jun 2020
modi

‘‘प्रत्येक रणनीतिक क्षेत्र में एक, यानी चार सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSUs) को छोड़कर बाकी सारे केंद्रीय PSUs का निजीकरण किया जाएगा’’- यह चैंकाने वाली घोषणा वित्तमंत्री सीतारमण ने 17 मई 2020 को आत्मनिर्भर भारत अभियान के पांचवे अंश के अनावरण के अवसर पर की, और सभी को- औद्योगिक कक्ष (Industrial Chambers), वरिष्ठ नौकरशाहों और विपक्षी राजनीतिक दलों से लेकर ट्रेड यूनियनों तक को स्तब्ध कर दिया। ऐसा व्यापक निजीकरण समाजवाद के पतन के दौर में रूस और पूर्वी योरोपीय देशों को छोड़कर किसी देश के आर्थिक इतिहास में देखा नहीं गया।

इस योजना की व्यवहारिकता को लेकर सवाल हैं, खासकर जब लॉकडाउन के बाद शेयर बाज़ार में कई बार तेज़ी से गिरावट आई। व्यापारिक-पत्रकारिता से जुड़े कई मीडिया गुरुओं ने संशय-भरी प्रतिक्रिया दी। कुछ को लगा कि मोदी का जुमला-वायरस निर्मलाजी को भी संक्रमित कर गया। कुछ को लगा कि ये अधिकतम एक अस्पष्ट आशय की घोषणा है, जो गलती से ऐसे नीतिगत पैकेज के रूप में घोषित किया गया जो महामारी की चपेट में फंसी अर्थव्यवस्था को तत्काल उबारेगा। वैसे, आम तौर पर मीडिया ने इसे नज़रअंदाज़ करना चाहा, जबकि इसका आशय 1991 के रिफॉर्म पैकेज (तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा घोषित) किसी अर्थ में कम नहीं! क्या संशयवादी दृष्टिकोण न्यायोचित है?

केसरिया नवउदारवाद के मोदी-दर्शन की घोषणा

तमिलनाडु के वरिष्ठ श्रमिक नेता, एस. कुमारसामी ने कहा कि ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता ऐसे संशय (scepticism) का शिकार नहीं हो सकते। ‘‘एक स्तर पर मोदी सरकार महामारी के संकट का इस्तेमाल कर विनाशकारी निजीकरण का एजेंडा लायी है। दूसरे स्तर पर ये एक संपूर्ण दर्शन की घोषणा है, जो अर्थव्यवस्था के आने वाले संकटकालीन दौर में उनकी नीति और व्यवहारिक कदमों को निर्धारित करेगा। यह पूंजीपतियों को आश्वस्त करेगा कि उनके स्वार्थों की सेवा होती रहेगी, भले ही हमें देश को कौड़ी के दाम बेचना पड़े। यह भविष्य के संकट को हल करने हेतु केसरिया नवउदारवाद का घोषणापत्र है। यह पूंजीपतियों को टैक्स की छूट देने और श्रम कानूनों में सुधार जैसे नाटकीय कदमों के लिए अग्रदूत है। व्यवहारिकता का प्रश्न उठ सकता है और कुछ पीएसयूज़ के निजीकरण में समय लग सकता है। पर यह एक सैद्धान्तिक धमाका जरूर है। श्रमिक इसपर निश्चिंत नहीं रह सकते। एक गुणात्मक रूप से नए युद्ध के लिए बिगुल बज चुका है और श्रमिकों को पूरी स्पष्टता व सचेतन के साथ जवाब देना होगा; न दिया तो उनकी ही तबाही।’’

व्यवहारिकता से जुड़े मुद्दे

श्रम आंदोलन को इस बारे में भी सचेत होना होगा कि सरकार को इस भव्य घोषणा को चरितार्थ करने में कौन सी व्यवहारिक कठिनाइयों का समना करना होगा, ताकि वे प्रतिरोध की ठोस कार्यनीति तैयार करें और नए नारे गढ़ सकें। विनिवेश, यानी स्टॉक एक्सचेंज (stock exchange) के माध्यम से अल्प संख्य शेयर (minority shares) निजी हाथों में बेच देना निजीकरण का एक रास्ता है। प्रत्यक्ष रणनीतिक बिक्री, यानी कंट्रोलिंग स्टेक्स (controlling stakes) निजी हाथों को बेचना दूसरा रास्ता है। ठेकेदारों को मैनुफैक्चरिंग आउटसोर्स करना या पीपीपी (Public Private Partnership) चलाना अर्ध-निजीकरण के कुछ अन्य रास्ते हैं।

ताज़ा पब्लिक एन्टरप्राइजेज़ सर्वें (Public Enterprises Survey) 2018-19 के अनुसार वर्तमान समय में 249 चालू PSU हैं। सबका एक झटके में निजीकरण कर देना मज़ाक नहीं है। पहली बार वाजपेयी काल में PSUs का निजीकरण राज्य की नीति बन गया था। अरुण शौरी के अधीन एक अलग विनिवेश मंत्रालय व विभाग निर्मित हुआ। 2000-2020 के बीच 2 दशकों में निजी निवेशकर्ताओं ने केवल 10 PSUs के मामले में बहुसंख्यक कंट्रोलिंग स्टेक्स पर काबू किया या रणनीतिक बिक्री में PSU को प्रत्यक्ष तौर पर खरीदा।      

शुरुआत में सरकार की नीति थी कि मुख्यतः घाटे पर चल रही PSUs का निजीकरण करे। कुछ PSU लम्बे समय से घाटे पर चल रहे थे। तो, पिछले 2 दशकों में 27 PSUs, जिनमें कुछ बड़े भी थे, जैसे एचएमटी, हिंदुस्तान केब्ल्स और हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स, बंद किये गए और उनकी परिसमाप्ति (liquidation) किया गया। केवल वीएसएनएल (VSNL) (टाटा को बेचा गया) और बाल्को (BALCO), माल्को (MALCO) व हिंदुस्तान ज़िंक (अनिल अग्रवाल के वेदान्ता ग्रुप को बेचा गया) बड़े निजी पूंजीपतियों ने हथिया लिया। फिर कुछ लाभ कमाने वाले नवरत्न, जैसे बीएचईएल (BHEL) को भी निजीकरण की सूची में शामिल कर लिया गया।

निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) ने 2017 में ही एयर इंडिया, एचपीसीएल (HPCL), बीईएमएल (BEML), स्कूटर्स इंडिया, एसएआईएल (SAIL) के सलेम और दुर्गापुर स्टील प्लांट सहित 35 PSUs के रणनीतिक बिक्री की योजना बनाई थी। परंतु आज तक एक भी यूनिट की रणनीतिक बिक्री संभव नहीं हुई, केवल एचपीसीएल को 700 करोड़ रुपये के लिए एक अन्य PSU ओएनजीसी (ONGC)के मत्थे मढ़ दिया गया; इसी तरह  टेहरी हाइड्रो पावर कॉम्प्लेक्स (THPC) और नार्थ ईस्टर इलेक्ट्रिक पावर कार्पोरेशन (NEEPCO को 4000 करोड़ के लिए एनटीपीसी (NTPC) के मत्थे मढ़ा गया और कामराजर पोर्ट को मद्रास पोर्ट ट्रस्ट पर केवल 2383 करोड़ के लिए लाद दिया गया। ऐसे ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि 249 PSUs का मोदी सरकार के बाकी 4 सालों में निजीकरण किया जा सकता है?

फिर, संभावित खरीददारों की अपनी शर्त भी होंगी। इनमें प्रमुख होंगी वेतन कटौती, कार्यशक्ति घटाने (downsizing) जैसे कदम। विश्व बैंक के एक शोध के अनुसार, 1999-2000 में भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों में वास्तविक वेतन संगठित निजी क्षेत्र उद्योगों की अपेक्षा 2.1 गुना था। क्या निजी पूंजीपती इन PSUs को खरीदकर अन्य निजी क्षेत्र के प्रतिद्वन्द्वियों की अपेक्षा दूने वेतन-दर पर चलाना चाहेंगे? सार्वजनिक क्षेत्र में प्रति मजदूर वर्धित मूल्य (value added per worker) निजी क्षेत्र की अपेक्षा काफी कम होता है। मसलन 1975-76 के दौर में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए यदि यह 15,700 रुपये था तो निजी क्षेत्र में 96,100 रुपये था। बाद के वर्षों में अनुपात लगभग यही रहा। इसके मायने हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र में उत्पादकता काफी कम है और श्रमिकों की संख्या ज़रूरत से अधिक। तो कोई भी निजी पूंजीपति जो PSU  को खरीदेगा, उसे लेने से पहले छंटनी पर जोर देगा। उदाहरण के लिए, जब एयर इंडिया को टाटा को दिया जा रहा था, उनकी शर्त थी कि वह खरीदने के बारे में तब सोचेगा जब सरकार कर्मचारियों की संख्या आधी करके उसे बेचे। सैम पित्रोदा ने भी बीएसएनएल (BSNL) के निजीकरण की तैयारी के लिए उसकी कार्यशक्ति आधी करने का प्रस्ताव रखा था।

31 मार्च 2019 तक केंद्रीय पीएसयूज़ की कार्यशक्ति, 4.81 लाख ठेका और कैज़ुअल श्रमिक सहित, 15.14 लाख थी। पहले सरकार की नीति होती थी-एक भी श्रमिक की छंटनी नहीं होगी। इस नीति को मापदंड मानें तो क्या मोदी सरकार अपने निजीकरण के एजेंडे को चरितार्थ करने के लिए 7 लाख श्रमिकों की छंटनी कर सकती है? क्या वे इन PSU श्रमिकों को वीआरएस (VRS) देने लायक पूंजी तक जुटा सकेगी?

शेयर बाज़ार की स्थिति आदर्श नहीं

मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज (BSE) इंडेक्स ने मई 2019 में 40,000 पाइंट पार किया। यद्यपि उस समय तक अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में प्रवेश कर चुकी थी, शेयर बाज़ार में उछाल था। वास्तविक अर्थव्यवस्था में जाने की जगह पूंजी शेयर बाज़ार में सट्टेबाज़ी की ओर बह रही थी, और यहां हमने स्पष्ट अंतरविरोध देखा। पर  सट्टेबाज़ी के जरिये उछाल अधिक समय तक टिक नहीं सकता था। कोविड-19 लॉकडाउन शुरू होते ही शेयरबाजार सूचकांक 30,000 पाइंट के नीचे लुढ़का-यानी 25 प्रतिशत! यह निवेशकों को शेयर बेचने का उपयुक्त समय नहीं है, और ऐसी स्थितियों को बेयर मार्केट के नाम से जाना जाता है। 10,000 पाइंट की गिरावट के मायने हैं निवेशकों की 37.98 लाख करोड़ पूंजी कुछ ही महीनों में स्वाहा होना।

PSU शेयरों का बुरा प्रदर्शन

PSUs का सफल विनिवेश शेयर बाज़ार के स्वास्थ्य की हालत पर निर्भर होता है। BSE सूचकांक में पहले से सूचीबद्ध (listed) PSU शेयर बुरा प्रदर्शन कर रहे हैं। BSE ने जून 2001 में PSU स्टॉक इंडेक्स प्रक्षेपित (launch) किया था। इस इंडेक्स में कौन से PSU आए? वे PSU जिनमें सरकार 51 प्रतिशत या अधिक शेयर की मालिक थी और जो BSE में सूचिबद्ध हो गए थे। अबतक करीब 60 PSU इस सूचकांक में शामिल हुए। रेटिंग एजेन्सी स्टैन्डर्ड ऐण्ड पूअर (Standard and Poor) ने गणना की थी कि 2008 में BSE PSU Index 17 प्रतिशत गिरा और 2009 में 11 प्रतिशत। इसके मायने यदि आपने BSE PSU शेयर्स में 1 करोड़ का निवेश किया और यदि ये साठ PSU शेयर्स में बराबर बंटे हैं तो आप 2 सालों में 28 लाख खो चुके होंगे। जब शेयर बाज़ार में ऐसी तेज़ गिरावट हो तो कोई भी वित्तीय सलाहकार बाजार में नए PSU शेयर प्रक्षेपित (लॉन्च) करने की सलाह नहीं देगा। वह बराबर मूल्य से काफी नीचे खरीदा जाएगा; यानी 10 रुपये के शेयर का दाम 2 या 3 रुपये तक गिरेगा। सरकार के लिए यह भारी घाटे का सौदा होगा।

प्रमुख राजस्व रणनीति के रूप में विनिवेश हो रहा फ्लॉप

जब मोदी-काल में विकास प्रदर्शन काफी बुरा रहा, विनिवेश के माध्यम से फंड उगाही प्रमुख यंत्र बन गया। 2016-17 के बाद विनिवेश से जुटे फंड में उछाल आया। 2017-18 में PSU हिस्सेदारी बिक्री या स्टेक सेल (stake sale) से कुल आमद 1,00,056 करोड रु़ रहा और 2018-19 में यह 84,972 करोड़ था। पर 2019-20 में सरकार ने 65,000 करोड़ का टारगेट रखा। पर विनिवेश से आमद इस लक्ष्य से 38 प्रतिशत नीचे गिरा। इसके बावजूद सरकार ने वर्तमान वित्त वर्ष के लिए विनिवेश लक्ष्य 2.1 लाख करोड़ रखा है (बजट अनुमान के वास्तविक आंकड़े (budget estimate actuals, 2019-20) 2020-21 के लिए 90,000 करोड़ तक के एलआईसी के अल्पसंख्यक स्टॉक बेचना भी इस टार्गेट का हिस्सा है। अब सभी स्टॉक मार्केट विश्लेषकों ने निष्कर्श निकाला है कि यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता, तो लगातार दूसरे वर्ष भी इसे संशोधित करना पड़ेगा।

पहले से BSE सूचकांक में सूचीबद्ध 59 पीएसयूज़ का संपूर्ण बाज़ार पूंजीकरण 31 मार्च 2018 तक 15,20,412 करोड़ रुपये बना। यदि सारे 249 चालू PSUs को सूचीबद्ध किया जाए तो वे कितने बाज़ार पूंजीकरण (market capitalization) के लिए उत्तरदायी होंगे, इसका आप अंदाज़ा लगाएं! दूसरी तरह देखा जाए तो सभी PSUs में लगी संपूर्ण पूंजी 31 मार्च 2019 तक 26,33,956 करोड़ थी। यदि सभी सूचिबद्ध हो जांए तो उनका कुल बाज़ार पूंजीकरण इससे कम नहीं होगा, क्योंकि उनकी सम्पत्ति की कीमत अबतक और भी बढ़ चुकी होगी। क्या भारतीय शेयर बाज़ार के जरिये नए शेयर जारी कर एक बार में इतने धन की उगाही हो सकेगी?

आइये हम हाल के रिकॉर्ड देखें। पिछले छह वर्षों में नए शेयर जारी करके भारतीय स्टॉक मार्केट BSE और NSE (National Stock Exchange) के माध्यम से 1,45,093 करोड़ रुपये की कुल पूंजी अर्जित की गई। इसमें से 53,124 करोड़ रुपये की उगाही केवल एक कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ द्वारा इस वित्तीय वर्ष में की गई। केवल 13 कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2021 में नए शेयर जारी करके पूंजी की उगाही की। निवेशक बेवकूफ नहीं हैं कि बुरी मुद्रा (bad money) के पीछे अच्छी मुद्रा (good money) झोंकें। या तो आत्मनिर्भर भारत अभियान को सारे PSUs का निजीकरण करने के लिए सालों इंतेज़ार करना होगा या फिर संकट बिक्री करके देश की सम्पदा को गंवाना होगा।

भारत के PSUs वास्तव में निजी क्षेत्र को सस्ती आधारभूत सुविधाएं (infrastructure), कच्चा माल और बिजली देकर फायदा पहुंचाती हैं। यदि इन सबका निजीकरण हो जाएगा तो निजी कंपनियों को कितने अतिरिक्त मूल्य का बोझ उठाना पड़ेगा? निजीकरण इन्हें और गहरी मंदी की ओर ढकेलेगा। 178 केंद्रीय PSU मुनाफा कमा रहे हैं और इन्होंने 2018-19 में कुल 1,74,587 करोड़ रुपये का लाभ कमाया था। केवल 70 ने घाटे सहे और महज उस साल उन्होंने 31,635 करोड़ रुपये का घाटा लगाया। समस्त केंद्रीय PSUs ने 2017-18 में 76,014 करोड़ रुपये का सूद अदा किया और 2018-19 में 71,916 करोड़ रुपये सूद अदा किया। 31 मार्च 2019 तक इन PSUs के पास 9,93,238 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी और आरक्षित निधि थी, जिसे मोदी सरकार हड़प रही है। अनिश्चित व एक बार मिलने वाले विनिवेश प्राप्ति आय की खतिर इतने बेहतर वार्षिक लाभांश आय को ठुकरा देना कहां की बुद्धिमानी है?

यदि सभी PSUs का इस्तेमाल कर पूंजी कमानी ही है तो उसका बेहतर रास्ता है, जिससे देश की संपदा को कौड़ी के दाम नहीं बेचना होगा। आश्चर्य है कि ऐसा एक विकल्प आरएसएस के अरुण शौरी ने सुझाया था। उन्होंने प्रस्ताव दिया था कि सभी पीएसयूज़ को संबंधित मंत्रालयों से मुक्त कर एक या अधिक-से-अधिक दो-तीन वित्तीय होल्डिंग कम्पनियों के अंतरगत लाया जाए और ऐसी संपत्ति आधार को लेकर यह होल्डिंग कम्पनी विदेशी वित्तीय बाज़ारों में एक खरब यूएस डॉलर तक की उगाही कर सकती है। इस पूंजी को उपयोगी तरीके से निवेशित कर अर्थव्यवस्था को मंदी के दौर से उबारा जा सकता है। पर मोदी की सूट-बूट सरकार इन्हें अंबानी-अडानी सरीखे मुट्ठी भर कारपोरेट घरानों को कौड़ी के भाव देकर देश और श्रमिकों को तबाह करना चाहती है।

प्रतिरोध शुरू हो चुका है। सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियन 3 जुलाई को राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस मनाएंगे। बंगलुरु में, जो PSUs का केंद्र है, ऐटक नेता अनन्त सुब्बाराव के कार्यालय से सूचना मिली कि इसी सप्ताह से PSU इकाइयों में प्लांट-स्तर के प्रतिरोध आरंभ होंगे। मोदी सरकार इस दिशा में जितना आगे बढ़ेगी, प्रतिरोध उतना ही तीव्र होगा।         

 

(लेखक श्रम मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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