NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन का फायदा किसको?
सड़क और रेलवे लाइन तो बहुत दूर की बात है, गांव-देहात के इलाकों में ढंग के प्राइवेट स्कूल तक नहीं होते हैं। यह भारत के प्राइवेट सेक्टर की एक कड़वी हकीकत है।
अजय कुमार
27 Aug 2021
नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन का फायदा किसको?
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

भारत का प्राइवेट सेक्टर बुनियादी ढांचे में निवेश करने से भागता है। निवेश ना करने के पीछे बहुत बुनियादी कारण है। पहला इतना ज्यादा पैसा नहीं होता कि वह सड़क और रेलवे लाइन बिछा दे। दूसरा मुनाफे के लिए काम करने वाला प्राइवेट सेक्टर इस बात को पहले ही भांप लेता है कि भारत के दूरदराज इलाके तक बुनियादी ढांचे पहुंचाने में खर्चा बहुत आएगा और उसके बाद भारत के गरीब लोग उसे मुनाफा भी नहीं देंगे। इसलिए सड़क और रेलवे लाइन तो बहुत दूर की बात गांव देहात के इलाकों में ढंग के प्राइवेट स्कूल तक नहीं होते हैं। यह भारत के प्राइवेट सेक्टर की एक कड़वी हकीकत है।

इस हकीकत को जानते हुए भी मोदी सरकार का नारा है कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है। इस हकीकत के साथ अगर मोदी सरकार का यह नारा पढ़ा जाए तो निष्कर्ष यह निकलता है कि सरकार का काम जनकल्याण करना नहीं है।

इसलिए सरकार नेशनल मोनेटाइजेशन पाइप लाइन की स्कीम लेकर आई है। जिसका विचार यह है कि बनी बनाई सरकारी संपतिया जैसे की रोड, रेलवे, शिपिंग, बंदरगाह, एयरपोर्ट, टेलीकॉम प्राइवेट सेक्टर को सौंप दी जाएंगी। तकनीकी तौर पर कहा जाए तो ब्राउनफील्ड संपत्तियां प्राइवेट सेक्टर को सौंपी जाएंगी। जहां बुनियादी ढांचा सरकार के जरिए पहले खड़ा किया जा चुका है। केवल संचालन और रखरखाव करके प्राइवेट सेक्टर को कमाई करनी है। उस कमाई का एक हिस्सा सरकार को दे देना है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा करते वक्त सरकार ही सरकारी संपत्ति की मालिक होगी। प्राइवेट सेक्टर मालिक नहीं होगा। चार साल के लिए सरकारी संपतिया दी जाएंगी जिनसे सरकार का अनुमान है कि 6 लाख करोड रुपए की कमाई होगी।

अगर पहली बार आंख के सामने से ऐसा प्रस्ताव गुजरे कि सरकार ने बुनियादी ढांचा विकसित कर प्राइवेट कंपनियों को चलाने के लिए दे दिया और प्राइवेट कंपनियां कमाकर सरकार को देंगी तो बहुतों को ऐसे प्रस्ताव बड़े सुहावने लग सकते हैं। लेकिन ऐसे प्रस्तावों पर खुश होने से पहले प्राइवेटाइजेशन से जुड़े हाल-फिलहाल का इतिहास देख लीजिए।

साल 2020-21 सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर सरकार ने 2.1 लाख करोड़ रुपए वसूलने का लक्ष्य रखा था। लेकिन मिला केवल 30-40 हजार करोड़ रुपए। इस नाकामी के बाद भी फिर से साल 2022 के बजट में सरकार ने सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी को बेचकर 1.75 लाख करोड़ रुपए कमाने का लक्ष्य रखा है।
अब सवाल यह है कि आखिरकार क्या वजह रही कि सरकारी संपत्तियों की हिस्सेदारी नहीं खरीदी गई? इसका जवाब भी सिंपल है। उद्योगपति उद्योग को तभी चलाते हैं जब उन्हें मुनाफे की संभावना दिखती है। मुनाफा तभी होता है जब लोगों की जेब में खरीदने के लिए पैसा होता है। लेकिन भारत की पूरी अर्थव्यवस्था कई सालों से इस गहरी हकीकत के साथ चल रही है कि खरीददारों और सुविधा उठाने वाले तमाम लोगों की कमाई ऐसी नहीं है कि ट्रेन से यात्रा करने के बजाय हवाई जहाज से यात्रा करें। ट्रेन प्राइवेट सेक्टर के हाथ में जाए तो उतना पैसा दे पाए जितना प्राइवेट सेक्टर ट्रेन के किराए के तौर पर तय कर रहा है। मतलब यह कि लोगों की जेब में पैसा नहीं है। पैसा लाने वाला रोजगार नहीं है। अगर रोजगार भी है तो मेहनताना इतना कम मिलता है कि कईयों के लिए दो जून की रोटी ही जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में यह कैसे हो पाएगा कि प्राइवेट क्षेत्र के लोग को अपनी लागत के ऊपर बंपर कमाई हो पाए।

इसलिए आर्थिक जानकार इस मोनेटाइजेशन से जुड़े इस पूरी योजना पर यह सवाल पूछ रहे हैं कि सरकार 6 लाख करोड़ रुपए की कमाई का आंकड़ा कैसे बता रही है? किस तरह से गिनती करके इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि उसे चार साल में छह लाख करोड़ का की कमाई होगी?

ऐसे में एक ही विकल्प बचता है कि जिनके पास मोटी पूंजी है। उन्हीं का राज कायम हो। पूरा बाजार उन्हीं का हो जाए। इसी को अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में एकाधिकार की तरफ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था कहा जाता है। जो किसी भी देश के लिए एक बुरा संकेतक है। भारत जैसे देश के लिए तो खास तौर पर।

वरिष्ठ पत्रकार अनिंदो चक्रवर्ती अपने ट्विटर अकाउंट पर नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन की घोषणा पर जरूरी सवाल खड़ा करते हैं।

वह लिखते हैं कि सरकार तकरीबन 35000 करोड़ की सरकारी टेलीकॉम की संपत्ति आखिरकर प्राइवेट कंपनी को क्यों सौंप रही है? जबकि हकीकत यह है कि वोडाफोन आइडिया का दिवाला निकल चुका है। भारती एयरटेल को नुकसान पर नुकसान सहना पड़ रहा है। ऐसे में आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं की अंतिम फायदा किसे होगा? बिना कोई बुनियादी ढांचा बनाए केवल पट्टे पर लेकर किसे फायदा पहुंचेगा? तकरीबन 24 हजार करोड रुपए की प्राकृतिक गैस की पाइप लाइन प्राइवेट सेक्टर को सौंपी जाएगी? सब कोई जानता है कि प्राकृतिक गैस पाइपलाइन के क्षेत्र में पहले से ही काम कर रही कुछ कंपनियां कौन-सी हैं? यही हाल एयरपोर्ट का है, बंदरगाहों का है, जल मार्गों का है, जहाजरानी का है, कोयला खनन का है। यहां पर पहले से काम करने वाली प्राइवेट कंपनियों के बारे में सोचिए। और चुपचाप अपने दिमाग में उनका सरकार से कैसा रिश्ता है इसके बारे में सोचिए तो सारा खेल सामने नजर आएगा।

इन सभी क्षेत्रों में सरकारी संपत्तियां प्राइवेट हाथों में प्राइवेट लोगों के मुनाफे के लिए सौंपी जा रही हैं। अधिकतर क्षेत्रों में बड़े खिलाड़ी स्वाभाविक तौर पर एकाधिकार बना लेंगे। इनके लिए सबसे बड़ी फायदेमंद की स्थिति यह है कि इन्हें बुनियादी ढांचा खड़ा नहीं करना होगा केवल पट्टे पर लेकर किराया देना होगा और मुनाफा कमाना होगा।

अब थोड़ा मुनाफे के खेल को देखिए। आर्थिक मामलों के पत्रकार एनडी मुखर्जी ब्लूमबर्ग पर लिखते हैं कि यह एक तरह का ऐसा अनुबंध है जिसमें मालिकाना हक सरकार के पास होगा और 4 साल के लिए प्राइवेट इन्वेस्टर को सरकारी संपत्ति को सौंपा जाएगा। इस छोटी सी अवधि में अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए प्राइवेट इन्वेस्टर कीमतें ऊंचे करेगा। मतलब सड़क इस्तेमाल करने के लिए आम लोगों को अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। रेलवे स्टेशन और रेलगाड़ी भारत की 1-2 कंपनियों के हाथों में जा सकती है जिनका सरकार से अच्छा खासा संबंध है। सिंगापुर में ठीक ऐसे ही हुआ था। सरकार ने शहरों से गांव देहात को जाने वाली ट्रेनों का प्राइवेटाइजेशन कर दिया। इन्वेस्ट करने वालों ने ट्रेन के मेंटेनेंस पर कम खर्चा किया। इसलिए बार-बार ब्रेक लगाने की समस्या पैदा हुई। यात्री गुस्से में आए विरोध प्रदर्शन किया और फिर से ट्रेन का राष्ट्रीयकरण करना पड़ा।

नेशनल मोनेटाइजेशन पाइप लाइन से जुड़े ये सभी राय हमें कहां ले जा रहे हैं?  भारत एक गरीब मुल्क है। महामारी और मंदी के दौरान और अधिक गरीब हुआ है। जहां पर भ्रष्टाचार और कालाबाजारी नेता और प्रशासनिक अधिकारियों केेे नस-नस में समाई हुई है। सरकारी संपत्ति में इन्वेस्ट करने की हैसियत कम लोगों के पास है। इसलिए सारे नियम कानून धरे के धरे रह जाएंगे और अर्थव्यवस्था में एकाधिकार का बढ़ना स्वाभाविक है। एकाधिकार बढ़ेगा तो 4 साल के भीतर अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के नियम भी बनेंगे। मुनाफा अधिक से अधिक कमाने का मतलब है कि आम लोगों पर भार पड़ेगा। यानी अमीर अमीर होंगे और गरीबों पर बोझ पड़ेगा। इन सबके बीच भारत जैसे लोक कल्याणकारी देश में अर्थव्यवस्था से जो उम्मीद की जाती है वह नहीं होगा। लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा। पूंजी के संकेंद्रण से आर्थिक विकास का झूठ का कारोबार चलेगा।

National Monetisation Pipeline
privatization
Nirmala Sitharaman
Narendra modi
Modi Govt

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?


बाकी खबरें

  • मोदी की काशी यात्रा: बदहाल ‘विकास’ की हक़ीक़त परदे से ढांपने की कोशिश
    विजय विनीत
    मोदी की काशी यात्रा: बदहाल ‘विकास’ की हक़ीक़त परदे से ढांपने की कोशिश
    15 Jul 2021
    प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के समय नौकरशाही ने बनारस शहर के चेहरे पर चस्पा दाग़ को ढंकने के लिए पूरे शहर में जगह-जगह पैबंद लगा दिए। जितने भी खुले नाले थे, जिसकी बदबू और सड़ांध से समूचा शहर परेशान रहता…
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    खोरी गांव में घरों का तोड़े जाना जारी, राजद्रोह क़ानून पर मुख्य न्यायाधीश के अहम सवाल और अन्य ख़बरें
    15 Jul 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हम बात करेंगे खोरी गांव में जारी मकानों के गिराए जाने, राजद्रोह पर भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उठाए सवाल और अन्य ख़बरों के बारे में।
  • भारत का संचालन किसके हाथ — शास्त्र/धर्मपुस्तकें या संविधान?
    सुभाष गाताडे
    भारत का संचालन किसके हाथ — शास्त्र/धर्मपुस्तकें या संविधान?
    15 Jul 2021
    विगत कुछ सालों के विभिन्न अदालतों के फैसलों की थोड़ी-सी बेतरतीब चर्चा करते हुए हम इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि अदालतों ने किस तरह समय-समय पर कानून की हिफाजत का काम किया है।
  • खोरी गांव : पुलिसिया दमन के बीच आज भी जारी रहा तोड़-फोड़, हरियाणा सरकार की पुनर्वास योजना हवा हवाई
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    खोरी गांव : पुलिसिया दमन के बीच आज भी जारी रहा तोड़-फोड़, हरियाणा सरकार की पुनर्वास योजना हवा हवाई
    15 Jul 2021
    फरीदाबाद खोरी गांव में लोग रोते रहे, चिल्लाते-बिलखते रहे किंतु प्रशासन एवं नगर निगम द्वारा चल रही तोड़फोड़ जारी रही। आज यानि गुरुवार को लगभग 1700 घरों को तोड़ दिया गया है। इसका विरोध कर रहे कुल 9 लोगों…
  • दिल्ली दंगे: पुलिस जाँच से नाख़ुश कोर्ट
    दिल्ली दंगे: पुलिस जाँच से नाख़ुश कोर्ट
    15 Jul 2021
    दिल्ली में 2020 में हुए दंगो के एक केस की सुनवाई करते हुए कड़कड़डूमा अदालत ने दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। इसके साथ ही पुलिस पर 25,000 का जुर्माना भी लगाया है। 'बोल' के इस एपिसोड में अदालत के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License