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भारत
राजनीति
चंडीगढ़ के अभूतपूर्व बिजली संकट का जिम्मेदार कौन है?
बिजली बोर्ड के निजीकरण का विरोध कर रहे बिजली कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान लगभग 36 से 42 घंटों तक शहर की बत्ती गुल रही। लोग अलग-अलग माध्यम से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन प्रशासन पूरी तरह से लाचार दिखाई दिया।
सोनिया यादव
24 Feb 2022
Chandigarh
Image courtesy : Facebook

लंबे समय से 'चंडीगढ़ बिजली बोर्ड' के निजीकरण का विरोध कर रहे बिजली कर्मचारियों ने अपने हड़ताल के दौरान शहर की बिजली गुल कर सभी को सकते में डाल दिया। एक ओर शासन, प्रशासन से लेकर हाई कोर्ट तक मामले ने तूल पकड़ लिया तो, वहीं आम लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। फिलहाल हाई कोर्ट की फटकार और प्रशासन के साथ बैठक के बाद बिजली विभाग के कर्मचारियों ने हड़ताल तो खत्म कर दी है, लेकिन केंद्र की बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की निजीकरण नीतियों का उनका विरोध अब भी जारी है।

बता दें कि चंडीगढ़ दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) की संयुक्त राजधानी है, लेकिन इसका प्रशासन केंद्र के अंतर्गत आता है। ये एक केंद्र शासित प्रदेश है और पंजाब के राज्यपाल इस शहर के मुख्य प्रशासक भी हैं। हड़ताल की वजह से शहर में बने अभूतपूर्व बिजली संकट के चलते प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई करते हुए अगले छह महीने के लिए बिजली कर्मियों की हड़ताल पर रोक लगा दी है।

क्या है पूरा मामला?

बीते लंबे समय से बिजली कर्मचारी 'चंडीगढ़ बिजली बोर्ड' के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं। लेकिन प्रशासन ने इस विरोध को नजरअंदाज करते हुए बोर्ड को निजी हाथों में सौंपने का फैसला कर लिया। जिसके बाद इस फैसले के विरोध में बिजली कर्मचारियों द्वारा 72 घंटे की हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल सोमवार, 21 फरवरी की मध्यरात्रि 12 बजे शुरू हुई और बुधवार, 23 फरवरी को प्रशासन के साथ बैठक के बाद खत्म हुई। इस दौरान करीब 36 से 42 घंटे तक शहर की बत्ती गुल रही, जिसके चलते कई इलाकों में लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी।

'सिटी ब्यूटीफ़ुल' नाम से मशहूर चंडीगढ़ शहर के अधिकतर घरों में बिजली के साथ पानी की सप्लाई तक बंद हो गई थी। पीजीआई समेत चंडीगढ़ के कई हॉस्पिटल अलर्ट मोड में आ गए थे और कुछ इस संकट से दोचार होते नज़र आए। महामारी के कारण घर से परीक्षा देने वाले छात्रों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई तो वहीं शहर की ट्रैफिक लाइट तक बंद नज़र आईं, जिस कारण ट्रैफिक नियंत्रित करने का काम पुलिसकर्मियों को मैनुअल तरीके से करना पड़ा।

कुछ स्थानीय लोगों ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में बताया कि ये हड़ताल अचानक नहीं हुई थी। बिजली कर्मचारी बीते लंबे समय से इसकी चेतावनी दे रहे थे। उन्होंने इसकी घोषणा भी काफी समय पहले ही की थी, लेकिन फिर भी प्रशासन पुख्ता इंतजाम नहीं कर सका और मूकदर्शक बनकर बैठा रहा।

प्रशासन और बिजली विभाग स्थिति संभालने में पूरी तरह नाकाम

वैसे चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से बैकअप प्लान होने का दावा तो किया जा रहा था। लेकिन इस संकट की घड़ी में प्रशासन और बिजली विभाग दोनों ही स्थिति संभालने में पूरी तरह नाकाम दिखाई दिए। जिसके चलते पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने खुद इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मुख्य अभियंता को तलब किया।

अदालत ने तत्काल दोनों पक्षों को फटकार लगाते हुए बिजली व्यवस्था सुनिश्चित करने का आदेश दिया, जिसके बाद शहर के लोगों ने राहत की सांस ली। अदालत ने कहा कि बिजली गुल होने से न केवल आम नागरिक बल्कि अस्पतालों में भर्ती गंभीर रूप से बीमार मरीजों पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसके अलावा ऑफलाइन पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में कोर्ट की सुनवाई इससे प्रभावित हो सकती है।

उधर, बिजली विभाग को प्राइवेट करने के फैसले का विरोध कर रहे कर्मचारियों का कहना था कि विभाग के प्राइवेट होने की वजह से उनके काम में बदलाव हो जाएगा और इसके बाद बिजली की दरों में बढ़ोतरी भी देखने को मिल सकती है।

प्रशासन से हुई बातचीत के बाद बुधवार को हड़ताल खत्म करने का ऐलान कर दिया गया। कर्मचारी नेता सुभाष लांबा ने मीडिया से कहा कि हमने 5 साल में एक हजार करोड़ से ज्यादा प्रॉफिट दिया है। हमने प्रशासन से पूछा कि इसके बावजूद वह इसका निजीकरण क्यों कर रहे हैं? प्रशासन से भरोसा मिला है कि हड़ताल करने वाले किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। यह भी सहमति बनी कि जब तक यह मामला हाईकोर्ट में है, निजीकरण से जुड़ा कोई फैसला नहीं लिया जाएगा।

मालूम हो कि बिजली विभाग के निजीकरण का मामला अभी हाई कोर्ट में पेंडिंग है, इसे लेकर अदालत ने कर्मचारी यूनियन से नाराज़गी जाहिर करते हुए सवाल किया कि फैसले से पहले कर्मचारी हड़ताल पर क्यों गए?। यह सीधे तौर पर क्रिमिनल कंटेंप्ट का मामला बनता है।

सांसद किरण खेर की चुप्पी पर सवाल

गौरतलब है कि इस बिजली संकट के दौरान लोग अलग-अलग माध्यम से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन प्रशासन पूरी तरह से लाचार दिखाई दिया। एक ओर शहर की सांसद किरण खेर ने जहां पूरे मामले पर चुप्पी साध ली, तो वहीं आनंदपुर साहिब से सांसद मनीष तिवारी ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मदद की गुहार लगाई। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने मामले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हस्तक्षेप करने की मांग करते हुए कहा कि चंडीगढ़ में अव्यवस्था एवं अराजकता जैसी स्थिति है और सभी आवश्यक सेवाएं ठप्प हो गई हैं।

कांग्रेस नेता ने बुधवार को ट्वीट कर कहा, ‘प्रिय अमित शाह जी, चंडीगढ़ में 36 घंटे से बिजली नहीं है। अव्यवस्था एवं अराजकता जैसी स्थिति है। चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है और यहां सभी आवश्यक सेवाएं ठप्प हैं।’

तिवारी ने केंद्रीय गृह मंत्री ने इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए कहा कि चंडीगढ़ प्रशासन स्थिति का समाधान करने में विफल रहा है।

सरकार के निज़ीकरण के फैसले से किसको फायदा

मालूम हो कि मार्च 2021 में भी मनीष तिवारी ने लोकसभा में पूछा था कि जब चंडीगढ़ का बिजली विभाग लाभ में है तो इसे क्यों बेचा जा रहा है। इस पर ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) आरके सिंह ने लिखित में जवाब दिया था कि निजी कंपनी शहरवासियों को बेहतर सुविधा देगी। यह फैसला आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत केंद्र सरकार की ओर से लिया गया है। सरकार ने चंडीगढ़ बिजली विभाग के तीन साल के राजस्व व पारेषण (ट्रांसमिशन) और वितरण लॉस के बारे में भी जानकारी दी। बताया कि विभाग अधिशेष (सरप्लस) में है। तीन साल में लाभ करीब चार गुना हो गया है।

बहरहाल, ये तो फिलहाल सिर्फ एक राज्य की समस्या है, लेकिन जल्द ही ऐसे मामले दूसरे राज्यों में भी देखने को मिल सकते हैं क्योंकि केंद्र सरकार के रेलवे, बैंकों से लेकर नवरत्न कंपनियों तक के निजीकरण का विरोध समय-समय पर देखने को मिलता ही रहता है। ऐसे में निकट भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा देखने को मिलें तो कोई आश्चर्य नहीं है।

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