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टीएसआरटीसी कर्मचारियों की मौतों की ज़िम्मेदार कौन?
टीएसआरटीसी कर्मचारियों को भाजपा सहित सभी विपक्षी पार्टियां और प्रगतिशील संगठन समर्थन कर रहे हैं लेकिन आरटीसी में केन्द्र की 30 प्रतिशत हिस्सेदारी होने के बावजूद भाजपा कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही है।
सुनील कुमार
29 Nov 2019
TSRTC
Image courtesy: Livemint

टीएसआरटीसी के लगभग 50 हज़ार कर्मचारी 26 सूत्री मांगों को लेकर 5 अक्टूबर, 2019 से हड़ताल पर थे। इन कर्मचारियों की प्रमुख मांगे इस प्रकार थीं : टीएसआरटीसी को राज्य सरकार के अधीन किया जाए; बजट का एक प्रतिशत टीएसआरटीसी को दिया जाए; ड्राइवर और कंडक्टर की नौकरी पक्की की जाए; एक अप्रैल 2017 से बढ़े हुए वेतन का भुगतान किया जाए; सीसीएस, पीएफ़, एसआरबीएस, एसबीटी की बक़ाया राशि ब्याज सहित दी जाए; अचानक मृत कर्मचारियों के परिवार को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी दी जाए। तेलंगाना सरकार ने काम पर नहीं आने वाले कर्मचारियों को 7 अक्टूबर से बर्खास्तगी की घोषणा कर दी, जिसके बाद क़रीब 24 कर्मचारियों की हार्ट अटैक और आत्महत्या में मृत्यु हो चुकी है। कई कर्मचारियों को हार्ट अटैक, घबराहट और आत्महत्या करने के प्रयास में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। 

18 अक्टूबर, 2019 को तेलंगाना उच्च न्यायलय ने सरकार को आदेश दिया कि वह कर्मचारी यूनियनों से बातचीत करे और उनका सितम्बर माह का भुगतान करे। कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने कर्मचारियों की कमाई हुई रकम का भुगतान नहीं किया। 26 अक्टूबर, 2019 को टीएसआरटीसी प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच वार्ता हुई, जो विफल रही। कर्मचारी यूनियनों ने कहा कि कोर्ट के दबाव में सरकार ने बातचीत की औपचारिकता पूरी की। केवल 4 लोगों को ही अंदर बुलाया गया और उनके मोबाइल फ़ोन भी ले लिये गये और इस बातचीत में कार्यकारी निदेशक उपस्थित नहीं थे। बातचीत में पहले ही कह दिया गया था कि सरकार में टीएसआरटीसी के विलय पर चर्चा नहीं होगी, अंततः यह चर्चा विफल रही। बातचीत से पहले ही 24 अक्टूबर को मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने कह दिया था कि हड़ताल पर जाकर कर्मचारियों ने ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और कहा कि हड़ताल तभी ख़त्म होगी जब आरटीसी बंद हो जायेगा। उन्होंने आरटीसी को सरकार में विलय से साफ़ इनकार कर दिया। 

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हड़ताल के दौरान सरकार ने 5100 रूटों को निजी हाथों में सौंप दिया और वह 5000 रूटों को भी निजी हाथों में सौंप देने की तैयारी कर रही है। मप्र के बाद तेलंगाना ऐसा राज्य होगा जहां पर सरकारी बसें नहीं होंगी। हड़ताल के 45वें दिन कोर्ट ने इस मामले को लेबर कोर्ट के हवाले कर दिया और कहा कि लेबर कोर्ट तय करे कि हड़ताल वैध है या अवैध। 

हड़ताल के दौरान क़रीब 50-60 प्रतिशत बसों को चलाया गया जिससे आम जनता को काफ़ी परेशानी हुई। स्कूलों की छुट्टियों को बढ़ाना पड़ा। सरकार ने 1500 और 1000 रुपये के दैनिक वेतनभोगी ड्राइवर और कंडक्टर को रखा और उनको छूट दे दी कि शहरी रूटों पर 5000 रुपये और ग्रामीण रूटों पर 4000 रुपये से अधिक कमाई होने पर ड्राइवर और कंडक्टर उस पैसे को रख सकते हैं। उस समय एक वीडियो वायरल हो रहा था जिसमें कंडक्टर यात्री से ज़्यादा किराया ले रहा था। कई जगह से दुर्घटना होने की भी ख़बरें आई जिसका कारण आनन-फानन में अनुभवहीन ड्राइवर और कंडक्टर का रखना था। यहां तक कि एक बस चालक ने महिला कंडक्टर से बलात्कार करने की भी कोशिश की। 

टीएसआरटीसी कर्मचारी यूनियनों ने 25 नवम्बर, 2019 को 52 दिन बाद हड़ताल को एकतरफ़ा वापस लेने की घोषणा कर दी। हड़ताल वापस लेने के बाद भी कर्मचारियों को काम पर वापस नहीं लिया जा गया और न ही उनके सितम्बर माह के कमाये हुए वेतन दिए जा रहे हैं। काम पर वापस नहीं लिये जाने से 26 नवंबर को निज़ामाबाद ज़िले के बोधन डिपो में चालक राजेन्द्र (55) की हार्ट अटैक से मौत हो गई। संगारेड्डी डिपो के कंडक्टर भीमला डिपो आया था कि उसे काम पर वापस लिया जाए पर उसे काम पर वापस नहीं लिया गया और पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया, जहां थाने में उसे हार्ट अटैक आने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसी तरह हैदराबाद में एक महिला कर्मचारी पुलिस हिरासत में फ़िट्स आने से बेहोश हो गई। डिपो आए हुए कर्मचारियों को पुलिस गिरफ़्तार कर रही है। 

आरटीसी प्रबंधन ने कोर्ट में बताया है कि एक दिन हड़ताल पर जाने से एक सप्ताह का वेतन काटने का प्रावधान है। 16 नवंबर को आरटीसी प्रबंधन ने शपथ पत्र दायर कर कहा है कि यदि कर्मचारी स्वयं हड़ताल ख़त्म कर ड्यूटी पर लौटना चाहें तो उन्हें ड्यूटी पर लेना मुश्किल काम है। कर्मचारियों की हो रही मौतों पर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा है कि हड़ताल पर जाने का फ़ैसला यूनियनों का था तो कर्मचारियों की आत्महत्या या सामान्य मौत (हार्ट अटैक) की ज़िम्मेदारी भी यूनियनों को लेनी चाहिए; आत्महत्या या सामान्य मौत को अदालत कैसे रोक सकता है। क्या अपने कर्मचारियों की मौत की ज़िम्मेदार यूनियनें हैं, जो कि अपने भविष्य सुरक्षित करने की मांग को लेकर संवैधानिक अधिकार के तहत शांतिपूर्वक आंदोलन चला रही थीं।

अब ताज़ा ख़बर यह है कि  आरटीसी कर्मचारियों को सरकार ने काम पर लौटने की अनुमति दे दी है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने घोषणा की है कि तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम (टीएसआरटीसी) के कर्मचारी शुक्रवार से ड्यूटी पर लौट सकते हैं।

हालांकि बड़ा सवाल यह है कि आरटीसी कर्मचारियों को भाजपा सहित सभी विपक्षी पार्टियां और प्रगतिशील संगठन समर्थन कर रहे हैं लेकिन आरटीसी में केन्द्र की 30 प्रतिशत हिस्सेदारी होने के बावजूद भाजपा कोई हस्तक्षेप नहीं कर रही है। भाजपा नेता कई बार दिल्ली आकर केन्द्रीय मंत्री से मुलाकात कर चुके हैं उसके बाद केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने यह कहते हुए अपने कर्तव्य से इतीश्री कर लिया है कि आरटीसी की निजीकरण के लिए केन्द्र से अनुमति लेनी होगी। तेलंगाना सरकार ने कहा है कि हम केन्द्र की परिवहन नीति का ही पालन कर रहे हैं। क्या भाजपा वोट के लिए आरटीसी कर्मचारियों का समर्थन दे रही है जबकि 30 प्रतिशत हिस्सेदारी रहते हुए केन्द्र सरकार चुप बैठी है?

TSRTC
TSRTC Employees Strike
BJP
opposition parties
Telangana
Central Government

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