NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
विज्ञान
अंतरराष्ट्रीय
इलेक्ट्रॉनिक कचरा तत्काल प्रदूषण की एक बड़ी चिंता
उत्पादित ई-कचरे की मात्रा लगभग 4,500 एफिल टावरों के बराबर है और यह मात्रा न्यूयॉर्क से बैंकॉक और बैंकाक से न्यूयॉर्क तक 28,000 किमी से अधिक दूरी का एक रास्ता बनाने के लिए पर्याप्त है।
अन्वेषा बोरठाकुर
24 Feb 2020
E waste

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने 2019 में कहा था कि दुनिया में प्रति वर्ष लगभग 50 मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा) पैदा होता है, जिसका वजन अब तक निर्मित सभी वाणिज्यिक विमानों से अधिक है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (यूएनयू) की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्पादित ई-कचरे की मात्रा लगभग 4,500 एफिल टावरों के बराबर है और यह मात्रा न्यूयॉर्क से बैंकॉक और फिर बैंकॉक से न्यूयॉर्क तक की 28,000 किमी से अधिक दूरी का एक रास्ता बनाने के लिए पर्याप्त है !

विशेष रूप से पिछले दो दशकों के दौरान अपनी अभूतपूर्व वृद्धि के बावजूद, ई-कचरा प्रदूषण सम्बन्धी चिंता का एक विषय बना हुआ है, जिसके बारे में पर्याप्त रूप से अबतक बात नहीं की की गयी है और इस प्रकार, अब भी वैश्विक आबादी के एक बड़ा हिस्से के लिए यह एक अपरिचित विषय है। सरल शब्दों में कहा जाय,तो ई-कचरा मुख्य रूप से छोड़ दिये गये या प्रयोग में नहीं आ रहे उन उपकरणों को दर्शाता है,जिसके संचालन के लिए बिजली का उपयोग किया जाता है।

उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स बाज़ार और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्रांति के विकास के साथ ई-कचरा एक नुकसान पहुंचाने वाले एक ऐसे गौण उत्पाद के रूप में सामने आया है, जो धीरे-धीरे लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ई-कचरे का सतत प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है, जिस पर वैज्ञानिक समुदायों, नीति निर्माताओं और नागरिक समाज को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। यह अनदेखी नहीं की जाने वाली एक वास्तविकता है कि ई-कचरा एक ज़हरीला और अबतक का एक जटिल कोटि का कचरा है।

इसमें भारी धातु (जैसे पारा, सीसा, क्रोमियम, कैडमियम, आदि) और लगातार बने रहने वाला कार्बनिक प्रदूषक होते हैं, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बेहद नुकसान पहुंचाने वाले हैं। ई-कचरा केवल ख़तरनाक रसायन ही नहीं, बल्कि सोना, चांदी, पैलेडियम, तांबा, आदि जैसे बहुमूल्य और मूल्यवान धातुओं का एक समृद्ध स्रोत भी है। ज़हरीले और मूल्यवान दोनों धातुओं की मौजूदगी ई-कचरे को जटिल अपशिष्टों का एक ऐसा स्रोत बना देती है, जिसके लिए एक सजग प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता है।

प्रबंधन की जटिलतायें

हालांकि ई-कचरे का प्रति व्यक्ति उत्पादन तो विकसित देशों में बहुत अधिक होता है, लेकिन इसकी कुल उत्पादित मात्रा विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में काफी अधिक है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (यूएनयू) के एक हालिया अध्ययन में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 2 किलो से कम ई-कचरा पैदा करता है, जबकि स्विट्जरलैंड में प्रति व्यक्ति 25 किलोग्राम से अधिक ई-कचरा पैदा होता है। हालांकि, भारत में उत्पादित ई-कचरे की कुल मात्रा स्विट्जरलैंड की कुल मात्रा से लगभग आठ गुनी है,जो इसे दुनिया में ई-कचरे के सबसे बड़े उत्पादक में से एक बना देती है। ऐसा इस कारण से है कि ग्लोबल साउथ (निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए प्रयोग होने वाला शब्द) मुख्य रूप से बड़े बाज़ार की क्षमता वाला एक विशाल आबादी वाला क्षेत्र है।

इसके अलावा, कई विकासशील देश नॉर्थ ग्लोबल( उच्च आय वाले देशों के लिए प्रयोग होने वाला शब्द) से आयातित ई-कचरे के प्रमुख स्थलों के रूप में काम करते हैं। हालांकि, 1989 में हस्ताक्षरित 'ख़तरनाक कचरे और उनके निपटान की सीमा पार आवाजाही के नियंत्रण पर बासेल कन्वेंशन' और 1992 से प्रभावी, औद्योगिक देशों से औद्योगिकरण से गुज़र रहे देशों की तरफ़ ई-कचरे के इस हस्तांतरण को प्रतिबंधित करता है, जो इस सम्मेलन की खामियों को प्रभावी रूप से सामने लाता है। उदाहरण के लिए, भारत, नाइजीरिया, घाना आदि देशों में कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण 'दान' या 'काम कर रहे उपकरण' के नाम हस्तांतरित किये जाते हैं।

 मगर,वास्तविकता तो यही है कि ये उपयोग से बाहर हो चुके ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स या ई-कचरे हैं, जो इन देशों के प्रमुख शहरों में कुकुरमुत्ते की तरह फैल रहे अनौपचारिक रिसाइकलिंग स्थलों पर सीधे-सीधे डंप किये जा रहे हैं। इस प्रकार, साउथ ग्लोबल को अपने घरेलू स्तर पर उत्पन्न और आयातित ई-कचरे दोनों का ध्यान रखना चाहिए।

अनौपचारिक ई-कचरे की रीसाइक्लिंग वाले इन स्थलों को गहन रूप से प्रदूषित पानी, मिट्टी, वायु के लिए जाना जाता है,जहां बड़ी संख्या में महिला श्रमिक और बच्चे होते हैं, जो बिना किसी स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों के काम कर रहे होते हैं। इस समय, औपचारिक ई-कचरा रीसाइक्लिंग सेक्टर में पुनर्नवीनीकृत ई-कचरे का केवल 20% हिस्सा है। बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन, अवैध आयात, अनौपचारिक रीसाइक्लिंग सेक्टर का प्रभुत्व और अपर्याप्त औपचारिक रीसाइक्लिंग उपक्रम मिलकर ई-कचरे के स्थायी प्रबंधन को विशेष रूप से विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक जटिल कार्य बना देते हैं।

कुछ संभावित हल

इस वास्तविकता को देखते हुए कि ई-कचरे में मूल्यवान धातु सांद्रता प्राकृतिक अयस्कों की तुलना में बहुत अधिक होती है, ऐसे में इस ई-कचरे को ‘शहरी खानों’ के रूप में देखे जाने और इससे अधिकतम लाभ उठाने की दिशा में ढांचागत प्रावधान सुनिश्चित करना एक संभावित तरीक़े में से एक हो सकता है। इस समय, ग्लोबल साउथ में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन के लिए आवश्यक धातुओं का खनन किया जा रहा है, जिसके पर्यावरण और सामाजिक नतीजे विनाशकारी साबित हो रहे हैं। यदि ई-कचरे में पहले से मौजूद धातुओं का नये उपकरणों के निर्माण के लिए फिर से उपयोग किया जाता है, तो इससे पर्यावरणीय दबाव में काफी कमी आयेगी और एक वृत्तीय अर्थव्यवस्था की दिशा में भी योगदान होगा। इसके अलावा, वैश्विक और स्थानीय,दोनों ही स्तरों पर ई-कचरे की समस्या से निपटने के लिए कठोर नीतियों को तैयार करना और उन्हें लागू करना आवश्यक है।

‘ई-कचरा’ की परिभाषा को मानक बनाना भी आवश्यक है। हालांकि यूरोपीय संघ की परिभाषा में मोबाइल फ़ोन, टीवी, वॉशिंग मशीन, इस्त्री मशीनों से लेकर चिकित्सा उपकरणों, स्वचालित मशीनों और ऐसे इलेक्ट्रॉनिक खिलौने तक शामिल हैं, जिनमें विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होते हैं, मगर,भारत जैसे देशों में इस परिभाषा का दायरा बहुत तंग है। एक समान परिभाषा नहीं होने के कारण ई-कचरे के प्रबंधन को लेकर जटिलतायें बढ़ती ही जाती हैं।

मौजूदा रुझान से स्पष्ट है कि ई-कचरा निकट भविष्य में विशेष रूप से ग्लोबल साउथ में अपनी इस महत्वपूर्ण वृद्धि को जारी रखेगा। इस वृद्धि को देखते हुए एक बड़ी चुनौती पर्याप्त ढांचागत प्रावधानों और नीतिगत दृष्टिकोणों को सुनिश्चित करने की है,जिसकी कमी इस समय औद्योगिकीकरण से गुज़र रहे अधिकांश देशों में देखी जा रही है।

(लेखक बेल्जियम स्थित लेउवेन में काथोलिक यूनिवर्सिटी में मैरी स्कोलोडोव्स्की क्यूरी पोस्टडॉक्टोरल फेलो हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।)

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Why Electronic Waste Is an Urgent Pollution Concern

Electronic Waste
E Waste
Global South
Pollution in Global South
United nations
E Waste in Developing World
United Nations Environment Program

Related Stories

कोविड-19 के ठोस, बायोमेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्टों का निष्पादन

फ़िलिस्तीन ने चीन से 1,00,000 कोविड-19 टीके मंगाए

यमन में बच्चों में कुपोषण ख़तरनाक गति से बढ़ रहाः यूएन

ब्लॉग: क्या बच्चों के लिए 2020 उम्मीदों, सपनों और आकांक्षाओं के टूट जाने का साल है?

यूएस ने नियमों का उल्लंघन किया, COVID-19 पॉज़िटिव हैती नागरिकों का निर्वासन जारी

कोरोना वायरस: विकलांगों के लिए संकट कितना गंभीर है?

सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में दो सप्ताह के संघर्ष विराम की घोषणा की

कोरोना के कारण दुनिया भर में खत्म हो सकती हैं 2.5 करोड़ नौकरियां: संयुक्त राष्ट्र

नफ़रत भरे माहौल में क्या कोरोना वायरस से लड़ पाएगा भारत?

कोरोना वायरस: संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों पर नज़र रख रहा चिकित्सीय दल


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License