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भारत
राजनीति
इरफ़ान हबीब को गुस्सा क्यों आया!
"वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था/ वो बात उनको बहुत ना-गवार गुज़री है" - खुद राज्यपाल - महामहिम - भी इसे कुछ इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे 88 साल के इतिहासकार से उनकी जान को ही ख़तरा होने वाला था।
बादल सरोज
30 Dec 2019
Irfan habib
फोटो साभार : हिन्दुस्तान

दो दिन से आईटी सेल और इन दिनों उसी के एक्सटेंशन के रूप में काम कर रहा कथित मुख्य धारा का मीडिया केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान और देश के वरिष्ठतम इतिहासकार इरफ़ान हबीब के बीच कहे-अनकहे की तर्ज़ पर हुए-अनहुए संवाद को लेकर सरसराया हुआ है। इस कवरेज़ से कुछ 'सुधीजन' भी हैरान-परेशान हैं। जिन्हें सेवारत जनरल की पाकिस्तानी फ़ौजी की तरह की जाने वाली राजनीतिक बयानबाजी, तथागत राय और धनखड़ जैसे राज्यपालों यहाँ तक कि चीफ जस्टिसों तक की खुल्लमखुल्ला राजनीतिक पक्षधरता के वक़्त रतौंधी आ जाती है। उन्हें भी अचानक राज्यपाल के संवैधानिक पद की गरिमा पर संकट मंडराता दिखाई देने लगा है- कुछ को तो कांग्रेस से बसपा वाया जनमोर्चा भाजपाई हुए आरिफ़ मोहम्मद खान मे "खाँटी सेक्युलर" तक नजर आने लगता है। कहा जा सकता है कि "वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था/ वो बात उनको बहुत ना-गवार गुज़री है" - खुद राज्यपाल - महामहिम - भी इसे कुछ इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे 88 साल के इतिहासकार से उनकी जान को ही ख़तरा होने वाला था।

आख़िर 28 दिसंबर को केरल की कन्नूर यूनिवर्सिटी मे हुआ क्या था ?

अलीगढ़ के इतिहासकारों द्वारा जारी किए गए वक्तव्य के मुताबिक इस दिन इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस की 80वीं कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन होना था। देश भर के नामचीन इतिहासकार इसमें भाग लेने के लिए जमा हुये थे। रवायत के अनुसार केरल के राज्यपाल के नाते आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को उसका उद्घाटन करना था। कॉन्फ्रेंस ठीकठाक शुरू हुयी। प्रोफ़ेसर अमिय कुमार बागची का अध्यक्षीय भाषण हुआ और उसके बाद राज्यपाल - महामहिम राज्यपाल - आरिफ़ मोहम्मद खान को उद्घाटन भाषण के लिए न्योता गया। राज्यपाल - महामहिम - आरिफ़ मोहम्मद ख़ान माइक पकड़ते ही भूल गए कि वे राज्यपाल हैं और उनका काम उस तैयार भाषण को पढ़ना है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति वाली इस संस्था के 80वें सम्मेलन के महत्व इत्यादि का जिक्र है ।

वे एक पार्टी विशेष - भाजपा - के प्रवक्ता के नाते शुरू हो गए । बजाय अपना पहले से तैयार लिखित भाषण देने के उन्होंने बिना किसी संदर्भ या प्रसंग के नागरिकता संशोधित क़ानून (सीएए) की पैरवी शुरू कर दी - इतना ही नहीं नफ़रती भाषा में बोलते हुए सीएए का विरोध करने वालों को "पाकिस्तानी" एजेंट बताना शुरू कर दिया। महामहिम ने सीएए के विरोधियों को ऐसा कायर भी बताया जिन्होंने कभी जवाहरलाल नेहरू और गांधी परिवार की गलत नीतियों की आलोचना तक नहीं की। बोलते बोलते वे इतने जोश में आ गए कि उन्होंने सीएए का विरोध करने वालों को "देशद्रोही" तक करार दे दिया। इतने पर भी नहीं रुके और अपने ज्ञान-गरल के तीव्र-प्रवाह में वे इतने भावविभोर हो उठे कि केरल के लोगों से भी कह दिया कि उन्होंने पार्टीशन और पाकिस्तान का बनना देखा ही नहीं है इसलिए वे क्या जाने कि विभाजन क्या होता है !!

ये केरल का कन्नूर था, अगर कोई दूसरा प्रदेश या शहर भी होता तब भी एक राज्यपाल के इस तरह के अशोभनीय भाषण का विरोध होना स्वाभाविक था । आरिफ़ मोहम्मद खान की इस तरह की टिप्पणियों के बीच इतिहास कॉन्फ्रेंस में आई जेएनयू में शोध करने वाली 2 लड़कियां अपने हाथ में "नो टू सीएए" का प्लेकार्ड लेकर खड़ी हो गयीं। अलीगढ़ और दिल्ली यूनिवर्सिटी के सीनियर प्रोफेसर्स भी खड़े हुए और राज्यपाल से इस तरह की बातें न बोलने को कहा। मगर राज्यपाल होते तो मानते भी, यहाँ तो आरिफ़ मोहम्मद खान थे, जो एक समय बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके कह चुके हैं कि अब वे भाजपा के आगे सरेंडर करने जा रहे हैं।

वे बोलते बोलते मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के बारे मे टिप्पणियाँ करने तक आ गए। इसी बीच पुलिस ने विरोध करने वालों पर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। उन दो लड़कियों को पकड़ना चाहा। उद्घाटन सत्र के अतिथि के रूप में मंच पर बैंठे एक राज्यसभा सदस्य के हस्तक्षेप से यह टला। मगर जल्दी ही जेएनयू, एएमयू, दिल्ली यूनिवर्सिटी और जामिया के उन कुछ शोधार्थियों को हिरासत में ले लिया गया जो आरिफ़ मोहम्म्द खान की कही बातों से असहमति जता रहे थे। हालांकि बाद में उन्हें छोड़ भी दिया गया। इसी दौरान अलीगढ के एक प्रोफ़ेसर को भी पकड़ने की कोशिश की गयी।

जैसे ही विरोध शुरू हुआ - इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के निवर्तमान अध्यक्ष के नाते मंच पर बैठे प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब अपनी सीट से उठे और कन्नूर यूनिवर्सिटी के कुलपति गोपीनाथ रवींद्रन की ओर यह अनुरोध करने के लिए बढ़े कि जो हो रहा है उसे वे रोकें और राज्यपाल - महामहिम राज्यपाल - से भी कहें कि वे इतिहासकारों के इस सम्मेलन को राजनीतिक अखाड़ा न बनाएँ। उन्हे बताएं कि जिस तरह की टिप्पणियां वे कर रहे हैं वे राज्यपाल के नाते उचित नहीं हैं, इसलिए न करें। जैसे ही प्रो. इरफ़ान हबीब कन्नूर के कुलपति की ओर बढ़े तो इधर राज्यपाल के एडीसी और सिक्योरिटी ऑफिसर ने उन्हें धक्का दिया और उधर खुद माइक पकड़े राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान ने यह कहना शुरू कर दिया कि प्रो. हबीब उन्हें बोलने से रोक रहे हैं।

कमाल की ढीठता यह है कि बजाय 88 साल के सम्मानित बुजुर्ग और देश के वरिष्ठतम इतिहासकार से खेद जताने के, उनके साथ अपने एडीसी और सिक्योरिटी द्वारा की गयी बेहूदगी के लिए माफी मांगने के आरिफ़ मोहम्मद खान अपने राज्यपाल के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके अपने ऊपर हुए "हमले" और इरफ़ान हबीब द्वारा कॉलर तक पकड़ने की आशंका की गुहार लगा रहे हैं। कहा जा सकता है कि आरएसएस और भाजपा की झूठ को ज़ोर से बोलकर शोर मचाने की आजमाई हुयी विधा को काम में ला रहे हैं ।

आरिफ़ मोहम्मद खान की एक शिकायत यह भी है कि वे सीएए का विरोध करने वालों को समझाने के लिए बार बार राजभवन बुला रहे हैं मगर एक छोटे से मदरसे के चंद लोगों को छोड़ कोई उनसे मिलने नहीं आया। अब कोई इन्हें यह क्यों नहीं समझाता कि उनका काम केंद्र सरकार के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर या भाजपा के प्रवक्ता का नहीं है। उनका काम संविधान की हिफ़ाज़त का है। मगर इतनी बारीक़ बात वे समझेंगे ऐसा सोचना उनसे कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगाना होगा। इसमें कोई शक नहीं कि आरिफ़ मोहम्मद खान अपने नए कुनबे में पूरी तरह से खपने के लायक हो गए हैं। उन्होंने संवैधानिक पद की गरिमा की धज्जियां उड़ाकर अपने राजनीतिक आकाओं की पुंगी बजाना सीख लिया है। व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी की सड़कछाप जुबान और असत्यों-अर्धसत्यों को धड़ल्ले से बोलने में माहिरी हासिल कर ली है। मगर - जैसा कि उन्ही के कुनबे के कुछ 'विद्वानो' का दावा है - यदि ऐसा वे राष्ट्रपति भवन में जाने के लिए कर रहे हैं तो अभी उन्हें और भी कुछ करके दिखाना होगा।

बहरहाल एक बात बहुत लोग सिरे से भूल रहे हैं और वो ये कि एक वाक्य में आधा दर्जन हिज्जे अशुद्द लिखने वाले लोग पाणिनी को व्याकरण और वर्तनी नहीं सिखाते। संविधान का स और इतिहास का इ तक नहीं जानने वाले लोग देश की मेधा के प्रतीक प्रोफेसर इरफान हबीब को शऊर और सलीका नहीं सिखाते।

इन दिनों जब खुद संविधान को ही ध्वस्त करने की मुहिम सी छेड़ी हुयी है तब संवैधानिक पदों के अवमूल्यन की निचली से निचली भी सीमा नहीं चौंकाती, किन्तु आश्चर्य पगी दया उन बंधुओं पर आती है जिन्हें प्रो. इरफ़ान हबीब और हिस्ट्री कॉन्फ्रेंस मे आए इतिहासकारों की असहमति में अचानक संवैधानिक पदों और संस्थानों की गरिमा के गिरने का भान हो रहा है। जिन्हें बाकी सब कुछ नहीं दिखा रहा है। मगर दोष उन बेचारों का नहीं है। ग़लत को ग़लत कहने के लिए जोखिम उठाने पड़ते हैं। सच कहने की स्थिति में लोया बनने का भी लोचा होता है। सो ट्रोल आर्मी और आईटी सेल के संग बहने और उनका कहा कहने में ही भलाई समझते हैं। ये डेढ़ सयाने लोग जीवन में ढेर खुश रह सकते हैं - मगर इतिहास इनकी शिनाख्त शरीके-जुर्म के रूप मे ही करता है।

(लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Kerala
Irrfan Habib
Indian media
Governor Arif Mohammad Khan
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Kannur University
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CAA
Protest against CAA
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