NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्यों राम मंदिर के लिए चंदा अभियान चलाने का तरीक़ा चिंताजनक है
जब पड़ोस के 'जाने-पहचाने लोग' अनजान लोगों के साथ दरवाज़े पर आएं, तब मंदिर समर्थक ना होने की 'पहचान' का ठप्पा लगने का डर, बहुत साहस रखने वालों में भी घर कर जाता है।
नीलांजन मुखोपाध्याय
19 Feb 2021
राम मंदिर
Image Courtesy: freepress journal

"विश्वास के मामले में किसी तरह का दबाव नहीं होना चाहिए!" कुरान की यह पंक्ति अक्सर उद्धरित की जाती है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है, जिसपर कोई भी धर्म सवाल भी नहीं उठाएगा। लेकिन जिन्होंने राजनीति और धर्म का अध्ययन किया है, वह भी इससे सहमत हैं। राजनीति की ज़मीन पर डर या हिंसा पैदा होती है, जो बाद में धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाती है। इसका उल्टा कभी-कभार ही होता है। 

प्रधानमंत्री मोदी समेत कई नेताओं द्वारा नैतिकता का प्रतिमान माने जाने वाले महात्मा गांधी ने भी दबाव की राजनीति को ख़ारिज किया है। उन्होंने एक बार कहा था, "जो भी व्यक्ति दबाव का इस्तेमाल करता है, वह जानबूझकर की गई हिंसा का दोषी होता है। दबाव की प्रक्रिया ही अमानवीय है।"

दबाव मुखर और अंतर्निहित, दोनों तरह का हो सकता है। संघ परिवार ने जनवरी के मध्य में घर-घर जाकर राम मंदिर के लिए चंदा अभियान शुरू किया था। भले ही ऐसा कहा नहीं जाता, लेकिन यह हमेशा से ही एक दबाव का अभियान रहा है। जब पड़ोस के 'जाने-पहचाने' लोग अनजान लोगों के साथ आपका दरवाज़ा खटखटाते हुए आते हैं, तब कई बहुत बहादुर लोग भी राम मंदिर का समर्थन ना करने वाली 'पहचान' बनने के डर से हिल जाते हैं।

आबादी का एक हिस्सा अपने आदर्शवाद पर कायम है। इसका कहना है कि अपने आदर्शों के चलते हम चंदा नहीं देंगे। वहीं दूसरे लोगों के अपने तर्क हैं, या फिर उन्होंने अपने दोस्तों-परिवारों के साथ मिलकर विचार किया है कि राम मंदिर अभियान का समर्थन ना करने वाली पहचान बनना घातक है। कई लोगों ने पर्याप्त मात्रा में चंदा दे दिया या फिर दावा किया कि उन्होंने पहले ही चंदा दे दिया है। इन लोगों की चिंताओं से साफ़ हो जाता है कि राम जन्मभूमि आंदोलन कभी मंदिर के बारे में था ही नहीं और इसका धर्म से भी बहुत थोड़ा लेना-देना है। यह हमेशा से राजनीतिक साख बढ़ाने और धार्मिक आधिपत्य बनाने का रास्ता था। 

बल्कि बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने इस बात की खुलेआम घोषणा भी की थी। उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा था कि आंदोलन कभी मस्जिद की जगह पर मंदिर बनाने के लिए था ही नहीं। बल्कि यह 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के विचार को लोकप्रिय बनाने के लिए था। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हिंदुत्व की अभिव्यंजना है।

हाल में रिपोर्ट आई हैं कि कुछ स्वयंसेवक चंदा देने वाले लोगों के घरों पर पर्चा चिपका रहे हैं, इसके ज़रिए उन लोगों को भविष्य में सताए जाने का मंच तैयार किया जा रहा है, जिनके इस मुद्दे पर विपरीत विचार हैं। धार्मिक-सांस्कृतिक उत्साह के यह चिन्ह ज़्यादातर घरों पर लगे हुए हैं, वहीं कॉलोनियों में जिन घरों पर पर्चे नहीं चिपके हैं, उन्हें चिन्हित किया जा रहा है।

इतिहास में ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं, जो बताती हैं कि कैसे भीड़ योजनाबद्ध तरीके से ऐसे घरों और व्यापारिक उद्यमों को निशाना बनाती है, जिन्हें पहले चिन्हित किया गया था। कैसे जर्मनी में "क्रिस्टालनाच" अभियान के तहत गहन दस्तावेज़ीकरण कर योजना बनाई गई और उसे अंजाम दिया गया, इसकी हज़ारों कहानियां हैं। जर्मनी में 1938 के नरंसहार के उस स्याह दौर में यहूदियों के स्वामित्व वाली संपत्तियों और साइनागॉग (यहूदियों के प्रार्थनाघर) को निशाना बनाया गया।

भारत में सिख दंगों के दौरान 1984 में दिल्ली की कुछ कॉ़लोनियों में सिखों के स्वामित्व वाले घरों की निशानदेही की गई और जब भीड़ हिंसा कर रही थी, तब यह आसान निशाना बन गए। कथित 'मिश्रित कॉलोनियों' में दंगों के दौरान ऐसे ही तरीके अपनाए जाते हैं। इन मिश्रित कॉलोनियों में सभी धर्मों के लोग रहते हैं। कई बार अक्सर पड़ोसियों ने ही हमलावरों को उन घरों की पहचान कराई है, जो निशाना बनाए गए समुदाय के स्वामित्व वाले होते हैं।

यह बड़े पैमाने पर माना जाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास एक शानदार ढंग से काम करने वाला राजनीतिक तंत्र मौजूद है, जिसकी समाज में बहुत भीतर तक जड़ें जमी हुई हैं। परिणामस्वरूप जब विश्व हिंदू परिषद ने पिछले साल नवंबर में 14 जनवरी से राम मंदिर के लिए 45 दिन तक चंदा एकत्रित करने की योजना का ऐलान किया, तो साफ़ था कि यह टकराव पैदा करने वाला कदम था और इसका उद्देश्य सांप्रदायिक टकराव पैदा करना था। 

जब यह अभियान औपचारिक तौर पर शुरू भी नहीं हुआ था, तभी हिंदुत्व से जुड़े समूहों ने मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में पिछले साल दिसंबर में हिंसा उकसाने के कदम उठाना शुरू कर दिए थे। कुछ रैलियां निकाली गईं, जिनसे हिंसा हुई। रोम के राजनीतिज्ञ मार्कस टुलियस सिसरो के बहुत प्रसिद्ध शब्द हैं: "युद्ध के वक़्त कानून शांत हो जाता है।" इंदौर, उज्जैन, मंदसौर और धार के जिला प्रशासन के नाकारापन से कुछ इन्हीं शब्दों की याद आती है।

राम मंदिर समर्थकों द्वारा हाल में चंदा देने वालों के घरों पर पर्चे चिपकाए जाने की घटनाएं देश में उपज रहे समस्याग्रस्त घटनाक्रमों में ताजा जोड़ है, जबकि हमारे देश की सत्ता का मूल आधार ही पंथनिरपेक्षता है।

राम मंदिर के लिए चंदा देने या ना देने का फ़ैसला लोगों ने अपनी धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं किया। मुस्लिमों में कई लोग ऐसे रहे, जिन्होंने चंदा देने पर रजामंदी दिखाई। कोई कैसे यह भूल सकता है कि भारत के पहले देशभक्त कवि अल्लामा इकबाल ने भगवान राम को इमाम-ए-हिंद के तौर पर संबोधित किया था। 

यह संभव है कि अगर अल्लामा इकबाल जिंदा होते, तो वे चंदा इकट्ठा करने के तरीके से असहमति जताते। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो पहचान का डर पैदा करती है। लेकिन तब भी कुछ मुस्लिम हैं, जिन्होंने राम मंदिर के लिए अपनी व्यक्तिगत क्षमता के हिसाब से, चाहे डर या रणनीतिक तरीके से चंदा दिया है।

इसी तरह ऐसे अनगिनत हिंदू हैं, जो मंदिर के लिए चंदा नहीं देना चाहते। उनका विरोध निर्माण के राजनीतिक तरीके से है, जहां प्रधानमंत्री भूमि पूजन कर रहे हैं, जबकि उनके पूर्व मुख्य सचिव इस प्रोजेक्ट पर नजर रखने वाले ट्रस्ट में सदस्य हैं और जब VHP का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति भवन पहुंचा, तो वहां राष्ट्रपति ने चंदा अभियान की शुरुआत की। 

जो हिंदू राम मंदिर के लिए चंदा देने से इंकार कर रहे हैं, वे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से भी असहमत हैं, जिसमें बाबरी मस्ज़िद को गिराए जाने को गैरकानूनी बताए जाने के बावजूद हिंदू पक्ष को राहत प्रदान कर दी गई।

1980 के आखिर में जबसे रामजन्मभूमि अभियान शुरू हुआ है, तबसे इसे एक 'राष्ट्रीय कार्य' के तौर पर पेश किए जाने की कोशिश जारी थी। राम मंदिर के अभियान को "राष्ट्रीय महत्वकांक्षांओं के प्रतीक" के तौर पर प्रचारित किया गया। असहमत लोगों के लिए कोई भी जगह नहीं थी। शुरू से ही असहमत लोगों को डराया गया या उन्हें तिरस्कृत किया गया।

'हिंदुस्तान में रहना होगा, तो राम का नाम लेना होगा', 'जो राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं' जैसे नारे इस अभियान के प्रमुख नारे थे। बल्कि बाद वाले नारे को एक कोलाहल भरे गाने में परिवर्तित किया गया और राम मंदिर से संबंधित कार्यक्रमों में इसे खूब बजाया जाता था।

चाहे मुस्लिम हों या राम मंदिर आंदोलन की मांग का समर्थन ना करने वाले हिंदू, इन्हें जिस तरीके से निशाना बनाया जा रहा है और जिस तरीके से ऐसा कर भारत में ध्रुवीकरण किया गया, वह कोई नया घटनाक्रम नहीं है।

लेकिन घर-घर जाकर निशानदेही करना और चंदा ना देने वाले लोगों का नाम-पता लिखना, उनके लिए भविष्य में नुकसान की संभवना पैदा करता है। एक सामान्य समाज में इन तरीकों की इन संगठनों के उच्च नेताओं द्वारा निंदा की जानी थी। लेकिन 13 फरवरी को RSS प्रमुख मोहन भागवत ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि "एक भी परिवार छूटना नहीं चाहिए।"

लोगों की भागीदारी को बनाए रखने के लिए, संघ परिवार के उच्च नेताओं का एकजुट प्रयास और मौजूदा चंदा अभियान बताता है कि सत्ता में साढ़े छ: साल गुजारने के बाद भी मोदी सरकार के पास, लोगों से सकारात्मक प्रोत्साहन को पाने के लिए कोई आधार मौजूद नहीं है। लेकिन यहां चंदा अभियान से संघ को अपने समर्थकों और विरोधियों का बड़ा डाटाबेस मिलना चिंता की बात है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Why the Manner of Ram Temple Donation Drive is Worrisome

Mandir donations
coercive donations
ram temple
Sangh Parivar
RSS
VHP
lk advani

Related Stories

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

कटाक्ष:  …गोडसे जी का नंबर कब आएगा!

भाजपा के क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करने का मोदी का दावा फेस वैल्यू पर नहीं लिया जा सकता

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कांग्रेस का संकट लोगों से जुड़ाव का नुक़सान भर नहीं, संगठनात्मक भी है

कार्टून क्लिक: पर उपदेस कुसल बहुतेरे...

पीएम मोदी को नेहरू से इतनी दिक़्क़त क्यों है?

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप


बाकी खबरें

  • modi
    विजय विनीत
    बनारस में फिर मोदी का दौरा, क्या अब विकास का नया मॉडल होगा "गाय" और "गोबर"? 
    23 Dec 2021
    मोदी ने बनारस दौरे पर दिए अपने भाषण में यह नहीं बताया कि डबल इंजन की सरकार के विकास से किस वर्ग के लोगों की आमदनी बढ़ी? चाहे वो किसान हो, मजदूर हो या फिर व्यापारी, कोई इस स्थिति में नहीं है कि वो यह…
  • paul
    कैप्टन पॉल वाटसन
    पृथ्वी पर इंसानों की सिर्फ एक ही आवश्यक भूमिका है- वह है एक नम्र दृष्टिकोण की
    23 Dec 2021
    जहाँ एक तरफ दुनिया के महासागर, गैर-मानवीय जानवर और पेड-पौधे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को बरक़रार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहीं हम इसे नुकसान पहुंचाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं?
  • dharm sansad
    अजय कुमार
    हरिद्वार में ‘धर्म संसद’ के नाम पर तीन दिन तक चलते रहे अल्पसंख्यक विरोधी भाषण, प्रशासन मौन! 
    23 Dec 2021
    ‘धर्म संसद' नाम का इस्तेमाल कर उत्तराखंड के हरिद्वार में 17 दिसंबर से लेकर 19 दिसंबर तक एक ऐसी सभा का आयोजन हुआ जिसमें सब कुछ अपवित्र और आपत्तिजनक था।
  • mid day meal
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    उत्तराखंड : दलित भोजन माता की नियुक्ति और विवाद का ज़िम्मेदार कौन है?
    23 Dec 2021
    चंपावत के सूखीढांग इंटर कॉलेज मामले में कई बड़े झोल सामने आ रहे हैं। कभी भोजन माता की नियुक्ति को अवैध बताया जा रहा है, तो कभी जातिवाद का मुद्दा हावी हो रहा है। बहरहाल, मामला जो भी हो ज़िम्मेदारी और…
  • Saudis
    पीपल्स डिस्पैच
    यमन में युद्ध अपराध की जांच कर रहे यूएन इंवेस्टिगेटर की जासूसी के लिए सऊदी ने किया पेगासस का इस्तेमाल
    23 Dec 2021
    सऊदी अरब ने यमन में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के सदस्यों के ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चलाने की सिफ़ारिश करते हुए स्वतंत्र पैनल द्वारा एक रिपोर्ट जारी करने से हफ्तों पहले ही संयुक्त राष्ट्र के एमिनेंट…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License