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क्या पूंजीवादी व्यवस्था में निवेश का सामाजीकरण सब दुरुस्त कर सकता है?
बिना विकट मुद्रास्फीति संकट के कारण पैदा हुई व्यवस्था की विफलता के, पूंजीवादी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी कभी भी एक निश्चित स्तर से नीचे नहीं गिर सकती है।
प्रभात पटनायक
07 Jul 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
capitalism

जॉन मेनार्ड केन्स, बीसवीं सदी के सबसे अंतर्दृष्टि-संपन्न पूंजीवादी अर्थशास्त्री थे। वे अपने समय में पूंजीवादी व्यवस्था के हिमायती भर बनकर नहीं रहे। आखिरकार, वह महामंदी के बीचौ-बीच और बोल्शेविक क्रांति की पृष्ठभूमि में लिख रहे थे। ऐसे वक्त में इसका स्वांग भरने की कोशिश करना कि पूंजीवादी व्यवस्था में सब कुछ ठीक-ठाक था, वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान ही करना होता। जबकि इस व्यवस्था को वह बहुत प्यार करते थे। इसलिए, उनकी नजर में पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने का सबसे कारगर रास्ता यही हो सकता था कि वह ईमानदारी से इस व्यवस्था की खामियों को स्वीकार करें और इन खामियों की मरम्मत करने की कोशिश करें।

आम बेरोज़गारी और पूंजीवाद की मरम्मत

पूंजीवादी व्यवस्था में जो असली खामी उन्हें दिखाई दी, वह यह थी कि यह व्यवस्था करीब-करीब हमेशा ही आम-बेरोजगारी के बोझ से लदी रही है। और उनको आशंका थी कि यह इस व्यवस्था के ही ठुकराए जाने और इस तरह उसे दूसरी व्यवस्था से प्रतिस्थापित किए जाने की ओर ले जा सकता है। पूंजीवादी व्यवस्था में आम-बेरोजगारी की वजह उनकी नजर में यही थी कि इसमें निवेश के निर्णय पूंजीपतियों के एक समूह द्वारा निजी तौर पर तथा अलग-अलग रहकर लिए जाते हैं और कुल निवेश सब मिलकर कभी भी इसके लिए परिपूर्ण नहीं होते हैं (‘उत्तेजना के संक्षिप्त से दौरों’ को छोडक़र) कि वे पूर्ण रोजगार की स्थिति में पैदा हो सकने वाले उत्पादन और अगर इतने उत्पादन में उसके संभव उपभोग के बीच के अंतर को पूरा सकें। यही वह चीज है जो पूर्ण रोजगार के उत्पादन के स्तर पर, अपर्याप्त सकल मांग पैदा करती है और इसलिए, पूर्ण रोजगार को हासिल होने से रोकती है। आखिरकार, किसी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अलग कर के देखें तो उसमें वास्तव मेें हासिल होने वाला उत्पाद, उपभोग तथा निवेश के योग के बराबर ही तो होगा।

इसलिए, केन्स ने यह सुझाया कि अगर निवेश के निर्णयों का सामाजीकरण कर दिया जाए यानी ‘समाज’ की ओर से काम करते हुए शासन, नीतियों के एक समुच्चय के जरिए, जिसमें मौद्रिक तथा राजकोषीय नीतियां भी शामिल होंगी, यह सुनिश्चित कर सके कि कुल मिलाकर, निवेश के निर्णय हमेशा ही ऐसे होंगे जो पूर्ण रोजगार के स्तर के उत्पाद तथा इस उत्पाद में से उपभोग के बीच के अंतर को पूरा कर देंगे, तो पूंजीवादी व्यवस्था पर्याप्त रूप से काम कर सकती है।

निवेश के सामाजीकरण का केन्स का नुस्खा

इसलिए, उन्हें लगा कि पूंजीवादी व्यवस्था के अंदर, निवेश का सामाजीकरण ही, इन खामियों को दूर करने के लिए काफी होगा। उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के सामाजीकरण यानी समाजवाद की तो जरूरत ही नहीं थी। केन्स के शब्दों में, ‘उत्पादन के साधनों का स्वामित्व नहीं है, जिसका राज्य द्वारा अपने हाथों में लिया जाना महत्वपूर्ण हो। अगर, शासन यह तय करने में समर्थ होता है कि उत्पादन के साधनों को बढ़ाने के लिए कितने संसाधन लगाए जाने हैं तथा उन पर, इन साधनों के स्वामियों के लिए पुरस्कार की एक बुनियादी दर सुनिश्चित कर देता है, तो वह सब कुछ हासिल कर चुका होगा, जो कि जरूरी है।’

केन्स जब यह लिख रहे थे उस समय भी, माक्र्सवादी धारा से जुड़े अनेक लेखकों ने यह ध्यान दिलाया था कि वह जो उपचार सुझा रहे थे नाकाफी था, कि पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में निवेश का इस तरह का सामाजीकरण अगर लागू भी हो सकता हो, तो भी वह आम बेरोजगारी से उबरने के लिए काफी नहीं होगा। उनके समय के बाद से, हमारे पास अनेक वर्षों का व्यावहारिक अनुभव भी आ चुका है, जो पर्याप्त रूप से इसी सचाई की पुष्टि करता है।

पूंजीवाद के अंतर्गत आम बेरोजगारी सिर्फ मांग की अपर्याप्तता का ही नतीजा नहीं होती है। आम बेरोजगारी की एक न्यूनतम मात्रा की या माक्र्स के शब्दों में ‘श्रम की सुरक्षित सेना’  की जरूरत तो, इस व्यवस्था को चलाते रहने के लिए ही होती है। पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत आम बेरोजगारी, सिर्फ उसका एक दोष भर नहीं है बल्कि उसके कार्य पद्घति का ही हिस्सा है। बेशक, 1930 के दशक की महामंदी के दौरान देखने में आयी बेरोजगारी जैसी भारी बेरोजगारी या यहां तक कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में सामान्य रूप से देखने को मिलने वाली आम बेरोजगारी को भी, शासन द्वारा सकल मांग के उत्प्रेरण के जरिए कम किया जा सकता है। वास्तव में, जैसाकि पोलिश अर्थशास्त्री माइकेल कलेखी ने ध्यान दिलाया था, शास्त्रीय पूंजीवाद एक ‘मांग-बाधित व्यवस्था’ होता है। लेकिन, अगर हम मांग बढ़ाते जाएंगे तो, इस व्यवस्था में बेरोजगारी के एक हद तक नीचे आने के बाद, भारी मुद्रास्फीति पैदा हो जाएगी। 

पूंजीवाद की ज़रूरत है एक हद तक बेकारी

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रम की इस सुरक्षित सेना का एक महत्वपूर्ण काम है, मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत को दबाए रखना ताकि वे बेहतर मजदूरी की मांग नहीं कर सकें। इसलिए, आम बेरोजगारी का एक स्तर से नीचे ले जाया जाना, इस भूमिका के अदा किए जाने को रोकता है। मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत बढ़ती है और वे बेहतर मजदूरी मांगते हैं (श्रम की उत्पादकता में बढ़ोतरी की दर से ज्यादा बढ़ोतरी के साथ) ताकि उत्पाद में से अपने हिस्से को बढ़ा सकें। लेकिन, पूंजीपति चूंकि उत्पाद में मजदूरों के हिस्से में कोई बढ़ोतरी करने के लिए तैयार नहीं होते हैं, वे उत्पाद के दाम बढ़ा देते हैं, ताकि उत्पाद में से मजदूरी के हिस्से में कोई बढ़ोतरी नहीं हो। इससे मुद्रास्फीति पैदा होती है और अगर मजदूर अपनी उक्त कोशिशों को जारी रखते हैं, तो मुद्रास्फीति अनवरत रूप से जारी रहती है। और अगर मजदूर इस मुद्रास्फीति का भी पहले से अनुमान कर लेते हैं और मजदूरी की अपनी मांग में इसका हिस्सा भी शामिल कर लेते हैं, तो वक्त के साथ मुद्रास्फीति भी बढ़ती जाती है। इसलिए, पूंजीवादी व्यवस्था में आम बेरोजगारी को कभी खत्म किया ही नहीं जा सकता है। आम बेरोजगारी एक स्तर से नीचे भी कभी नहीं जा सकती है और अगर जाती है तो मुद्रास्फीति के भारी संकट के जरिए, पूरी व्यवस्था ही ठप्प पडऩे लगती है।

यह सब कोई कोरे सिद्घांत का मामला नहीं है। ठीक यही है जिसके चलते युद्घोत्तर आर्थिक उछाल का अंत हुआ था। याद रहे कि दूसरे विश्व युद्घ के बाद के वर्षों में अधिकांश देशों में उन नीतियों पर ही चला जाता रहा था, जिनकी वकालत केन्स करते थे। इन नीतियों से मांग में बढ़ोतरी हुई थी, बेरोजगारी घटी थी और मांग के ऊंचे स्तर के चलते, पूंजीवादी निवेशों को बढ़ावा मिला था और इसने वृद्घि दर को ऊपर उठा दिया था। इसके चलते इस दौर को ‘पूंजीवाद का स्वर्ण युग’ कहा जाता है। लेकिन, लंबे अर्से तक बेरोजगारी का स्तर नीचा रहने से अंतत: मजदूरी तथा मुनाफे के हिस्सों में बंटवारे पर एक असाध्य टकराव पैदा हुआ, जिसकी अभिव्यक्ति ऊंची मुद्रास्फीति के रूप में हुई। इसके चलते पूंजीवाद, थैचर तथा रीगन के शासन कालों में, बेरोजगारी की ऊंची दरों पर लौट गया।

बंटवारे का समझौता व्यवहारिक नहीं

फिर भी, बेरोजगारी की ऊंची दर के बहाल होने से पहले, एक ‘मूल्य तथा आय नीति’ लागू करने के जरिए, केन्सवादी संकल्पना को बचाने की कोशिश की गयी थी। इस नीति के पीछे विचार यह था कि अपने-अपने हिस्सों को लेकर, मजदूरों तथा पूंजीपतियों के बीच समझौते के जरिए, मुद्रा में मजदूरी तथा कीमतों में बढ़ोतरी पर अंकुश लगाकर, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण कायम किया जाए। लेकिन, किसी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कीमतों व आय की नीति कभी काम कर ही नहीं सकती है। इसकी वजह यह है कि अगर किसी खास उद्योग में मजदूरों तथा पूंजीपतियों के बीच हिस्से के बंटवारे पर समझौता हो भी जाता है तब भी, अलग-अलग उद्योगों में श्रम की उत्पादकता की वृद्घि दर अलग-अलग रहने के चलते, इस तरह के समझौतों के चलते वास्तविक मजदूरी में वृद्घि की दर भी अलग-अलग ही होगी। इस तरह, जिन उद्योगों में श्रम उत्पादकता कम है या ठहरी हुई है, उन्हें अपनी किसी गलती के न होते हुए भी वास्तविक मजदूरी के जहां के तहां रुके रहने की मार झेलनी पड़ रही होगी (आखिरकार, श्रम उत्पादकता में वृद्घि का फैसला मजदूरों के हाथों में तो होता नहीं है)। इससे मजदूरों के बीच एक विभाजन होने लग जाएगा, जिसमें मजदूरों के एक हिस्से की वास्तविक मजदूरी में तो तेजी से बढ़ोतरी हो रही होगी जबकि दूसरे मजदूरों की वास्तविक मजदूरी एक ही जगह ठहरी रहेगी। इसलिए, इस तरह के समझौते अंतत: तो टूट ही जाते हैं।

दूसरा रास्ता यही हो सकता है कि मजदूरी के हिस्से के संबंध में, मजदूरों के प्रतिनिधियों और पूंजीपतियों के प्रतिनिधियों के बीच एक देशव्यापी समझौता हो और हर जगह वास्तविक मजदूरी में समान दर से बढ़ोतरी हो, श्रम की उत्पादकता में बढ़ोतरी की औसत दर के हिसाब से। लेकिन, ऐसी स्थिति में कुछ उद्योगों में तो (जहां श्रम की उत्पादकता में वृद्घि की दर ज्यादा होगी) मुनाफे का हिस्सा बढ़ रहा होगा, जबकि अन्य उद्योगों में यह हिस्सा घट रहा होगा। इसीलिए, इस तरह का समझौता भी अंतत: टूट जाने वाला है क्योंकि जिन उद्योगों में मुनाफे का हिस्सा गिर रहा होगा, उनके मालिक पूंजीपति इसके खिलाफ विद्रोह कर देेंगे। इस तरह, किसी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में मूल्यों तथा आयों की नीति को तो लागू कर पाना ही असंभव है।

समाजवादी व्यवस्था ही दे सकती है पूर्ण रोज़गार

इसके मुकाबिल, समाजवादी व्यवस्था को रखकर देखें। चूंकि ऐसी व्यवस्था में सारे ही उद्योग राज्य की मिल्कियत होते हैं, उद्योगों के बीच मुनाफों के वितरण के हिस्सों के कम या ज्यादा होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता है क्योंकि सारे मुनाफे आखिरकार तो सरकारी खजाने में ही जाते हैं। इसलिए, ऐसी व्यवस्था में ऐसे समझौते को लागू करने में कोई कठिनाई नहीं होगी, जिसमें सभी मजदूरों को हर साल वास्तविक मजदूरी में, श्रम उत्पादकता में औसत वृद्घि की रफ्तार से ही बढ़ोतरी हासिल हो। (बेशक, अगर समझौता मजदूरी के हिस्से में बढ़ोतरी का हो तो मजदूरी में औसत वृद्घि, उत्पादकता में औसत बढ़ोतरी से ज्यादा रखी जा सकती है और अगर समझौता मजदूरी के हिस्से को घटाने पर हो तो, मजदूरी में औसत वृद्घि, उत्पादकता में बढ़ोतरी के औसत से नीचे रखी जा सकती है।) संक्षेप में यह कि एक समाजवादी अर्थव्यवस्था आसानी से मूल्यों तथा आयों की नीति को लागू कर सकती है और पूर्ण रोजगार को बनाए रख सकती है, जैसाकि पहले के समाजवादी देशों ने वाकई किया था।

इस तरह, 1930 के दशक के दौर का केन्स का नुस्खा तो ज्यादा से ज्यादा पूंजीवादी व्यवस्था के परिचालन की एक खास त्रुटि को ही दूर कर सकता है। लेकिन, इस व्यवस्था की तो कार्य पद्घति में ही इस माने में खोट है कि यह व्यवस्था, वर्गीय-विरोध पर टिकी हुई है। इसलिए, यह सोचना कि इस व्यवस्था को इसकी दोषपूर्ण कार्यपद्घति से ही बाहर निकाला जा सकता है, एक मरीचिका के सिवा और कुछ नहीं है।

साम्राज्यवाद की भूमिका

बहरहाल, सामान्यत: जब भी पूंजीवाद के अंतर्गत विकट मुद्रास्फीति पैदा होती है, उसे तीसरी दुनिया में स्थित, कच्चे मालों तथा मजदूरी मालों या प्राथमिक उत्पादों के लघु-उत्पादक आपूर्तिकर्ताओं की कीमत पर ही, हल करने की कोशिश की जाती है। तीसरी दुनिया के ये लघु उत्पादक आम तौर पर दूसरे द्वारा तय की जाती कीमतों पर आपूर्ति करने वाले या ‘प्राइस टेकर्स’ साबित होते हैं, जिनके पास सौदेबाजी की कोई खास ताकत ही नहीं होती है। वे, पूंजीवादी इजारेदारियों के लिए लागत सामग्री आपूर्तिकर्ताओं का एक ऐसा महत्वपूर्ण समूह साबित होते हैं, जो उत्पाद में अपने हिस्से को बनाए रखने की स्थिति में ही नहीं होता है। इसीलिए, मुद्रास्फीतिकारी उछाल को अंतत: उनकी ही कीमत पर हल किया जा जाता है।

वास्तव में साम्राज्यवाद की महत्वपूर्ण भूमिका यह सुनिश्चित करने की ही है कि वे प्राइस टेकर्स ही बने रहें। लेकिन, इन तबकों को पहले ही जिस हद तक अपने हिस्से के निचोड़े जाने का शिकार बनाया जा चुका है उसके इतिहास के चलते, उनका हिस्सा पहले ही इतने नीचे पहुंच चुका है कि अब, उसे और निचोडऩे के जरिए, विकसित दुनिया में मुद्रास्फीति पर काबू पाना करीब-करीब नामुमकिन हो गया है। इसके अलावा यह मानना कि विकसित दुनिया में पूंजीवाद, दूसरे देशों की कीमत पर हमेशा खुद को साधे रख सकता है, घटिया भी है और गैर-यथार्थवादी भी।

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