NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
टेलीविज़न की उत्तेजक डिबेट्स में आम ज़िन्दगी के बुनियादी मुद्दे क्यों नही होते शामिल?
नीतू जी जैसी अनेकों गृहणियों के लिए महंगाई एक बुनियादी मुद्दा है इसके साथ ही विक्की जैसे नौजवानों के लिए रोज़गार एक अहम मुद्दा है। और ये दोनों मुद्दे ही अक्सर टीवी चैनलों से नदारद ही रहते हैं। 
अभिषेक पाठक
04 Jul 2021
टेलीविज़न की उत्तेजक डिबेट्स में आम ज़िन्दगी के बुनियादी मुद्दे क्यों नही होते शामिल?
'प्रतीकात्मक फ़ोटो' साभार: Desta.tv

वर्तमान दौर बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी के साथ-साथ टीवी न्यूज चैनलों की गिरती साख के लिए भी जाना जाएगा। पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर अपनी विश्वसनीयता का पतन किस तरह से इन्होंने किया है हम सभी इस बात से वाकिफ हैं। देश मे बेरोज़गारी और महंगाई का जो चौमुखी विकास हुआ है इस बात से खुद सत्ता समर्थक लोग भी इंकार नही कर पाते हैं।

ऐसे में देश के लोग ये जानना चाहते हैं कि भारत के अधिकतर न्यूज़ चैनल्स जिन तेवरों के साथ फिज़ूल और अप्रासंगिक कार्यक्रम करते हैं उन्ही तेवरों और उत्साह के साथ आखिर क्यूं ये चैनल आम ज़िन्दगी से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर कार्यक्रम नही करतें? क्या कारण हैं कि देश के आमजन की कमर तोड़ती महंगाई पर लंबी-लंबी डिबेट्स नही की जाती? क्यूं सत्ता से सवाल नही किये जाते? क्यूं किसी की जवाबदेही तय नही की जाती? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो देश के आमजनमानस के मन को कचोटते हैं।

देश आज महंगाई से त्रस्त है। तोहफे के तौर पर ताज़ा-ताज़ा दूध और रसोई गैस के दामों में बढ़ोतरी हुई है। पेट्रोल-डीजल से लेकर खाने पीने की चीज़ों, रसोई गैस और खाद्य तेलों के दामों में आग लगी हुई है। मोदी दौर में शतक जड़ चुके पेट्रोल और दोहरा शतक लगा चुके सरसों के तेल ने देश के गरीब तबके की कमर तोड़ दी है। "बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार" इन नारों को याद करते हुए जब देश का नागरिक पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाता है तो खुद को ठगा-सा महसूस करता है, खुद के साथ वायदा खिलाफी का अनुभव करता है।

महंगाई का आलम ये है कि खुदरा महंगाई दर और थोक महंगाई दर दोनों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। कन्ज़्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के मुताबिक मई में खुदरा महंगाई दर 6.3 फीसदी पँहुच गयी जोकि छह महीने में सबसे अधिक दर्ज की गई। अप्रैल महीने में ये 4.23 प्रतिशत थी। मई में खुदरा महंगाई दर का ये आंकड़ा रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के दायरे जोकि 2-6 प्रतिशत था, से भी बाहर निकल गया। वहीं इसके अलावा थोक महंगाई दर (WPI) मई में रिकॉर्ड 12.94 फीसदी दर्ज की गई जबकि अप्रैल में यह 10.49 प्रतिशत थी।

पेट्रोल के दाम सातवें आसमान पर हैं। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने अपनी चुनावी रैलियों और भाषणों में महंगाई के मुद्दे को बेहद जोर-शोर से उठाया था। विशेषतौर पर पेट्रोल और डीज़ल को लेकर उस समय की कांग्रेस सरकार पर बेहद तल्ख तेवरों के साथ प्रहार किए थे। साल 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई तब दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 71.41 रुपये तथा डीज़ल की कीमत 56.71 रुपये थी लेकिन वर्तमान में पेट्रोल के दाम देश के कई शहरों में 100 रुपये पार हो गया है। ध्यान रहे 2014 में जब कच्चे तेल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल थी तब देश मे पेट्रोल और डीज़ल की कीमत आज के मुकाबले कम थी जबकि आज कच्चे तेल की कीमत 75 रुपये प्रति बैरल के आसपास है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमत तब के मुकाबले काफी ज़्यादा है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सोनिया विहार इलाके में रहने वाली एक गृहिणी नीतू सिंह का कहना है, "ये मोदी सरकार जब से देश में आई है तबसे कुछ-न-कुछ हो ही रहा है। कुछ भी ठीक नही है। महंगाई तो पूछो मत। मैं एक गृहणी हूँ इसलिए अच्छे से समझती हूँ कि किस तरह से रसोई में इस्तेमाल होने वाली ज़्यादातर चीज़ों के दाम बढ़ गए हैं। सरसों का तेल जिसके बिना रसोई अधूरी हैं, हमने पहली बार इसका दाम 200 रुपये प्रति लीटर देखा। हमें इस सरकार से बहुत आशाएं थीं, बहुत विश्वास था कि नई सरकार सत्ता में आते ही महंगाई पर लगाम लगाएगी लेकिन ठीक इसके उल्टा हुआ महंगाई तो पहले से भी ज़्यादा हो गयी है। इस मोदी सरकार ने हमारा विश्वास तोड़ा है।"

इसी इलाके के एक नौजवान विक्की सिंह का कहना है, "नौकरियां हैं नही। नौकरियों के इच्छुक लोगों की संख्या में लगातार इज़ाफा हो रहा है। सरकारी नौकरियों का हाल ये है कि लाखों-लाख की संख्या में हर साल छात्र फॉर्म भरते हैं और उसके मुकाबले वेकैंसी की संख्या बेहद कम है यही कारण है कि इन परीक्षाओं की कटऑफ महंगाई की तरह सातवें आसमान पर है। सरकारी छोड़ो प्राइवेट सेक्टर के हालात भी बदतर हैं। आज एक पढ़े-लिखे ग्रेजुएट को 15 से 16 हज़ार के वेतन पर मजबूरन काम करना पड़ रहा है।"

नीतू जी जैसी अनेकों गृहणियों के लिए महंगाई एक बुनियादी मुद्दा है इसके साथ ही विक्की जैसे नौजवानों के लिए रोज़गार एक अहम मुद्दा है। और ये दोनों मुद्दे ही अक्सर टीवी चैनलों से नदारद ही रहते हैं। 

टीवी डिबेट्स का गिरता स्तर

वर्तमान दौर में टीवी डिबेट्स का नाम सुनते ही ज़हन मे क्या आता है? चीख-चिल्लाहट, भड़काऊ माहौल, एक गैरज़िम्मेदाराना एंकर, कई सारे मेहमान और सड़क छाप भाषा से भरपूर एक 40-50 मिनट का मनोरंजक कार्यक्रम!

आपको तमाम न्यूज़ चैनलों पर डिबेट्स का एक बिल्कुल नया फॉरमेट देखने को मिलेगा जिसमें ऐसे विषयों पर चर्चा होती हैं जिनका देश के लोगों की बुनियादी और वास्तविक समस्याओं से कोई लेना-देना नही। अमूमन अधिकतर चर्चाओं में सत्ता और विपक्ष के प्रवक्ताओं के साथ एक आरएसएस या हिंदूवादी प्रवक्ता शामिल होता है। बहस कहीं से कहीं पहुँच जाती है। और बहस का विषय अगर पाकिस्तान हो तो क्या ही कहने। ऐसे में तो स्टूडियो, स्टूडियो ना रहकर जंग का मैदान बन जाता है। मुँह से शब्दरूपी गोले छोड़े जाते हैं। एंकर और स्पीकरों का व्यवहार कुछ ऐसा होता है मानो सबकुछ यहीं स्टूडियो में रफा-दफा कर दिया जाएगा।

आपने टीवी पर न्यूज़ चैनल्स बदलते हुए चैनलों पर अक्सर पाकिस्तान और चीन से सम्बंधित कुछ न कुछ कार्यक्रम ज़रूर देखे होंगे। दरअसल हमारे न्यूज़ चैनल्स अंतर्राष्ट्रीय कवरेज के नाम पर पाकिस्तान को बहुत ज़्यादा ही वरीयता देते हैं। और वहां की महंगाई पर तो जिन तेवरों, तथ्यों और आंकड़ों के साथ कार्यक्रम और चर्चाएं की जाती हैं कि कोई भी उसका कायल हो जाए। अच्छी बात भी है कि भारत की टीवी मीडिया पड़ोसी देश के नागरिकों के प्रति इतनी संवेदनशील है लेकिन ये मीडिया यही संवेदनशीलता भारत के नागरिकों के लिए कब दिखाएगी? कब यहाँ के लोगों की पीड़ा का अनुभव इन चैनलों को होगा?

देश में इस कदर बढ़ती महंगाई के बीच सवाल यही है कि क्या इस देश की टीवी मीडिया की इस देश के लोगों के प्रति भी कुछ ज़िम्मेदारी या संवेदना है? आज महंगाई पर लगाम नहीं, लोगों की आमदनी कम हो गयी, लोगों के रोज़गार छिन रहे हैं, कमाई के साधन कम हो रहे हों ऐसे में क्या मीडिया का फर्ज़ नही बनता की वे कुछ भी ऊल-जलूल-फिज़ूल चीज़ों की बजाय बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दों को अपने कार्यकम में, अपनी चर्चाओं में जगह दें? जितना मुखर होकर इस देश की मीडिया दूसरे विषयों पर मोर्चा खोलती है क्यूं इसी तरह ये चैनल्स भारत मे पेट्रोल-डीजल और अन्य वस्तुओं की कीमतों को लेकर सत्ता से सवाल नही करते?

सवाल महज़ मंहगाई का नही बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की ज़िम्मेदारी जिन कन्धों पर है उस मीडिया की गिरती साख और विश्वसनीयता का भी है। खुद को राष्ट्रवादी घोषित करने वाले उन चैनलों को भी ये समझने की ज़रूरत हैं कि स्टूडियो में भारत बनाम पाकिस्तान करवाकर दोनों देशों के प्रवक्ताओं को तल्ख तेवरों के साथ लड़वाना और उत्तेजक माहौल पैदा करना राष्ट्रवाद नही है। राष्ट्रवाद में राष्ट्र के लोगों की ज़िंदगी से जुड़े मुद्दे शामिल होते हैं।

लोकतंत्र के चार स्तम्भों में से किसी एक का भी कमज़ोर होना देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा नही है। जहां इन चैनलों को जनता और सरकार के बीच एक पुल का कार्य करना था। जनमानस की आवाज़ को सत्ता तक पहुंचाने का काम करना था लेकिन टीआरपी और रेटिंग्स की इस अतृप्त भूख के चलते इन चैनलों ने सूचनाएं कम और शोर ज़्यादा परोसने का काम किया है, खबरें कम और प्रोपेगैंडा अधिक चलाने का काम किया है।

डिबेट्स और चैनलों का ये गिरता स्तर देश के लिए खतरनाक है। आज देश के कोने-कोने में, चाय की टपरी पर, पान की दुकान पर या दफ्तर में लोगों की चर्चा का विषय भी इन्हीं स्टूडियो से तय किया जाता है। इन चैनलों की पहुँच घर-घर तक है। बहस के इस नए दौर में टीवी पर होने वाली चर्चाएं और कार्यक्रम देश के आमजन के दिलो-दिमाग पर व्यापक प्रभाव छोड़ती हैं। आम लोगों के शब्दकोश में देशद्रोही, नक्सली, वामपंथी, खालिस्तानी जैसे शब्द इन्ही चैनलों की देन हैं।

वहीं इसी भीड़ में यकीनन कुछ ऐसे चैनल भी हैं जो खुद को टीवी डिबेट्स के इस नए 'फॉर्मेट' से दूर रखने की कोशिश करते हैं। बाकी चैनलों को भी विचार करने की ज़रूरत है कि उग्र और उत्तेजक बहस की बजाय ज़रूरी मुद्दों और उनके सार्थक पहलुओं पर चर्चा की ज़रूरत है ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को पुनः स्थापित किया जा सके। इन चैनलों को सोचने की आवश्यकता है कि राशि-भविष्य, सास-बहू, चीन-पाकिस्तान, मन्दिर मस्ज़िद के अलावा भी ऐसे तमाम विषय हैं जिनपर देश चर्चा करना चाहता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Inflation
Rising inflation
unemployment
TV Debates
Media
Mainstream Media
Godi Media
Indian news channels
Narendra modi
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध
    02 Feb 2022
    पिछले दिनों झारखंड सरकार के कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रदेश के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों की नियुक्तियों के लिए भोजपुरी, मगही व अंगिका भाषा को धनबाद और बोकारो जिला की स्थानीय भाषा का दर्जा…
  • ukraine
    पीपल्स डिस्पैच
    युद्धोन्माद फैलाना बंद करो कि यूक्रेन बारूद के ढेर पर बैठा है
    02 Feb 2022
    मॉर्निंग स्टार के संपादक बेन चाकों लिखते हैं सैन्य अस्थिरता बेहद जोखिम भरी होती है। डोंबास में नव-नाजियों, भाड़े के लड़ाकों और बंदूक का मनोरंजन पसंद करने वाले युद्ध पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ है।…
  • left candidates
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल
    02 Feb 2022
    “…वामदलों ने ये चुनौती ली है कि लूट-खसोट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ एक ध्रुव बनना चाहिए। ये ध्रुव भले ही छोटा ही क्यों न हो, लेकिन इस राजनीतिक शून्यता को खत्म करना चाहिए। इस लिहाज से वामदलों का…
  • health budget
    विकास भदौरिया
    महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
    02 Feb 2022
    कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो
  • 5 election state
    रवि शंकर दुबे
    बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन
    02 Feb 2022
    पूरा देश भारत सरकार के आम बजट पर ध्यान लगाए बैठा था, खास कर चुनावी राज्यों के लोग। लेकिन सरकार का ये बजट कल्पना मात्र से ज्यादा नहीं दिखता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License