NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पीके से कांग्रेस की डील क्यों हुई फ़ेल?
दिलचस्प बात यह है पीके से कांग्रेस की बातचीत टूटने को लेकर गोदी मीडिया में काफ़ी हायतौबा मची हुई है। यह बताने की कोशिश की जा रही है कि कांग्रेस ने पीके को अपने साथ न लेकर बहुत बड़ी ग़लती कर दी है।
अफ़ज़ल इमाम
30 Apr 2022
Prashant Kishor

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) के साथ कांग्रेस की डील फेल होने के बाद पार्टी अगले माह उदयपुर में होने वाले अपने तीन दिवसीय चिंतन शिविर की तैयारियों में जुट गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा गठित आधा दर्जन कमेटियों से जुड़े नेता पार्टी के वार रूम 15, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पर अपनी बैठकें करने में व्यस्त हैं। यह कमेटियां जो पेपर तैयार करेंगी, उन पर चिंतन शिविर में विस्तार से चर्चा होगी और फिर उसी के आधार पर आगे का रोडमैप तैयार किया जाएगा। 

दिलचस्प बात यह है पीके से कांग्रेस की बातचीत टूटने को लेकर गोदी मीडिय़ा में काफी हायतौबा मची हुई है। यह बताने की कोशिश की जा रही है कि कांग्रेस ने पीके को अपने साथ न लेकर बहुत बड़ी गलती कर दी है। पिछले दो हफ्ते से टीवी के एंकर और रिपोर्टर यह भी बता रहे हैं कि पीके ने कितनी स्लाइड्स में अपना प्रजेंटेशन दिया  और कांग्रेस में नई जान फूंकने व चुनावी तैयारियों के लिए क्या-क्या सुझाव दिए हैं? पीके व कांग्रेस नेताओं के बीच जो भी चर्चा हुई है और जो नहीं भी हुई उस पर भी, धुआंधार ज्ञान दिए जा रहे हैं। टीवी पर बहसें चल रही हैं और अखबारों में बड़ी-बड़ी खबरें भी छप रही हैं। 

कांग्रेस शायद दुनिया की पहली ऐसी राजनीतिक पार्टी है, जिसकी सांगठनिक व चुनावी रणनीति पर मीडिया में बिंदुवार चर्चा हो रही है। आखिर वह रणनीति ही क्या, जिस पर सार्वजनिक रूप से चर्चा हो और मीडिया में उसकी खिल्ली उड़ाई जाए! छोटे और क्षेत्रीय दलों के नेता भी जब इस तरह की कोई तैयारी करते हैं, तो उसकी भनक किसी को भी नहीं लगने देते हैं। 

बहरहाल इसमें एक बात तो स्पष्ट है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने पीके को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बनने वाले एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप (ईएजी) का हिस्सा बनने का ऑफर दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। साथ ही ट्विटर पर अपनी सलाह भी दे दी ‘परिवर्तनकारी सुधारों के जरिए गहरी जड़ जमाने वाली ढांचागत समस्याओं को ठीक करने के लिए कांग्रेस को मुझसे ज्यादा नेतृत्व व सामूहिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।’ कांग्रेस में पीके की एंट्री कराने की जो लोग पैरोकारी कर रहे हैं, वे भी यही बात कह रहे हैं। उनके मुताबिक पीके एक डॉक्टर की तरह हैं, इसलिए पार्टी का इलाज करने के लिए उन्हें ‘फ्री हैंड’ दिया जाना चाहिए। 

पीके की शर्त भी यही थी कि वे अपनी योजनाओं को अपने तरीके से लागू करेंगे। पार्टी का कोई भी नेता उनसे सवाल नहीं पूछ सकता है, जो भी बात करनी होगी वे सीधे सोनिया गांधी से करेंगे। बातचीत टूटने की बड़ी वजह इसी को बताया जा रहा है, क्योंकि पार्टी कोई भी बड़ा नेता यह नहीं चाहता है कि बाहर कोई प्रोफेशनल व्यक्ति उन्हें आ कर यह बताए कि राजनीति कैसे की जाती है? वे पार्टी आला कमान के अलावा किसी और को अपने ऊपर नहीं देखना चाहते हैं। 

निश्चित रूप से यह खबर सही है, लेकिन मसला सिर्फ इतना भर नहीं है। दरअसल वर्ष 2019 के चुनाव के बाद से ही राजनीति व समाज के कुछ अन्य प्रभावशाली लोगों के ड्राइंग रूम में अक्सर यह चर्चा होती रही है कि गांधी-नेहरू परिवार के लोग कांग्रेस के शीर्ष पद से हट जाएं और कोई गैर गांधी नेतृत्व करे तो पार्टी का कुछ भला हो सकता है। राहुल गांधी ने भी जब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था, तो उन्होंने भी यही कहा था कि पार्टी जिसे भी चाहे अपना अध्यक्ष चुन ले, लेकिन अभी तक स्थिति जस की तस बनी हुई है। बीच में कभी मोती लाल वोरा तो कभी मुकुल वासनिक को कमान सौंपे जाने की चर्चा हुई, लेकिन अंततः सोनिया गांधी को ही अंतरिम अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। सूत्रों का कहना है कि अब पीके ने भी कांग्रेस को सुझाव दिया कि वह राहुल के बजाए प्रियंका गांधी या सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाए और साथ ही परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करे। इतना ही नहीं उन्होंने यूपीए का नाम बदलने और उसके अध्यक्ष पद के लिए दो-दो साल का रोटेशन बनाने की बात कही। एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए राहुल का नाम खारिज किया। साथ ही परोक्ष रूप से कांग्रेस को यूपीए की कमान छोड़ने की भी सलाह दे डाली। उनकी यह दोनों ही बातें कांग्रेस के नेताओं को हजम नहीं हुईं, क्योंकि पार्टी और उसके बाहर भी आमतौर पर यह माना जाता है कि राहुल की शैली में भले ही कुछ कमियां हों और उनकी छवि भी बिगाड़ी गई हो, लेकिन मोदी सरकार और संघ परिवार के खिलाफ वे ही खुल कर बोलते हैं। अगर राहुल में कुछ भी दम नहीं होता तो संघ व भाजपा के लोग उन पर सबसे ज्यादा हमले नहीं करते। 

दूसरी अहम बात यह कि पीके ने अपने प्रेजेंटेशन के दौरान बहुत सारा डाटा दिया और पार्टी की बात को जनता तक पहुंचाने के लिए कई अच्छे सुझाव भी दिए, लेकिन वे आक्रामक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण व बहुसंख्यकवादी की राजनीति का कोई तोड़ नहीं बता सके। इसके अलावा उनकी खुद की वैचारिक स्थिति क्या है और उनके चुनावी कार्यक्रम व रणनीति कांग्रेस की विचारधारा से किस हद तक मेल खाते हैं? इसके बारे में भी अस्पष्टता अभी तक बनी हुई है। वर्तमान में न सिर्फ कांग्रेस बल्कि अन्य सभी विपक्षी पार्टियों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि ध्रुवीकरण की राजनीति की कोई जवाब उन्हें सूझ ही नहीं रहा है। इसके सामने क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय व वर्गीय पहचान और इनकी राजनीति भी हाशिए पर चली गई है। ऐसा नहीं कि हाल के दिनों में कांग्रेस ने कोई कोशिश नहीं की। पिछले दिनों ही यूपी चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के व्यूह को तोड़ने के लिए ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं...’ के नारे के साथ महिला अधिकारों की बात की, लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह से पिट गया। उन्होंने दलितों और किसानों के मुद्दों पर भी संघर्ष किया। 

जब किसान आंदोलन चल रह था तो भी कांग्रेस ने उसके समर्थन में बड़ी-बड़ी जनसभाएं व कार्यक्रम किए, लेकिन यूपी तो दूर पंजाब में भी उसे इसका कोई फाएदा नहीं मिल सका। जहां तक संगठन में बदलाव की बात है तो पिछले 5-6 वर्षों के दौरान एआईसीसी से लेकर प्रदेश व जिला स्तर पर बड़ी संख्या में नए लोगों को मौका दिया गया हैं। पार्टी व सरकारों में दलित व पिछड़े वर्ग के नेताओं व कार्यकर्ताओं को खास अहमियत भी मिली है। भारी विरोध होने के बावजूद पार्टी ने पंजाब में दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया। वर्तमान में भी उसके राजस्थान व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पिछड़े वर्ग से ही हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यह सारे नुस्खे नाकाम साबित हुए हैं। वर्तमान में देश जिस तरह के स्थितियों में पहुंच चुका है, उसमें कांग्रेस के साथ-साथ अन्य विपक्षी पार्टियों के भी तमाम नेता यह मान रहे हैं कि अब चुनाव एक बड़ी वैचारिक लड़ाई में तब्दील हो चुके हैं। जिन पार्टियों व लोगों को धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, बहुलतावाद व सहिष्णुता जैसी चीजों में विश्वास है तो उन्हें स्पष्टता और शिद्दत के साथ सामने आना होगा। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के चिंतन शिविर में संगठन, भविष्य के कार्यक्रमों व रणनीति आदि के साथ-साथ विचारधारा में मुद्दे पर भी चर्चा होगी। पिछले कई वर्षों से यह देखा गया है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जब किसी ज्वलंत मुद्दे पर अपनी बात कहता है तो उसे अपने ही नेताओं का साथ नहीं मिलता है। 

इतना ही नहीं सबसे ज्यादा कांग्रेस के ही नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। यदि पार्टी में विचारधारा की समस्या न होती ऐसा नहीं होता।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

Prashant Kishor
Congress
Rahul Gandhi
sonia gandhi

Related Stories

हार्दिक पटेल भाजपा में शामिल, कहा प्रधानमंत्री का छोटा सिपाही बनकर काम करूंगा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

ED के निशाने पर सोनिया-राहुल, राज्यसभा चुनावों से ऐन पहले क्यों!

ईडी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को धन शोधन के मामले में तलब किया

राज्यसभा चुनाव: टिकट बंटवारे में दिग्गजों की ‘तपस्या’ ज़ाया, क़रीबियों पर विश्वास

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

केरल उप-चुनाव: एलडीएफ़ की नज़र 100वीं सीट पर, यूडीएफ़ के लिए चुनौती 

कांग्रेस के चिंतन शिविर का क्या असर रहा? 3 मुख्य नेताओं ने छोड़ा पार्टी का साथ

‘आप’ के मंत्री को बर्ख़ास्त करने से पंजाब में मचा हड़कंप

15 राज्यों की 57 सीटों पर राज्यसभा चुनाव; कैसे चुने जाते हैं सांसद, यहां समझिए...


बाकी खबरें

  • एजाज़ अशरफ़
    निचले तबकों को समर्थन देने वाली वामपंथी एकजुटता ही भारत के मुस्लिमों की मदद कर सकती है
    25 Apr 2022
    जहांगीरपुरी में वृंदा करात के साहस भरे रवैये ने हिंदुत्ववादी विध्वंसक दस्ते की कार्रवाई को रोका था। मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यकों को अब तय करना चाहिए कि उन्हें किसके साथ खड़ा होना होगा।
  • लाल बहादुर सिंह
    वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव को विभाजनकारी एजेंडा का मंच बनाना शहीदों का अपमान
    25 Apr 2022
    ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता की बुनियाद पर लड़ी गयी आज़ादी के लड़ाई से विकसित भारतीय राष्ट्रवाद को पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद (जो सहजता से मुस्लिम विरोध में translate कर…
  • आज का कार्टून
    काश! शिक्षा और स्वास्थ्य में भी हमारा कोई नंबर होता...
    25 Apr 2022
    SIPRI की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार ने साल 2022 में हथियारों पर जमकर खर्च किया है।
  • वसीम अकरम त्यागी
    शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार
    25 Apr 2022
    अधिकांश मुस्लिम आबादी वाली इस बस्ती में हिंदू दुकानदार भी हैं, उनके मकान भी हैं, धार्मिक स्थल भी हैं। समाज में बढ़ रही नफ़रत क्या इस इलाक़े तक भी पहुंची है, यह जानने के लिये हमने दुकानदारों,…
  • अजय कुमार
    शहरों की बसावट पर सोचेंगे तो बुल्डोज़र सरकार की लोककल्याण विरोधी मंशा पर चलाने का मन करेगा!
    25 Apr 2022
    दिल्ली में 1797 अवैध कॉलोनियां हैं। इसमें सैनिक फार्म, छतरपुर, वसंत कुंज, सैदुलाजब जैसे 69 ऐसे इलाके भी हैं, जो अवैध हैं, जहां अच्छी खासी रसूखदार और अमीर लोगों की आबादी रहती है। क्या सरकार इन पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License