NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आंदोलन का मीडिया कवरेज क्यों सवालों के घेरे में है?
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने मीडिया को सलाह दी है कि प्रदर्शनकारी किसानों को खालिस्तानी, राष्ट्र-विरोधी के तौर पर पेश नहीं करे।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 Dec 2020
किसान आंदोलन

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के बॉर्डर बिंदुओं पर पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के किसानों का प्रदर्शन पिछले लगभग 10 दिनों से जारी है। केन्द्र सरकार के तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे इन किसानों की शनिवार यानी आज सरकार के साथ पांचवें दौर की बातचीत हो रही है। प्रदर्शनकारी किसान केंद्र सरकार की नीतियों से तो नाराज हैं ही, उनकी नाराजगी मुख्य धारा के मीडिया खासकर टेलीविजन मीडिया के प्रति भी देखी जा रही है। प्रदर्शन के दौरान पिछले दस दिनों में कई रिपोर्टरों को कवरेज से रोका गया है तो ऐसे पोस्टरों की बाढ़ सी आई हुई है जिसमें कई बड़े टेलीविजन चैनलों के खिलाफ टिप्पणियां की गई हैं।

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब सरकार की किसी नीति के खिलाफ हो रहे आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा मीडिया के प्रति नाराजगी जाहिर की गई है। इसी साल की शुरुआत में सीएए और एनआरसी के विरोध में हो रहे आंदोलन के दौरान भी प्रदर्शनकारी मुख्यधारा की मीडिया से नाराज दिखे थे। ऐसे में मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल इसके लिए ऐसे आंदोलनों के मीडिया कवरेज को जिम्मेदार माना जा सकता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और उसकी जिम्मेदारी सभी पक्षों के संतुलित कवरेज की होती है लेकिन पिछले कुछ सालों से ये देखने में आ रहा है कि सरकार के खिलाफ हो रहे आंदोलनों के कवरेज में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पक्षपाती हो जा रहा है।

ऐसा लगता है कि इन चैनलों में सरकार का सबसे बड़ा हितैषी साबित होने की होड़ लगी हुई है। इसके चलते ये चैनल इन आंदोलनों को लेकर सरकार से ज्यादा नकारात्मक और विषैले साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि ये प्रदर्शनकारियों को ही नक्सल समर्थन, एंटी नेशनल, अर्बन नक्सल, खालिस्तान समर्थक, विदेशी फंडिंग की उपज आदि बताने लगते हैं।

इसके अलावा ये चैनल सरकार के भोंपू की तरह बार बार सरकार का ही पक्ष सही बताने में लगे रहते हैं। उदाहरण के लिए अगर हम इस किसान आंदोलन को ही लें तो मुख्यधारा के मीडिया के ज्यादातर एंकरों द्वारा यही बात बार बार कही जा रही है कि कृषि कानून किसानों के हित में हैं। प्रदर्शन करने वाले किसानों को बरगलाया जा रहा है। जबकि उन्हीं किसानों से बातचीत के दौरान सरकार भी यह मान रही है कि कुछ ऐसे मसले हैं जिस पर और बातचीत किए जाने की जरूरत है, जिसमें बदलाव की जरूरत है।

स्थिति इस हद तक बिगड़ गई है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) को दिल्ली में किसानों के प्रदर्शन के समाचार कवरेज को लेकर शुक्रवार को चिंता प्रकट करनी पड़ी। ईजीआई ने कहा कि मीडिया का कुछ हिस्सा बगैर किसी साक्ष्य के प्रदर्शनकारी किसानों को ‘खालिस्तानी’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताकर आंदोलन को अवैध ठहरा रहा है।

ईजीआई ने एक बयान में कहा कि यह जिम्मेदार और नैतिकतापूर्ण पत्रकारिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। बयान में कहा गया है, ‘द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया राष्ट्रीय राजधानी में समाचारों के उन कवरेज के बारे में चिंतित है, जिनमें मीडिया के कुछ हिस्से में उन्हें खालिस्तानी, राष्ट्रविरोधी बताया जा रहा है तथा बगैर किसी साक्ष्य के प्रदर्शन को अवैध ठहराने के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।’ ईजीआई ने मीडिया को प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने में निष्पक्ष और संतुलित रहने की भी सलाह दी।

ईजीआई प्रमुख सीमा मुस्तफा द्वारा जारी बयान में कहा गया है, ‘ईजीआई मीडिया संस्थाओं को किसानों के प्रदर्शन की रिपोर्टिंग में निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और संतुलन प्रदर्शित करने की सलाह देता है तथा इसमें अपने लिए संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने वालों के खिलाफ कोई पक्षपात नहीं करे। मीडिया को ऐसे किसी विमर्श में संलिप्त नहीं होना चाहिए जो प्रदर्शनकारियों को उनकी वेश भूषा के आधार पर अपमानित करता हो और उन्हें हीन मानता हो।’

फिलहाल एक बात साफ है कि मुख्यधारा के मीडिया के प्रति जनता का भरोसा टूट रहा है और मीडिया के प्रति टूट रहा यह भरोसा लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत नहीं है।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

farmers protest
Farm bills 2020
Media and Politics
Mainstream Media
Godi Media
Editors guild of india

Related Stories

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला

लखीमपुर कांड की पूरी कहानी: नहीं छुप सका किसानों को रौंदने का सच- ''ये हत्या की साज़िश थी'’

इतवार की कविता : 'ईश्वर को किसान होना चाहिये...

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

जीत कर घर लौट रहा है किसान !

किसान आंदोलन की ऐतिहासिक जीत , 11 को छोड़ेंगे मोर्चा


बाकी खबरें

  • poverty
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता
    11 Mar 2022
    राष्ट्रवाद और विकास के आख्यान के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने रोटी और स्वाधीनता के विमर्श को रोटी बनाम स्वाधीनता बना दिया है।
  • farmer
    सुरेश गरीमेल्ला
    सरकारी इंकार से पैदा हुआ है उर्वरक संकट 
    11 Mar 2022
    मौजूदा संकट की जड़ें पिछले दो दशकों के दौरान अपनाई गई गलत नीतियों में हैं, जिन्होंने सरकारी कंपनियों के नेतृत्व में उर्वरकों के घरेलू उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया और आयात व निजी क्षेत्र द्वारा उत्पादन…
  • सोनिया यादव
    पंजाब : कांग्रेस की हार और ‘आप’ की जीत के मायने
    11 Mar 2022
    कांग्रेस को जो नुक़सान हुआ, उसका लगभग सीधा लाभ 'आप' को मिला। मौजूदा वक़्त में पंजाब के लोगों में नाराज़गी थी और इस कारण लोगों ने बदलाव को ही विकल्प मानते हुए आम आदमी पार्टी पर भरोसा किया है।
  • विजय विनीत
    यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !
    11 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में विपक्ष के पास मुद्दों की भरमार रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव मोदी-योगी का जादू बेअसर नहीं कर सके। बार-बार टिकटों की अदला-बदली और लचर रणनीति ने स
  • LOOSERES
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: कई दिग्गजों को देखना पड़ा हार का मुंह, डिप्टी सीएम तक नहीं बचा सके अपनी सीट
    11 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की वापसी हो गई है, हालांकि इस प्रचंड जीत के बावजूद कई दिग्गज नेता अपनी सीट नहीं बचा पाए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License