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किसान आंदोलन का मीडिया कवरेज क्यों सवालों के घेरे में है?
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने मीडिया को सलाह दी है कि प्रदर्शनकारी किसानों को खालिस्तानी, राष्ट्र-विरोधी के तौर पर पेश नहीं करे।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 Dec 2020
किसान आंदोलन

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के बॉर्डर बिंदुओं पर पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के किसानों का प्रदर्शन पिछले लगभग 10 दिनों से जारी है। केन्द्र सरकार के तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे इन किसानों की शनिवार यानी आज सरकार के साथ पांचवें दौर की बातचीत हो रही है। प्रदर्शनकारी किसान केंद्र सरकार की नीतियों से तो नाराज हैं ही, उनकी नाराजगी मुख्य धारा के मीडिया खासकर टेलीविजन मीडिया के प्रति भी देखी जा रही है। प्रदर्शन के दौरान पिछले दस दिनों में कई रिपोर्टरों को कवरेज से रोका गया है तो ऐसे पोस्टरों की बाढ़ सी आई हुई है जिसमें कई बड़े टेलीविजन चैनलों के खिलाफ टिप्पणियां की गई हैं।

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब सरकार की किसी नीति के खिलाफ हो रहे आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा मीडिया के प्रति नाराजगी जाहिर की गई है। इसी साल की शुरुआत में सीएए और एनआरसी के विरोध में हो रहे आंदोलन के दौरान भी प्रदर्शनकारी मुख्यधारा की मीडिया से नाराज दिखे थे। ऐसे में मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल इसके लिए ऐसे आंदोलनों के मीडिया कवरेज को जिम्मेदार माना जा सकता है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और उसकी जिम्मेदारी सभी पक्षों के संतुलित कवरेज की होती है लेकिन पिछले कुछ सालों से ये देखने में आ रहा है कि सरकार के खिलाफ हो रहे आंदोलनों के कवरेज में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पक्षपाती हो जा रहा है।

ऐसा लगता है कि इन चैनलों में सरकार का सबसे बड़ा हितैषी साबित होने की होड़ लगी हुई है। इसके चलते ये चैनल इन आंदोलनों को लेकर सरकार से ज्यादा नकारात्मक और विषैले साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि ये प्रदर्शनकारियों को ही नक्सल समर्थन, एंटी नेशनल, अर्बन नक्सल, खालिस्तान समर्थक, विदेशी फंडिंग की उपज आदि बताने लगते हैं।

इसके अलावा ये चैनल सरकार के भोंपू की तरह बार बार सरकार का ही पक्ष सही बताने में लगे रहते हैं। उदाहरण के लिए अगर हम इस किसान आंदोलन को ही लें तो मुख्यधारा के मीडिया के ज्यादातर एंकरों द्वारा यही बात बार बार कही जा रही है कि कृषि कानून किसानों के हित में हैं। प्रदर्शन करने वाले किसानों को बरगलाया जा रहा है। जबकि उन्हीं किसानों से बातचीत के दौरान सरकार भी यह मान रही है कि कुछ ऐसे मसले हैं जिस पर और बातचीत किए जाने की जरूरत है, जिसमें बदलाव की जरूरत है।

स्थिति इस हद तक बिगड़ गई है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) को दिल्ली में किसानों के प्रदर्शन के समाचार कवरेज को लेकर शुक्रवार को चिंता प्रकट करनी पड़ी। ईजीआई ने कहा कि मीडिया का कुछ हिस्सा बगैर किसी साक्ष्य के प्रदर्शनकारी किसानों को ‘खालिस्तानी’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताकर आंदोलन को अवैध ठहरा रहा है।

ईजीआई ने एक बयान में कहा कि यह जिम्मेदार और नैतिकतापूर्ण पत्रकारिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। बयान में कहा गया है, ‘द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया राष्ट्रीय राजधानी में समाचारों के उन कवरेज के बारे में चिंतित है, जिनमें मीडिया के कुछ हिस्से में उन्हें खालिस्तानी, राष्ट्रविरोधी बताया जा रहा है तथा बगैर किसी साक्ष्य के प्रदर्शन को अवैध ठहराने के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।’ ईजीआई ने मीडिया को प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने में निष्पक्ष और संतुलित रहने की भी सलाह दी।

ईजीआई प्रमुख सीमा मुस्तफा द्वारा जारी बयान में कहा गया है, ‘ईजीआई मीडिया संस्थाओं को किसानों के प्रदर्शन की रिपोर्टिंग में निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और संतुलन प्रदर्शित करने की सलाह देता है तथा इसमें अपने लिए संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने वालों के खिलाफ कोई पक्षपात नहीं करे। मीडिया को ऐसे किसी विमर्श में संलिप्त नहीं होना चाहिए जो प्रदर्शनकारियों को उनकी वेश भूषा के आधार पर अपमानित करता हो और उन्हें हीन मानता हो।’

फिलहाल एक बात साफ है कि मुख्यधारा के मीडिया के प्रति जनता का भरोसा टूट रहा है और मीडिया के प्रति टूट रहा यह भरोसा लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत नहीं है।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

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Media and Politics
Mainstream Media
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