NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार में जातीय जनगणना का मुद्दा बीजेपी की परेशानी क्यों बना हुआ है?
बिहार विधानसभा में पहली बार 18 फरवरी, 2019 और फिर 27 फरवरी, 2020 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर मांग की गई थी कि 2021 में होने वाली जनगणना जाति आधारित हो। हालांकि अब इस पर राज्य की एनडीए सरकार दो हिस्सों में बंट गई है।
सोनिया यादव
14 Aug 2021
बिहार में जातीय जनगणना का मुद्दा बीजेपी की परेशानी क्यों बना हुआ है?
Image courtesy : News8plus

"बिहार विधानसभा से दो बार जातीय जनगणना को लेकर सर्वसम्मति प्रस्ताव पारित किया जा चुका है। बीजेपी भी समर्थन में थी, लेकिन आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने का भी समय नहीं है। यह तो नीतीश कुमार ही समझें कि ऐसा क्यों हो रहा है।"

ये तंज बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सीएम नीतीश कुमार पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कसा। तेजस्वी ने कहा कि नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखे एक सप्ताह हो गया, अब तक तो समय मिल जाना चाहिए था। इसलिए हमने भी चिट्ठी लिखकर गुहार लगाई है कि हमें समय मिलना चाहिए। यह लड़ाई देश हित, राज्य हित और जनहित में है। दोनों जगह एनडीए की सरकार है।

दरअसल, जातीय जनगणना का मुद्दा पिछले कुछ समय से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। ख़ासकर बिहार में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज़ है। राज्य में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनसंख्या नियंत्रण कानून को गैर जरूरी बताकर जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार के साफ इनकार के बावजूद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है और उनसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

पक्ष और विपक्ष साथ-साथ

वहीं दूसरी ओर विपक्ष खासकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के इस मामले को लेकर फिर से मुखर होने से सियासत तेज हो गई है। तेजस्वी तो पहले से ही आक्रामक हैं, अब उन्हें लालू प्रसाद यादव का भी साथ मिल गया है। पिछले कुछ दिनों से एकाएक सक्रिय नज़र आ रहे राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने एक नया ट्वीट कर इस मामले को और गरमा दिया।

बुधवार, 11 अगस्त को अपने ट्वीट में लालू प्रसाद यादव ने लिखा, "अगर 2021 जनगणना में जातियों की गणना नहीं होगी तो बिहार के अलावा देश के सभी पिछड़े-अतिपिछड़ों के साथ दलित और अल्पसंख्यक भी गणना का बहिष्कार कर सकते हैं। जनगणना के जिन आँकड़ों से देश की बहुसंख्यक आबादी का भला नहीं होता हो, तो फिर जानवरों की गणना वाले आँकड़ों का क्या हम अचार डालेंगे?"

अगर 2021 जनगणना में जातियों की गणना नहीं होगी तो बिहार के अलावा देश के सभी पिछड़े-अतिपिछड़ों के साथ दलित और अल्पसंख्यक भी गणना का बहिष्कार कर सकते है।

जनगणना के जिन आँकड़ों से देश की बहुसंख्यक आबादी का भला नहीं होता हो तो फिर जानवरों की गणना वाले आँकड़ों का क्या हम अचार डालेंगे?

— Lalu Prasad Yadav (@laluprasadrjd) August 11, 2021

वैसे इस मामले में पक्ष और विपक्ष साथ-साथ नज़र आ रहा है। जनता दल (यूनाइटेड) और राजद एक साथ नज़र आ रहे हैं, जाति आधारित जनगणना को जरूरी बता रहे हैं। हालांकि इसे लेकर बिहार में एनडीए सरकार की प्रमुख सहयोगी बीजेपी फिलहाल पसोपेश में है। क्योंकि केंद्र और प्रदेश दोनों में जाति आधीरित वोट बैंक की रणनीति अलग-अलग है, जिसे हर पार्टी अपने हिसाब से साधना चाहती है।

आपको बता दें कि देश में आजादी से पहले 1931 तक जातिगत जनगणना होती थी। 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया। आजादी के बाद 1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं।

ओबीसी आबादी कितने प्रतिशत है, फ़िलहाल इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं

हालांकि साल 1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, उसकी एक सिफ़ारिश को लागू किया। ये सिफ़ारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी। इस फ़ैसले ने देश, ख़ासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया।

जानकारों का मानना है कि भारत में ओबीसी आबादी कितने प्रतिशत है, इसका कोई ठोस प्रमाण फ़िलहाल नहीं है। मंडल कमीशन के आँकड़ों के आधार पर कहा जाता है कि भारत में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत है। हालाँकि मंडल कमीशन ने साल 1931 की जनगणना को ही आधार माना था। हालांकि कमीशन ने जाति जनगणना कराकर सही आँकड़े हासिल करने की सिफ़ारिश भी की थी।

इससे पहले 2011 में SECC यानी सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस आधारित डेटा जुटाया था। चार हजार करोड़ से ज़्यादा रुपए ख़र्च किए गए और ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय को इसकी ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

साल 2016 में जाति को छोड़ कर SECC के सभी आँकड़े प्रकाशित हुए, लेकिन जातिगत आँकड़े प्रकाशित नहीं हुए। जाति का डेटा सामाजिक कल्याण मंत्रालय को सौंप दिया गया, जिसके बाद एक एक्सपर्ट ग्रुप बना, लेकिन उसके बाद आँकड़ों का क्या हुआ, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

माना जाता है कि SECC 2011 में जाति आधारित डेटा जुटाने का फ़ैसला तब की यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के दबाव में ही लिया था। अब एक बार फिर विपक्षी पार्टियाँ एकजुट होकर नरेंद्र मोदी सरकार को इस मुद्दे पर घेरने के लिए कमर कस चुकी हैं। पिछले दिनों राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने मुलायम सिंह यादव और शरद यादव से भी मुलाक़ात की थी और कहा था कि संसद में जनता के मुद्दे को उठाने वाली अहम आवाज़ें अब नहीं हैं।

केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष लामबंद

साथ ही शरद पवार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कई मुद्दों पर विभाजित विपक्ष के लिए जातीय जनगणना ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर वो सरकार पर आक्रामक हो सकता है। लेकिन पिछड़ों और दलितों को कैबिनेट में प्रतिनिधित्व देने को लेकर ख़ूब प्रचार प्रसार करने वाली बीजेपी इसे कराने से हिचक रही है। बीते दिनों ही लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया था कि 2021 की जनगणना में केंद्र सरकार केवल अनुसूचित जाति और जनजाति की ही गिनती कराने के पक्ष में है।

हिंदुत्व और जातिवाद का मुद्दा

जानकार मानते हैं कि हिंदुत्व की राजनीति करने वाली बीजेपी नहीं चाहती कि जाति का मुद्दा ऐसा बन जाए कि उसे किसी तरह का नुक़सान हो या उसके राजनीतिक समीकरण बिगड़ें। हालांकि एनडीए के साथी नीतीश इस मामले में खुलकर अपनी राय रख रहे हैं और जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं।

मालूम हो कि कभी सवर्णों के वर्चस्व वाली बिहार की राजनीति में अब पिछड़ों का दबदबा है। चाहे सरकार कोई भी बनाए, अहम भूमिका पिछड़ा वर्ग निभाता है। इसलिए बिहार में बिना जाति की बात किए सरकार नहीं चल सकती। यहां जाति बिना न तो संसदीय राजनीति पर बात हो सकती है और न ही सामाजिक राजनीति पर।

एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइज़ेशन) के अनुमान के मुताबिक़, बिहार की आधी जनसंख्या ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) है। राजद के पारंपरिक वोटर यादव हैं जबकि जेडीयू के 'लव-कुश' यानी कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा। राज्य में दलित और मुसलमान भी बड़े समुदाय हैं। लेकिन इन सब वर्गों के अंदर कई वर्ग बने और बनाए भी गए जो अलग-अलग तरह से वोट करते हैं। पार्टियों के लिए इन वर्गों के वोट बांधना आसान नहीं होता। इसलिए पार्टियां अपने पारंपरिक वोटबैंक को खिसकने नहीं देना चाहती न ही ओबीसी के सच्चे हितैषी होने का क्रेडिट खोना चाहती है।

गौरतलब है कि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां काफी मज़बूत स्थिति में हैं और उनकी राजनीति जाति पर आधारित है। ऐसे में ओबीसी की आबादी का सही आंकड़ा मिलने से क्षेत्रीय दलों को राजनीति का नया आधार मिल सकता है। क्षेत्रीय दल हमेशा से जातीय जनगणना की मांग करते रहे हैं लेकिन इस मुद्दे पर केंद्र में रही कोई भी सरकार अपने हाथ नहीं जलाना चाहती है।

जातिगत जनगणना के पक्ष-विपक्ष में तर्क

साल 2010 में जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी तब भी लालू प्रसाद यादव, शरद यादव व मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने इस आधार पर जनगणना की मांग की थी और उस समय पी. चिदंबरम सरीखे नेताओं ने इसका जोरदार विरोध किया था। सरकार को आशंका है कि जाति आधारित जनगणना के बाद तमाम ऐसे मुद्दे उठेंगे, जिससे देश में आपसी भाईचारा व सौहार्द बिगड़ेगा तथा शांति व्यवस्था भंग होगी। जिस जाति की संख्या कम होगी, वे अधिक से अधिक बच्चे की वकालत करेंगे, इससे समाज में विषम स्थिति पैदा होगी।

हालांकि जातिगत जनगणना के पक्ष में तर्क रखने वालों का मानना है कि इस तरह की जनगणना से सभी जातियों को मदद मिलेगी और उनकी सही संख्या का पता चलने से उस आधार पर नीतियां बनाई जा सकेगी। इससे ये भी पता चल सकेगा कि किस इलाके में किस जाति की कितनी आबादी है, इसी आधार पर उनके कल्याण के लिए काम हो सकेगा, साथ ही सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थानों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिए जाने का रास्ता साफ हो सकेगा। ऐसे में जाहिर है ये मामला तूल पकड़ेगा और दूर तक जाएगा।

अब देखना ये होगा कि सरकार इस मुद्दे को कैसे डील करती है। हालांकि यह दिलचस्प है कि धर्म की राजनीति करने वाले ही सबसे ज़्यादा जातिगत जनगणना से डरते और विरोध करते हैं।

Bihar
caste census
Bihar caste census
Nitish Kumar
Sushil Kumar Modi
NDA
BJP
jdu
Tejashwi Yadav
RJD
LALU YADAV

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • omicron
    भाषा
    दिल्ली में कोविड-19 की तीसरी लहर आ गई है : स्वास्थ्य मंत्री
    05 Jan 2022
    ‘‘ दिल्ली में 10 हजार के करीब नए मामले आ सकते हैं और संक्रमण दर 10 प्रतिशत पर पहुंच सकती है.... शहर में तीसरी लहर शुरू हो चुकी है।’’
  • mob lynching
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना
    05 Jan 2022
    निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना कहीं से भी…
  • TMC
    राज कुमार
    गोवा चुनावः क्या तृणमूल के लिये धर्मनिरपेक्षता मात्र एक दिखावा है?
    05 Jan 2022
    ममता बनर्जी धार्मिक उन्माद के खिलाफ भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरती रही हैं। लेकिन गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी के साथ गठबंधन करती हैं। जिससे उनकी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर सवाल खड़े हो…
  • सोनिया यादव
    यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?
    05 Jan 2022
    सीएम योगी के साथ-साथ पीएम नरेंद्र मोदी भी आए दिन अपनी रैलियों में महिला सुरक्षा के कसीदे पढ़ते नज़र आ रहे हैं। हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त की बात करें तो आज भी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले में उत्तर…
  • मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मुंबईः दो साल से वेतन न मिलने से परेशान सफाईकर्मी ने ज़हर खाकर दी जान
    05 Jan 2022
    “बीएमसी के अधिकारियों ने उन्हें परेशान किया, उनके साथ बुरा व्यवहार किया। वेतन मांगने पर भी वे उस पर चिल्लाते थे।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License