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केरल में कोरोना से लड़ाई में महिलाओं की सेना ‘पेन पाड’ ने संभाल रखा है मोर्चा
इस महिला सेना की हज़ारों सदस्य अलग-अलग स्तरों पर राज्य में कोरोना संकट के ख़िलाफ़ बड़ी सफलताओं को हासिल कर रही हैं। इसकी तारीफ़ राज्य में ही नहीं, भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हो रही है।
सुभाषिनी अली
08 Jun 2020
पेन पाड
यह केरल के त्रिशूर मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल की तस्वीर है। यह फ़ोटो newindianexpress में 1 फरवरी, 2020 को प्रकाशित हुआ, जिसे हम यहां साभार ले रहे हैं। इसमें साफ देखा जा सकता है कि उस समय भी यहां स्वास्थ्यकर्मी पीपीई किट और एन-95 मास्क में हैं। 

केरल में उन्हें कहते हैं ‘पेन पाड’, महिलाओं की सेना। उनके हर सदस्य की तरफ़ लोग इज़्ज़त से देखते हैं, उनके योगदान से कोई इंकार नहीं करता। उस सेना की हर सैनिक भी महसूस करती है कि समाज मे उसका स्तर कुछ ऊंचा हो गया है। इस एहसास से, उसका सर भी ऊंचा हो जाता है।  
 
इस महिला सेना की हज़ारों सदस्य अलग-अलग स्तरों पर राज्य में कोरोना संकट के ख़िलाफ़ बड़ी सफलताओं को हासिल कर रही हैं। इसकी तारीफ़ राज्य में ही नहीं, भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हो रही है।
 
इस सेना का सबसे अधिक जाना-पहचाना चेहरा, राज्य की स्वास्थ मंत्री, शैलजा टीचर का आज बन गया है। केरल में निपाह वायरस का प्रवेश भी इन्हीं के कार्यकाल में हुआ था। स्वास्थ्य विभाग और पूरे सरकारी तंत्र के सहयोग से उससे निबटने का जो काम किया गया था उससे तमाम अनुभव तो मिले ही, इसके साथ ही नए वायरस के प्रवेश के प्रति सावधानी भी बढ़ी।  जब दिसंबर के अंत मे चीन से कोरोना के प्रवेश की ख़बर मिली, तो शैलजा टीचर ने इस बात की पुष्टि की कि यह वायरस केरल ज़रूर आएगा। एक जनवरी, 2020 को ही, उन्होंने पत्रकार वार्ता के माध्यम से जनता को इसकी जानकारी देते हुए बताया कि किस तरह के नियमों का पालन करना होगा और, साथ ही, यह आश्वासन भी दिया कि उन्हें डरने और घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है, सरकार और उसके साथ जुड़े तमाम संगठन उनकी सुरक्षा और सलामती बनाए रखेंगे। इस तरह की पत्रकार वार्ता रोज़ होने लगी और कुछ ही दिनों में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी इनमे शामिल होकर स्थिति के हर मोड़ की जानकारी जनता को देने लगे। केरल की स्वास्थ सेवाओं को और मजबूत किया गया, वह ज़रूरी सामान जो स्वास्थ कर्मियों और लोगों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक था, उसको भी इकठ्ठा कर लिया गया।  
 
इस सबका परिणाम था कि जब 30 जनवरी को कोरोना का पहला मरीज चीन से केरल, अपने घर लौटा तो सरकार पूरी तरह से तैयार थी। दूसरे दिन भी मरीज़ पहुंचे और यह सिलसिला बना रहा। 
 
बड़े संकट से निबटने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार पर होती है। इसके लिए कानून और वित्तीय प्रावधान मौजूद हैं लेकिन जनवरी और फरवरी के महीने भर और मार्च के तीन हफ्ते गुज़र जाने तक, केंद्र सरकार का ध्यान कोरोना पर केन्द्रित नहीं था। दिल्ली का चुनाव, ट्रंप का स्वागत, दिल्ली में हिंसा और सीएए के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों का हटाया जाना और मध्य प्रदेश की कांग्रेस की सरकार की जगह भाजपा की सरकार बनाने मे केंद्र सरकार अधिक दिलचस्पी दिखा रही थी। इन कामों को अंजाम देने के लिए हवाई अड्डे खुले रहे और हवाई जहाज़ उड़ते रहे। 20 मार्च को भोपाल मे भाजपा की सरकार बन गयी और उसके 4 दिन के बाद, बिना किसी से चर्चा किये, केंद्र सरकार ने लाकडॉउन घोषित कर दिया। 
 
निश्चित तौर पर हवाई जहाजों के आवागमन ने केरल को बहुत प्रभावित किया और जो केस बढ़ रहे थे वह अधिकतर बाहर से आने वाले लोग या उनके परिवारजन या उनसे मिलने वालों के ही थे। लेकिन, केरल की सरकार ने स्कूलों इत्यादि को 13 मार्च को ही बंद करने का काम किया, सबसे अधिक टेस्टिंग करके मरीजों का पता लगाया, उनके संपर्क मे आने वाले तमाम लोगों को ट्रैक किया और अपनी मजबूत स्वस्थ व्यवस्था से उनको लाभान्वित किया। यही नहीं, सरकार ने मार्च के महीने में ही जनता को राहत पहुँचाने के बहुत सारे कदम उठाए ताकि कोई भी भूखा या परेशान न रहे। तमाम पेंशन का 6 माह का वितरण घरों पर विधवाओं, बुज़ुर्गों इत्यादि मे किया गया; पंचायत स्तर पर आम रसोई चलाकर लोगों को खाना पहुंचाया गया और बाहर से आए हुए ‘मेहमान’ मज़दूरों का पूरा ख्याल रखा। इसके साथ, चेकिंग और टेस्टिंग का व्यापक अभियान जारी रहा। यही वजह हैं की अकेले केरल मे ही कोरोना प्रभावितों की बढ़ती संख्या पर लगाम लगाया जा सका और, जब लॉकडाउन में ढील दी गयी और पहले ट्रेन फिर हवाई जहाज़ केरल आने लगे तो उनमें मौजूद कोरोना के मरीज़ो की संख्या एक बार फिर बढ़ने लगी तो सरकार और समाज दोनों ही इससे निबटने के लिए तैयार था।
 
यह सब केरल की पेन पाड, महिलाओं की फ़ौज, के अथक परिश्रम और निष्ठा के चलते ही हुआ।  केरल की सरकार के लिए 15000 डॉक्टर और नर्स काम करते हैं। स्वास्थ्य सेवा और स्वास्थ्य शिक्षा के दोनों निदेशक महिलाएं हैं;  14 में से 11 ज़िला स्वास्थ अधिकारी महिलाएं हैं; कुल डॉक्टरों में भी उनकी संख्या 65:35 है। नर्स, आशा बहनें, जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर और जूनियर हेल्थ वर्कर महिलाएँ ही हैं।
 
स्वास्थ्य सेविकाओं का यह बड़ा समूह अपने परिवार और अपने घरों को भुलाकर अपने काम में जुटा है। महिला डाक्टर अपने ज़िले को छोड़ उन ज़िलों में जहां अधिक केस हैं वहाँ कई कई दिन तक तैनात रहती हैं।  कई नर्सों और स्वास्थ कर्मियों ने अपने छोटे बच्चों को रिश्तेदारों के घर भेज दिया है। दूध पिलाने वाली माताओं ने अपने शिशुओं को अपने दूध से वंचित रखने का काम किया है। आशा बहनें और कुटुंबश्री (एक बड़ा स्वयंसेवी संगठन) के कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों के स्वास्थ का हाल-चाल पूछती हैं और उन पर निगाह भी रखती हैं। 
 
कुटुंबश्री केरल का एक अनोखा संगठन है जिसके बारे में कहा जाता है कि हर परिवार की  कम से कम एक महिला सदस्य कुटुंबश्री से जुड़ी हुई है। कुटुंबश्री की शुरुआत बचत गुटों से हुई थी और केरल की वाम सरकार ने हमेशा उनको शक्तिशाली बनाने मे पूरी मदद की है। आज वह स्वास्थ के क्षेत्र मे तो अपना योगदान दे ही रही हैं लेकिन कई अन्य क्षेत्र भी हैं जहां वह पूरी निष्ठा के साथ कम करते हुए दिखाई देती हैं।
 
जब हम केरल के स्वास्थ कर्मियों के योगदान की बात करते हैं तो हमें याद रखना चाहिए कि सरकार और स्वास्थ विभाग उनका भी बहुत ख्याल रखता है। उनको सुरक्षा किट और पीपीई के साथ लैस किया गया है। उनके स्वास्थ्य पर नज़र रखी जाती है। इसका परिणाम यह है कि दो बीमार पड़ने वाली नर्सों का फौरन इलाज किया गया और वे ठीक हो गयी। इसके विपरीत हम पाते हैं कि दुनिया भर में और अपने देश के अन्य राज्यों मे काम करने वाली काफी मलयाली नर्सें कोरोना की लड़ाई मे शहीद हो चुकी हैं। दिल्ली के एक अस्पताल की मलयाली नर्स, जो बची नहीं, ने शिकायत की थी कि उनको एक ही पीपीई बार बार पहनना पड़ रहा है। अन्य नर्सों ने इस बात की पुष्टि भी की। कहीं भी सफाई कर्मियों को पूरा किट उपलब्ध नहीं किया जाता और उनकी भी मौतों की ख़बरें आती रहती हैं। इस मामले में भी केरल अपवाद हैं।
 
13 मार्च को ही, सरकार कि घोषणा के बाद, राज्य की आंगनवाड़ी कर्मियों ने घर-घर उन बच्चों को दिन का भोजन पहुंचाने का काम किया जिनके स्कूल बंद कर दिये गए थे। इसके साथ ही, उन्होंने उनको परिवारों के लिए राशन और अन्य सामान जैसे दाल, मसाला, तेल इत्यादि के बड़े पैकेट भी पहुंचाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस ज़बरदस्त राहत कार्य को संज्ञान में लेते हुए इसकी सराहना की और अन्य राज्यों से ऐसा करने का सुझाव दिया। लेकिन किसी दूसरे राज्य के लिए ऐसा करना संभव ही नहीं हो पाया। इस योजना का लाभ 3.75 लाख आंगनवाड़ी के बच्चों को और 3 लाख गर्भवती और दूध-पिलाने वाली महिलाओं को मिल चुका है। 6.75 लाख छोटे और बड़े बच्चों को पौष्टिक आहार से लाभान्वित किया जा चुका है। याद रखने की बात है कि इस काम को राज्य सरकार ने स्कूल और आंगनवाड़ी केन्द्रों को बंद करने के साथ ही शुरू कर दिया। पके हुए खाने और कच्चे राशन और सामान की पैकिंग और उसको पहुंचाने का काम आंगनवाड़ी कर्मी ही करते हैं और उनके खिलाफ किसी तरह की कोताही की शिकायत नहीं मिली है।
 
पंचायतों के चुने हुए प्रतिनिधियों मे 33% आरक्षण का कानून तो है ही लेकिन केरल में यह आंकड़ा अब 60% से ऊपर पहुँच गया है। कोरोना के इस दौर मे, हर पंचायत मे आम रसोई चल रहे हैं और चारों तरफ खाना बांटा गया है। मेहमान मजदूरों के कैंपो मे भी खाना – और वह भी उनके पसंद का खाना – पहुंचाया गया है।
 
केरल मे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति का संगठन भी बहुत मजबूत हैं।  सरकारी योजनाओं का फायदा लोगों तक पहुंचाने के अलावा वह अपने स्वतंत्र पहल पर बहुत काम कर रही हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के कोष के लिए अब तक 20 लाख रुपये जमा कर दिया है (बंगाल के तूफान ग्रस्त लोगों की मदद के लिए भी वे 1 लाख रुपए भेज चुकी हैं)।  इसके अलावा, हर ज़िलें मे उनकी ‘हेल्प लाइन’ 24 घंटे चलती है। महिलाओं की हर तरह की शिकायत वह सुनती हैं, घरेलू हिंसा कि शिकायते भी, और हस्तक्षेप करके, उनकी मदद करती हैं।
 
इस सब का नतीजा है कि जिस केरल में सबसे पहले कोरोना का प्रवेश हुआ था, जिस केरल में रोज़ बाहर से लोग आ रहे हैं, उस केरल मे इस महामारी पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया गया है। कुल 6 लोगों की मौत हुई है और इसके लिए भी केरल की जनता शर्मिंदगी व्यक्त करती है। 
 
अब लॉकडाउन खुल रहा है। लोग काम पर जाने लगे हैं। उनको सस्ते दरों पर अच्छा और पेट-भर भोजन उपलब्ध कराने का काम ‘कुटुंबश्री कैंटीन’ कर रहे हैं। यहाँ 20 रुपये में कई तरह की सब्जी, चावल, इत्यादि उनको मिल जाती है।
 
केरल की महिलाओं के योगदान और केरल मॉडल के उदाहरण के बारे मे कहा जा रहा है कि इसकी नकल चारों तरफ की जानी चाहिए। निश्चित तौर पर ऐसा होना चाहिए लेकिन इस  योगदान और इस मॉडल के पीछे केरल में वाम राजनीति का शक्तिशाली होना और सरकार का वैकल्पिक नीतियों पर चलना जिनमें सार्वजनिक स्वस्थ सेवाएं और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत करना प्रमुख हैं। इस तरह की राजनीति के चलते, केरल की जनता में बड़ी एकता और एकजुटता का एहसास है जो उसे बड़ी चुनौतियों को स्वीकार करने में सक्षम बनाता है। विभाजनकारी नीतियों, बेलगाम निजीकरण और गरीब विरोधी नीतियों के प्रति समर्पित सरकारें केरल के उदाहरण की तरफ केवल देख सकती हैं, उसका अनुसरण नहीं कर सकती हैं।
 
{लेखक संसद की पूर्व सदस्य और ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमन्स एसोसिएशन (AIDWA) की उपाध्यक्ष हैं।}

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