NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
अर्थव्यवस्था
कोविड-19 लॉकडाउन ने संकटग्रस्त ज़ैदपुर हैंडलूम उद्योग के ताबूत में ठोकी आख़िरी कील  
ज़ैदपुर के बुनकर अपने हैंडलूम शहर में दो वक़्त की रोटी को मोहताज़ हो गए हैं, जो 2014 में निर्यात नीतियों में किए गए बदलाव की वजह पहले ही बड़ा झटका झेल चुके थे।
सौरभ शर्मा
13 May 2020
Translated by महेश कुमार
 ज़ैदपुर हैंडलूम उद्योग

बाराबंकी: 47 साल के मोहम्मद नफ़ीस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 मार्च को कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए लॉकडाउन की घोषणा के बाद से हर हफ्ते घंटों तक अपने करघे को चलाने वाले हाथ को घूरते रहने की आदत को पाल लिया है।

नफीस एक हैंडलूम की कला के माहिर व्यक्ति हैं जो बाराबंकी के ज़ैदपुर शहर में रहते है, जो शहर हैंडलूम के दुपट्टे/ओढ़नी बनाने के लिए काफी प्रसिद्ध है और जिसे दुनिया के विभिन्न शहरों में निर्यात किया जाता था। लेकिन 2014 में निर्यात नीतियों में लाए गए बदलाव से शहर के हथकरघा उद्योग को एक बड़ा झटका लगा है।

सफ़ेद शर्ट और नीले रंग की लुंगी पहने बाहर की तरफ निकली आँखों और दुबले-पतले शरीर वाले नफीस मियां कहते हैं कि, "ज़ैदपुर का हथकरघा उद्योग तो पहले से ही मौत के कगार पर खड़ा था और अब इस  तालाबंदी ने इसके ताबूत में आखिरी कील ही ठोक दी है।" उन्होंने कहा कि, “सभी कारीगर काम के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बाज़ारों में धागा उपलब्ध नहीं है और स्टॉक आवाजाही में फंस गया है।”

अपनी तकलीफ़ों के बारे में और अधिक बताते हुए, उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया कि, “मैं चार बच्चों का पिता हूँ और ये सभी दुपट्टे या ओढ़नी को डिजाइन करने में मेरी मदद करते थे, लेकिन अब हमारे पास कोई भी काम नहीं बचा है और हम अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए जूझ रहे हैं। हमारे पास कुछ दिनों का ख़र्च चलाने के पैसे बचे हैं और उसके बाद अल्लाह ही जानता है कि वह हमें कैसे जिंदा रखेगा।”

उन्हौने राशन की उस मात्र को दिखाया जो उनके पास खाने के लिए बची है, उन्होंने बताया कि, “पिछले तीन हफ्तों से हम केवल चावल और दाल पर ही ज़िंदा हैं, वह भी बिना किसी मसाले के बनाकर खा रहे हैं। सब्जियां महंगी हैं और उन्हे पकाने के लिए तेल भी नहीं खरीद सकते हैं। हर निकलते दिन के साथ हमारी हालत खराब होती जा रही है और मैंने अपने बच्चों को हिदायत दी है कि वे कम से कम भंडारे (सामुदायिक रसोई) से एक वक़्त का भोजन जरूर खाने की कोशिश करें।”

2011 की जनगणना के अनुसार, ज़ैदपुर की आबादी करीब 34,000 थी और उसमें अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी बहुमत में है। इस शहर में अब 1,000 से भी कम हथकरघा हैं जो ज्यादातर महिलाओं द्वारा संचालित हैं क्योंकि पुरुष नौकरियों की तलाश में दूसरे देशों में पलायन कर गए है।

37 वर्षीय मेहरुल निशा, जो हाथ से बने दुपट्टे/ओढ़नी पर कढ़ाई के छोटे-छोटे ऑर्डर लेकर अपने बच्चों के लिए आजीविका कमाती हैं, ने कहा कि उसने अपने बच्चों को भूख से मरने से बचाने के लिए कुछ पैसे उधार लिए हैं।

उन्होंने कहा, “मैं छोटे-छोटे काम करके लगभग 2,700 से 3,000 रुपये कमा लेती थी जो काम मुझे पड़ोस के हथकरघों से मिल जाता था। मेरे पति दुबई में रहते हैं और पिछले दो महीनों से उन्होंने भी वहां से कोई पैसा नहीं भेजा है। वे कमाने के लिए बाहर चले गए क्योंकि यहां काम करने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी और अब मुझे भी लगता है कि हमारी समस्याओं का कोई अंत नहीं है। यदि कोरोना से नहीं तो निश्चित तौर पर हम काम की कमी के कारण भुखमरी से मर जाएंगे।”

उन्होंने आगे कहा, ''जहां से मुझे काम मिल रहा था वहां की सभी कार्यशालाएं भी बंद हो गई हैं क्योंकि वहाँ अब कोई काम नहीं है और करघे भी नहीं चल रहे हैं। मैंने पूरे गाँव में काम के बारे में पूछताछ की है लेकिन सभी अपने लंबित कामों को पूरा कर चुके है और कस्बे में शायद ही कोई काम बचा है। मैं थोड़ी  चिंतित हूं क्योंकि मेरे पति भी दुबई में फंसे हुए हैं और मुझे नहीं पता कि अगर मुझे मदद की आवश्यकता होगी तो मैं किससे संपर्क करूंगी। हर एक बीतते दिन के साथ हालात बदतर होते जा रहे हैं।”

आज़मी रिज़वी, जो ज़ैदपुर में करघा ऑपरेटरों और कारीगरों के कल्याण के लिए काम करते रहे हैं, का भी कहना है कि इन लोगों की स्थिति काफी दयनीय है।

उन्होंने बताया, “स्थिति इतनी ख़राब है कि आप उन लोगों की पसलियों को गिन सकते हैं जो इस काम को करते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो तालाबंदी के कारण दो वक़्त के भोजन के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। परिवारों ने सरकार का समर्थन किया है लेकिन अब वे भुखमरी के कगार पर हैं। हमने ग्राम प्रधान को सूचित किया तो उन्हौने हमें आश्वासन दिया है कि मदद उन तक पहुंचेगी लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है।”

थोक व्यापारी और पार्टटाईम कार्यकर्ता ने आगे कहा कि, "शहर की एक और बड़ी समस्या यह है कि बहुत से लोग जो कमाई के लिए अस्थायी रूप से खाड़ी देशों में चले गए थे, वे वहां फंस गए हैं और उनके लौटने के लिए कोई साधन नहीं हैं। इस हालत में, जो महिलाएँ यहाँ रह रही हैं, उन्हें महामारी के संकट से निपटने में बड़ी मुश्किल हो रही है।”

अंग्रेज़ी में लिखा मूल आलेख आप नीचे लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

COVID-19 Lockdown Last Nail in Coffin for Crisis-hit Zaidpur Handloom Industry

Zaidpur
Handloom Workers Crisis
Barabanki
COVID 19 Lockdown
COVID 19 Relief
Handloom Industry
Uttar pradesh
Lockdown Impact on Economy
Modi government

Related Stories

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

यूपी: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच करोड़ों की दवाएं बेकार, कौन है ज़िम्मेदार?

ग्राउंड रिपोर्ट: स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रचार में मस्त यूपी सरकार, वेंटिलेटर पर लेटे सरकारी अस्पताल

लड़कियां कोई बीमारी नहीं होतीं, जिनसे निजात के लिए दवाएं बनायी और खायी जाएं

दवाई की क़ीमतों में 5 से लेकर 5 हज़ार रुपये से ज़्यादा का इज़ाफ़ा

महामारी भारत में अपर्याप्त स्वास्थ्य बीमा कवरेज को उजागर करती है

यूपी चुनाव : माताओं-बच्चों के स्वास्थ्य की हर तरह से अनदेखी

यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

स्वास्थ्य बजट: कोरोना के भयानक दौर को क्या भूल गई सरकार?


बाकी खबरें

  • Mothers and Fathers March
    पीपल्स डिस्पैच
    तख़्तापलट का विरोध करने वाले सूडानी युवाओं के साथ मज़बूती से खड़ा है "मदर्स एंड फ़ादर्स मार्च"
    28 Feb 2022
    पूरे सूडान से बुज़ुर्ग लोगों ने सैन्य शासन का विरोध करने वाले युवाओं के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाले। इस बीच प्रतिरोधक समितियां जल्द ही देश में एक संयुक्त राजनीतिक दृष्टिकोण का ऐलान करने वाली हैं।
  • गौरव गुलमोहर
    यूपी चुनाव: क्या भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं सिटिंग विधायक?
    28 Feb 2022
    'यदि भाजपा यूपी में कम अंतर से चुनाव हारती है तो उसमें एक प्रमुख कारण काम न करने वाले सिटिंग विधायकों का टिकट न काटना होगा।'
  • manipur
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मणिपुर में पहले चरण का चुनाव, 5 ज़िलों की 38 सीटों के लिए 67 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदान
    28 Feb 2022
    मणिपुर विधानसभा के लिए आज पहले चरण का मतदान संपन्न हो गया। मतदान का समय केवल शाम 4 बजे तक ही था। अपराह्न तीन बजे तक औसतन 67.53 फ़ीसदी मतदान हुआ। अंतिम आंकड़ों का इंतज़ार है।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : फिर ज़ोर पकड़ने लगी है ‘स्थानीयता नीति’ बनाने की मांग : भाजपा ने किया विरोध
    28 Feb 2022
    हेमंत सोरेन सरकार को राज्य में होने वाली सरकारी नियुक्तियों के लिए घोषित विसंगतिपूर्ण नियोजन नीति को छात्रों-युवाओं के विरोध के बाद वापस लेना पड़ा है। लेकिन मामला यहीं थम नहीं रहा है।
  • Sergey Lavrov
    भाषा
    यूक्रेन की सेना के हथियार डालने के बाद रूस ‘किसी भी क्षण’ बातचीत के लिए तैयार: लावरोव
    28 Feb 2022
    लावरोव ने यह भी कहा कि रूस के सैन्य अभियान का उद्देश्य यूक्रेन का ‘‘विसैन्यीकरण और नाजी विचारधारा से’’ मुक्त कराना है और कोई भी उस पर कब्जा नहीं करने वाला है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License