NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
‘हाथ जोड़कर-सर झुकाकर’ झूठ बोलने वाली सरकार
मोदी दावा कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू कर दिया है, जो कि गलत है- और सरकार के इस झूठ की वजह से किसानों को 1.93 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
सुबोध वर्मा
21 Dec 2020
Translated by महेश कुमार
modi

हाल ही में मध्य प्रदेश में किसानों को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर दावा किया कि उनकी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की प्रमुख सिफारिशों को लागू कर दिया है कि इन सिफ़ारिशों के मद्देनजर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) खेती की कुल लागत से 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए (जिसे सी2 फोर्मूला कहा जाता है)।

यह एक ऐसा झूठ है जिसे इस सरकार ने कई बार दोहराया है, क्योंकि उसके खुद के दस्तावेज कुछ ओर ही कहानी बयान करते हैं। मोदी उन तीन कृषि-कानूनों के समर्थन में अभियान कर रहे हैं जिन्होंने किसानों को देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों करने पर मजबूर कर दिया है और नतीजतन हजारों किसान कड़ाके की सर्दी में दिल्ली की नाकेबंदी किए सीमा पर डटे हुए हैं। 

वर्ष 2014-15 और 2020-21 के बीच, केंद्र सरकार ने गेहूं और चावल की खरीद पर लगभग 7.43 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया है। हालाँकि, अगर सरकार विभिन्न फसलों का दाम एमएसपी के फोर्मूले सी2+50 प्रतिशत (सिफ़ारिश के अनुसार) के हिसाब से देती तो सरकार को इस खरीद पर 9.36 लाख करोड़ रुपए अदा करने पड़ते। यानि 1.93 लाख करोड़ रुपये का बकाया किसानों को सीधा नुकसान है। [नीचे दी गई तालिका को गौर से देखें]

इसकी गणना कैसे की जाती है और किसी को भी ये संख्या कहां से मिलती हैं? कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) नामक एक सरकारी संस्था काम करती है। हर साल यह खरीफ और रबी फसलों पर रिपोर्ट प्रकाशित करती है, कीमतों, व्यापार, स्टॉक आदि पर विस्तृत ब्यौरा संख्या के साथ देती है। जिसके आधार पर, वह दो कृषि मौसमों के लिए एमएसपी की सिफारिश करती है। वहाँ से आप प्रत्येक उत्पाद/फसल की कुल लागत (C2) हासिल कर सकते हैं। खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग (राज्यों और केंद्र सरकारों द्वारा) द्वारा की गई उपज की खरीद पर मासिक डेटा प्रकाशित करता है। यह खरीद उस मौसम के लिए घोषित एमएसपी पर की जाती है। किसी भी विशेष वर्ष में किसी भी फसल की कुल खरीद को एमएसपी से गुणा कर सरकार के कुल खर्च का पता लगाया जा सकता है। इसी तरह, सी2+50 प्रतिशत की गणना की जा सकती है और जब कुल खरीद से गुणा किया जाता है तो आपको उस सरकारी खर्च का पता चलता है जिसे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू होने पर किया गया होता। प्रत्येक वर्ष के आंकड़ों को जोड़ते हुए, आप ऊपर दिए गई संख्या पर पहुंचते हैं। विस्तृत डेटा और गणना अंत में देखें।

उपरोक्त विवरण केवल दो मुख्य फसलों-गेहूं और चावल को ले कर है। 21 अन्य फसलें भी हैं, जिनमें बाजरा, मक्का, दालें और तिलहन शामिल आदि हैं, जिनके लिए हर मौसम में एमएसपी भी निर्धारित की जाती है। यदि आप इन फसलों की एमएसपी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के बीच के अंतर की गणना करते हैं, तो बहुत बड़ा अंतर मिलेगा। हालांकि, इन फसलों का अर्थशास्त्र बहुत बदतर हालत में है क्योंकि इन फसलों के छोटे से हिस्से की वास्तव में खरीद की जाती हैं। इसका मतलब है कि देश भर में इनमें से अधिकांश फसल को एमएसपी से नीचे बेचा जाता है।

एमएसपी एक मुद्दा क्यों बन गया है?

जून माह में पहले जब तीन कानूनों को अध्यादेश के रूप में लागू किया गया था और फिर सितंबर में संसद द्वारा इन्हे पारित किया गया, तो यह स्पष्ट हो गया था कि इनमें से एक कानून को पूरी की पूरी सार्वजनिक खरीद प्रणाली को खत्म करने के लिए लाया जा रहा है क्योंकि यह निजी व्यापारियों को सरकार द्वारा चलाई जा रही मंडियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का अवसर प्रदान करता है, जिन्हे (थोक अनाज व्यापार केंद्र या कृषि उपज मंडी समिति और एपीएमसी) भी कहा जाता है, जो बड़ी मात्रा में खाद्यान्न खरीदने में सहायक होती हैं।

इससे किसानों की फसल की कीमतों में गिरावट आएगी क्योंकि एपीएमसी या सरकारी खरीद की मशीनरी नदारद हो जाएगी, क्योंकि किसानों को डर है कि व्यापारी तबका उनकी उपज को एमएसपी के भाव पर नहीं खरीदेगा। इस डर ने किसानों के गुस्से को हवा दी और विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग गई, किसानों की मांग है कि एमएसपी प्रणाली को कानूनी अधिकार बनाया जाए। किसानों ने सरकार के लिखित प्रस्ताव को खारिज कर दिया है कि एमएसपी को बरकरार रखा जाएगा- क्योंकि खरीद के बिना केवल एमएसपी की घोषणा बेकार की बात है।

इस व्यापक गुस्से का मुकाबला करने के लिए, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाली सरकारों ने एक अभियान चलाया हुआ है, जिनमें वे किसानों को एमएसपी के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। इस संदर्भ में अब पीएम मोदी से लेकर सारे  नेता बता रहे हैं कि मोदी के दौर में एमएसपी कितनी बढ़ी है और मोदी सरकार ने अनाज की खरीद पर एमएसपी का भुगतान करने के लिए कितना पैसा खर्च किया है। 

अपनी साख कायम रखने के लिए, पीएम मोदी को किसानों के सामने ''हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर'' विनती करनी पड़ रही है कि वे उनके साथ किसी भी मुद्दे पर बात कर सकते हैं, सबकुछ हल हो जाएगा, आदि। क्योंकि सभी किसान इस बात से बखूबी जागरूक हैं कि उन्हें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश की गई कीमतें नहीं मिल रही हैं, इसलिए इस तरह की ड़रामेबाज़ी का कोई असर अब पड़ने की संभावना नहीं है।

परिशिष्ट: विस्तृत डेटा

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

A Lie Presented with ‘Folded Hands and Bowed Head’

minimum support price
MSP
Farmer protests
Agriculture Laws
PM MODI
Modi Govt
CACP
agriculture ministry

Related Stories

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

कानपुर हिंसा: दोषियों पर गैंगस्टर के तहत मुकदमे का आदेश... नूपुर शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं!

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

मोदी सरकार 'पंचतीर्थ' के बहाने अंबेडकर की विचारधारा पर हमला कर रही है

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा


बाकी खबरें

  • कोरोना
    बादल सरोज
    अजब ग़ज़ब मध्यप्रदेश: ज़िंदगी में कभी शुमार नहीं हुये, अब मौत में भी गिनती में नहीं
    18 Jun 2021
    मौतें और उनमें अचानक इतनी ज़्यादा बढ़त सिर्फ़ संख्या के इधर उधर होने या तात्कालिक रूप से झांसा देकर "पॉजिटिविटी अनलिमिटेड" का स्वांग रचाने भर का मामला नहीं है। इसका बची हुई ज़िंदगियों की सलामती के साथ…
  • तेल के नाम पर आम जनता से वसूली!
    सुबोध वर्मा
    पेट्रो डकैती: सार्वजनिक लूट का सरकारी ब्लूप्रिन्ट
    18 Jun 2021
    मोदी सरकार लोगों से पैसा वसूलने और अपने संसाधनों को बढ़ाने के लिए बेरहमी से पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स बढ़ाती रही है।
  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: मौत के आंकड़े घटे, लेकिन अभी भी 24 घंटे में डेढ़ हज़ार से ज़्यादा मौतें
    18 Jun 2021
    देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 62,480 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 2.68 फ़ीसदी यानी 7 लाख 98 हज़ार 656 हो गयी है।
  • NATASHA NARWAL, DEVANGANA KALITA
    मुकुंद झा
    एक साल के संघर्ष के बाद जेल से रिहा आसिफ़, देवांगना और नताशा; कहा संघर्ष जारी रहेगा
    17 Jun 2021
    पिछले एक साल से 'बिना सबूत' के तिहाड़ जेल में बंद जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आसिफ़ इकबाल तनहा और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा देवांगना कालिता और नताशा नरवाल को गुरुवार शाम को रिहा…
  • कभी न भूलें: कोविड-19 से बचे एक पीड़ित की अपील
    तान्या अग्रवाल
    कभी न भूलें: कोविड-19 से बचे एक पीड़ित की अपील
    17 Jun 2021
    केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी ने कई विधानसभा चुनावों में लगातार प्रचार-प्रसार इसलिए किया, क्योंकि इनके लिए राजनीति कहीं ज़्यादा अहम है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License