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अब लिंचिंग के लिए गाय के बहाने की भी ज़रूरत नहीं रही
अब किसी को आपका झोला तलाशने की ज़रूरत नहीं है, न आपकी फ्रिज में झांकने की ज़रूरत है। बस ‘जय श्रीराम’ कहकर किसी की भी टोपी उछाली जा सकती है, किसी की भी दाढ़ी खींची जा सकती है, किसी को भी पीटा जा सकता है, किसी को भी मारा जा सकता है।
मुकुल सरल
04 Jul 2019
सांकेतिक तस्वीर

बधाई हो! बहुत ही कम समय में हम उस मकाम पर पहुंच गए हैं जहां मॉब लिंचिंग के लिए अब गाय के बहाने की भी ज़रूरत नहीं रही है। जी हां! अब एक नारा ही काफ़ी है किसी की जान लेने के लिए।

पार्ट-1 से पार्ट-2 तक आते-आते 5 सालों में हमने काफ़ी तरक्की कर ली है। आप कहेंगे ये व्यंग्य है। मैं कहूंगा नहीं, ये विद्रूप है, हमारे समय की भयानक हक़ीक़त जिसे व्यंग्य की शैली में कहा जा रहा है। 

अब किसी को आपका झोला तलाशने की ज़रूरत नहीं है, न आपकी फ्रिज में झांकने की ज़रूरत है। बस ‘जय श्रीराम’ कहकर किसी की भी टोपी उछाली जा सकती है, किसी की भी दाढ़ी खींची जा सकती है, किसी को भी पीटा जा सकता है, किसी को भी मारा जा सकता है।

अच्छा हुआ। वरना कितना झंझट था। सुबूत दिखाओ, सुबूत बनाओ, कि फलां ने गौ-कशी की है। या फलां बीफ खा रहा था, ले जा रहा था। इसके लिए कितने जतन करने पड़ते थे, कहां-कहां से लाकर गाय के शव मौके पर डालने पड़ते थे। भैंस को, बकरे को गाय का मांस साबित करने के लिए भी कितनी मशक्कत करनी पड़ती थी। और तब भी बड़े दंगे न हो पाए। बेकार गई इतनी कवायद। अब ये सब चोंचले, ये सब बहाने बंद।

हां, अगर अपनी सरकार में भी ये सब ‘दिखावे’ करने पड़ें तो बेकार है। ये पहले ही बंद हो जाने चाहिए थे। अगर कोई भक्त कह रहा है कि फलां ने गौमांस खाया तो मान लेना चाहिए कि खाया है। फलां ने गौ-कशी की, तो मान लेना चाहिए कि गौ-कशी की है। एक भक्त के कहे की कोई कीमत है भी या नहीं! उसे भी सुबूत दिखाना पड़े तो बेकार है।

और इसकी भी ज़रूरत क्या है। भक्त को बिना कहे, बिना बताए भी किसी भी पीटने, मारने का अधिकार होना चाहिए।

अगर भक्तों को भी कानून मानना पड़े, पुलिस से डरना पड़े तो क्या फायदा अपनी सरकार का। अब हम इसी तरफ़ बढ़े हैं तो ये बधाई की बात है। जहां भक्त को कुछ कहने की भी ज़रूरत नहीं, आपका सिर्फ़ मुसलमान होना ही काफी है। आपको पीटने के लिए, आपकी हत्या के लिए। क्या अब भी हमें इसके लिए कोई कारण बताना पड़ेगा। फिर तो धिक्कार है हमारे हिन्दू होने पर। फिर किस काम का बहुमत और बहुसंख्यकवाद।

jharkhand lynching.jpg

तबरेज़ के साथ क्या हुआ?

बीती 17 जून को, 24 वर्षीय तबरेज़ अंसारी को झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में अपने घर लौटते समय कुछ लोगों ने घेर लिया और मोटरसाइकिल चोरी करने का आरोप लगाते हुए खंभे से बांधकर पिटाई की। भीड़ ने उनसे जबरन 'जय श्री राम' और 'जय हनुमान' के नारे भी लगवाए। भीड़ ने उन्हें इतना मारा और बाद में पुलिस ने इतनी लापरवाही की कि उनकी मौत हो गई।

इसे पढ़ें : झारखंड : लिंचिंग को ललकार

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक  2014 के बाद से झारखंड में नफ़रत से भरे अपराध का यह 14वां मामला था। कुछ रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में मॉब लिंचिंग का 18वां मामला था। यही नहीं तबरेज़ अंसारी की मौत के साथ, इस साल इस तरह के 11 मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के 2014 में पहली बार सत्ता में आने के बाद से ऐसी घटनाओं की कुल संख्या बढ़कर 266 हो गई है। यह आंकडे  Factchecker.in की मीडिया रिपोर्टों के आधार पर जारी किए गए हैं जो एक ऐसी वेबसाइट है जो भारत में धार्मिक घृणा पर आधारित अपराधों के भयावह रूप पर नज़र रख रही है।

इसे पढ़ें : झारखंड में चार साल में भीड़ ने की 14 हत्याएं, देशभर में 266

अब केवल 2.O की बात करें तो अब तेज़ी से ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। कुछ दिन पहले असम के बरपेटा में एक दक्षिणपंथी संस्थान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई कि वहां कथित तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के एक समूह की पिटाई कर दी गई और उनसे जबरन ‘जय श्रीराम’ और ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगवाए। 

इसी तरह अभी हाल में दिल्ली के अमन विहार इलाके में एक मदरसे के मौलवी ने आरोप लगाया कि तीन लोगों की ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने की मांग मानने से इनकार करने पर उन्हें कार से टक्कर मारी गई।

हरियाणा के गुड़गांव में 25 मई की शाम नमाज़ पढ़कर लौटते 25 साल के बरकत से मारपीट की गई थी। बरकत का दावा था कि जब वह नमाज़ पढ़कर घर लौट रहे थे तो कुछ युवकों ने उनके साथ मारपीट की और जय श्री राम का नारा लगाने के लिए कहा।

मई के आखिरी हफ्ते में ही पुणे के एक डॉक्टर को नई दिल्ली में भीड़ का सामना करना पड़ गया था। अरुण गद्रे नाम के इस डॉक्टर के मुताबिक युवाओं के एक समूह ने उनसे ‘जय श्री राम' बोलने को कहा। यह घटना कनॉट प्लेस के पास उस समय हुई जब वह सुबह की सैर पर थे।

इसे पढ़ें : क्या इस देश में भाजपा नहीं भीड़तंत्र का राज लौट आया है?

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(फोटो साभार)

आपको मालूम हो कि राज्य सरकारों और केंद्र सरकार ने बड़े पैमाने पर सुप्रीम कोर्ट के 2018 निर्देशों की अनदेखी की है जिसमें फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना करना शामिल है। सोशल मीडिया पर नफरत भरे संदेशों को रोकना शामिल है, पीड़ितों को मुआवजा देना और भीड़ द्वारा हिंसा को रोकने के लिए एक कानून बनाना शामिल है। लेकिन इस सिलसिले में कोई ठोस काम नहीं हुआ है।

हां, एक काम हुआ है कि अब मॉब लिंचिंग का विरोध भी रोकने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के मेरठ में यही हुआ। यहां तबरेज़ की हत्या के विरोध में जुलूस निकालने की कोशिश पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। पुलिस का कहना है कि शहर में धारा 144 लागू है। रविवार को फैज-ए-आम कॉलेज में बिना अनुमति सभा की गई और उसके बाद बिना अनुमति के जुलूस निकालने की कोशिश की गई। इसलिए उसे रोका गया लेकिन पुलिस के रोकने पर कुछ लोगों ने पथराव किया। इस मामले में 70 नामज़द सहित एक हजार लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। 10 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में भी लिया गया।

इसे पढ़ें : मेरठ में तबरेज़ हत्याकांड के विरोध जुलूस पर लाठीचार्ज, 1000 लोगों पर मुकदमा

इसी तरह पिछले शनिवार की शाम लखनऊ में तबरेज़ की हत्या के विरोध में निकाले जा रहे शांति मार्च को पुलिस ने रोक लिया था। वहां भी पुलिस का कहना था क पूर्व अनुमति नहीं ली गई। जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पुलिस-प्रशासन को इसके लिए पहले ही सूचित कर दिया गया था।

ख़ैर, मुस्कुराइए क्योंकि आप...

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

इसे भी पढ़ें : घृणा और हिंसा को हराना है...

 

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