NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
व्यंग्य
भारत
राजनीति
सुंदरता का पता नहीं, लेकिन अच्छे दिन देखने वाले की आंखों में बसते हैं
छप्पन इंच जी के प्रताप से, इतनी मिसाइलें जमा हो चुकी हैं कि दीवाली के रॉकेटों वाला हाल है। दो-चार इधर-उधर टहल भी जाएं तो खास फर्क नहीं पड़ता है। पड़ोसी के घर में जा भी पड़ी तो क्या? वोट पड़ चुके होंगे तो सॉरी बोल देंगे, वोट पड़ने वाले होंगे तो छाती ठोक के कह देेंगे कि उखाड़ा जाए सो उखाड़ लो! इससे ज्यादा अच्छे दिन क्या होंगे।
राजेंद्र शर्मा
13 Mar 2022
Achhe din

इंडिया यहीं तो मार खा जाता है। माना कि आठ साल पहले मोदी जी ने अच्छे दिन लाने का प्रॉमिस किया था, जरूर किया था। लेकिन, उसके बाद आठ साल में मोदी जी ने पब्लिक को क्या-क्या ऑफर नहीं दिया है। स्वच्छ भारत भी। मेक इन इंडिया भी। न्यू इंडिया भी। स्वस्थ भारत भी। पांच ट्रिलियन वाला इंडिया भी। आत्मनिर्भर भारत भी। दुनिया में पिटते डंके वाला इंडिया भी। और तो और, विश्व गुरु भारत भी। राम और शिव के बाद, कृष्ण की वापसी वाला इंडिया भी। यहां तक कि यूक्रेन में भारतीय छात्रों के दूसरों के झगड़े में फंसने के बाद तो, मैडीकल शिक्षा गुरु भारत भी। मोदी जी ने एक से बेहतर एक चॉइस दी है। पर  पट्ठे  विपक्ष वाले हैं कि इनकी सुई अच्छे दिनों पर ही अटकी हुई है। और विपक्ष वाले सिर्फ अपनी सुई अच्छे दिनों पर अटकाए रहते तब तो फिर भी गनीमत थी, ये तो पब्लिक की सुई भी वहीं की वहीं अटकाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। न मौका देखते हैं न माहौल, बस किसी भी दिन इसका शोर मचाने लग जाते हैं कि अच्छे दिन कहां हैं? अच्छे दिन कहां रह गए? अच्छे दिन कब तक आएंगे, वगैरह, वगैरह। और तो और, इस बार के चुनाव में पब्लिक ने तो भगवाइयों की होली से हफ्ते भर पहले होली करवा दी, चार के चार राज्यों में दोबारा सरकार बनवा दी, पर कमबख्त विपक्षियों ने ऐसे खुशी के मौके तक का ख्याल नहीं किया। मोदी जी के जिम्मेदारी का एहसास दिलाने तक का ख्याल नहीं किया। यहां तक कि चुनाव नतीजे आने के हफ्ते भर बाद तक जलाने वाले तेल के दाम जस के तस बने रहने का भी ख्याल नहीं किया। प्रोवीडेंट फंड पर ब्याज में जरा सी कटौती की सिफारिश होने की देर थी, लगे वही पुराना राग अलापने कि क्या यही अच्छे दिन हैं? अच्छे दिन कहां हैं? अच्छे दिन कब आएंगे! चुनाव वाले जनादेश की याद दिलाओ तो बेशर्मी से कहते हैं कि ये तो भगवाइयों के अच्छे दिन हुए। पब्लिक के अच्छे दिन कब आएंगे? बेरोजगारों के भूखों रहने के बाद, अब तो पेंशनयाफ्ता भी एक रोटी कम खाएंगे- क्या ऐसे ही अच्छे दिन आएंगे!

वैसे अच्छे दिनों की हम नहीं कहते, पर भूख वाली बात सही नहीं है। भूख होती तो योगी जी की लखनऊ की गद्दी पर वापसी होती? सारे देश ने वीडियो देखा था और मोदी जी ने अपनी चुनाव सभाओं में अपनी जुबानी उसका ऑडियो सुनाया था, बूढ़ी अम्मा ने एलानिया बताया था कि वोट तो मोदी को ही देंगे। “बिन्नै हमें अन्न दओ है। हमने बिनको नमक खाओ है। वोट बिन्हें ई देंगे।” यानी प्रमाणित है कि अन्न दिया गया और वह भी मुफ्त। और सिर्फ पांच किलो अन्न ही कहां? तेल, नमक, दाल भी। सारी दुनिया को दिखाकर दिया। मोदी जी और योगी जी की फोटू वाले थैलों में सजाकर दिया गया। हजारों-लाखों को नहीं, तेईस करोड़ की आबादी में पूरे पंद्रह करोड़ को दिया गया। उनको भी दिया गया, जिन्होंने सब खाने के बाद भी एक मामूली थैंक्यू की डकार तक नहीं ली। फिर भूख कहां? 

पेंशनयाफ्ताओं की थाली में आधी रोटी कम भी हो जाएगी तो ऐसा क्या गजब हो जाएगा? कम खाएंगे, जल्दी मुक्ति पाएंगे! और प्लीज अब कोई पलट कर यह मत कहने लगिएगा कि ये कैसे अच्छे दिन हुए? तेईस करोड़ में से पंद्रह करोड़ मुफ्त राशन की लाइन में--क्या यही अच्छे दिन हैं? यह तो भूखे से ही पूछो कि ये अच्छे दिन हुए कि नहीं। भूखा ही जानता है कि पेट में अन्न जाने के दिन से बढ़कर, अच्छा दिन दूसरा नहीं होता है। भूखे को तो अच्छे दिन की छोड़ो, रोटी में स्वर्ग दिखाई देता है और अन्न बांटने वाले में भगवान। और हां इसमें सरकार-वरकार को बिल्कुल नहीं घसीटना चाहिए। पर एक बात समझ में नहीं आयी। एक तरफ तो मोदी जी कह रहे हैं कि यूपी ने 2022 में, उनकी देश में 2024 की जीत पक्की कर दी है और दूसरी तरफ अखबारों में खबर है मार्च के बाद से मोदी जी-योगी जी की फोटुओं वाले थैलों का राशन बंद। राशन के पुराने दिन आएंगे, तो मोदी जी 2024 की अपनी जीत पक्की कैसे कराएंगे! नये-नये जुम्लों से पब्लिक को कब तक बहलाएंगे?

हम तो कहेंगे कि चार राज्यों में जीत के इस जश्न में ही मोदी जी, अच्छे दिनों की इस किचकिच का कांटा हमेशा के लिए काट ही क्यों नहीं देते! सिंपल है। अच्छे दिनों का नाम बदल दो। यानी अच्छे दिन का मतलब बदल दो। फिर न पहले वाले अच्छे दिन रहेंगे और न अच्छे दिनों के नहीं आने की किचकिच रहेगी। मोदी जी को बस एक बार छाती ठोककर एलान करने की जरूरत है कि अच्छे दिन तो कब के आ चुके, बस विरोधी ही पब्लिक को देखने नहीं दे रहे हैं। इंडिया में अरबपतियों का दुनिया भर में सबसे तेजी से बढ़ना, यही तो इंडिया के अच्छे दिनों की निशानी है। इसलिए तो करोड़पति सरकार के और सरकार करोड़पतियों की दीवानी है। तेल के दाम के सैकड़ा लगाने में पब्लिक के अच्छे दिनों की कहानी होगी। चैनल-चैनल, भगवान मोदी की कहानी होगी!

उसके बाद भी अगर मोदी जी की 2024 की जीत पक्की होने में कोई कसर रह जाए, तो मिसाइलों के अच्छे दिन किस काम आएंगे? छप्पन इंच जी के प्रताप से, इतनी मिसाइलें जमा हो चुकी हैं कि दीवाली के रॉकेटों वाला हाल है। दो-चार इधर-उधर टहल भी जाएं तो खास फर्क नहीं पड़ता है। पड़ोसी के घर में जा भी पड़ी तो क्या? वोट पड़ चुके होंगे तो सॉरी बोल देंगे, वोट पड़ने वाले होंगे तो छाती ठोक के कह देेंगे कि उखाड़ा जाए सो उखाड़ लो! इससे ज्यादा अच्छे दिन क्या होंगे। अच्छे दिन यहां हैं भाई!        

achhe din
Narendra modi
Elections

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!

कटाक्ष: एक निशान, अलग-अलग विधान, फिर भी नया इंडिया महान!

कटाक्ष: सांप्रदायिकता का विकास क्या विकास नहीं है!

कार्टून क्लिक: चुनाव ख़तम-खेल शुरू...

मुस्कुराहट वाला नफ़रती बोल, नफ़रती नहीं होता

कटाक्ष: मोदी जी, कश्मीरी पंडितों के आंसू हर्गिज़ सूखने नहीं देंगे!

तिरछी नज़र: सरकार-जी, बम केवल साइकिल में ही नहीं लगता

बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!


बाकी खबरें

  • sex ratio
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: चिंताजनक स्थिति पेश कर रहे हैं लैंगिक अनुपात और घरेलू हिंसा पर NFHS के आंकड़े
    04 Dec 2021
    जन्म के दौरान लड़के-लड़कियों के अनुपात में पिछले पांच सालों में बहुत गिरावट आई है. अब 1000 लड़कों पर सिर्फ़ 878 महिलाएं हैं। जबकि 2015-16 में 1000 लड़कों पर 954 लड़कियों की संख्या मौजूद थी।
  • NEET-PG 2021 counseling
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नीट-पीजी 2021 की काउंसलिंग की मांग को लेकर रेजीडेंट डॉक्टरों ने नियमित सेवाओं का किया बहिष्कार
    04 Dec 2021
    ‘‘ओपीडी सेवाएं निलंबित करने से प्राधिकारियों से कोई ठोस जवाब नहीं मिला तो हमें दुख के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि हम फोरडा द्वारा बुलाए देशव्यापी प्रदर्शन के समर्थन में तीन दिसंबर से अपनी सभी…
  • Pilibhit
    तारिक अनवर
    भाजपा का हिंदुत्व वाला एजेंडा पीलीभीत में बांग्लादेशी प्रवासी मतदाताओं से तारतम्य बिठा पाने में विफल साबित हो रहा है
    04 Dec 2021
    नागरिकता और वैध राजस्व पट्टे की उम्मीदें टूट जाने के साथ शरणार्थियों को अब पिछले चुनावों में भाजपा का समर्थन करने पर पछतावा हो रहा है।
  • Gambia
    क्रिसपिन एंवाकीदेऊ
    गाम्बिया के निर्णायक चुनाव लोकतंत्र की अहम परीक्षा हैं
    04 Dec 2021
    गाम्बिया में राष्ट्रपति पद का चुनाव हो रहा है। पर्यवेक्षकों का मानना है ये चुनाव गाम्बिया के लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण अग्निपरीक्षा हैं। 
  • prashant kishor
    अनिल सिन्हा
    नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!
    04 Dec 2021
    ग़ौर से देखेंगे तो किशोर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने में लगे हैं। वह देश को कारपोरेट लोकतंत्र में बदलना चाहते हैं और संसदीय लोकतंत्र की जगह टेक्नोक्रेट संचालित लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License