NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अडाणी पवार प्लांट: आदिवासी-किसानों की ज़मीन लूट का पर्याय बना
गोड्डा के रैयत आदिवासी-किसानों की दर्द-गाथाI
अनिल अंशुमन
15 Sep 2018
Adani Power Plant Godda

बरसों पहले अंग्रेज़ी हुकूमत ने अपने विकास के लिए संथाल परगना के इलाकों में टेलीफोन और रेलवे लाइन बिछाने का काम शुरू किया था तो शासन-बल से यहाँ के अनगिनत आदिवासियों और गरीब किसानों से उनकी ज़मीनें छीन लींI अपने पुरखों की ज़मीन से बेदखल किये गए लोगों के लिए केवल एक कानून था - न खाता, न बही, अंग्रेज़ी हुकूमत जो कहे वही सहीI लेकिन आज़ादी के 71 वर्षों बाद उसी इलाके के गोड्डा क्षेत्र के आदिवासी– किसानों के साथ फिर से शासन का वही रवैया लागू होता दिख रहा है I जहाँ अडाणी पावर प्लांट के लिए पुलिस–प्रशासानिक तन्त्र के बल पर प्रदेश की भाजपा सरकार सारे नियम कायदों को धता बताकर लोगों की ज़मीनें छीन रही हैI               

पिछले 31 अगस्त के दिन गोड्डा शहर से सटे माली गाँव में हुई घटना, यदि सोशल मीडिया से वायरल न हुई होती तो शायद ही कोई ये जान पाता कि किस तरह गाँव में घुसकर अडाणी पवार प्लांट के अधिकारियों ने गरीब रैयत आदिवासी-किसानों की 16 बीघा से भी अधिक ज़मीन में लगी सारी फसलें रौंदकर ज़बरन कब्ज़ा कर लियाI वे बिना कोई पूर्व सूचना दिए सुनियोजित नाटकीय अंदाज में अचानक हथियारबंद पुलिस और पोकलेन–जेसीबी मशीनें  लेकर वहाँ पहुँच गए और कंपनी का दावा जताकर वहाँ खड़ी फसलों समेत सारे पेड़–पौधों तक को तहस-नहस कर दियाI अधिकांश मर्दों के बाहर होने के कारण घर की महिलाएँ व चंद बुज़ुर्ग बदहवास होकर खेतों पर पहुँचे और देखा कि जिन खेतों को भीषण सुखा झेलकर उन्होंने धान की फसल से हरा-भरा किया था, उसे उजाड़ा जा रहा हैI रोती–कलपती महिलाओं ने कंपनीवालों के पाँव पकड़कर मिन्नतें कीं कि इसी फसल से उनके घर–परिवार का गुज़ारा होता है, लेकिन आला अधिकारियों ने अनसुना कर दियाI मौके पर पहुँचे कुछ ग्रामीणों ने जब ज़िले के एसपी से गुहार लगाकर मदद माँगी तो उन्होंने उसी स्थानीय थाना में जाने की सलाह देकर पल्ला झाड़ लिया, जो खुद वहाँ कंपनी के लठैत बनकर तैनात थेI कम्पनी कारिंदों ने साफ़ लहज़े में कह दिया कि ये ज़मीनें अब उनकी नहीं रहीं, अडाणी पावर प्लांट के लिए अधिगृहित की जा चुकी हैंI ग्रामीणों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने कंपनी को न तो अपनी ज़मीन दी है और न ही अधिग्रहण की कोई जानकारी मिली हैI कंपनी अधिकारियों ने कहा कि – हमारे पास सरकार व ज़िला प्रशासन का एलपीसी ऑर्डर है और उसी के तहत ज़मीन पर कब्ज़ा करने आये हैंI जाते-जाते ग्रामीणों के धार्मिक स्थल ‘जंगबाहा’ को भी ध्वस्त कर पुलिस की पहरेदारी बैठा गएI

गोड्डा में अडाणी पावर प्लांट के नाम पर रैयत किसानों से उनकी सहमति के बिना ज़बरन ज़मीनें छीने जाने के खिलाफ आन्दोलन चला रहे “भूमि बचाओ संघर्ष समिति” के संयोजक और स्थानीय किसान चिंतामणि जी का कहना है कि माली गाँव में जो हुआ, वही काण्ड हर जगह करके यहाँ के आदिवासी–किसानों से ज़मीनें छीनी जा रही हैंI इसी साज़िश से उनकी भी 4 एकड़ ज़मीन कम्पनीवालों ने ज़बरन ले ली हैI जबकि उन्होंने न अपनी कोई सहमति दी है और न ही कोई मुआवज़ा लिया हैI सरकार और ज़िला प्रशासन हर जगह यही प्रक्रिया अपनाकर अधिकांश रैयत आदिवासी व किसानों की ज़मीनें छीनकर और झूठा सहमती-पत्र तैयार कर फर्ज़ी सूचना जारी कर रहा है कि सभी असली ज़मीन मालिक राज़ी हैं और जो विरोध कर रहें हैं वे सभी बाहरी हैंI चिंतामणि जी ने बताया कि पूरे संथाल परगना क्षेत्र में    संथाल परगना कानून (एसपीटी कानून) का विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू है, जिसके तहत बिना ग्राम सभा की अनुमति के जंगल–ज़मीन का अधिग्रहण गैरकानूनी है I लेकिन खुलेआम इन संवैधानिक प्रावधानों को धता बताकर राज्य की वर्तमान सरकार अडाणी कम्पनी के लिए यहाँ के रैयत आदिवासी व किसानों को उनकी ज़मीन से उजाड़ रही है I विरोध करने वालों को ‘बाहरी’ बताकर कभी कंपनी के गुंडों से पिटवाया जाता है तो कभी झूठे मुकदमों में फंसाकर प्रताड़ित किया जा रहा हैI

सन 2014 में भाजपा शासन ने सरकार बनते ही अडाणी कम्पनी से गोड्डा में पावर प्लांट बनाने का एमओयू कर इसकी औपचारिक घोषणा कर दी थीI जिसका त्वरित  विरोध पूरे इलाके के रैयत आदिवासियों और किसानों के साथ–साथ कई सामाजिक जन संगठनों ने शुरू कर दिया थाI विरोध का मुख्य पहलू हैं– जिस इलाके में पावर प्लांट का प्रस्ताव है वो पूरा इलाका बहु फसली कृषि-क्षेत्र और बहुसंख्यक स्थानीय आदिवासी–किसानों की आजीविका का मुख्य साधन हैI दूसरा है, इस पावर प्लांट से तैयार होनेवाली बिजली को सीधे बांग्लादेश को बेचनाI इस परियोजना से राज्य की सरकार को प्रतिवर्ष होने वाले लगभग 294 करोड़ की राजस्व हानि को लेकर झारखण्ड महालेखाकार ने भी सवाल खड़े किये हैंI वहीं, दुनिया में ऊर्जा क्षेत्र से सम्बंधित लगने वाली परियोजनाओं के आर्थिक–सामाजिक मापदंडों का अध्ययन करनेवाली “इंस्टिट्यूट फॉर एनर्जी इकोनोमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालासिस (IEEEAFA) ने भी इस पवार प्लांट प्रोजेक्ट को बांग्लादेश के लिए महंगा, खतरनाक और देर से शुरू होने वाला प्रोजेक्ट बताया हैI साथ ही यह भी कहा है कि इससे सिर्फ अडाणी कंपनी को फायदा होगा क्योंकि इस प्लांट के लिए कोयला भारत की बजाय ऑस्ट्रेलिया स्थित अडाणी की बदहाल हो चुकी कोयला कंपनी से लाकर उसे फिर से खड़ा किया जाएगाI जिससे कोयले की लागत खर्च कई गुना महँगा होगा और इसकी मार यहाँ के राजस्व को झेलना पड़ेगाI

अडाणी पावर प्लांट कम्पनी द्वारा ज़बरन ज़मीन छीने जाने के शिकार माली गाँव के रैयत आदिवासियों ने 2 सितम्बर को अपनी जीविका के सवाल को लेकर गोड्डा में “विरोध मार्च” निकालकर कर उपायुक्त से भी मिलेI उन्होंने साफ़ कह दिया कि वे कुछ नहीं कर सकते, ऊपर से सरकार का दबाव है कि हर कीमत पर यहाँ प्लांट लगेगा हीI ये साफ़ दिखलाता है कि किस तरह झारखण्ड सरकार ‘विकास’ के नाम पर वहाँ के स्थानीय रैयत आदिवासी–किसानों की बलि चढ़ाकर अडाणी जी की मुनाफा–योजना को लागू करने पर अमादा हैI यही वजह है कि इसका विरोध इस कदर जारी है कि इस परियोजना के लिए होने वाली कोई भी ‘जन सुनवाई’ अभी तक सफल नहीं हो सकी हैI पिछले 5 मार्च 2017 को जब सरकार व प्रशासन ने पहली ‘पर्यावरण–जन सुनवाई’ रखी तो हज़ारों किसान जुट गए और जन सुनवाई के नाम पर हो रही खानापूर्ति देखकर आक्रोशित हो गएI तब प्रशासन ने कुछेक फर्जी जन-सुनवाई करवाकर कागज में दिखला दिया है कि सारे किसान सहमत हैंI हालाँकि इलाके के कई धनी व संपन्न किसानों ने स्वेक्छा से अपनी ज़मीनें देकर उसका मुआवज़ा ले लिया है, लेकिन अधिकांश ऐसे मंझोले व गरीब रैयत किसान व आदिवासी, जिनकी आजीविका का मुख्य साधन उनकी ज़मीन है, नहीं देना चाहते हैंI ऐसे में इन पर स्थानीय दलाल–बिचौलियों द्वारा दबाव डलवाया जा रहा और फर्जी मुकदमों में फंसाने की धमकी दी जा रही है I

प्लांट के लिए जबरन ज़मीन छीने जाने के सवाल पर विपक्ष के कई राजनीतिक दलों के हो रहे विरोध पर हाल ही में आदर्श–सांसद चुने गए निशिकांत दुबे ने निंदा करते हुए इसे विकास विरोधी करार देकर कहा है कि यह प्लांट इस क्षेत्र का उतरोत्तर विकास करते हुए ढेरों रोजगार का सृजन करेगाI सरकार व पार्टी प्रवक्तागण आये दिन मीडिया के माध्यम से जबरन ज़मीनें छीने जाने की घटनाओं को झूठा व मनगढ़ंत बताकर हो रहे जन विरोध को ‘बाहरी लोगों’ का उकसावा करार दे रहें हैं I वहीं, “भूमि बचाओ संघर्ष समिति” समेत विपक्षी दलों व अन्य आन्दोलनकारी संगठनों और रैयत किसानों के विरोध का सिलसिला भी रुक नहीं रहा हैI 31 अगस्त को माली गाँव में आदिवासियों से ज़मीन छीने जाने और उन पर झूठा मुकदमा दर्ज किये जाने की घटना से स्थानीय आदिवासी समुदाय और उनके संगठन बेहद आक्रोशित हैंI राजधानी रांची से लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार विरोध कार्यक्रम जारी रखे हुए हैंI देखना है कि स्थिति क्या करवट लेती है?

Jharkhand Adani Project
Adani Power Plant
Godda
Jharkhand
Adani

Related Stories

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

झारखंड : हेमंत सोरेन शासन में भी पुलिस अत्याचार बदस्तूर जारी, डोमचांच में ढिबरा व्यवसायी की पीट-पीटकर हत्या 

झारखंड रोपवे दुर्घटना: वायुसेना के हेलिकॉप्टरों ने 10 और लोगों को सुरक्षित निकाला


बाकी खबरें

  • इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल और क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित
    23 Jul 2021
    तीन सदस्यीय जांच आयोग का नेतृत्व नवी पिल्ले करेंगे जो 2008-2014 के बीच यूएनएचआरसी के प्रमुख थे।
  • 400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    पीपल्स डिस्पैच
    400 से अधिक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, बुद्धिजीवियों की अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन से क्यूबा पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग
    23 Jul 2021
    400 से अधिक हस्तियों द्वारा हस्ताक्षरित एक खुला पत्र अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान क्यूबा पर लगाए गए 243 एकतरफ़ा प्रतिबंधों को हटाने की मांग करता है जिसने इस द्वीप…
  • अध्ययन के मुताबिक भारत में कोरोनावायरस की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद की सबसे भयावह त्रासदी’, सरकार ने किया आंकड़े से इंकार
    दित्सा भट्टाचार्य
    अध्ययन के मुताबिक भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर ‘विभाजन के बाद सबसे बड़ी त्रासदी’, सरकार का आंकड़े से इंकार
    23 Jul 2021
    रिपोर्ट में कहा गया है, “वास्तविक मौतों का आंकड़ा कई लाखों में होने का अनुमान है, न कि कुछ लाख में, जो इसे यकीनन विभाजन और स्वतंत्रता के बाद से भारत की सबसे भयावह मानवीय त्रासदी बना देता है।” 
  • अयोध्या में बीएसपी के कार्यक्रम का पोस्टर। बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्रा के ट्विटर हैंडल से साभार
    असद रिज़वी
    दलित+ब्राह्मण: क्या 2007 दोहरा पाएगी बीएसपी?
    23 Jul 2021
    पार्टी अपने 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के प्रयोग को दोहराने की कोशिश कर रही है, लेकिन ये इस बार इतना आसान नहीं होगा। एक विश्लेषण...
  • ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    दमयन्ती धर
    ज़मीन और आजीविका बचाने के लिए ग्रामीणों का विरोध, गुजरात सरकार वलसाड में बंदरगाह बनाने पर आमादा
    23 Jul 2021
    वलसाड में उमरागाम तालुक के स्थानीय लोग प्रस्तावित बंदरगाह के निर्माण का विरोध 1997 से ही करते आ रहे हैं, जब पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License