NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आदिवासियों की बेदखली : सामूहिक क्रंदन का वक्त है
एफआरए के तहत निरस्त दावों के बाद आदिवासियों को जंगल से बाहर किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को चुनौती देने के लिए मध्यप्रदेश सरकार तलाश रही है उपाय।
राजु कुमार
26 Feb 2019
baiga tribes

माखनलाल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. दविन्दर कौर उप्पल ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है,

‘‘धरती की संताने

बेदखल कर दी जाएंगी

अपनी ही धरती से

उनकी नदियां, उनके पहाड़

दे दिए जाएंगे,

पहाड़ को नोचकर समतल बनाने वाले को

सामूहिक क्रंदन का वक्त है।’’

वाकई यह सामूहिक क्रंदन का वक्त है, जब सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले अपने एक फैसले में 21 राज्यों को आदेश दिया कि वे अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासियों को जंगल से बेदखल कर वन भूमि को खाली करवाएं। अदालत के इस फैसले पर आदिवासियों के लिए काम कर रहे जन संगठनों सहित आम बुद्धिजीवियों ने भी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है और इसके लिए वे वर्तमान केन्द्र सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ ने वाइल्ड लाइफ फर्स्ट सहित कुछ एनजीओ द्वारा वन अधिकार कानून 2006 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि वन अधिकार कानून के तहत जिनके दावे कानून के तहत खारिज हो जाते हैं, उन्हें वन भूमि से राज्य सरकारों द्वारा निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। इस कानून के बचाव में सुनवाई के दरम्यान केन्द्र सरकार ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से अपने वकील को नहीं भेजा। पीठ ने राज्यों को आदेश दे दिया कि वे 27 जुलाई तक उन सभी आदिवासियों को वन भूमि से बेदखल कर दें, जिनके दावे खारिज हो गए हैं।

कोर्ट के इस फैसले से आदिवासी बहुल मध्यप्रदेश के सबसे ज्यादा आदिवासी परिवार प्रभावित होंगे। यह कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार का बड़ा महत्वकांक्षी कानून था। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र लिखकर कहा है, ‘‘आदिवासी मामलों के मंत्रालय के अनुसार 45 फीसदी से भी कम व्यक्तिगत दावे और 50 फीसदी से भी कम सामुदायिक दावे मान्य किए गए हैं। मंत्रालय ने यह इंगित किया है कि वन अमले के बेतुके आपत्ति के कारण दावे निरस्त हुए हैं। ...बड़े स्तर पर कार्रवाई करने से पहले यह जरूरी है कि पुनर्विचार याचिका दायर की जाए, या जो आप उचित समझे।’’ उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों के लिए जल, जंगल और जमीन उनके जीवन का हिस्सा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कमलनाथ को इस मसले पर पत्र लिखकर कहा कि भाजपा प्रशासन में आदिवासियों के बहुत सारे आावेदन को किसी न किसी कारण मान्यता नहीं दी जाती थी। भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार ने भी कोर्ट के सामने मजबूत दलीलें नहीं पेश की। इनकी लापरवाहियों का नुकसान आदिवासियों को नहीं भुगतना चाहिए, इसलिए उन्हें अपनी जमीन और घर से उजड़ने से बचाने के लिए हर संभव कोशिश की जाए। इन पत्रों पर कार्रवाई करते हुए कमलनाथ ने गृह मंत्री बाला बच्चन, विधि मंत्री पीसी शर्मा, वन मंत्री उमंग सिंघार और जनजातीय कार्य मंत्री ओमकार सिंह मरकाम ने एक समिति गठित की है, जो कोर्ट के फैसले के संबंध में आगे की कार्रवाई को प्रस्तावित करेगा।

Baiga Tribes (2) (1).png

20 राज्यों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे के अनुसार 13,86,549 दावे खारिज हुए हैं। सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में 3,54,787 दावे खारिज होने का हलफनामा मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था। मध्यप्रदेश सरकार ने हलफनामे में कहा है कि वन अधिकार कानून के तहत वन भूमि पर दावे को लेकर 4,26,105 दावे आदिवासियों एवं 1,53,306 दावे परंपरागत रूप से रह रहे अन्य वनवासियों द्वारा किए गए थे। इनमें से आदिवासियों के 2,04,123 दावे और अन्य के 1,50,664 दावे खारिज कर दिए गए हैं। कोर्ट ने कहा है कि जिनके दावे खारिज हो गए हैं, उन्हें अगली सुनवाई से पहले वन भूमि से बेदखल कर दिया जाए, अन्यथा इस मामले को कोर्ट गंभीरता से लेगा। मध्यप्रदेश के बाद सबसे ज्यादा खारिज दावे गुजरात (1,82,869), कर्नाटक (1,76,540) और ओडिशा (1,48,870) के हैं।

उल्लेखनीय है कि जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 8.6 फीसदी आबादी (लगभग 11 करोड़ लोग) आदिवासियों की है। देश के कुल आदिवासियों में सबसे ज्यादा 153.16 लाख यानी 14.7 फीसदी आदिवासी मध्यप्रदेश में रहते हैं, जो मध्यप्रदेश की कुल जनसंख्या में 21.10 फीसदी हैं। जनगणना एवं अन्य रिपोर्ट्स को देखा जाए, तो इन आदिवासी परिवारों एवं जंगलों पर आश्रित परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति बहुत ही कमजोर है और विभिन्न विकास परियोजनाओं के नाम पर इन्हें लगातार विस्थापित किया जाता रहा है। लूट-खसोट के शिकार इन लोगों के लिए जंगल पर अधिकार एवं सम्मानजनक जीवन के लिए लगातार किए गए आंदोलनों की बदौलत दिसंबर 2006 में संसद ने अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 को पारित किया, जिसे 1 जनवरी 2008 से लागू किया गया। इस अधिनियम की प्रास्तावना में यह जिक्र है कि आदिवासियों एवं जंगलवासियों के साथ हुए ‘‘ऐतिहासिक अन्याय’’ से उन्हें मुक्ति दिलाने और जंगल पर उनके अधिकारों को मान्यता देने के लिए यह कानून है। कानून के अनुसार 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर काबिज आदिवासियों को और तीन पीढ़ी से रह रहे अन्य वन निवासियों को उस भूमि का अधिकार पट्टा दिया जाएगा।

इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी आदिम जाति कल्याण विभाग को दी गई और जिस भूमि पर अधिकार लेना है वह वन विभाग का है। इस पूरी प्रक्रिया में अधिकारियों की उदासीनता एवं वन विभाग के नकारात्मक रवैये के कारण सभी आदिवासी न तो सही तरीके से दावे कर पाए और न ही समुचित कागाजात लगा पाए। तरह-तरह के अड़ंगों के बीच बहुत सारे दावे खारिज हो गए। मध्यप्रदेश में यह मामला ज्यादा गंभीर रहा है। यह चुनावी मुद्दा भी रहा। वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार पर सवाल दागते हुए सवाल नंबर 9 में कहा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदिवासियों के अधिकार रौंद दिए हैं। मध्यप्रदेश में 6,63,424 परिवारों ने व्यक्तिगत एवं सामुदायिक दावे किए थे, जिनमें से 3,63,424 दावे खारिज कर दिए गए। ग्राम वन अधिकार समिति एवं विकासखंड वन अधिकार समिति में दावे को मान्य किए जाने के बावजूद हजारों दावे जिला स्तरीय समिति से खारिज किए गए।

लोकसभा चुनाव से पहले यह मामला पूरे देश में गरमाने वाला है। यूपीए सरकार द्वारा पारित इस कानून की रक्षा में एनडीए सरकार द्वारा कोई पहल नहीं किए जाने को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मुखर हैं। देश में आदिवासियों के हित में काम करने वाले आदिवासी संगठन भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आक्रोशित हैं। वे आगे की रणनीति बनाने के लिए भोपाल में बैठक भी कर रहे हैं।

वन अधिकार कानून के लिए दबाव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला संगठन एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रन सिंह परमार का कहना है, ‘‘केन्द्र की उदासीनता से आदिवासियों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। मध्यप्रदेश एकता परिषद के अनिल गुप्ता ने कहा कि सबूतों के अभाव और प्रक्रियाओं की जानकारी के अभाव के कारण और वनविभाग द्वारा सबूत नहीं दिये जाने के कारण आदिवासी अपनी पैरवी ठीक ढंग से नहीं कर पाए और उनके दावे निरस्त हो गये। उन पर पुनर्विचार किये जाने की आवश्यकता है, इसके लिए पुनर्विचार याचिका दाखिल कर आदिवासियों का पक्ष मजबूती से रखने की जरूरत है। मध्यप्रदेश सहित देश में कई आदिम जनजातियां रहती हैं, जिनका अस्तित्व खतरे में हैं, इसलिए उन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति कहा जाता है। मध्यप्रदेश के बैगा को आदि मानव कहा जाता है। ऐसे आदिवासी एवं वन्यजीव सदियों से जंगल में एक साथ रहते आए हैं। इन्हें हटाने से जंगल और वन्यजीव दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।’’

fra
Forest Rights Act
forest policy
tribal communities
tribal land
scheduled tribes
Supreme Court
Madhya Pradesh government
kamalnath

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • Colombia
    पीपल्स डिस्पैच
    कोलंबिया में साल 2021 का 91वां नरसंहार दर्ज
    16 Dec 2021
    इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट एंड पीस स्टडीज (INDEPAZ) ने आगाह किया है कि 2021 में हुए नरसंहारों की संख्या 2020 में हुए नरसंहारों की कुल संख्या को पार कर सकती है। फ़िलहाल, दोनों ही आंकड़े बराबर हैं। 
  • bank strike
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी : निजीकरण के ख़िलाफ़ 900 बैंकों के 10,000 से ज़्यादा कर्मचारी 16 दिसम्बर से दो दिन की हड़ताल पर
    16 Dec 2021
    बैंक कर्मचारियों की यूनियन का दावा है कि कॉरपोरेट घरानों की नज़र जनता द्वारा बड़ी मेहनत से कमाए गए 157 लाख करोड़ रुपयों पर है, जो सरकारी बैंकों में जमा है।
  • Advocate Manavi of ALF, YJ Rajendra of PUCL and Pastor Lucas present the report.
    निखिल करिअप्पा
    नई रिपोर्ट ने कर्नाटक में ईसाई प्रार्थना सभाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को दर्ज किया
    16 Dec 2021
    पीयूसीएल की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि ज़्यादातर मामलों में पुलिस पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है, यहां तक कि उन मामलों में भी पुलिस सुरक्षा नहीं दे पाई जहां उन्हें खुफ़िया…
  • modi
    सबरंग इंडिया
    काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन: मंदिर और राज्य के विकास में अंतर क्यों नहीं?
    16 Dec 2021
    क्या पीएम को औरंगजेब का जिक्र ऐसे चुनावी राज्य में लाना था जहां अयोध्या फैसले के बाद से मंदिर की राजनीति गर्म हो रही है?
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 7,974 नए मामले, 343 मरीज़ों की मौत
    16 Dec 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 87 हज़ार 245 हो गयी है।वही कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन के मामलों की संख्या बढ़कर 73 हो गई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License