NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
उत्पीड़न
कानून
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्या नागरिकता क़ानून अफ़ग़ानिस्तानी शरणार्थियों की मदद कर पा रहा है? नहीं, बिल्कुल नहीं
भाजपा समर्थक कह रहे है कि नागरिकता संशोधन कानून की वजह से ही अफ़ग़ानिस्तान के सिख और हिंदू भारत में आ रहे हैं। ये सिर्फ़ एक झूठ है। कैसे, आइए समझिए
अजय कुमार
31 Aug 2021
caa

अफगानिस्तान की जर्जर हालत नागरिकता संशोधन कानून को लेकर राजनीति करने का मौका दे रही है। लोग भले शरण की तलाश में दर-दर भटक रहे हो लेकिन भाजपा इस मौके को गंवा दे, ऐसा कैसे हो सकता है। भाजपा समर्थक कह रहे है कि नागरिकता संशोधन कानून की वजह से ही अफगानिस्तान के सिख और हिंदू भारत में आ रहे हैं। इसमें सबसे प्रमुख नाम मोदी सरकार के मंत्री हरदीप सिंह पुरी का है। हरदीप सिंह पुरी का बयान है कि हमारा पड़ोसी परेशानी के हालात से गुजर रहा है।वहां जिस तरह से सिख और हिंदू एक मुश्किल समय से गुजर रहे हैं, यही वह कारण है कि क्‍यों नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करना जरूरी था। लेकिन क्या यही हकीकत है? अगर यह हकीकत नहीं है तो अफगानिस्तान के बवाल पर नागरिकता संशोधन कानून को लेकर सरकारी नेताओं का जो बुलबुला उठा है उसकी हकीकत क्या है?

पहचान के आधार पर राजनीति करने वालों का कारोबार सच को तोड़ मरोड़ कर पेश करने पर चलता है। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अब तक का सबसे बड़ा काम यही है कि उसने भारत के बहुत बड़े जनमानस के अंदर यह भरा है कि भारत हिंदुओं का है। मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे देश बने हैं। इसी सोच के आधार पर संविधान को पूरी तरह से खारिज करते हुए सड़कों पर जबरदस्त विरोध के बावजूद भाजपा की सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून लागू किया।

नागरिकता संशोधन कानून के मुताबिक 31 दिसंबर साल 2014 से पहले के अवैध अप्रवासियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। शर्त यह लगाई गई है कि अगर अवैध अप्रवासी यानी वह अप्रवासी जिनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं है और वे पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर मुस्लिम समुदाय से संबंध रखते हैं तो उन्हें भारत की नागरिकता दे दी जाएगी। इस कानून को लेकर सबसे बड़ा विवाद यह था कि इसमें नागरिकता देने के लिए धर्म के आधार पर बंटवारा किया गया था। जबकि भारत का संविधान के लिखित और अलिखित दोनों भाव धर्म के आधार पर नागरिकता की बात नहीं करते हैं। इसलिए अधिकतर जानकार यह सवाल खड़ा कर रहे थे कि जब देश भर में एनआरसी होगी तब नागरिकता संशोधन कानून के धार्मिक आधार पर भेदभाव के प्रावधानों को लेकर मुस्लिम समुदाय के साथ बहुत बड़ा भेदभाव किया जा सकता है। संक्षिप्त में समझे तो यह भाजपा सरकार ने बिना किसी तर्क के 31 दिसंबर साल 2014 की तिथि निर्धारित की और संविधान के विरुद्ध जाकर धार्मिक आधार पर भेदभाव करने वाला नागरिकता कानून भारत में लागू किया।

हरदीप सिंह पुरी से लेकर राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा तक भाजपा समर्थक कह रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून की वजह से अफगानिस्तान के सिख और हिंदुओं की मदद हो पा रही है। कानून अपनी सार्थकता को साबित कर रहा है। जबकि बात बिल्कुल इससे अलग है। अलग कैसे?

- पहली बात, साल 2019 के दिसंबर के आखिरी महीने में नागरिकता संशोधन बिल नागरिकता कानून में तब्दील हो गया। तब से लेकर अब तक नागरिकता संशोधन कानून से जुड़े किसी भी तरह के नियम और उपनियम नहीं बने हैं। कानूनी भाषा में कहा जाए तो अभी कानून के भीतर जान नहीं डाला गया है। इसलिए इस कानून के जरिए अफगानिस्तान के लोगों को कोई मदद पहुंच रही है इसका तो सवाल ही नहीं उठता।

- दूसरी बात, कानून में लिखा गया है 31 दिसंबर साल 2014 के पहले भारत में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले गैर मुस्लिम अवैध अप्रवासियों को नागरिकता दी जाएगी। कानून लागू करने से पहले यह विरोध हो रहा था कि 31 दिसंबर साल 2014 का दिन कैसे निर्धारित किया गया? वह कौन सा युक्तियुक्त तर्क लगाकर 31 दिसंबर साल 2014 का दिन निर्धारित हुआ? कानूनी मामलों के जानकार फैजान मुस्तफा कहते है कि 31 दिसंबर साल 2014 के बाद धार्मिक प्रताड़ना नहीं होगी, यह कैसे संभव है? नागरिकता संशोधन कानून का यही बिंदु यह बताता है कि अगर नागरिकता कानून के नियम और उपनियम बन भी जाते तो इस कानून के जरिए अफगानिस्तान से मदद मांगने वाले लोगों को कोई मदद नहीं मिलती।

तीसरी बात, नागरिकता संशोधन कानून में साफ-साफ तो नहीं लेकिन अंतिम पन्ने पर धार्मिक आधार पर प्रताड़ना का जिक्र है। लेकिन सरकार के शब्दों में कहा करती थी कि पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर प्रताड़ना की जाती है। इसलिए या कानून लाया गया है। जबकि इस कानून के आलोचकों का कहना था कि उत्पीड़न या प्रताड़ना के कई आधार होते हैं। केवल धार्मिक आधार पर प्रताड़ना नहीं होती। प्रताड़ना क्षेत्रीय आधार पर भी हो सकती है। प्रताड़ना जातिगत आधार पर भी हो सकती है। जैसे पाकिस्तान के बलूचिस्तान में रहने वाले लोगों के साथ क्षेत्रीयता आधार पर प्रताड़ना होती है तो श्रीलंका में रहने वाले लोगों के साथ तमिल प्रजाति के आधार पर प्रताड़ना की खबरें आती रहती हैं। ऐसा होने के बावजूद भी सरकार केवल धार्मिक आधार पर प्रताड़ना की बात क्यों कर रही है? धार्मिक आधार पर प्रताड़ना की बात करते हुए इस्लाम धर्म को अलग क्यों रख रही है? पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुसलमानों के साथ प्रताड़ना होती है। यह सारे तर्क नागरिकता कानून के विरोध में आलोचकों के जरिए दिए जा रहे थे। अब यह सही साबित हो रहे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान की दर से मदद मांगने वाले लोग केवल सिक्ख और हिंदू समुदाय की नहीं है बल्कि बहुत बड़ा हिस्सा इस्लाम धर्म के मानने वाले लोगों का है। जिन्हें नागरिकता संशोधन कानून उत्पीड़न के आधार पर नागरिक बनने का अधिकार नहीं देता।

इन तीन बातों के आधार पर देखा जाए तो यह साफ दिखता है की नागरिकता संशोधन कानून और अफगानिस्तान से आने वाले शरणार्थियों के बीच कोई संबंध नहीं है। बल्कि यह सवाल और मुखर तरीके से खड़ा हो गया है कि नागरिकता संशोधन कानून का विरोध क्यों किया जाना चाहिए?

प्रताड़ना केवल धर्म के आधार पर नहीं होती। अगर धर्म के आधार पर होती तो मुस्लिमों के साथ भी प्रताड़ना होती है। 31 दिसंबर 2014 के बाद प्रताड़ना नहीं होगी। यह भी मनमाना तक साबित हुआ। अफगानिस्तान इसका मिसाल है।इसलिए नागरिकता संशोधन कानून पहले भी संविधान के खिलाफ था और मौजूदा वक्त में भी संविधान के खिलाफ है।

हमारा संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव करते हुए मदद की बात नहीं करता। लेकिन भले कानून का प्रावधान बिल्कुल अलग क्यों ना हो लेकिन मौजूदा सरकार किसी ना किसी तरह से यह अभिव्यक्त करने की कोशिश में लगी रहती है कि वह हिंदुओं की रहनुमा है।

शरणार्थी के मूल में शरण शब्द है। इंसान खुशी में नहीं बल्कि मजबूरी और दुख में शरण मांगता है। क्या एक भारतीय होने के नाते हम चाहेंगे कि हम उनकी मदद धर्म के आधार पर भेदभाव करते हुए करें जो अपनी जिंदगी बचाने के डर से भाग रहे हैं? क्या विश्व गुरु की चाहत रखने वाला भारत यही चाहेगा की भूख से जूझते हुए लोगों को हिंदू मुस्लिम सिख जैसे धार्मिक आधारों पर बांटकर मदद की जाए?

कुछ लोग तंज कसते हुए कहते हैं कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है। लेकिन कभी पलट कर नहीं सोचते कि बिहार छोड़कर मुंबई दिल्ली बसने वाले लोगों से भरे हुए भारत के लिए कितनी झूठी बात है।

दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी एजेंसी के बाहर अफ़ग़ान लोग माँग कर रहे हैं कि उन्हें भारत में शरणार्थी का दर्जा दिया जाए। हमें ऐसे सवालों पर कैसे सोचना चाहिए? भारत के लाखों लोग मुस्लिम और ईसाई देशों में रहते हैं। अगर भविष्य में कभी मुस्लिम और ईसाई देश में संकट आए और वहां धर्म के आधार पर भेदभाव करते हुए केवल मुस्लिम लोगों की मदद की जाए तो एक देश के तौर पर हम उस देश की मुखालफत करेंगे। क्यों करेंगे? क्योंकि इंसानियत कहती है कि सबकी मदद की जाए। यही शाश्वत मूल्य है। इन्हीं मूल्यों के आधार पर भारत का संविधान बना है। संविधान सभा में जब यह बात हुई कि भारत उन सभी हिंदू और सिख धर्म के लोगों को मजबूरी के वक्त में शरण देगा जो दुनिया में कहीं रहते हो। इस बात को संविधान सभा के कई सदस्यों ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर भेदभाव करते हुए शरण नहीं दी जाएगी। बल्कि भारत की जमीन पर हर शरणार्थी को मदद मिलेगी। भले वह किसी भी धर्म का हो। यह शाश्वत और सनातन मूल्य हैं। इसी आधार पर कई जानकार कह रहे हैं कि शरणार्थी सीधे नागरिकता की मांग नहीं करता। वह शरण मांगता है। भारत को नागरिकता के कानून में संशोधन करने की जरूरत नहीं है। बल्कि शरणार्थी से जुड़े व्यवस्था और नियमों में संशोधन करने की जरूरत है।

afghanisatn and caa
caa and muslim
sikh and caa
refugee in india
Refugee Law
taiban and caa

Related Stories


बाकी खबरें

  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में न Modi magic न Yogi magic
    06 Mar 2022
    Point of View के इस एपिसोड में पत्रकार Neelu Vyas ने experts से यूपी में छठे चरण के मतदान के बाद की चुनावी स्थिति का जायज़ा लिया। जनता किसके साथ है? प्रदेश में जनता ने किन मुद्दों को ध्यान में रखते…
  • poetry
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'टीवी में भी हम जीते हैं, दुश्मन हारा...'
    06 Mar 2022
    पाकिस्तान के पेशावर में मस्जिद पर हमला, यूक्रेन में भारतीय छात्र की मौत को ध्यान में रखते हुए पढ़िये अजमल सिद्दीक़ी की यह नज़्म...
  • yogi-akhilesh
    प्रेम कुमार
    कम मतदान बीजेपी को नुक़सान : छत्तीसगढ़, झारखण्ड या राजस्थान- कैसे होंगे यूपी के नतीजे?
    06 Mar 2022
    बीते कई चुनावों में बीजेपी को इस प्रवृत्ति का सामना करना पड़ा है कि मतदान प्रतिशत घटते ही वह सत्ता से बाहर हो जाती है या फिर उसके लिए सत्ता से बाहर होने का खतरा पैदा हो जाता है।
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: धन भाग हमारे जो हमें ऐसे सरकार-जी मिले
    06 Mar 2022
    हालांकि सरकार-जी का देश को मिलना देश का सौभाग्य है पर सरकार-जी का दुर्भाग्य है कि उन्हें यह कैसा देश मिला है। देश है कि सरकार-जी के सामने मुसीबत पर मुसीबत पैदा करता रहता है।
  • 7th phase
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव आख़िरी चरण : ग़ायब हुईं सड़क, बिजली-पानी की बातें, अब डमरू बजाकर मांगे जा रहे वोट
    06 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में अब सिर्फ़ आख़िरी दौर के चुनाव होने हैं, जिसमें 9 ज़िलों की 54 सीटों पर मतदान होगा। इसमें नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी समेत अखिलेश का गढ़ आज़मगढ़ भी शामिल है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License