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भारत
राजनीति
यूपी में 'अब्बा जान' प्रहार के बाद उत्तराखंड में 'ज़मीन जिहाद'
उत्तराखंड राज्य सरकार अपने हालिया फ़रमान के हवाले से कथित जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर कोई ठोस आंकड़ा दे पाने में नाकाम रही है।
एस.एम.ए. काज़मी
27 Sep 2021
After 'Abba Jaan' Jab in UP, It's 'Land Jihad' in Uttarakhand
अप्रैल 2018 में रुद्रप्रयाग ज़िले के अगस्तमुनि शहर में एक मुस्लिम युवक के एक नाबालिग़ लड़की के साथ बलात्कार करने की अफवाह फ़ैलाये जाने के बाद भीड़ ने मुसलमानों की दुकानें जला दी थीं।

देहरादून: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के "अब्बा जान" के सांप्रदायिक प्रहार के बाद पड़ोसी राज्य उत्तराखंड अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाले अहम राज्य विधानसभा चुनावों से पहले अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने का फ़रमान लेकर आया है। हालांकि, उत्तराखंड राज्य सरकार ने इस फ़रमान को "ज़मीन जिहाद" के ख़िलाफ़ एक उपाय के तौर पर तो पेश नहीं किया है, लेकिन इस आदेश के निशाने पर मुसलमान हैं और इसका मक़सद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करना है।

यह विचाराधीन सरकारी फ़रमान सवालों के घेरे में है, जिसमें कहा गया है कि उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में एक ख़ास समुदाय की आबादी में "अभूतपूर्व" वृद्धि हुई है, जिसके चलते "एक ख़ास समुदाय के लोगों" का यहां से पलायन हुआ है।

राज्य सरकार ने सभी ज़िलों के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को शांति समितियां गठित करने, “अवैध भूमि सौदों” पर नज़र रखने और आपराधिक इतिहास वाले बाहरी लोगों की सूची तैयार करने का आदेश दिया है। शुक्रवार शाम को जारी एक सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, “राज्य के कुछ इलाक़ों में जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि के चलते उन क्षेत्रों की जनसांख्यिकी अहम तरीक़े से प्रभावित हुई है। और इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन की वजह से एक ख़ास समुदाय के लोग उन इलाक़ों से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। साथ ही उन इलाक़ों में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की भी संभावना है।”

ज़िला अधिकारियों को अवैध भूमि ख़रीद सौदों पर नज़र रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि कोई भी अपनी ज़मीन “दबाव में” न बेचे। ज़िला अधिकारियों को उन विदेशी नागरिकों की पहचान करने के लिए भी कहा गया है, जो फ़र्ज़ी मतदाता पहचान पत्र और अन्य सरकारी पहचान पत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह सब तब शुरू हुआ, जब आरएसएस के क़रीबी बीजेपी नेता अजेंद्र अजय ने इस साल जुलाई में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर दावा किया कि सूबे में मुसलमानों ने "ज़मीन जिहाद" शुरू कर दिया है। अपने उस पत्र में उन्होंने आरोप लगाया था कि मुसलमान न केवल थोक में ज़मीन ख़रीद रहे हैं, बल्कि अपने पूजा स्थल भी बना रहे हैं और मुख्यमंत्री से इस मामले को देखने का आग्रह किया था।

2017 में विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में भाजपा के सत्ता में आने के बाद पिछले चार सालों से ज़्यादा समय में तक़रीबन एक दर्जन ऐसी घटनायें हुई हैं, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को आरएसएस, भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी समूहों की ओर से निशाना बनाया गया है। हाल ही में जुलाई में बद्रीनाथ में एक निर्माणाधीन स्थल पर प्रवासी मुस्लिम मज़दूरों ने ईद-उल-जुहा की नमाज़ पढ़ी थी, जिसके बाद दक्षिणपंथी समूहों ने कार्रवाई की मांग की थी। सोशल मीडिया पर अफ़वाहें फैलायी गयीं कि इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए बद्रीनाथ मंदिरों में नमाज़ पढ़ी गयी। चूंकि कई मीडिया संस्थानों ने तब्लीग़ी जमात के लोगों को कोविड-19 फैलाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराने को लेकर अभियान चलाया था, इसी दरम्यान भाजपा विधायक महेंद्र भट्ट ने हिंदुओं को अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के स्वामित्व वाले नाई की दुकानों और ब्यूटी पार्लरों से बचने की सलाह दी थी।

अप्रैल 2018 में गढ़वाल के रुद्रप्रयाग ज़िले के अगस्तमुनि क़स्बे में मुस्लिम दुकानदारों की छह दुकानें फूंक दी गयी थीं। कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े लोगों सहित दक्षिणपंथी समूहों के सदस्यों ने एक जुलूस निकाला था और इन दुकानों को निशाना बनाया था। बाद में रुद्रप्रयाग के ज़िलाधिकारी ने एक बयान में साफ़ किया था कि यह महज़ अफ़वाह थी, जो सोशल मीडिया पर फ़ैलाई गयी थी। अक्टूबर 2017 में रायवाला में हुई एक हत्या के बाद हिंदू समूहों ने ऋषिकेश से हरिद्वार तक मुस्लिम दुकानों और घरों पर हमला किया था और तोड़फोड़ की थी। उस हत्याकांड के आरोपी मुसलमान थे।

अक्टूबर 2017 में ऋषिकेश में दक्षिणपंथी हिंदू समूहों के लोगों ने एक मुसलमान की फल दुकान में आग लगा दी थी।

8 सितंबर 2017 को टिहरी गढ़वाल के कीर्तिनगर क़स्बे के दो मुस्लिम लड़कों को देहरादून में बहुसंख्यक समुदाय की दो लड़कियों के साथ घूमते हुए पुलिस ने पकड़ लिया था। पुलिस ने तुरंत उस मामले की सूचना कीर्तिनगर को दे दी थी, जहां दक्षिणपंथी समूहों के सदस्यों ने उन मुस्लिम लड़कों की दुकानों में तोड़फोड़ की। उन लड़कों को जेल भेज दिया गया था।

जुलाई 2017 में दक्षिणपंथी लोगों ने पौड़ी गढ़वाल ज़िले के सतपुली क़स्बे में एक "आपत्तिजनक" फ़ेसबुक पोस्ट के बाद मुसलमानों की दुकानों पर एक हमला कर दिया था, जिसे कथित तौर पर एक मुस्लिम लड़के ने बनाया था। गाय के साथ कथित रूप से यौन सम्बन्ध बनाने के आरोप में एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किये जाने के बाद सतपुली क़स्बे में एबीवीपी के लोगों ने इस क़स्बे के बाज़ार को ज़बरदस्ती बंद करवा दिया था।

जुलाई, 2017 में मसूरी के हिल स्टेशन में कुछ दक्षिणपंथी समूहों ने कश्मीरी व्यापारियों को निशाना बनाया था और मार्च 2018 तक अपना बोरिया बिस्तर उठाने और मसूरी छोड़ देने की धमकी दी गयी थी। इसके लिए उनपर उकसावे में कथित तौर पर भारत-पाकिस्तान चैंपियंस ट्रॉफी मैच के बाद पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने का आरोप लगाया गया था। हालांकि, कश्मीरी व्यापारियों का इससे कोई लेना-देना नहीं था।

नंदप्रयाग और टिहरी गढ़वाल ज़िलों के मूल निवासी गढ़वाली मुसलमानों के अलावा, उत्तर प्रदेश के पड़ोसी ज़िलों के कुछ मुसलमान सब्ज़ी की दुकानें, फलों की दुकानें, नाई की दुकानें या इसी तरह के छोटे-छोटे करोबार चलाते हैं। गढ़वाली मूल के मुसलमान पीढ़ियों से इन पहाड़ियों में रह रहे हैं। 2000 में उत्तराखंड राज्य के गठन के पहले से ही देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर के मैदानी ज़िलों की मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन इलाक़ों में रह रहा है। मुस्लिम आबादी राज्य की कुल आबादी का तक़रीबन 10% है और मुख्य रूप से तीन ज़िलों में केंद्रित है।

उत्तराखंड राज्य सरकार ने अपने इस फ़रमान में जिस कथित जनसांख्यिकीय परिवर्तन की बात की है, उस पर कोई ठोस आंकड़ा दे पाने में विफल रही है। सरकार उन इलाक़ों को बता पाने में भी नाकाम रही है, जहां इस तरह के "चिंताजनक" जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुए हैं, जिससे कि "कुछ समुदाय" का पलायन हुआ है।

दूसरी ओर, सख़्त भौगोलिक भूभाग, नागरिक और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा और रोज़गार के कम अवसर आदि जैसे मुद्दों की एक श्रृंखला के चलते इन इलाक़ो में कई सालों से यहां से देश के दूसरे हिस्से में लोगों के पलायन होते देखा गया है। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस मुद्दे का पता लगाने और सुधारात्मक उपाय सुझाने को लेकर एक प्रवासन आयोग का भी गठन किया था। एक सेवानिवृत्त आईएफ़एस अधिकारी एस. एस.नेगी की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट भाजपा सरकार को सौंप दी है, लेकिन इस फ़रमान में कथित जनसांख्यिकीय परिवर्तन के चलते ज़बरदस्ती या जबरन प्रवास के किसी भी कारण का उल्लेख नहीं किया गया है।

विपक्षी दलों ने इस हालिया फ़रमान को राज्य विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास क़रार दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने ट्वीट करके अपनी आशंका जतायी है और कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि इस फ़रमान का इस्तेमाल करते हुए किसी समुदाय को निशाना नहीं बनाया जायेगा।

भाकपा (माले) के गढ़वाल क्षेत्र के सचिव इंद्रेश मैखुरी ने कहा, “उनके पास लोगों को दिखाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में विकास या रोज़गार के अवसर दिये जाने को लेकर कुछ भी नहीं है। इसलिए, वे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इस खुलेआम इस्तेमाल में लिप्त हैं। गढ़वाल के क़स्बों और शहरों में छोटे-मोटे धंधे चलाने वाले बाहर के मुसलमान उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। 'ज़मीन जिहाद' के आरोप पूरी तरह से झूठे हैं और कहीं न कहीं प्रेरित हैं।”

उत्तराखंड कांग्रेस के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का भी कहना है कि भाजपा के पास विकास के मोर्चे पर दिखाने के लिए और कुछ भी नहीं है और इसलिए उसने बहुसंख्यक समुदाय के वोट हासिल करने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का विकल्प चुना है। धस्माना कहते हैं, "वे या तो 'तालिबान, तालिबान' चिल्लाकर बहुसंख्यक समुदाय को डराकर उनके डर से खेलना चाहते हैं या स्थानीय स्तर पर ध्रुवीकरण करने को लेकर मुसलमानों के ख़तरे को पेश करना चाहते हैं। यह एक भोंडी कोशिश है और वे बुरी तरह नाकाम होंगे।”

मगर,भाजपा के एक वरिष्ठ नेता डॉ. देवेंद्र भसीन ने इस फ़ैसले का बचाव किया और कहा कि इस तरह के क़दम से बाहरी लोगों मे से संदिग्धों की पहचान होगी और राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित होगा।

सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया (SUCI) के स्टेट कोर्डिनेटर डॉ मुकेश सेमवाल ने राज्य सरकार के इस फ़रमान पर हैरानी जतायी है। वह कहते हैं, “मैं पूरे गढ़वाल के गांवों, क़स्बों और शहरों में काम करता रहा हूं और कभी भी 'ज़मीन जिहाद' या मुसलमानों की आमद के चलते भूमि की बिक्री या पलायन का कोई मामला नहीं आया। ये सियासी फ़ायदे के लिहाज़ से हालात का ध्रुवीकरण करने को लेकर आरएसएस और बीजेपी की गढ़ी हुई काल्पनिक आशंकायें हैं।”

राज्य में आम आदमी पार्टी (AAP) की उपाध्यक्ष और टिहरी ज़िले की मूल निवासी गढ़वाली मुस्लिम रज़िया बेग़ ने न्यूज़क्लिक को बताया, “सामाजिक ताने-बाने का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की अपनी कोशिश में भाजपा किसी भी स्तर तक गिर सकती है। यह आरोप तो सरासर बेबुनियाद हैं। उल्टे पिछले पांच साल में गढ़वाल में एक दर्जन से ज़्यादा ऐसी घटनायें हुई हैं, जहां ग़रीब मुसलमानों को निशाना बनाया गया है, उनकी दुकानों में तोड़फोड़ की गयी है और उन्हें भागने पर मजबूर किया गया है।”

इस बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से जब इस फ़रमान को लेकर पूछा गया, तो उन्होंने शनिवार को संवाददाताओं से कहा कि इसका मक़सद किसी ख़ास समुदाय को निशाना बनाना नहीं है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

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