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आईएलएफएस: कर्ज़ की पोंज़ी योजना बर्बाद, जनता के पैसे से भरपाई
आईएलएफएस ने पीपीपी मॉडल का सरमाया बनकर अपनी 169 सहायक कंपनियों और सहयोगी कंपनियों के माध्यम से 91,000 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लिया। अब यह धन डूब गया है और मोदी सरकार एलआईसी को इसे बचाने के लिए मजबूर कर रही है।
सुबोध वर्मा, पृथ्वीराज रूपावत
30 Sep 2018
Translated by महेश कुमार
ILFS

भारत के सबसे बड़े आधारिक ढांचे क्षेत्र का सबसे बड़ा कंपनी समूह, आईएलएफएस, पिछले कुछ हफ़्तों से डूबने लगा हैI इसकी 1,158 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति हैI इस वजह से कई बैंक भी मुश्किल पद गये हैं, शेयर बाज़ार में तबाही मच गयी है और बाज़ार झटके पर झटके ले रहा हैI राजमार्गों और मेट्रो लाइनों से लेकर पुलों और सुरंगों तक की दर्जनों बुनियादी ढांचे सम्बन्धी परियोजनाएं खतरे में पड़ गयी हैं।

31 मार्च, 2018 को, आईएलएफएस समूह की समेकित बैलेंस शीट ने कुल ऋण 91,093.3 करोड़ रुपये दिखाया है। इसे दिखने से लगता है कि आईएलएफएस आने वाले महीनों में इसे चुकाने में काफी हद तक असमर्थ है। यह पहले ही, सितंबर में यह सिडबी को 1000 करोड़ रुपये, वाणिज्यिक कागजात पर 105 करोड़ रुपये और अंतर-कॉर्पोरेट जमा पर 80 करोड़ रुपये सहित तीन भुगतानों को करने पर चूक गया है। अक्टूबर तक, आईएलएफएस को 3,600 करोड़ रुपये चुकाने हैं। अपने लेनदारों से बचने के लिए, आईएलएफएस और इसकी सहायक कंपनियों में से 40 ने दिवालियापन होने का दावा दायर किया है। कंपनी की वार्षिक आम बैठक से एकदम पहले जो 29 को थी, इस बीच आरबीआई ने इस महीने की 28 तारीख को सभी हितधारकों (आईएलएफएस और लेनदारों) की बैठक बुलाई।

इसके उपर, अनुमानित 169 सहायक कंपनियों/सहयोगी कंपनियों के साथ, जिनकी 22 राज्यों में उपस्थिति है और उनके सरकारों के साथ घनिष्ठ संबंध भी हैं यह विशाल कंपनी डूबने के कगार पर है यह केंद्र और राज्य स्तर पर, अविश्वसनीय सा लगता है। एक ऐसी कंपनी इतनी बुरी तरह गलत अनुमान कैसे लगा गयी जिसे भारत में 'सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) के अग्रणी' के रूप के लिए जाना जाता था?

यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि जीवन बीमा निगम का (एलआईसी) आईएलएफएस में शेयरों का सबसे बड़ा हिस्सा है - 25.34 प्रतिशत - अब केंद्र सरकार उसे इसे संकट से निकालने के लिए कह रही है। एलआईसी के चेयरमैन वी के शर्मा को यह कहते हुए सुना गया था कि "हम सुनिश्चित करेंगे कि आईएल एंड एफएस डूबे नहीं। हम आईएल और एफएस के संक्रमन को फेलने की अनुमति नहीं देंगे...सभी विकल्प खुले हैं (कंपनी में हिस्सेदारी बढ़ाने सहित)।" इसका मतलब है कि एलआईसी के प्रीमियर के रूप में आम भारतीयों द्वारा भुगतान किए गए पैसे को बैंक ऋणों को दूर करने के लिए आईएलएफएस के जादूगरों को सौंप दिया जाएगा।

कर्ज़ उगाहने की ठग योजनाएँ

अपनी वेबसाइट पर, आईएलएफएस ने बड़े शब्दों में कहता है कि उपयुक्त परियोजनाओं की पहचान करने के बाद ही, "हम परियोजना व्यवहार्यता और उसके प्रभाव को बढ़ाने के लिए नवीन संरचनात्मक और वित्तीय तकनीकों का उपयोग करते हैं।" 1987 में इसके गठन के 25 सालों से, इसने वास्तव में इस रणनीति का प्रतिनिधित्व किया है। अब पता यह चला है कि 'अभिनव तकनीक' वास्तव में ऋण की एक पोंजी योजना थी। यहां बताया गया है कि यह कैसे काम करती है।

आईएलएफएस ने खुद को एक समय में कंपनी के रूप में पेश किया, तब जब उदारीकरण और विनियमन की शुरुआत हुई और सरकार आधारिक निर्माण समेत विभिन्न परियोजनाओं को लेने के लिए भागीदारों के रूप में निजी संस्थाओं की तलाश में थी। यह माना जाता है कि आईएलएफएस में सेवानिवृत्त नौकरशाहों की एक आकाशगंगा थी जो सरकार से अनुबंध प्राप्त करने में विभाग में लोबिंग करते थे। इन अनुबंधों का उपयोग तब बैंकों, एनबीएफसी और अन्य संस्थाओं से ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता था।

लेकिन पूंजीवाद के तहत यह सामान्य व्यवसाय है। इसमें नया या 'अभिनव' क्या था कि सहायक भी खुद के बीच उधार दे रहे थे, और फिर- नकदी भंडार दिखाने के आधार पर बाहर से अधिक ऋण ले रहे थे। यह ऋण की एक तरह की पोंजी योजना है।

इसका नतीजा यह था कि कर्ज़ बढ़ रहा था लेकिन आईएलएफएस क्रूज़ मोड में था क्योंकि यह अपने कर्ज़ के बल पर बढ़ रहा था, फिर भी उसे अधिक ऋण मिल रहा था। यह इस शातिर छोटी सी योजना के सहारे शताब्दी के चौथाई हिस्से तक चलता रहा।

अप्रत्याशित कर्ज़

पिछले कुछ सालों में, मामला बिगड़ने लगा। आईएलएफएस ने अपने कर्मचारियों को लिखे एक पत्र में यह दावा कर सभी को यह बताने की कोशिश की कि सरकार द्वारा 16,000 करोड़ रुपये के होल्ड करने से कंपनी में नकदी का संकट हो गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि धीमी अर्थव्यवस्था, मांग में गिरावट, बैंकों का एनपीए बढ़ने के कारण जोखिम को कम करने, खराब और एक अयोग्य इन्फ्रा परियोजनाओं के चलते, सरकार द्वारा इनका अनुपालन न करने से, यह संकट बड़ा बन गया है। यह तो होना ही था कि आईएलएफएस खुद को पीपीपी मॉडल और इसकी 'अभिनव' वित्त पोषण रणनीति के लिए प्रतिबद्ध करे।

वर्तमान में यह स्पष्ट नहीं है कि आईएलएफएस और इसकी सहायक कंपनियों/सहयोगियों के झुंड द्वारा उधार ली गई राशी पर कितना खर्च किया गया था। अन्य एनपीए कहानियां- और भारत इन दिनों उनके साथ बहुत अधिक चर्चा में है - दिखाता है कि आम तौर पर निवेश या लाभ के माध्यम से व्यक्तिगत लाभ के लिए क्रेडिट को हटा दिया जाता है। नीरव मोदी या मेहुल चोकसी, या अपने समय के राजा विजय माल्या, इस तरह के धोखाधड़ी का एक अच्चा नमूना बन चुके हैं।

इस मामले में, क्योंकि आईएलएफएस पीपीपी मॉडल का सरमाया था, इसलिए कहा जा सकता है कि लूट को कंपनी के शीर्षस्थो के साथ ही नहीं बल्कि सरकारी ठेके को सौंपने वालों के साथ भी साझा किया गया होगा। अभी तक इसका कोई सबूत नहीं है, लेकिन जैसे ही मामला खुलेगा, यह भी बाहर आ सकता है।

एलआईसी - अच्छा साथी या बलि का बकरा

हालांकि तत्काल चिंता केंद्र सरकार द्वारा उठाया गया कदम है, जो मुख्य रूप से अपने इस कदम के लिए गोदी मीडिया से समर्थन हासिल कर रहा है। कुछ हफ्ते पहले डूबने वाले बैंक आईडीबीआई के मामले में, गोल्डन गुज़ को बुलाकर और आईएलएफएस को बचाने के लिए एलआईसी को सरकार द्वारा बुलाने को सबसे अधिक सुविधाजनक तरीका के रूप में देखा गया। क्यों? क्योंकि यह सार्वजनिक धन का उपयोग कर आईएलएफएस को बाहर संकट से बाहर निकाल देगा और फिर पूरे लेनदेन को सरकार को अपनी बही से बाहर रखने में कोइ दिक्कत नहीं होगी।

यहां तक कि एलआईसी आईएलएफएस को जमानत देने की पेशकश कर रहा था, आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि आईएलएफएस के पास संपत्ति है, इसकी देखभाल करना उनकी जिम्मेदारी है। कुछ अस्थायी गड़बड़ी हो सकती है, लेकिन यह आईएल एंड एफएस को खुद सुलझाना होगा। इसमें सरकार सीधे तौर पर शामिल नहीं है।"

एलआईसी एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है जो भारत के अग्रणी बीमा प्रदाता के रूप में अपनी प्रतिष्ठित स्थिति के कारण एक विशाल नकदी आरक्षित कंपनी है। हालांकि कानूनों ने इसे कंपनियों, सरकार में एक सीमा से परे निवेश से प्रतिबंधित कर दिया है। एलआईसी के आईडीबीआई के अधिग्रहण के मामले में इसे स्पष्ट तौर पर देखा गया था, ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते है। इस तरह, संकट (बेलआउट) पर खर्च किए गए पैसे को एलआईसी पैसा माना जाता है जो सरकार की किताबों में नहीं आता है। यह भारत के राजकोषीय घाटे में शामिल नहीं होगा, जो मोदी सरकार और पश्चिम में इसके नवउदारवादी सलाहकार दोनों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय है।

यह जुआ क्या करता है कि आम आदमी के पैसे को खतरे में डाल देता है। यदि एलआईसी उन कंपनियों को सहेजता रहेगा जो उनके प्रबंधन की वजह से या दुर्भावना के कारण डूब रहे हैं, तो इसका मतलब है कि इस तरह के धोखाधड़ी को लोगों द्वारा सब्सिडी दी जा रही है। सरकार पूरे मामले से किनारा काट लेती है, आईएलएफएस के जादुगर धीरे-धीरे बारबाडोस या किसी अन्य खूबसूरत द्वीप के किनारे रहना शुरू कर देते हैं, और आम लोग बाजार के अदृश्य हाथों की मार खाते हुए अपने दैनिक काम पर निकल जाते हैं।

आने वाले दिनों में, आईएलएफएस के इन हथकंडों के बारे में अधिक जानकारी उभरने जा रही है क्योंकि पानी में जल्द ही उबाल आएगा। फिर और मसले बाहर आएंगे। इससे जुड़ी अगली खबरों के लिए यहां जुड़े रहे।

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