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हिंदुत्व और नृशंसता की संस्कृति: ऐज़ाज़ अहमद
‘बाबरी मस्जिद गिराने वालों के लिए बाबरी मस्जिद हिंदुओं के ख़िलाफ़ हमलावर मुसलमानों की नृशंसता की संस्कृति का प्रतीक थी। दूसरी ओर,ठीक उसी तरह बाबरी मस्जिद का विध्वंस इसकी उलट भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।'
लेफ़्टवर्ड ब्लॉग
07 Dec 2020
ऐज़ाज़ अहमद

बाबरी मस्जिद गिराने वालों के लिए बाबरी मस्जिद हिंदुओं के ख़िलाफ़ हमलावर मुसलमानों की नृशंसता की संस्कृति का प्रतीक थी। दूसरी ओर,ठीक उसी तरह बाबरी मस्जिद का विध्वंस इसकी उलट भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। नथिंग ह्यूमन टू मी टू के लिए लेफ़्टवर्ड के मुख्य संपादक,विजय प्रसाद (वीपी) द्वारा लिये गये एजाज़ अहमद (एए) के एक साक्षात्कार से निम्नलिखित उद्धरण में एजाज़ अहमद बताते हैं कि यूरोपीय फ़ासीवाद आख़िर हिंदुत्व के उदय को समझने के लिहाज़ से नाकाफ़ी क्यों है, और यह कि इस विचारधारा का मुक़ाबला करने के लिए यह महसूस करना होगा कि यह महज़ एक ऐसा राजनीतिक सिद्धांत भर नहीं है, जिसका समर्थन कट्टरपंथी करते है; दरअसल हिंदुत्व एक ऐसी बीमारी का उत्पाद है,जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।

ग्राम्शी और हिंदुत्व

विजय प्रसाद: 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के बाद आपने अपने विचार की दिशा को बहुत गंभीरता के साथ हिंदुत्व के उत्थान,न सिर्फ़ उत्थान,बल्कि इस ताक़त की सतह पर मौजूदगी के सवाल की तरफ़ मोड़ना शुरू कर दिया है। आप इन घटनाक्रमों को समझने की ख़ातिर ख़ुद के मालूमात से बावस्ता करवाने को लेकर ग्राम्शी को पढ़ रहे हैं। इस सिलसिले में इस दौरान हिंदुत्व,आरएसएस पर आपके कई महत्वपूर्ण व्याख्यान और निबंध आये हैं। फिलहाल उसके विस्तार में जाने का समय तो नहीं है। लेकिन क्या आप इस नए संकट में घिरे हुए तो नहीं पाते हैं।

एजाज़ अहमद: जब मैं पहली बार भारत में रहने के लिए लौटा,तो मुझे बहुत जल्दी पता चल गया था कि भारत को लेकर मेरी जानकारी वास्तव में बहुत उथली है। मुझे कुछ वक़्त सोचने, पढ़ने, अवलोकन करने, यथासंभव देखने-समझने में बिताना पड़ा.…यह बाबरी मस्जिद विध्वंस ही था,जिसने मुझे भारत पर लिखने को लेकर अपने संकोच को छोड़ने पर मजबूर किया था। दिसंबर के आख़िर में अयोध्या में घटी उस घटना के कुछ ही हफ़्तों बाद मैंने कलकत्ता स्थित सेंटर फ़ॉर यूरोपीयन स्टडीज़ में अमल भट्टाचार्जी मेमोरियल लेक्चर दिया था। मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक ही चीज़ थी और वह थी-आरएसएस, लेकिन चूंकि यह सेंटर फ़ॉर यूरोपीयन स्टडीज़ था, इसलिए मैंने महसूस किया कि मैं एक यूरोपीय विचारक और ग्राम्स्की के बारे में बोलने के लिए मजबूर हूं, उन हालत के लिए फ़ासीवाद दौर के महान बौद्धिक ग्राम्शी एकदम सटीक विकल्प लग रहे थे।

इसलिए, उस व्याख्यान का विमर्श 'हिंदुत्व के दिनों में ग्राम्शी का पढ़ना' था। उस विमर्श के साथ दो बड़ी समस्यायें हैं। एक यह है कि यह बहुत अधिक समसामयिक और मिजता-जुलता विमर्श है,यानी कि ग्राम्शी के मुताबिक़ इटली में फ़ासीवाद कैसा था,और हमारे लिए इसकी अनुगूंज भारत में किस तरह सुनायी-दिखायी पड़ती है। ठीक उसी तरह,ख़ुद मुझमें शामिल ग्राम्शी के विचार के साथ मैं सीधे-सीधे अपने हिसाब से उस व्याख्यान में भारत को लेकर नहीं सोच रहा हूं। इसके बजाय, मैं ग्राम्शी के विचार को यहां इस्तेमाल करने को लेकर ग्राम्स्की के उद्धरण ख़ूब देता हूं और उन्हें उद्धृत करता हूं, जो कि इसलिए ठीक नहीं है,क्योंकि उनकी तरह के राजनीतिक बुद्धिजीवी वस्तुत: अपने समय और अपनी जगह की ज़रूरतों के हिसाब से सोचते हैं।

फिर,डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी की तरफ़ से आयोजित संस्कृति, समुदाय और राष्ट्र पर एक कार्यशाला में भाग लेने के लिए मुझे एक साल बाद हैदराबाद आमंत्रित किया गया था। यह आयोजन अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की पहली वर्षगांठ के मौक़े पर आयोजित था। यह दूसरा व्याख्यान- अयोध्या के ध्वंसावशेष पर- बहुत ही लंबा था; इस व्याख्यान को देने में डेढ़ घंटे का समय लगा। कोई शक नहीं कि तब से अपनी बातों में मैंने काफ़ी हद तक बदलाव किया है  और उन्हें परिष्कृत भी किया है, लेकिन मुझे अभी भी लगता है कि भारत में फ़ासीवाद के सवाल पर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर मेरे विचार का मूल आधार उसी विमर्श में था।

इस तरह,वे दो मूल निबंध हैं। फिर,दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित डिपार्टमेंट ऑफ़ जर्मनिक एंड रोमांस स्टडीज की पत्रिका जर्मिनल के लिए मैंने दो साल बाद एक निबंध लिखा, जो इतालवी फ़ासीवाद पर है। यह इतालवी फ़ासीवाद के मेरे व्यापक अध्ययन का नतीजा था और जिस तरह से इसका विस्तार देश के विभिन्न हिस्सों,और ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में बढ़ गया,यह उसके बारे में है। पहले के ग्राम्सी निबंध,जो भारतीय हालात के साथ विकृत समानताओं से सम्बद्ध है, उसके ठीक उलट यह निबंध एक इतालवी फ़ासीवाद और उसका बड़े पैमाने पर अमल में लाये जाने को फिर से जोड़ता है।

तब से मैंने हमेशा ज़ोर देकर कहा है कि व्यवहार में हर फ़ासीवाद ख़ास तौर पर राष्ट्रीय रूप ले लेता है और उनके काम करने के ढंग में पर्याप्त समानतायें होती हैं,लेकिन वांछित प्रभाव के उलट होता है। इसलिए,एक वैचारिक स्तर पर मैं इन बातों के बीच फ़र्क़ करने की कोशिश करता रहा हूं कि आख़िर आरएसएस को लेकर ख़ास तौर पर कौन सी चीज़ें फासीवादी हैं और इसके विपरीत,इसके कौन से वे अमल हैं,जो भारतीय राजनीति को लेकर इसके बोध में निहित है और इस बहुत ठोस स्थिति में यह किस तरह दक्षिणपंथी क्रांति कर सकती है।

बहुत सारी चीज़ों मे से एक चीज,जिसे लेकर मैं अभी भी भारत के संदर्भ में नहीं सोच पा रहा हूं,वह है-यहां की कृषि जगत में इस फ़ासीवाद की गहरी भूमिका, जो कि इटली में बहुत अहम थी। बाद में जाकर मुझे पता चला कि जर्मनी और स्पेन,या फिर आम तौर पर जहां कहीं भी फ़ासीवाद बढ़ता गया था,वहां-वहां कृषि से जुड़ा सवाल कितना अहम था। भारत में इन चीज़ों के बारे में सैद्धांतिक रूप से सोच पाना मुश्किल है,क्योंकि यहां अनुभव से पैदा होने वाला इस सोच का आधार अच्छी तरह से विकसित नहीं है।

हम वास्तव में व्यावहारिक तौर पर इस बारे में बहुत ज़्यादा नहीं जानते कि देश के बड़े हिस्सों में भाजपा की चुनावी शक्ति के विस्तार में मझोले और समृद्ध किसानों की क्या भूमिका है, इस मुद्दे को लेकर भी हम बात करने की हालत में नहीं हैं दुनिया का हिंदुत्व के नज़रिये के सिलसिले में कहीं ज़्यादा आम सहमति वाला कौन सा बिंदु है। यूपी के किसान आदित्यनाथ और उनके जैसे दूसरे उन लोगों को किस तरह देखते हैं,जो उस सूबे में भाजपा की अगुवाई करते हैं? किसी विश्वसनीय निष्कर्ष तक पहुंचने को लेकर मेरे पास पर्याप्त अनुभवजन्य तथ्य नहीं हैं।

[…]

मैंने मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में इसी तरह के बदलावों के तक़रीबन बीस साल बाद भारत में सांप्रदायिकता और राजनीतिक धार्मिकता के बारे में लिखना शुरू कर दिया था। दरअस्ल,जिन-जिन देशों में जैसे-जैसे एक के बाद एक वामपंथ या धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद ख़त्म होता गया, वहां-वहां शून्य पैदा होता गया और इसी शून्य को भरने के लिए इस्लामवाद पैदा हुआ। इस्लामिक संगठन इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों के रक्तपात में सुहार्तो की सेना के प्रमुख सहयोगी थे। इस बात को भुला दिया जाता है कि उस दौर में हिजबुल्लाह और अमल का शिया किसान के बीच और दक्षिणी लेबनान में कभी लेबनानी कम्युनिस्ट पार्टी का सामाजिक आधार होते थे। जिसे मैं ‘मरू इस्लाम’ कहता हूं, उस वहाबवाद के साथ सऊदी अरब का बढ़ता वर्चस्व सीधे-सीधे नासिर और अरब धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की पराजय के जुड़ा हुआ था।

इसी तरह की चीज़ 1948 में ईरान में भी हुई,जब तेहरान स्थित ब्रिटिश काउंसेल ने विदेशी कार्यालय को एक गुप्त ज्ञापन लिखा था,जिसमें उसने कहा था कि ईरान के साम्यवादियों की पार्टी तुदे को किसी क्रांति की ज़रूरत नहीं है और वह महज़ चुनाव के ज़रिये ही सत्ता हासिल कर लेगी। यह 1948 की बात है। 1953 में सीआईए ने राष्ट्रवादियों को उखाड़ फेंका और उस एसएवीएके को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया,जो ख़ौफ़नाक़ ईरानी ख़ुफ़िया सेवा है,जिसने कम्युनिस्टों का क़त्लेआम किया, उस क़त्लेआम में वही लोग बचे रहे,जो किसी तरह निर्वासन में जाने में कामयाब रहे और भूमिगत होने में कामयाब हुए।

ऐसे में सवाल उठता है कि इससे जो शून्य पैदा हुआ,उसे भरने के लिए आख़िरकार कौन आया? वही इस्लामवादी आये। जैसे ही अमेरिकियों ने धर्मनिरपेक्ष बाथ पार्टी की सरकार को तबाह कर दिया,इस्लामवादियों और नस्लों-राष्ट्रवादियों का एक पूरा का पूरा बर्बर समूह इराक़ में हावी हो गया और एक बड़ी ताक़त के तौर पर उभर आया। राष्ट्रवाद का सवाल एक ऐसा जंग-ए-मैदान बन गया था,जिस पर धर्मनिरपेक्ष वामपंथ और धार्मिक दक्षिणपंथियों के बीच लड़ाई लड़ी गयी। धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद को पराजित करने के बाद सबसे ज़्यादा प्रतिगामी तरह का अखिल-इस्लामवादी सामने आया।

हाल के स्वतंत्र समाजों और साम्राज्यवाद के युग में राष्ट्रवाद एक उद्देश्यपूर्ण ज़रूरत बन गया है। इसके पूंजीवाद में संक्रमण के लिए यह भी एक उद्देश्यपूर्ण ज़रूरत है, क्योंकि यह संक्रमण एक बहुत ही दर्दनाक प्रक्रिया है और उस प्रक्रिया के दबाव में समाज के विघटन को रोकने के लिए एक राष्ट्रीय जुड़ाव के अहसास का होना ज़रूरी है। अगर धर्मनिरपेक्ष वामपंथी उस स्थान को कब्ज़ाने में नाकाम रहे, तो उस पर धार्मिक दक्षिणपंथियों का कब्ज़ा हो जायेगा।

विजय प्रसाद: दूसरा बिंदु,जिसे आप बेहद बेचैनी के साथ यहां उठाते हैं,वह नृशंसता की संस्कृति को लेकर है। आप कहते हैं कि संघ के राजनीतिक विमर्श में एक ऐसी संस्कृति की पहचान है, जो धार्मिकता के अधिनायकवादी रूपों के साथ बनती है और नये तरीक़े का निर्माण करने में मिली हर नाकामी लोगों के उन बड़े समूहों को पर्याप्त रूप से नवीनता का जोखिम उठाने देती है,जो हमेशा उन लोगों में से एक बड़े समूह को उस परिधि में आगे बढ़ने को लेकर प्रोत्साहित करते हैं,जो उन्हें जाने-पहचाने से दिखते हैं; रूढ़िवाद का जन्म न सिर्फ़ विशेषाधिकार और उस विशेषाधिकार की रक्षा करने की इच्छा से पैदा हुआ है, बल्कि यह रूढ़िवाद,और शायद निश्चित रूप से दर्द के अहसास और आने वाले दिनों की परेशानियों के डर से भी पैदा होता है।'

एजाज़ अहमद: फ़ासीवाद का जनाधार बहुत कुछ विशेषाधिकार के साथ नहीं,बल्कि वर्ग और जातिगत पीड़ा से जुड़ा हुआ है। अगर आप विध्वंस होते बाबरी मस्जिद की तस्वीरों पर नज़र डालें,तो आप उन लोगों के बारे में पूछेंगे,जो गुंबदों पर चढ़े हुए हैं, आप जानना चाहेंगे कि ये लोग कौन हैं? वे लोग किस वर्ग से सम्बन्धित हैं?’ वे उच्च वर्गों या उच्च जातियों से नहीं आते हैं; ये वे लोग हैं,जो पूंजीवाद और जातिगत समाज के हद दर्जे तक शिकार हैं। इस तरह की घिनौनी हिंसा उन्हें ऐसी ताक़त को महसूस करती है,जो अपनी ही शक्तिहीनता पर विजय पाने का भ्रम का अहसास दिलाती है। उनके पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचा है,जिसमें उन्हें गरिमा का कोई अहसास हो, इसलिए यह उनके लिए गरिमा की झूठी कल्पना है। इस पर मेरी सोच लुंपेन-प्रोलिटेरियट (समाज के असंगठित और ग़ैर-राजनीतिक निचला क्रम,जो क्रांतिकारी उत्कर्ष में रुचि नहीं रखते) की भूमिका के बारे में सोचने से आती है, दो सौ सालों में क्रांतिकारी आंदोलनों के ख़िलाफ़ उनकी भूमिका से आती है।

सवाल है कि यह कैसे होता है कि लुम्पेन-प्रोलिटेरियट वर्ग, जो सर्वहारा वर्ग से भी ज़्यादा ग़रीब है, वह तमाम क्रांतिकारी कार्यों के ख़िलाफ़ होने वाले कार्यों का चारा बन जाता है? आख़िर यह  कैसे मुमकिन होता है कि आदिवासी गुजरात दंगे में ख़ास तौर पर अपनी भागीदारी करते हैं या फिर 1984 में हुए सिखों के क़त्लेआम में दलित ख़ास तौर पर भाग लेते हैं? उस वाक्यांश में वह सब कुछ है, जिसका आपने ऊपर ज़िक़्र किया है। संघ इस सब का आह्वान हिंदुत्व के नाम पर कर सकता है,जातिविहीन लोगों को हिंदू कहे जाने की गरिमा दी जा रही है। यह महात्मा गांधी के उस विचित्र विचार का एक बहुत ही हिंसक संस्करण है, जिसमें 'दलित' की जगह 'हरिजन' शब्द इस्तेमाल करते हुए अछूत की गरिमा को बढ़ाने का भ्रम पैदा किया गया था।

[…]

वामपंथी इन्हीं गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ आगे बढ़ता है;ये गड़बड़ियां हमेशा वामपंथ के ख़िलाफ़ होती हैं.…लाखों की संख्या और भारतीय संदर्भ में तो करोड़ों की तादाद में लोगों को लामबंद करना सही मायने में एक अविश्वसनीय उपलब्धि है। यह वास्तव में काफी गंभीर बात है कि ब्राह्मणवाद जाति व्यवस्था की तमाम चुनौतियों के साथ सहस्राब्दियों से बना हुआ है। साम्यवाद उस बहुत ही ठोस,बहुत ही ऐतिहासिक रूप से धरातल के भीतर गहरे तक जमी ताक़त के विरोध में काम करता है।

[…]

विजय प्रसाद: 1990 के दशक में अपने कई निबंधों में आपने 'नृशंसता की संस्कृति' वाक्यांश का इस्तेमाल किया था। क्या आप उस पर थोड़ी रौशनी डालेंगे ?

एजाज़ अहमद: मैंने असल में ‘कल्चर ऑफ़ क्रुएल्टी’ यानी नृशंसता की संस्कृति शीर्षक से एक पूरा आलेख प्रकाशित किया है। महज़ शुद्ध रूप से लिंगगत हिंसा के कारण अपने ही परिवार के सदस्यों द्वारा भारत में हर साल हज़ारों महिलाओं की हत्या हो जाती है; हजारों महिलाओं को इसलिए पीटा जाता है या उनके चेहरे को बिगाड़ दिया जाता है कि उनके परिवार वाले पर्याप्त रूप से दहेज न नहीं देते  या वे महिलायें पतियों या ससुराल वालों की बात नहीं मानतीं,या फिर इसके पीछे इसी तरह के दूसरे कारण होते हैं। हर साल महज़ वर्गगत और जातिगत नफ़रत की वजह से हजारों दलित मारे जाते हैं, बेशुमार दलित महिलाओं का बलात्कार होता है। इस तरह की दुनिया में सांप्रदायिक मक़सद की वजह से हत्या या बलात्कार करना आसान होता है।

मेरा मानना है कि सांप्रदायिक हिंसा,ख़ास तौर पर मुस्लिम-विरोधी हिंसा दैनिक क्रूरताओं के बहुत व्यापक संजाल का महज़ एक पहलू है। स्वतंत्र भारत में मुसलमानों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा दलित मारे गये हैं। कहीं बड़ी संख्या में ग़ैर-मुस्लिम महिलाओं की हत्या या बलात्कार हुआ है। सभी तरह की क्रूरतायें अपनायी जाती रही हैं। मेरा मानना है कि नेहरू तब बिल्कुल सही थे,जब उन्होंने कहा था कि हिंदू सांप्रदायिकता को विशेष ताक़त के साथ विरोध करने की ज़रूरत है, क्योंकि यह भारत में एकमात्र संगठित प्रवृत्ति है,जो संभवतः फ़ासीवाद में बदल सकती है। हालांकि, मुझे लगता है कि आरएसएस को लेकर हम जिस तरह की बातें हमेशा करते हैं, उसमें कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ है, हम ऐसे बातें करते हैं कि मानों बाक़ी समाज बहुत ही सभ्य,उदारवादी,बहुत आधुनिक रहा हो,और जैसे कि बस यही छोटा सा हिस्सा है,जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ भयानक क्रूरता का भाव लिये चल रहा हो।

आइए,हम मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाली इस क्रूरता को अलग-अलग स्वरूप में देखें। आरएसएस हिंदू-मुस्लिम सवाल के इर्द-गिर्द उन्माद पैदा करके उदार हिंदुओं की समझ-बूझ पर भी अपना कब्ज़ा करना चाहता है। सवाल है कि मुसलमानों के बचाव में फिर कौन लोग सामने आते हैं ? ये लोग हिंदू मूल के वामपंथी और उदारवादी लोग हैं। वामपंथियों और हिंदू मूल के उदारवादियों की एकजुटता के बिना आरएसएस को बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों को मारना और समाज के बाक़ी लोगों को दूसरे दर्जे के नागरिकों के रूप में उन्हें हाशिये पर पहुंचा देना बहुत आसान होगा। आरएसएस मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक सामूहिक उन्माद पैदा करना चाहता है ताकि वे उन हिंदू वामपंथियों और उदारवादियों को देश विरोधी और यहां तक कि हिंदू विरोधी के तौर पर दिखा सकें,जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के समान अधिकारों की हिफ़ाज़ करते हैं।

अपने पूरे स्वरूप में यहूदीवाद ही आरएसएस का असली मॉडल है, ठीक उसी तरह,जिस  तरह नाज़ीवाद,फ़िलिस्तीनियों को ठिकाने लगाने के लिए इजरायल में यहूदूवादी चरमपंथियों का असली मॉडल है। इसी तरह, इसका एक और पक्ष यह भी है,जिसकी अनदेखी कभी नहीं की जानी चाहिए कि लोगों के सूंपूर्ण ध्यान को सांप्रदायिक सवाल पर लाकर यह दलितों के ख़िलाफ़,महिलाओं के ख़िलाफ़ और इसी तरह की हिंसा के दूसरे सवालों को भी दबा देता है।

हालांकि वे तमाम दूसरी क्रूरतायें वास्तव में हमारे समाज की वह संरचनात्मक विशिष्टता हैं,जिन्हें आप एक ख़ास तरह के प्रतिगामी,फ़ासीवादी राजनीति के साथ भी नहीं जोड़ सकते हैं,क्योंकि यह बहुत कुछ वैसा है,जैसा कि हमारा समाज है। जातिगत हिंसा आंशिक रूप से वर्गगत हिंसा है,लेकिन यह आंशिक रूप से जातिगत हिंसा ही है। यह नृशंसता आदिवासियों के साथ भी है। यही 'नृशंसता की संस्कृति' वाले वाक्यांश का मूल है।

[…]

भारतीय मालदार वर्गों और उच्च जातियों को दलित महिला के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार करना बहुत आसान लगता है। उनके लिए इस बात से क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वे जिस महिला का बलात्कार कर रहे हैं वह दलित है या मुसलमान ? यह उसी विस्तार का हिस्सा है। इसकी जवाबी राजनीति महज़ सांप्रदायिकता विरोधी नहीं हो सकती,बल्कि इसके ख़िलाफ़ सांप्रदायिक,जातिगत और लिंगगत पीड़ितों का एक लामबंद संघर्ष ही काम करेगा; यह संघर्ष उस पूरी राष्ट्र व्यापी हालात के ख़िलाफ़ हो सकता है,जिसे मैंने 'नृशंसता की संस्कृति' कहा है।

मूल रूप से https://mayday.leftword.com में प्रकाशित

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

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