NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
आंदोलन
घटना-दुर्घटना
भारत
राजनीति
ऐसे कैसे अच्छे दिन? महिलाओं,दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते जा रहे हैं अपराध
बहुत देरी से सामने आई 2017 की NCRB रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के तीन चौथाई आरोपियों को कोर्ट छोड़ देता है।
सुबोध वर्मा
23 Oct 2019
ncrb

एक अस्पष्ट देरी के बाद 2017 में हुए अपराधों पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने अपनी रिपोर्ट जारी कर दी है। हैरान करने वाले नतीजे बताते हैं कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने से ठीक पहले मतलब 2013 से 2017 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध में 16 प्रतिशत की बढ़त आई है।भारतीय समाज के दो सबसे शोषित तबकों, दलित (एससी) और आदिवासी (एसटी) वर्ग के खिलाफ होने वाले अपराधों में भी 2013 के बाद क्रमश: 10 और 5 प्रतिशत की बढ़त आई है।

महिलाओं के खिलाफ हर डेढ़ मिनट में एक अपराध

2017 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से संबंधित 3.59 लाख मामले दर्ज हुए थे। इसका मतलब है कि हर डेढ़ मिनट में महिलाओं के खिलाफ अपराध होते रहे। 2013 में इस तरह के अपराधों की संख्या 3.09 लाख थी। 

इस बेहद खराब स्थिति के लिए सत्ताधारी पार्टी और उसके मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पिछड़ा हुआ सामाजिक नजरिया मुख्य वज़ह दिखाई पड़ता है। यह दोनों संगठन महिलाओं को बच्चा पैदा करने और चारदीवारी में परिवार की देखभाल के लिए ही सबसे उपयोगी मानते हैं।
 
ऐसी कई घटनाएं हैं, जब संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने स्कूल और कॉलेज में महिलाओं के लिए रुढ़ीवादी ड्रेस कोड की मांग की है। एक बीजेपी सांसद ने तो हिंदू महिलाओं को ज्यादा बच्चे तक पैदा करने की सलाह दी थी। इन मध्ययुगीन मूल्यों, जिनमें दूसरे समुदायों के लिए कट्टरता और नफरत भरी पड़ी है, उनसे महिला सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक हो गई है। 

इस सोच का प्रभाव तो कुछ कोर्ट पर भी दिखाई पड़ता है। जैसे सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने 2017 में IPC की धारा 498A को कमजोर कर दिया। यह धारा महिलाओं से उनके पति और रिश्तेदारों द्वारा दहेज की मांग के लिए होने वाली बर्बरता से संबंधित है। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसमें एक नई विवाहित को सिर्फ दहेज के लिए जलाकर मारा जाता है या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया जाता है। NCRB डेटा के मुताब़िक इस तरह की बर्बरताओं में 2017 में 7,838 महिलाओं को मारा गया है।

रिपोर्ट से एक और चिंता की बात सामने आती है कि दोषसिद्धी दर में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। 

2013 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में दोषसिद्धी दर 21.3 प्रतिशत थी। 2017 में ये 24.6 प्रतिशत पहुंच गई। साफ है कि महिला सुरक्षा और दोषियों को तेजी से सजा की तमाम बातों के बीच भी चार में से सिर्फ एक को ही कोर्ट सजा सुना पाता है। बेहतर पुलिसिंग के अलावा इस चीज को भी सरकार सुधार सकती थी। कम दोषसिद्धी दर से सजा का डर नहीं बनता और अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। 

दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार

एक और जो परेशान करने वाली बात NCRB के डेटा से सामने आती है, वो है दलित और आदिवासियों के खिलाफ मोदी राज में बढ़ते अत्याचार। 2017 में देश भर में अलग-अलग कानूनों के तहत दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों के 43,203 मामले दर्ज किए गए।  यह मोदी सरकार के आने से पहले, मतलब 2013 के आंकड़ों से सीधे 10 फीसदी ज्यादा है। इसी तरह आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों से संबंधित मामले 2017 में बढ़कर 7,125 हो गए। 2013 में इनकी संख्या 6,793 थी। 

Capture_8.JPG

ऊपर चार्ट में देखा जा सकता है कि 2014 में दलित और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में एकदम से तेजी आई। इसका कारण सिर्फ उस साल लोकसभा चुनाव के लिए हुए गर्मागर्म अभियान और उसके बाद संघ/बीजेपी की जीत ही हो सकती है।

इस चुनावी अभियान में वंचित तबके जैसे दलित और आदिवासियों के खिलाफ जबरदस्ती के कदम उठाए गए थे। बीजेपी की जीत के बाद इसके सवर्ण समर्थकों में जबरदस्त रोमांच था। यह समर्थक खुद की दलित और आदिवासी विरोधी भावनाओं पर अंकुश लगाने के चलते लंबे समय से प्रशासन से नाराज थे। 

फिर बीजेपी एससी-एसटी एक्ट, जो दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर कड़ा अंकुश लगाने का काम करता है, उसे कमजोर किए जाने के पक्ष में भी नजर आई। जब सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कानून को कमजोर किया तो बड़े पैमाने पर प्रगतिशील तबकों ने देश भर में विरोध प्रदर्शन किया।बीजेपी सरकार कोर्ट की सुनवाईयों में एक्ट को बचाने में नाकामयाब रही और फैसले के खिलाफ अपील करने से भी घबराती रही। जब मामला हद से ज्यादा बढ़ गया, तब सरकार ने अध्यादेश के जरिए एक्ट को बचाया। यह सब 2017 में चल रहा था। बहुत संभावना है कि उस वक्त इस एक्ट के तहत मामले दर्ज होना आसान नहीं रहा होगा। संभावना है कि NCRB के आंकड़ें कमतर रहे होंगे।

दरअसल इन सभी डेटा में अपराधों का अंदाजा कम लग पाता होगा. क्योंकि पितृसत्तात्मक और सवर्णवादी विचारधारा कानून व्यवस्था में कुछ इस तरह घर कर गई है कि बहुत सारे मामले तो दर्ज ही नहीं होते। वहीं कई मामलों पर जबरदस्ती समझौता करा दिया जाता है। इन सब के बाद NCRB का डेटा सामने आता है। 

NCRB
crime against women
crime against sc
crime against st
Modi government

Related Stories

यूपी : ‘न्यूनतम अपराध’ का दावा और आए दिन मासूमों साथ होती दरिंदगी!

शर्मनाक: दिल्ली में दोहराया गया हाथरस, सन्नाटा क्यों?

यूपी: कानपुर में नाबालिग की मिली अधजली लाश, ‘रामराज्य’ के दावे पर फिर उठे सवाल!

मध्यप्रदेश: महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध का लगातार बढ़ता ग्राफ़, बीस दिन में बलात्कार की पांच घटनाएं!

यूपी: बेहतर कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर उठते सवाल!, दलित-नाबालिग बहनों का शव तालाब में मिला

हाथरस, कठुआ, खैरलांजी, कुनन पोशपोरा और...

दिल्ली: महिला मज़दूर से सामूहिक दुष्कर्म, चार आरोपी गिरफ्तार

दिल्ली को बचा लो!

आप दुखी न हों, आप तो यही चाहते थे सरकार!

शांति अपील : जनता से, जनता के लिए, जनता द्वारा


बाकी खबरें

  • इज़रायल की सर्वोच्च अदालत ने सरकार को पिछले साल इज़रायली सैनिकों द्वारा मारे गए फ़िलिस्तीनियों के शवों को अपने पास रखने की अनुमति दी
    पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल की सर्वोच्च अदालत ने सरकार को पिछले साल इज़रायली सैनिकों द्वारा मारे गए फ़िलिस्तीनियों के शवों को अपने पास रखने की अनुमति दी
    20 Aug 2021
    अहमद एरेकत के शरीर को ज़ब्त कर लिया गया है और इज़रायली अधिकारियों द्वारा उनके परिवार से एक साल से अधिक समय से दूर रखा जा रहा है, जिससे उनका परिवार उनका अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहा है।
  • अफ़ग़ानिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर गोलाबारी में कई प्रदर्शनकारियों की मौत
    पीपल्स डिस्पैच
    अफ़ग़ानिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर गोलाबारी में कई प्रदर्शनकारियों की मौत
    20 Aug 2021
    अफ़ग़ानिस्तान में भुखमरी के ख़तरे की ख़बरों के बीच आईएमएफ़ ने सरकार पर स्पष्टता न होने की वजह देश की संसाधनों तक पहुंच को भी रोक दिया है।
  • प्रगतिशीलों ने डेनमार्क सरकार से मानवीय हस्तक्षेप कर नर्स हड़ताल को ख़त्म करने की मांग की
    पीपल्स डिस्पैच
    प्रगतिशीलों ने डेनमार्क सरकार से मानवीय हस्तक्षेप कर नर्स हड़ताल को ख़त्म करने की मांग की
    20 Aug 2021
    वेतन बढ़ाने और वेतन की ग़ैर-बराबरी को ख़त्म करने की मांग के साथ चल रही नर्स की हड़ताल 62 दिन से जारी है, यह डेनमार्क की नर्सों की सबसे बड़ी हड़ताल बन गई है।
  • वीडियो: शोधकर्ताओं ने दर्शाया चूहों में कोविड-19 का संक्रमण और उससे लड़ती एंटीबाडीज़
    संदीपन तालुकदार
    वीडियो: शोधकर्ताओं ने दर्शाया चूहों में कोविड-19 का संक्रमण और उससे लड़ती एंटीबाडीज़
    20 Aug 2021
    चित्र में वायरस के प्रसार को दर्ज किया गया है, जिसके चलते चूहे के श्वसन मार्ग को क्षति पहुंची है। यह इस तथ्य को भी दर्ज करने में सफल रहा है कि कैसे एंटीबाडीज वायरस के प्रसार पर रोक लगाने में कारगर…
  • क्यों अफ़ग़ानिस्तान संकट शरणार्थी क़ानून की ज़रूरत को रेखांकित करता है
    जय मनोज संकलेचा
    क्यों अफ़ग़ानिस्तान संकट शरणार्थी क़ानून की ज़रूरत को रेखांकित करता है
    20 Aug 2021
    शरणार्थियों को भारत में शरण देने के मामले में क़ानून की कमी खल रही है और पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक संकट के कारण भाग रहे शरणार्थियों को समर्थन देना भारत की नैतिक अनिवार्यता बन गई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License