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ऐसे कैसे अच्छे दिन? महिलाओं,दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते जा रहे हैं अपराध
बहुत देरी से सामने आई 2017 की NCRB रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के तीन चौथाई आरोपियों को कोर्ट छोड़ देता है।
सुबोध वर्मा
23 Oct 2019
ncrb

एक अस्पष्ट देरी के बाद 2017 में हुए अपराधों पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने अपनी रिपोर्ट जारी कर दी है। हैरान करने वाले नतीजे बताते हैं कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने से ठीक पहले मतलब 2013 से 2017 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध में 16 प्रतिशत की बढ़त आई है।भारतीय समाज के दो सबसे शोषित तबकों, दलित (एससी) और आदिवासी (एसटी) वर्ग के खिलाफ होने वाले अपराधों में भी 2013 के बाद क्रमश: 10 और 5 प्रतिशत की बढ़त आई है।

महिलाओं के खिलाफ हर डेढ़ मिनट में एक अपराध

2017 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से संबंधित 3.59 लाख मामले दर्ज हुए थे। इसका मतलब है कि हर डेढ़ मिनट में महिलाओं के खिलाफ अपराध होते रहे। 2013 में इस तरह के अपराधों की संख्या 3.09 लाख थी। 

इस बेहद खराब स्थिति के लिए सत्ताधारी पार्टी और उसके मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पिछड़ा हुआ सामाजिक नजरिया मुख्य वज़ह दिखाई पड़ता है। यह दोनों संगठन महिलाओं को बच्चा पैदा करने और चारदीवारी में परिवार की देखभाल के लिए ही सबसे उपयोगी मानते हैं।
 
ऐसी कई घटनाएं हैं, जब संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने स्कूल और कॉलेज में महिलाओं के लिए रुढ़ीवादी ड्रेस कोड की मांग की है। एक बीजेपी सांसद ने तो हिंदू महिलाओं को ज्यादा बच्चे तक पैदा करने की सलाह दी थी। इन मध्ययुगीन मूल्यों, जिनमें दूसरे समुदायों के लिए कट्टरता और नफरत भरी पड़ी है, उनसे महिला सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक हो गई है। 

इस सोच का प्रभाव तो कुछ कोर्ट पर भी दिखाई पड़ता है। जैसे सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने 2017 में IPC की धारा 498A को कमजोर कर दिया। यह धारा महिलाओं से उनके पति और रिश्तेदारों द्वारा दहेज की मांग के लिए होने वाली बर्बरता से संबंधित है। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसमें एक नई विवाहित को सिर्फ दहेज के लिए जलाकर मारा जाता है या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया जाता है। NCRB डेटा के मुताब़िक इस तरह की बर्बरताओं में 2017 में 7,838 महिलाओं को मारा गया है।

रिपोर्ट से एक और चिंता की बात सामने आती है कि दोषसिद्धी दर में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। 

2013 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में दोषसिद्धी दर 21.3 प्रतिशत थी। 2017 में ये 24.6 प्रतिशत पहुंच गई। साफ है कि महिला सुरक्षा और दोषियों को तेजी से सजा की तमाम बातों के बीच भी चार में से सिर्फ एक को ही कोर्ट सजा सुना पाता है। बेहतर पुलिसिंग के अलावा इस चीज को भी सरकार सुधार सकती थी। कम दोषसिद्धी दर से सजा का डर नहीं बनता और अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। 

दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार

एक और जो परेशान करने वाली बात NCRB के डेटा से सामने आती है, वो है दलित और आदिवासियों के खिलाफ मोदी राज में बढ़ते अत्याचार। 2017 में देश भर में अलग-अलग कानूनों के तहत दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों के 43,203 मामले दर्ज किए गए।  यह मोदी सरकार के आने से पहले, मतलब 2013 के आंकड़ों से सीधे 10 फीसदी ज्यादा है। इसी तरह आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों से संबंधित मामले 2017 में बढ़कर 7,125 हो गए। 2013 में इनकी संख्या 6,793 थी। 

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ऊपर चार्ट में देखा जा सकता है कि 2014 में दलित और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में एकदम से तेजी आई। इसका कारण सिर्फ उस साल लोकसभा चुनाव के लिए हुए गर्मागर्म अभियान और उसके बाद संघ/बीजेपी की जीत ही हो सकती है।

इस चुनावी अभियान में वंचित तबके जैसे दलित और आदिवासियों के खिलाफ जबरदस्ती के कदम उठाए गए थे। बीजेपी की जीत के बाद इसके सवर्ण समर्थकों में जबरदस्त रोमांच था। यह समर्थक खुद की दलित और आदिवासी विरोधी भावनाओं पर अंकुश लगाने के चलते लंबे समय से प्रशासन से नाराज थे। 

फिर बीजेपी एससी-एसटी एक्ट, जो दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर कड़ा अंकुश लगाने का काम करता है, उसे कमजोर किए जाने के पक्ष में भी नजर आई। जब सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कानून को कमजोर किया तो बड़े पैमाने पर प्रगतिशील तबकों ने देश भर में विरोध प्रदर्शन किया।बीजेपी सरकार कोर्ट की सुनवाईयों में एक्ट को बचाने में नाकामयाब रही और फैसले के खिलाफ अपील करने से भी घबराती रही। जब मामला हद से ज्यादा बढ़ गया, तब सरकार ने अध्यादेश के जरिए एक्ट को बचाया। यह सब 2017 में चल रहा था। बहुत संभावना है कि उस वक्त इस एक्ट के तहत मामले दर्ज होना आसान नहीं रहा होगा। संभावना है कि NCRB के आंकड़ें कमतर रहे होंगे।

दरअसल इन सभी डेटा में अपराधों का अंदाजा कम लग पाता होगा. क्योंकि पितृसत्तात्मक और सवर्णवादी विचारधारा कानून व्यवस्था में कुछ इस तरह घर कर गई है कि बहुत सारे मामले तो दर्ज ही नहीं होते। वहीं कई मामलों पर जबरदस्ती समझौता करा दिया जाता है। इन सब के बाद NCRB का डेटा सामने आता है। 

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