NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
पुस्तकें
कला
भारत
आज़ादी हमारा पैदाइशी हक़ है : कृष्णा सोबती
“ लेखकों के विरोध को ‘गैंग’ कहने वालों का अग्रणी कौन है और यह भाषा किसकी है?” आइए सुनते हैं कृष्णा सोबती की बेबाक बयानी। इसे इंडियन कल्चरल फोरम (आईसीएफ) से साभार लिया गया है।
सौजन्य: इंडियन कल्चरल फोरम
25 Jan 2019
Krishna Sobti

लगातार तर्कशील एवं प्रगतिशील ताकतों पर हो रहे हमलों के विरोध में 1 नवम्बर, 2015 को दिल्ली के मावलंकर सभागार में आयोजित ‘प्रतिरोध’ नामक सभा में लेखक कृष्णा सोबती ने अपनी बात रखी थी। सोबती ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान हुए संघर्षों को याद करते हुए वर्तमान समय में मौजूदा हालात के खिलाफ मुखर प्रतिरोध का आह्वान किया। इसी मंच से उन्होंने प्रधानमंत्री से यह सवाल भी किया कि, “ लेखकों के विरोध को ‘गैंग’ कहने वालों का अग्रणी कौन है और यह भाषा किसकी है?” वास्तविक इतिहास को पौराणिक एवं पौराणिकता को इतिहास बनाने के प्रयासों पर भी सवाल उठाते हुए सोबती ने हिन्दुस्तान के विविधता में एकता के नारे को भी बुलंद किया। संविधान पर हो रहे हमलों के खिलाफ मुखर विरोध और हिंसा की राजनीति को नकारने का आह्वान करते हुए उन्होंने अपनी बात समाप्त की।

आइए सुनते हैं कृष्णा सोबती की बेबाक बयानी। इसे इंडियन कल्चरल फोरम (आईसीएफ) से साभार लिया गया है।  इंडियन कल्चरल फोरम ने इसे 15 नवंबर, 2015 को प्रकाशित-प्रसारित किया था।

“दोस्तो, पेशे खिदमत है इस पुरानी जन्मतारीख का नमस्कार, आदाब, सलाम, जय रामजी की और सत श्रीअकाल। ऊपर वाले ने इतनी लम्बी उम्र दी कि ज़िन्दगी में अपने इस महान देश के इतिहास को जिया है, उसे देखा है और उसके टुकड़ों को अपने अन्दर समोया है अंग्रेजी हुकूमत, आज़ादी की लड़ाई, अपना सिर ऊँचा करने वाले इन्क़लाबी क्रांतिकारी आज़ाद हिन्द के लोगों को लाहौर के गोल बाग में देखा है और उन्हें सुना है। असहयोग आन्दोलन-फिर विभाजन और फिर आज़ादी।

आज़ादी हमारा पैदाइशी हक़ है। ये नारा हम सुन रहे थे और अपने अन्दर उसे जला रहे थे।

दोस्तों यह किसी फिल्म की कहानी नहीं एक विचारधारा की हकीक़त है, जिस संकीर्ण राजनीति ने अटलजी को भुला कर इस महादेश पर एक बार फिर अपना हिंसक दर्शन बरपा दिया है । क्या सचमुच यह हिंसा और घृणा की मुद्राएँ हमें चाहिए ?

नहीं चाहिए।  ये देश उठ रहा है ।

बाबरी, फिर दादरी और हिंदुत्व के नाम पर फिर बहादुरी । नपुंसक बहादुरी ।

किसी भी विचारधारा की प्रभुत्व की हेकड़पट्टी पर ठुके तराजू के एक पलड़े पर संदूकची हो और दुसरे पर बंदूकची तो आप लोकतंत्र के मूल्यों का हनन देख सकते हैं। आप ये किसलिए कर रहे हैं? अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को प्रचारित और प्रसारित करने के लिए ये सारा जोर लगा रहे हैं ।

भारत की नागरिक संस्कृति एक बड़े राष्ट्र की शिक्षित जनता और जनार्दन की संस्कृति है और वो जो शिक्षित नहीं थे कुछ वर्षों पहले तक, चार जनरेशन, चार पीढियां निकल चुकी हैं, वो भी बहुत समझदार हैं । उस समझदार को आप लुभाए जा रहे हैं बहोत बड़े पैसे से ।

हम विनय पूर्वक भारत के प्रधानमंत्री जी से प्रार्थना करते हैं कि वह कृपापूर्वक हमें यह तो बताएं कि ऐसा शब्द इस्तेमाल करने वाले, हमलोगों को क्या उन्होंने कहा था शब्द, हमलोगों को एक गैंग शब्द से बुलाने वाले, हमलोग बेचारे राइटर , बेचारे लेखक जो अपने अनुशासन को खूब अच्छी तरह इस्तेमाल करते हैं । मैं तो कह ही सकती हूँ एक बेहद अदना से लेखक होने के नाते कि आज़ादी के बाद जो हाई टेक्स्ट हमारा नैरेटिव था, और हाई कास्ट हमारा नैरेटिव था, और लो कास्ट नरेटर, उसकी दूरियां काफी कम हुई हैं। हम क्या उसकी दूरी फिर भुला सकते हैं?

आप हमारे भारतीय भाषाओँ के कोई भी अच्छे नावेल उठा के देखिये आपको एक ऐसी ज़िन्दगी मिलेगी, गुथी हुई, जिसको आप देख के महसूस करेंगे कि ये भारत के ही लेखक हैं, ये भारत का लेखक है क्योंकि वो उसको प्रतिद्वंदित करता है ।

अजीब बात है कि इस वक़्त में भी हमारे अग्रणी कौन है ये हमें मालूम नहीं । हालाँकि हम अच्छी तरह जानते हैं और बेहद पहले से जानते हैं, जबसे गाँधी को मार के गिरा दिया था आज़ादी के बाद।

आज हम इतिहास को पौराणिक बनाना चाहते हैं और पौराणिक को इतिहास बना रहे हैं । हम बस अंधविश्वास बढ़ा रहे हैं । और आप एक नई संस्कृति एक बार फिर से लोगों को बता रहे हैं, जो लोग कभी संस्कृति के रूप में नहीं लेंगे । हम उम्मीद करते हैं कि इस मुल्क में पिछले सदियों में भी इतने समझौते नहीं हुए । इतनी समझ तो थी ही हमें, कि हमें क्या करना चाहिए! ।

दोस्तों हमारे देश का तानाबान, इसकी वैचारिक संस्कृति, अपनी गहराई और प्रखरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। ये हम केवल लेखक ही नहीं कह रहे, हम अपने दर्शकों की बात कर रहें हैं ।

विविधता में एकत्व की लोकधर्मी गहरी मानवीय संवेदनाओं को हमें गंभीरता से लेना चाहिए । ये खतरों का वक़्त है । ये मुठभेड़ एवं मुह्ज़ोर का वक़्त है जो हम पर डाला जा रहा है ।

हम राष्ट्र के महामहिम के सामने नतमस्तक हैं जो राष्ट्र को आगाह कर रहें हैं कि हमारी बौधिक संस्कृति में समाहित है विश्व परिवार की चेतना- इसी विरासत ने हर भारतीय के जन मन को सींचा है। इसे प्रतिक्रियावादी कुढ़न राजनीति में बदलना मुश्किल होगा। हम ऐसी उम्मीद करते हैं हालाँकि इसके दुसरे भाग को भी हम अच्छे से जानते हैं ।

और आप राष्ट्र के बहुसंख्यक हिन्दू होकर, ये बात कहने में झिझक का विषय है लेकिन मैं कहना चाह रही हूँ । इसबात के लिए कि जो आगे बढ़कर इसके बिलकुल विपरीत बोल रहें हैं, हम उनको बताना चाहते हैं कि आप बहुसंख्यक होकर, कम संख्या वाले लोगों की तासीर दुनिया के आगे रख रहे हैं । क्या बात है कि जब आज भी ये सब हो रहा है, और आप ही के लोग लिख रहें हैं कि मुसलमानों की संख्या कितनी है? ये देखने की जरुरत नहीं है किसी भी राष्ट्र को, जहाँ इतनी बड़ी दुनिया हो और आप आपके पास ऐसा इकनोमिक प्रोग्राम हो जिससे आप दुनिया को एक सही रास्ते पे ले जा सकते हैं ।

आखिर राष्ट्र के बहुसंख्यक हिन्दू हो कर हम अब भी किससे डर रहे हैं? यह भारतीय संस्कृति, सभ्यता और गहरी मानवीय संस्कृति और विश्व प्रसिद्ध भारतीय संस्कार से हम क्यों भिड़ रहें हैं? और अपने लेखकों और बुद्धिजीवियों को तरेर रहें-क्यों मार रहे हैं-क्यों उन्हें गैंग या मैन्युफैक्चर्ड कह रहे हैं? इसके लिए मै इतनी शर्मिंदा हूँ कि कोई पढ़े लिखे लोग, अपने लिखने वाले लोग, सोचने वाले लोग, जो बुद्धिजीवी लोग हैं, उन्हें गैंग कह कर बुला सकते हैं ।

और यह सिर्फ एक आदमी का काम नहीं है । हम अपने प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहते हैं कि साहब वो कौन हैं नागपुरी संस्थान में जो हमको यह कह रहें हैं?

हम उनसे यह कहना भी चाहते हैं कि राष्ट्रपति जी ने तीन बार इस बात की और इशारा किया है, इस राष्ट्र की एकत्व पर इशारा किया है । और हमकों समझाया है कि मानवीय मूल्यों की कदर करना भारत के इतिहास में हमेशा से लिखा हुआ है ।

मैं आपसे इजाज़त चाहती हूँ । मैं अच्छे से पढ़ नहीं सकी । हालाँकि मेरा आना बड़ा मुश्किल था क्योंकि मुझे लगा आप लोगो को बेहद परेशानी होगी । लेकिन फिर भी आपसे इज़ाजत चाहती हूँ।”

Krishna Sobti
literature
hindi literature
Hindi fiction writer
essayist
हिन्दी साहित्य
हिन्दी लेखक
कृष्णा सोबती
इंडियन कल्चरल फोरम
ICF

Related Stories

समीक्षा: तीन किताबों पर संक्षेप में

इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में 9 से 11 जनवरी तक अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन

नामवर सिंह : एक युग का अवसान

"खाऊंगा, और खूब खाऊंगा" और डकार भी नहीं लूंगा !

गोरख पाण्डेय : रौशनी के औजारों के जीवंत शिल्पी

कृष्णा सोबती : मध्यवर्गीय नैतिकता की धज्जियां उड़ाने वाली कथाकार

"हमारी मनुष्यता को समृद्ध कर चली गईं कृष्णा सोबती"


बाकी खबरें

  • भाषा
    ओमीक्रॉन वंचित इलाकों को हर तरह से करेगा प्रभावित
    22 Dec 2021
    वंचित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने बीमारी के स्वास्थ्य और वित्तीय बोझ को असमान रूप से महसूस किया है।
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    अखिलेश के "लाल रंग" से क्यों घबरा रही है बीजेपी?
    22 Dec 2021
    वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा आज अपने कार्यक्रम में चर्चा कर रहे हैं उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव की। अखिलेश यादव क्या योगी आदित्यनाथ पर भारी पड़ रहे हैं और बीजेपी से नाराज़ लोग क्या समाजवादी…
  • Urban
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    अर्बन कंपनी से जुड़ी महिला कर्मचारियों ने किया अपना धरना ख़त्म, कर्मचारियों ने कहा- संघर्ष रहेगा जारी!
    22 Dec 2021
    अर्बन कंपनी(Urban Company) से जुड़ी महिला कर्मचारियों ने तीन दिन के अपने धरने के बाद बुधवार को कंपनी गेट से अपना धरना उठा लिया है। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया क
  • झारखंडः मॉब लिंचिंग बिल विधानसभा में पास, तीन साल से लेकर उम्र क़ैद का प्रावधान
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    झारखंडः मॉब लिंचिंग बिल विधानसभा में पास, तीन साल से लेकर उम्र क़ैद का प्रावधान
    22 Dec 2021
    2019 के विधानसभा चुनावों में सत्तासीन जेएमएम-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन ने मॉब लिंचिंग क़ानून बनाने का वादा किया था। झारखंड में साल 2014 से एक के बाद एक मॉब लिंचिंग की कई बड़ी घटनाएं हुई हैं।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    तय समय से एक दिन पहले ही समाप्त हुआ संसद का शीतकालीन सत्र
    22 Dec 2021
    शीत सत्र के दौरान भी दोनों सदनों में सरकार की मनमानी और विपक्ष का विरोध लगातार देखने को मिला। सरकार ने जहां तीन कृषि क़ानून बिना चर्चा के ही वापस ले लिए वहीं कई और अहम विधेयक बिना चर्चा के ही पास कर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License