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मिड डे मील में लाखों महिलाओं को मिला काम लेकिन हालात बंधुआ मज़दूरों से भी बदतर
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिषदीय स्कूलों में काम करने वाले रसोइयों के वेतन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने प्रदेश में सभी रसोइयों को न्यूनतम वेतन भुगतान का  आदेश दिया। 
सरोजिनी बिष्ट
06 Jan 2021
maheela
मिड डे मील कार्यकर्ता (रसोइया)। फोटो : सरोजिनी बिष्ट

सीतापुर जिले के एलिया ब्लॉक स्थित सरकारी स्कूल में सावित्री बाई फूले विद्यालय रसोइया संगठन AICTU के बैनर तले मीटिंग के लिए जुटी मिड डे मील कर्मियों की भीड़ में बैठी ब्रजरानी पर जब नजर गई तो सहसा ही उनसे बात करने का मन हुआ। इसका कारण था उस भीड़ में उनका सबसे बुजुर्ग होना। आप यहां क्यों आई हैं? इस सवाल पर वे इलाहाबाद कोर्ट के उस फैसले की कॉपी दिखाने लगी जिसमें प्रदेश के सभी रसोइयों का वेतन बढ़ाने का निर्देश दिया गया है और साथ ही उनके वेतन को देखते हुए इसे बंधुआ मजदूरी की श्रेणी में रखा है। 

कॉपी दिखाते हुए वे बोलीं अब तो कोर्ट ने भी हमारे दर्द को समझ लिया है।  सरकार को भी समझना होगा कि राज्य की लाखों रसोईयां कोई बंधुआ मजदूर नहीं हैं। वे कहती हैं आज हम सब यहां इसलिए जुटी हैं ताकि अपने आंदोलन को और मजबूत बना सकें। 

छतौना गांव की रहने वाली पैंसठ साल की ब्रजरानी  पन्द्रह सालों से रसोइया का काम कर रही हैं। वे कहती हैं तब भी एक हज़ार पर ही बसर करते थे और आज भी वही हालात हैं, काम बढ़ गया लेकिन वेतन आज भी मामूली ही मिलता है। 

तो वहीं बैठक में शामिल होने आई सहरोई गांव की पचास साल की कांति देवी कहती हैं कि शुरू में तो ये हालात थे कि पूरे महीने काम करके तब  कहीं जाकर कभी दो सौ कभी चार सौ मिलते थे।

कांति देवी कहती हैं कि जब से मिड डे मील की शुरुआत हुई है, तब से वह इस काम से जुड़ी है अब कहीं जाकर पन्द्रह सौ वेतन हुआ पर लॉक डाउन के दौरान कुछ भी नहीं मिला। छह महीने बाद केवल एक महीने का वेतन ही आया जबकि लॉक डाउन के दौरान भी रसोइयों को स्कूल बुलाया जाता था और हाजिरी बनानी पड़ती थी। 

कांति देवी और ब्रजरानी कहती हैं कि अब हम पीछे नहीं हटने वाले अपने हक के लिए सड़क पर भी आना पड़ेगा तो आएंगे। वहीं मीटिंग में आईं सभी रसोइयों ने एक ही बात कही लड़ेंगे और जीतेंगे।

क्या कहता है कोर्ट का फैसला?

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिषदीय स्कूलों में काम करने वाले रसोइयों के वेतन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने प्रदेश में सभी रसोइयों को न्यूनतम वेतन भुगतान निर्देश दिया। 

कोर्ट ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मिड डे मील रसोइयों को एक हजार वेतन देना बंधुआ मजदूरी है। जिसे संविधान के अनुच्छेद 23 में प्रतिबंधित किया गया है। कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक  का अधिकार है कि वह अपने मूल अधिकारों के हनन पर कोर्ट आ  सकता है तो वहीं कोर्ट ने सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी को बताते हुए कहा कि सरकार का यह कर्तव्य है कि किसी के भी मूल अधिकार का हनन नहीं हो। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि सरकार न्यूनतम वेतन से कम वेतन नहीं दे सकती।


कोर्ट ने प्रदेश के सभी जिलों के डी एम को इस आदेश का पालन करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने  यह आदेश बस्ती जिले के पिंसार बेसिक प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील रसोइया रह चुकी चंद्रावती देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। 

चंद्रावती देवी चौदह सालों से एक हजार वेतन पर ही काम कर रही थी जबकि 01.08.2019 को चन्द्रवती को काम से हटा भी दिया गया। कोर्ट ने साफ कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति पावरफुल नियोजन के विरुद्ध कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकता और न ही वह बारगेनिंग की स्थिति में होता है। कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र और राज्य सरकार को चार माह के भीतर न्यूनतम वेतन तय कर 2005 से अब तक राज्य के सभी रसोइयों को बकाया का भी भुगतान करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार ने अपने अधिकार का दुरुपयोग किया है।

कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर आंदोलन की तैयारी

सीतापुर जिले में मिड डे मील रसोइयों के बीच काम करने वाले भाकपा माले के जिला सचिव अर्जुनलाल जी कहते हैं कि इस क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं सबसे ज्यादा श्रम शोषण की शिकार हैं। भले ही हम यह मान लें कि इस योजना के तहत आज लाखों महिलाएं रोजगार से जुड़ी हैं। लेकिन इस सुखद तस्वीर की दूसरा भयावह पहलू यह है कि एक रसोइए को अपने गुजारे लायक तक वेतन नहीं मिल पा रहा तो वह परिवार का पोषण कैसे करे। 

वह कहते हैं कि हमारी हमेशा से सरकार से यह मांग रही कि रसोइयों को न्यूनतम वेतन भुगतान के दायरे में रखा जाए लेकिन अब जब हाई कोर्ट तक ने यह फैसला दे दिया है तो सरकार को इसे ईमानदारी से रसोइयों के हित में लागू करना चाहिए। अर्जुनलाल के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को आधार बना आठ जनवरी को सीतापुर जिले की मिड डे मील रसोईयां जिला मुख्यालय के समक्ष प्रदर्शन करेंगी। 

वे कहते हैं कि केवल सीतापुर जिला नहीं बल्कि जहां भी हमारा संगठन हैं वहां अलग-अलग समय में चरणबद्ध तरीके से आंदोलन को गति दी जाएगी ताकि सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाया जा सके। यानी आने वाले समय में रसोईयां अपने लिए न्यूनतम वेतन और कोर्ट के आदेश को जल्द से जल्द लागू करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने की तैयारी कर चुकी हैं जिसकी शुरुआत आठ जनवरी को सीतापुर जिले से होनी है। 

वह कहते हैं कि एक रसोइए का मेहनताना मनरेगा मजदूर से भी कम है जबकि उन्हें प्रत्येक दिन 6 घंटे काम करना ही पड़ता है इतना ही नहीं अक्सर रसोइयों द्वारा यह शिकायत भी मिलती है कि उन्हें उनके काम यानी खाना बनाने के अलावा वे अतिरिक्त काम भी करवाया जाता है जो उनके दायरे में नहीं।

कोर्ट की यह टिप्पणी अपने आप में बहुत मायने रखती है जिसमें उसने मिड डे मील से जुड़ी रसोइयों को बन्धुआ मजदूर का दर्जा दिया है और सरकार को आड़े हाथों लेते हुए अपने अधिकार के दुरुपयोग की बात कही है। अब कोर्ट ने तो अपना फैसला दे दिया। लेकिन इस फैसले के बाद क्या रसोइयों को एक सम्मानपूर्ण मेहनताना मिल पाएगा? इस पर संशय रहना स्वाभाविक है क्यूंकि हम जानते हैं कि बिना लड़े कुछ भी हासिल करना असम्भव है। इसलिए जब उन महिला रसोइयों मुंह से मैंने यह सुना कि लड़ेंगे लड़ेंगे, जीतेंगे जीतेंगे तो लगा मानो आधी लड़ाई अब जीती जा चुकी है।

(सरोजिनी बिष्ट स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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