NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अम्मू की कहानी
"[सदस्यीय संविधान समिति] में केवल 15 महिलाएं ही थीं, लेकिन उनमें से हर एक महिला अनोखी थी। उन सबने आज़ादी के आंदोलन में पुलिस की लाठी खाई थीं। उनमें से सभी महिलाओं के अधिकार, उनकी समानता और लैंगिक न्याय की ज़बर्दस्त पक्षधर थीं...उन 15 महिलाओं में अम्मू स्वामीनाथन भी थीं।"
सुभाषिनी अली
14 Aug 2019
story of ammu
Image Courtesy: Free Press Journal

सन १९५०, २६ जनवरी को देश में संविधान लागू किया गया। संविधान तैयार करने में बहुत समय लगा था। संविधान तैयार करने के लिए 425 सदस्यीय संविधान समिति का चुनाव किया गया था। इन सदस्यों में केवल 15 महिलाएं ही थीं, लेकिन उनमें से हर एक महिला अनोखी थी। उन सबने आज़ादी के आंदोलन में पुलिस की लाठी खाई थीं। उनमें से सभी महिलाओं के अधिकार, उनकी समानता और लैंगिक न्याय की ज़बर्दस्त पक्षधर थीं। संविधान समिति की हर बैठक में वे उपस्थित रहती थीं और हर बहस में आगे बढ़कर भाग लेती थीं। उन 15 महिलाओं में अम्मू स्वामीनाथन भी थीं।

अम्मू का जन्म केरल के पालघाट जिले के आनकरा गांव के एक नायर परिवार में हुआ था। इसलिए वह अपनी मां के घर में ही पली-बढ़ी। सबसे छोटी होने के कारण वह बहुत लाडली थी। पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई। उनकी मां परिवार की मुखिया थी और उनके मज़बूत व्यक्तित्व का असर अम्मू पर पड़ा। घर से दूर केवल लड़कों को पढ़ने भेजा जाता था, इसलिए अम्मू स्कूल नहीं गई। उन्हें घर पर ही मलयालम में थोड़ी बहुत शिक्षा ग्रहण करने का मौका मिला।

जब अम्मू तेरह साल की थी, तब मद्रास से स्वामीनाथन नाम के वकील उनके घर आए। बचपन में ही अम्मू के पिता ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उनकी मदद की थी। छात्रवृतियों के सहारे स्वामीनाथन को देश-विदेश में पढ़ने का मौका मिला और उन्होंने मद्रास में वकालत शुरू कर दी थी। जब उन्होंने घर बसाने की सोची, तो मदद करने वाले अम्मू के पिता को याद किया।

स्वामीनाथन को आनकरा पहुंचने के बाद अम्मू के पिता के देहांत की खबर मिली। स्वामीनाथन ने अपना प्रस्ताव अम्मू की मां के सामने ही रख दिया-अगर उनकी कोई बेटी शादी के लायक हो, तो वह उससे शादी करने के लिए उत्सुक हैं। अम्मू की मां ने कहा, सबसे छोटी ही बची है, लेकिन वह तो बहुत चंचल स्वभाव की है। वह घर क्या संभालेगी?

स्वामीनाथन को अम्मू की बातें अच्छी लगीं और उन्होंने पूछ लिया, क्या तुम मुझसे शादी करोगी? अम्मू ने कहा, कर सकती हूं। पर मैं गांव में नहीं, शहर में रहूंगी। और मेरे आने-जाने के बारे में कोई कभी सवाल न पूछे। स्वामीनाथन ने सारी शर्तें मान लीं।

उस ज़माने में किसी ब्राह्मण की शादी नायर महिला से नहीं होती थी, केवल संबंध संभव था। स्वामीनाथन संबंध जैसी महिला-विरोधी प्रथा के विरोधी थे। उसने अम्मू से शादी की और विलायत जाकर कोर्ट मैरिज भी की। ब्राह्मण समाज ने इसका विरोध किया।

अम्मू ने लैंगिक और जातिगत उत्पीड़न का हर स्तर पर विरोध किया। वह हमेशा मानती थी कि नायर एक पिछड़ी जाति है। उन्होंने चुनाव लड़ा और संविधान सभा की सदस्य चुनी गई। महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में उन्होंने हमेशा बात की। महिलाओं को समान कानूनी अधिकार दिलवाने के लिए डॉ. आंबेडकर के अथक प्रयासों के साथ खुद को उन्होंने पूरी ताकत के साथ जोड़ा।

संविधान पारित होने के बाद भी वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहीं। वह लोकसभा और राज्यसभा की सदस्य बनीं, साथ ही, स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत योगदान किया। यह अम्मू नामक महिला की नहीं, संभावनाओं की कहानी है। वे संभावनाएं, जो तमाम महिलाओं में दबकर बुझ जाती हैं। वे संभावनाएं, जिनको अनुकूल परिस्थितियां और वातावरण प्रतिभा, हुनर और बड़े योगदान करने की क्षमता में परिवर्तित करते हैं। और हां, अम्मू मेरी नानी भी थीं!

First published in Amar Ujala on January 24, 2018.

( सौजन्य : आईसीएफ )

Constitution of India
gender justice
Annihilation of caste
constitution committee
equal rights for women
Ambedkar
independence day
republic day
freedom fighter
Women Rights

Related Stories

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

विशेष: क्यों प्रासंगिक हैं आज राजा राममोहन रॉय

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

मोदी सरकार 'पंचतीर्थ' के बहाने अंबेडकर की विचारधारा पर हमला कर रही है

ख़ान और ज़फ़र के रौशन चेहरे, कालिख़ तो ख़ुद पे पुती है

RTI क़ानून, हिंदू-राष्ट्र और मनरेगा पर क्या कहती हैं अरुणा रॉय? 

एलएसआर के छात्रों द्वारा भाजपा प्रवक्ता का बहिष्कार लोकतंत्र की जीत है

यति नरसिंहानंद : सुप्रीम कोर्ट और संविधान को गाली देने वाला 'महंत'

भारतीय लोकतंत्र: संसदीय प्रणाली में गिरावट की कहानी, शुरुआत से अब में कितना अंतर?


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License