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भारत
राजनीति
अनुच्छेद 370 : अगला निशाना उत्तर-पूर्व होने की आशंका!
कश्मीर के मामले में केंद्र सरकार के फ़ैसले के बाद पूर्वोत्तर में राष्ट्रवादियों को डर है कि ये क्षेत्र विशेष प्रावधानों के पुनर्गठन या निरस्त करने के तर्ज पर अगला निशाना होगा।
विवान एबन
07 Aug 2019
अनुच्छेद 370

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने के अपने लंबे समय के वादे को पूरा करने में कामयाब रही है। अनुच्छेद 370 संविधान के भाग 21 में 'अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध' के तहत था। यह जम्मू-कश्मीर से संबंधित है और उस क्षेत्र के तत्कालीन राजा और भारत संघ के बीच हुए समझौते पर आधारित है। राष्ट्रपति के आदेश से अनुच्छेद 35ए को भारत के संविधान में जोड़ा गया था। इसलिए 5 अगस्त को राष्ट्रपति के एक आदेश के माध्यम से अनुच्छेद 35ए को हटा दिया गया। हालांकि कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट की संभावनाओं को लेकर काफ़ी ख़ुश हो रहे हैं लेकिन इस क़दम से पूर्वोत्तर में कोई ख़ास विकास नहीं हुआ है।

अरुणाचल प्रदेश

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार अरुणाचल प्रदेश के लोगों ने इस फ़ैसले पर जश्न मनाया। लोगों ने इस फ़ैसले को 'सीमा पार आतंकवाद पर अंकुश लगाने के एक पहल' के रूप में देखा। अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी संविधान में अनुच्छेद 371एच है जो एक 'विशेष प्रावधान' है, जो कि राज्यपाल को भारतीय संविधान के अलावा अधिक शक्ति देता देता है। वर्ष 2014 में पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी ने अनुच्छेद 371ए (नागालैंड) और 371जी (मिजोरम) की तर्ज पर अनुच्छेद 371एच में संशोधन करने का असफल प्रयास किया।

अनुच्छेद 35ए को निरस्त करने वाले राष्ट्रपति के आदेश ने केंद्र सरकार को यह फ़ैसला करने में सक्षम बना दिया है कि कौन 'स्थायी निवासी'होगा और किसे स्थायी निवासी प्रमाण पत्र (पीआरसी) जारी किया जाएगा। अरुणाचल प्रदेश में पीआरसी मुद्दा एक मार्मिक विषय है। इस साल फरवरी में ईटानगर और आसपास के क्षेत्रों में इस मुद्दे को लेकर बड़े पैमाने पर दंगा हुआ और बर्बरता देखी गई। इसलिए हो सकता है कि पीटीआई की रिपोर्ट में राज्य के माहौल को शामिल न किया हो।

असम

द टेलीग्राफ ने लिखा है कि सामाजिक कार्यकर्ता अखिल गोगोई ने इस घटनाक्रम को एक संकेत के तौर पर देखा है कि अगला निशाना पूर्वोत्तरहो सकता है। जबकि असम ट्रिब्यून के संपादकीय में केंद्र सरकार के फ़ैसले और असम के निहितार्थ पर ज़्यादा टिप्पणी नहीं की गई। हालांकि असम अनुच्छेद 371 बी के अंतर्गत आता है जो केवल आदिवासी लोगों को विधानसभा में आदिवासी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रावधान देता है। असम के संदर्भ में इस प्रावधान को निरस्त करने से राज्य पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि संविधान के अन्य प्रावधान पर्याप्त आदिवासियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध रहेंगे।

मणिपुर

जम्मू-कश्मीर की तरह मणिपुर का भारतीय संघ में शामिल करना संघर्ष भरा हुआ था। द इंफाल फ्री प्रेस ने जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार के कदमों पर एक संपादकीय लिखा है जिसने कूटनीतिक रूप से इस क़दम की आलोचना की है। संपादकीय में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर के कई राजनेताओं ने कहा कि धारा 370 को निरस्त करने से जम्मू-कश्मीर समझौता ख़त्म कर दिया गया। यही स्थिति अनुच्छेद 371 एफ को लेकर सिक्किम के समान है।

मणिपुर के संदर्भ में नियंत्रण करने वाला विशेष प्रावधान अनुच्छेद 371 सी है। हालांकि इस विशेष प्रावधान में राज्यपाल को पहाड़ी क्षेत्रों अर्थात् जनजातीय क्षेत्रों का प्रभार दिया जाता है। हालांकि संपादकीय में केंद्र सरकार के उठाए गए क़दम के संदर्भ में नागा लोगों द्वारा एक अलग ध्वज, संविधान और पासपोर्ट की मांगों को भी शामिल किया गया है जो हवा में महल बनाने जैसा लगता है।


 

मेघालय

मेघालय के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं। इस राज्य को असम से अलग किया गया था। हालांकि इस राज्य में इनर लाइन परमिट सिस्टम(आइएलपीएस) को लागू करने की मांग लगातार होती रही है। 25 अप्रैल को द हिंदू ने राहुल करमाकर का एक लेख प्रकाशित किया जिसमें भारत संघ के साथ खासी सियेम राजा/प्रमुख) के एक्सेशन एग्रीमेंट पर फिर से विचार करने की उनकी इच्छा पर प्रकाश डाला गया। संक्षेप में, ऐसा लगता है कि मेघालय में विशेष प्रावधानों की आवश्यकता है। इस दिशा की पहली चिंता भूमि के स्वामित्व को लेकर है।

मिज़ोरम

मिज़ोरम के पूर्व मुख्यमंत्री लाल थनहावला ने 5 अगस्त को एक ट्वीट में जम्मू-कश्मीर के घटनाक्रम पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उनके शब्दों में "नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के लिए रेड अलर्ट। यह मिज़ोरम, नागालैंड और अरुणाचल जैसे राज्यों के लिए ख़तरा बन गया है जिन्हें संविधान द्वारा संरक्षण प्राप्त है। यदि 35ए और 370 को निरस्त कर दिया गया है तो अनुच्छेद 371जी जो मिज़ोरम के आदिवासियों के हितों और अस्तित्व की सुरक्षा करता है वह भी गंभीर ख़तरे में है।” न्यूज़18 के अनुसार, मिज़ोरम में अन्य राजनीतिक दलों ने भी इस परिवर्तन की निंदा की है।

पीपल्स रिप्रेजेंटेशन फॉर आइडेंटिटी एंड स्टेटस ऑफ मिज़ोरम (पीआरआइएसएम) ने लोगों को ख़तरे से आगाह किया है और पूर्वोत्तर के 'स्थानीय लोगों' को तैयार रहने को कहा है। ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (ज़ेडपीएम) ने जम्मू-कश्मीर और मिज़ोरम के बीच के अंतर को बताया था क्योंकि एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद 371जी को शामिल किया गया था।

नागालैंड

जिस तरह केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के मामले में फ़ैसला किया है उसी तरह शायद नागालैंड को लेकर फ़ैसला करने की ज़्यादा संभावना है। हालांकि नागालैंड कोअनुच्छेद 371 ए के तहत विशेष प्रावधान है जो नागालैंड राज्य के गठन के बाद शामिल किया गया था। इस राज्य का गठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) के अधीन एक नए विद्रोह का कारण बन गया। 2015 में बीजेपी सरकार ने एनएससीएन के इसाक-मुइवा गुट के साथ एक समझौते परहस्ताक्षर किया जिसे 'ऐतिहासिक' बताया।

नागालैंड की एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक द मोरंग एक्सप्रेस ने संपादकीय में सवाल उठाया है कि क्या संसद में नागालैंड के प्रतिनिधियों ने जम्मू-कश्मीर को लेकर असहमति जताई है या नहीं। इस संपादकीय का समापन रवींद्रनाथ टैगोर की एक पंक्ति के साथ हुई; "जब राष्ट्र का ये विचार नैतिक कर्तव्य के रूप में सामूहिक स्वार्थ को मानने का प्रयास करती है तो यह न केवल विनाश को जन्म देता है बल्कि मानवता के बहुत से सिद्धांतों पर हमला करता है।"


सिक्किम

मणिपुर की तरह सिक्किम के भारतीय संघ में शामिल करने को कई लोगों ने बलपूर्वक उठाया गया क़दम माना था। एक संदिग्ध जनमत संग्रह के ज़रिए इस राज्य ने अनुच्छेद 371एफ़ के माध्यम से अपने पुराने क़ानून को बरक़रार रखा लेकिन राज तंत्र और झंडे को हटा दिया। सिक्किम में ऐसे कई लोग हैं जो पुराने क़ानून के कमज़ोर पड़ने पर आंसू बहाते हैं और इसके लिए शहरी क्षेत्रों के वर्तमान जनसांख्यिकीय परिवर्तन को उत्तरदायी ठहराते हैं। हालांकि चुनाव के बाद सबसे बड़ी चिंता का विषय सिक्किम के साथ दार्जिलिंग के विलय का मुद्दा अब लगता है। चोग्याल द्वारा जारी सिक्किम सब्जेक्ट सर्टिफिकेट (एसएससी) रखने वालों में विलय के लिए कोई स्वीकार करने वाला नहीं है। इसके अलावा सिक्किम को दार्जिलिंग में विलय करने के विचार का सख़्त विरोध नेपाली भाषा बोलने वाले समुदायों से आता है।

जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार की कार्रवाई के बाद यह लगता है कि लोग आशंकित हैं कि एक और कार्रवाई इस बार सिक्किम में की जाएगी। हालांकि संघ सरकार के लिए अनुच्छेद 371एफ़ को रद्द करना मुश्किल होगा क्योंकि खंड (एम) भारत संघ और सिक्किम सरकार के बीच संधियों के चलते संबंधित मामलों को सभी अदालतों को सुनवाई करने से रोकता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय क़ानून में केवल संप्रभु राज्य ही संधियों में प्रवेश करने में सक्षम होते हैं इसलिए अनुच्छेद 371एफ को निरस्त करने से क़ानूनी रूप से सिक्किम अपनी संप्रभु अवस्था में लौट आएगा।

त्रिपुरा

त्रिपुरा से आ रही प्रतिक्रियाओं ने हिंदू राष्ट्रवाद और जातीय-राष्ट्रवाद के बीच के रिश्तों को उजागर किया है। बीजेपी के मुख्यमंत्री बिप्लब देव ने केंद्र सरकार की सराहना की है जबकि गठबंधन सहयोगी इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने इस फ़ैसले का विरोध किया। पुरानी पार्टी इंडिजिनस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा (आइएनपीटी) ने भी इस फ़ैसले की आलोचना की है। मेघालय की तरह त्रिपुरा का भी कोई विशेष प्रावधान नहीं है। हालांकि मेघालय की तरह आदिवासी क्षेत्रों के संदर्भ में सामान्य संवैधानिक प्रावधान त्रिपुरा में लागू होते हैं।

पूर्वोत्तर की प्रतिक्रियाओं को देखा जाए तो यह लगेगा कि राष्ट्रवादी ताक़तें जम्मू-कश्मीर के एकीकरण के बाद केंद्र सरकार की योजनाओं और उद्देश्यों को लेकर चौकन्ना हैं।

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