NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
आप राज्यपाल हैं या फिर वजुभाई वाला ?
न्यायालय द्वारा फैसले होते नहीं दिख रहे बल्कि न्यायाधीश अपने फैसले थोप रहे हैं.राज्यपाल CM तो नियुक्त कर सकते हैं क्योंकि संविधान बनाने वालों को यह आहट नहीं थी कि ‘वजुभाई वाला’ भी राज्यपाल हो सकते हैं...
अनिल चमड़िया
24 May 2018
karnataka

मान लें यदि कर्नाटक के राज्यपाल ने विधायकों की संख्या के आधार पर बहुमत मानकर कांग्रेस और जेडीएस के संयुक्त विधायक दल के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए आमंत्रित किया होता तो लोकतंत्र को क्या हासिल होता? हमारे अंदर लोकतंत्र का विचार प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर के आदर्श के इस रूप में विकसित हुआ है। जन मानस ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण का न्यूनतम अर्थ इस रूप में ग्रहण किया है कि वह जिसे असंगत, अनैतिक और अन्यायकारी मानता है वह बेधड़क सत्ता के एक केन्द्र के खिलाफ दूसरी विकेन्द्रित सत्ता के समक्ष जा सकता है। इस तरह विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था ही भारतीय लोकतंत्र है। लेकिन हम यह बहुत शिद्दत के साथ महसूस कर पा रहे हैं कि भारतीय समाज और उसके द्वारा निर्मित तमाम तरह की संस्थाओं को एक केन्द्रीकृत सत्ता के मातहत खड़े होने के लिए बाध्य किया जा रहा है।

एक स्थिति स्पष्ट दिख रही है कि राजनीतिक संस्थाओं के भीतर विकेन्द्रकरण का विचार दम तोड़ चुका है। कोई भी ऐसी संसदीय राजनीतिक संस्था नहीं दिखती है जिस पर राजनैतिक मूल्यों को लेकर बड़ा भरोसा किया जा सकता है। सदन के अध्यक्षों से लेकर राष्ट्रपति भी शामिल है। भारतीय समाज में प्रेमचंद का पंच परमेश्वर इसीलिए पीढियों से लोकप्रिय हैं क्योंकि वह अपने ‘परिवार ’ के तमाम तरह के दबावों से उस वक्त तक मुक्त होने की चाहत रखता है जब उसके सामने मूल्य और संस्कृति की इफाजत करने का प्रश्न खड़ा हो। कर्नाटक के राज्यपाल ने यदि विधायकों की संख्या के आधार पर कुमारस्वामी के दावे को स्वीकार किया होता तो इस संसदीय लोकतंत्र में केवल एक छोटा सा भरोसा फिर से सांस लेने लगता कि दबावों से मुक्त होकर कोई राजनीतिक संस्था बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र के औचित्य को बनाए रखना जरूरी समझती है।

न्यायालय द्वारा फैसले होते नहीं दिख रहे हैं बल्कि न्यायाधीश अपने फैसले थोप रहे हैं

तर्क की कोई एक पद्दति तो मान्य होनी चाहिए। गोवा के समुद्र तट पर खड़े होकर एक तर्क और मणिपुर की पहाड़ियों के बीच और मेघालय के बारिश में भीगते हुए राज्यपाल एक संविधान वाले देश के लिए अलग-अलग तर्क पद्धति की तस्वीर नहीं तैयार कर सकते। राज्यपाल सैर सपाटे पर निकला व्यक्ति नहीं है, उसे एक संस्था के रूप में काम करते हुए दिखने की अपेक्षा आम मानस का वह हिस्सा करता है जिसे लोकतंत्र में खुली सांस लेने की स्थितियों के बिगड़ने से बेचैन होता है। वह मानस जो मूल्यों के टूटने से सबसे ज्यादा आहत महसूस करता है। संविधान का अलग-अलग राज्यों के लिए संस्करण नहीं है। लेकिन हम यह देख पा रहे हैं कि संस्थाओं की भूमिका की परवाह ही नहीं रह गई है और वह एक राजनीतिक संस्कृति के रूप में दिख रही है। जैसे इस दौर में न्यायालय द्वारा फैसले होते नहीं दिख रहे हैं बल्कि न्यायाधीश अपने फैसले थोप रहे हैं। लोकतंत्र को एक भ्रम के रूप में लंबे समय तक नहीं टिकाए रखा जा सकता है। क्या यह इरादातन है कि लोकतंत्र के नाम पर बनी संस्थाओं और उनकी स्वायतता को खत्म करके एक सैन्य केन्द्रित सत्ता का ढांचा खड़ा किया जाए। शायद एक देश एक चुनाव का नारा इसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है।

कर्नाटक को भाजपा दक्षिण के राज्यों के लिए लोकतंत्र का रास्ता बनाना चाहती है या फिर अपना दक्षिणी सैन्य अड्डा बनाना चाहती है? लोकतंत्र का रास्ता लोकतंत्र की परंपराओं और मूल्य बोध के साथ ही तैयार हो सकता है। वजुभाई वाला कर्नाटक के राज्यपाल की जगह यदि गुजरात के भाजपा नेता और पूर्व मंत्री के रूप में दिख रहे हैं तो यह भाजपा की जीत हो सकती है लेकिन यह लोकतंत्र और उसकी परंपराओं की जीत के रूप में नहीं स्वीकार की जा सकती है। राज्यपाल मुख्यमंत्री तो नियुक्त कर सकते हैं क्योंकि संविधान को बनाने वालों को यह आहट नहीं थी कि ‘वजुभाई वाला’ भी राज्यपाल हो सकते हैं। लेकिन सरकारें लोगों के समर्थन से चलती हैं।

कर्नाटक की राजनीति ने वैसे ही संसदीय लोकतंत्र के सामने एक जटिल प्रश्न खड़ा कर दिया है कि बहुमत का वास्तविक अर्थ किसमें निहित है ? लोकतंत्र जनता के द्वारा है तो सबसे ज्यादा मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया लेकिन सरकार मतदाताओं की संख्या के आधार पर नहीं विधायकों की संख्या के आधार पर बनाई जा सकती है। कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में खड़ी होने वाली भाजपा की तुलना में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को मतदाताओं ने अपनी पसंद जाहिर किया है। कर्नाटक शायद इस दौर के कई चुनावों में पहला चुनाव है जिसमें कम से कम नोटा का इस्तेमाल मतदाताओं ने किया है। राज्यपाल के रूप में वजुभाई वाला ने यदि इस पहलू पर विचार किया होता कि विधायकों की बहुमत संख्या के आधार पर सरकार के लिए आमंत्रित करने का फैसला ‘बहुमत’ की संसदीय परिभाषा के प्रति भरोसा बनाए रखने में मददगार होगी तो शायद यदुरप्पा को उन्होने महज 104 विधायकों के समर्थन के दावे के साथ 224 सदस्यों वाली विधानसभा की सरकार के लिए आमंत्रित नहीं किया होता । दरअसल जब ये कहा जाता है कि जंग में सब जायज है और उसी तरह चुनावी जीत के लिए जब जायज है तो वास्तव में वह लोकतंत्र के लिए आवाज नहीं होती है। वह चुनावी जंग के लिए ही होती है और जंग की संस्कृति में यकीन करने वाले संस्थाओं के विकेन्द्रीकरण की विचारधारा के कट्टर विरोधी होते हैं।

कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में वजुभाई वाला ने लोकतंत्र को एक घाव दिया है। इस घाव को यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि पूर्व में भी ‘वजुभाई वालाओं” ने ऐसे ही हरकतें की हैं। महामहिम के ‘महामहीन’ होने की अपेक्षा होती है।यानी वे इतने महीनी ( ( सूक्ष्म) तरीके से लोकतंत्र के मूल्यों के प्रति संवेदनशील हो कि उस पर कोई नया घाव नहीं तैयार हो। ये आपने क्या किया ? आप राज्यपाल हैं या फिर वजुभाई वाला ?

राष्ट्रपति व राज्यपाल राजनीतिक संस्थाओं से अपेक्षा की आखिरी सीढ़ी मानी जाती है। इसका न्यायप्रिय राजनीतिक फैसलों में चूक का मतलब फैसले लेने की ताकत को खो देना है। वजूभाई वाला आपने यह खो दिया है।

Courtesy: हस्तक्षेप
karanataka
Governor

Related Stories

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

विचार-विश्लेषण: विपक्ष शासित राज्यों में समानांतर सरकार चला रहे हैं राज्यपाल

अमेरिका में नागरिक शिक्षा क़ानूनों से जुड़े सुधार को हम भारतीय कैसे देखें?

कार्टून क्लिक : राज्यपाल का डर!

सरकारी स्कूलों को क्यों बंद करना चाहती है कर्नाटक सरकार ?

रेत माफिया: नेताओं, निर्माण कंपनियों और अपराधियों का एक नेटवर्क

कश्मीर के हालत से साफ़ है कि बीजेपी सैन्य राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रही है: उर्मिलेश

कर्णाटक कपड़ा उद्योगः श्रमिकों की मज़दूरी न बढ़ाने को लेकर सरकार पर मैनेजमेंट का दबाव

मीडिया पर खरी खरी: एपिसोड 3 भाषा सिंह के साथ

कर्नाटक में हमें निरंकुश सत्तावाद देखने को मिला है : उर्मिलेश


बाकी खबरें

  •  Vir Das, Kunal Kamra and Munavvar
    बादल सरोज
    मुनव्वर से वीर दास और कुणाल कामरा तक, गहरे होते अंधेरे, मुक़ाबिल होते उजाले
    04 Dec 2021
    वीर दास की घेराबंदी का एपिसोड अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि दूसरे स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी को खुद को खामोश करने का ऐलान करने के लिए विवश कर दिया गया।
  • hisab kitab
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या भारत की इकॉनोमी पटरी पर वापस आ गई है?
    03 Dec 2021
    जुलाई-सितम्बर तिमाही की जीडीपी देखकर कुछ लोग कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई है पर क्या इकॉनमी में वाकई सुधार आया है? बता रहे हैं ऑनिंद्यो
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    कांग्रेस पर वार का ममता का दांव और दलितों की नृशंस हत्या पर योगी की लीपापोती
    03 Dec 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस पर हमला बोलने का राजनीतिक विश्लेषण किया और इसे इनकी 2024 की तैयारी से जोड़ा। साथ ही उत्तर प्रदेश के…
  • Bundelkhand Farmer
    न्यूज़क्लिक टीम
    बुंदेलखंड का किसान : मौसम की मार, क़र्ज़ का भार और आवारा पशुओं का खतरा
    03 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के इस ग्राउंड रिपोर्ट में हमने बुंदेलखंड के किसानो से बात की और जानना चाहा की मौजूदा सरकार में उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    भारत में ओमिक्रोन वैरिएंट के संदिग्ध मरीज़ बढ़े और अन्य ख़बरें
    03 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी भारत में आए ओमिक्रोन वैरिएंट के मामले, CBSE लेगा गुजरात दंगों से जुड़े सवाल पर 'एक्शन' और अन्य ख़बरें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License