NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
संस्कृति
फिल्में
समाज
भारत
आर्टिकल 15 : लेकिन राजा की ज़रूरत ही क्या है!
मैं आपको इस फ़िल्म की कहानी नहीं सुनाऊंगा। बस यह कहूंगा कि यह फ़िल्म हमारे भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है, जिसे हम और आप अपने आसपास रोज़ देखते हैं, बस याद नहीं रखते।
मुकुल सरल
01 Jul 2019
Article-15
फोटो साभार: Deccan Herald

“अगर सब बराबर होंगे तो राजा कौन बनेगा ?

लेकिन राजा की ज़रूरत ही क्या है ! ” 

“तुम्हें एक हीरो चाहिए !

नहीं, बस ऐसे लोग जो हीरो का इंतज़ार न करें ” 

ये संवाद हैं नई फ़िल्म आर्टिकल 15 (#ARTICLE15) के।

इस फ़िल्म को लिखा है गौरव सोलंकी ने। निर्देशन किया है अनुभव सिन्हा ने और मुख्य भूमिका में हैं आयुष्मान खुराना। दो घंटे 20 मिनट की इस फ़िल्म को आप इन दो सवालों और इनके जवाब के जरिये भी जान सकते हैं कि यह फ़िल्म क्या कहना या बताना चाह रही है।

मैं आपको इस फ़िल्म की कहानी नहीं सुनाऊंगा। बस यह कहूंगा कि यह फ़िल्म हमारे भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है, जिसे हम और आप अपने आसपास रोज़ देखते हैं, बस याद नहीं रखते, या रखना नहीं चाहते। यह हमें हमारा ‘अदृश्य भारत’ दिखाती है, जिसे देखकर कई बार हम आंख बंद कर लेना चाहते हैं और कई बार नाक-मुंह रूमाल से ढक लेना चाहते हैं।

फ़िल्म में हिन्दुत्ववादी राजनीति की झलक है, दलित उत्पीड़न है तो दलित उभार भी। कुल मिलाकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था का कुचक्र है, हालांकि उससे लड़ता हुआ भी एक ब्राह्मण नायक ही दिखाया गया है।

मैंने रविवार को अपने परिवार (पत्नी और दो बेटियों) के साथ यह फ़िल्म देखी। दोनों बेटियां टीन एज़र हैं। यानी देश-दुनिया को अपनी नज़र से देखने-समझने की कोशिश कर रही हैं। 

आपको फ़िल्म कैसी लगी? फ़िल्म ख़त्म होने के बाद मैंने बेटियों से यही सवाल पूछा।

बहुत अच्छी, उन्होंने जवाब दिया।

क्या अच्छा लगा?

बहुत नई जानकारी मिली।

जैसे?

जैसे ये तो हमें पता था कि चार कॉलोनियों में तो हम बंटे हुए हैं ही। ये भी पता चला कि कॉलोनियों में भी कैसी सब-कॉलोनियां हैं।

वर्ण व्यवस्था को लेकर बड़ी बेटी ने टिप्पणी की। यानी जाति भीतर जाति। यह उन जातियों के भीतर भी है जो जाति की वजह से उत्पीड़ित हैं। दलित के भीतर भी अति दलित।

इसी को ब्राह्मणवादी व्यवस्था कहते हैं। मैंने उसे बताया।

इसके अलावा? मैंने दूसरा सवाल पूछा।

इसके अलावा जितने बड़े क्राइम हैं, अगर वे नहीं खुलते हैं तो उनके पीछे ज़रूर पुलिस और दूसरे बड़े लोगों की मिलीभगत होती है। बड़ी ने कहा।

छोटी ने कहा- इस पिक्चर में इक्विलिटी (समानता) का जो मैसेज (संदेश) दिया गया है, वो उसे अच्छा लगा। 

वो इस बात से परेशान थी कि किस तरह सिर्फ़ तीन रुपये के लिए दो लड़कियों को मार दिया गया।

छोटी को सबसे ज़्यादा पसंद फ़िल्म की शुरुआत में आए जनगीत “बड़े बड़े लोगन के बंगला-दो बंगला...” लगा। ये उसने पहले भी सुन रखा था लेकिन इसमें जब आया कि “बड़े-बड़े लोगन के स्कूल, कॉलेजवा..और ट्यूशन अलग से...” तो उसे एहसास हुआ कि कितने बच्चों को स्कूल मयस्सर नहीं और वो खुद ट्यूशन भी पढ़ने जाती है।  

बच्चों की ये बातें सुनकर मुझे अच्छा लगा और लगा कि फ़िल्म अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब रही।

राजकुमार हिरानी निर्देशित और आमिर ख़ान अभिनीत फ़िल्म ‘पीके’ को देखकर मेरी बेटियां धर्म को लेकर सवाल करने लगी थीं। ये पांच साल पहले की बात है, तब तो वे और भी छोटी थीं। मेरी सोसायटी में बच्चों के बीच बहस होने लगी थी कि भगवान है कि नहीं। हिन्दू-मुसलमान के सवाल पर मेरी बेटियां अपने दोस्तों से पूछने लगी थीं कि बता ‘ठप्पा कहां लगा है?...अरे वही धर्म की मोहरिया’ 

मैंने उनके नाम के आगे सरनेम यानी जाति सूचक नाम नहीं लगाया है तो भी हमारी सोसायटी और उसके नये दोस्तों में बहस चलती रहती है। मेरे नाम से भी जाति का पता नहीं लगता तो बहुत लोग बड़े परेशान रहते हैं। ये बात आपको बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन ऐसी छोटी-छोटी बातें या शुरुआत भी काफी महत्व की हो सकती हैं। इसी तरह की बात ऐसी फ़िल्मों की भी है।

ये फ़िल्में आपको अच्छी बुरी कुछ भी लग सकती हैं, लेकिन अपनी कमियों, अपनी सीमाओं के बावजूद ये ज़रूरी फ़िल्में हैं, जिन्हें हमें और हमारे बच्चों को ज़रूर देखना चाहिए।

यह मानने में कोई बुराई नहीं है कि सिनेमा या फ़िल्म ऐसा लोकप्रिय और सशक्त माध्यम है कि उसका असर दूर तक जाता है और कई बार सैकड़ों वैचारिक लेख, भाषण, कविता-कहानी से ज़्यादा आम जनमानस पर प्रभाव डालता है।

वास्तिवकता में एक फ़िल्म से आप बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं कर सकते, करनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि ये भी अंतत: बाज़ार का एक माध्यम है, लेकिन बाज़ार भी अपनी ज़रूरतों या विरोधाभास के चलते कई तरह के प्रतिरोध रचता है। ऐसे ही विषय पर ऐसी ही एक अच्छी फ़िल्म ‘मसान’ थी, जिसे वरुण ग्रोवर ने लिखा था और नीरज घेवन ने निर्देशित किया था। अनुभव सिन्हा ने इससे पहले हिन्दू-मुस्लिम विषय पर फ़िल्म ‘मुल्क’ बनाई थी। उसे बहुत से जानकारों ने कमज़ोर फिल्म कहा, लेकिन मुझे वह फिल्म भी अच्छी लगी थी। अभी हाल की एक और फ़िल्म ‘तमाशा’ मुझे बहुत अच्छी लगी थी, जो कई दिनों तक मेरे ज़हन में रही और कचोटती रही।

एक फिल्म या फिल्मकार से आप कितनी अपेक्षा करते हैं। वह समाज सुधारक या एक्टिविस्ट की भूमिका में नहीं हो सकता। फिर भी अगर वह इतनी ज़िम्मेदारी भी समझ या उठा रहे हैं तो ये बड़ी बात है, क्योंकि यह ऐसा दौर है जब देश-समाज के लिए वास्तविक ज़िम्मेदार लोग और संस्थाएं अपनी ज़िम्मेदारी से कोसो दूर हैं। वह चाहे सरकार/कार्यपालिका हो, न्यायपालिका या मीडिया, जो खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहता है। इसलिए ऐसे दौर में ऐसी फ़िल्मों के लिए मैं तो कहता हूं- इतना बहुत है यार...

आइए अंत में जान लेते हैं कि आर्टिकल यानी अनुच्छेद 15 है क्या?

हमारे संविधान में सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकार दिए गए हैं। संविधान के आर्टिकल 15 के चार उपबंध यानी हिस्से हैं।

(1) राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद (अंतर) नहीं करेगा।

(2) कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर--

(क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश से रोका नहीं जा सकता या

(ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग के संबंध में किसी को नहीं रोका जा सकता।

(3) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से नहीं रोकेगी।

(4) इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।

इसके अलावा आर्टिकल 16 भी समता का अधिकार देता है। आर्टिकल 17 अस्पृशयता की बात करते हुए छुआछूत को दंडनीय अपराध घोषित करता है। आर्टिकल 19 में अभिव्यक्ति से लेकर कोई भी व्यापार करने और देश में कहीं भी आने-जाने की आज़ादी के अधिकार की बात कही गई है तो आर्टिकल 21 जीवन का अधिकार देता है। जो अपने आप में बहुत व्यापक है। इसमें मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है। इसे गौर से पढ़िए ये आपके लिए ही नहीं सभी के लिए है। उनके लिए भी जिनके उत्पीड़न पर ये फ़िल्म (आर्टिकल 15 फ़िल्म) बनी है। ख़ैर कुछ बदलता है तो अच्छा है, वरना बातें तो बहुत हैं बात या बहस करने के लिए, लाल किले से लेकर संसद तक और संसद से लेकर सड़क तक।

MOVIE
article 15
untouchability
Ayushmann Khurana
Anubhav Sinha
Dalit atrocities
Dalit movement
Massan
P.K
Mulk
Tamasha

Related Stories

जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार

दलित आंदोलन और जाति : आत्ममुग्धता से परे यथार्थ दृष्टि

चमन बहार रिव्यु: मर्दों के नज़रिये से बनी फ़िल्म में सेक्सिज़्म के अलावा कुछ नहीं है

'छपाक’: क्या हिन्दू-मुस्लिम का झूठ फैलाने वाले अब माफ़ी मांगेंगे!

घृणा और हिंसा को हराना है...

भारत में निर्बाध क्यों नहीं रही धर्मनिरपेक्षता की धारा?

चुनाव 2019; महाराष्ट्र : क्या नतीजों को प्रभावित कर पाएगा नाराज़ दलितों का वोट


बाकी खबरें

  • Modi
    राज कुमार
    ‘दमदार’ नेता लोकतंत्र कमजोर करते हैं!
    07 Mar 2022
    हम यहां लोकतंत्र की स्थिति को दमदार नेता के संदर्भ में समझ रहे हैं। सवाल ये उठता है कि क्या दमदार नेता के शासनकाल में देश और लोकतंत्र भी दमदार हुआ है? इसे समझने के लिए हमें वी-डेम संस्थान की लोकतंत्र…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 22 महीने बाद 5 हज़ार से कम नए मामले सामने आए 
    07 Mar 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 4,362 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 54 हज़ार 118 हो गयी है।
  • Modi
    सुबोध वर्मा
    ज़्यादातर राज्यों में एक कार्यकाल के बाद गिरता है बीजेपी का वोट शेयर
    07 Mar 2022
    हालांकि 'डबल इंजन' वाली सरकारों को फ़ायदेमंद बताकर प्रचारित किया जाता है, मगर आंकड़े कुछ और ही बताते हैं।
  • New pension scheme
    न्यूज़क्लिक टीम
    New Pension Scheme पर गुस्सा फूटा, महंगाई मारक, मोदी मैजिक नहीं चला
    06 Mar 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने घोसी विधानसभा में अलग-अलग राजनीतिक दलों के समर्थकों से बात की। New Pension Scheme पर नाराजगी फूटी, बासफोर समाज में वंचना की मार, भाजपा को मोदी का भरोसा।
  • communalism
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोधरा, भाजपा और देश में बढ़ती सांप्रदायिकता
    06 Mar 2022
    कुछ ऐसी घटनाएं होती है जो न केवल समाज बल्कि पूरे देश की दिशा बदल देते हैं। उनमें से एक है गोधरा त्रासदी। इतिहास के पन्ने के इस अंक में नीलांजन बात कर रहे हैं उसी घटना की और कैसे गोधरा त्रासदी ने देश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License