NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
असम नाज़ी यातना केंद्र बनने जा रहा है!
“असम में एनआरसी हिंदुत्व फ़ासीवाद का औजार बन गया है। अमित शाह, जो अब केंद्र में गृहमंत्री हैं, कह चुके हैं कि एनआरसी पूरे देश में लागू किया जायेगा और ‘एक-एक घुसपैठिये’ को—यहां पढ़िये मुसलमान को—देश से बाहर निकाला जायेगा।”
अजय सिंह
20 Jul 2019
assam nrc

कांग्रेस ने बीज बोया, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उसकी भरपूर फ़सल काटी। इसका ज़बर्दस्त नमूना है, असम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसीः नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़ंस), जिसकी वजह से असम में हाहाकार मचा हुआ है। यह पूरी तरह कांग्रेस की देन है। इसका फ़ायदा उठाते हुए केंद्र की मौजूदा भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे (एनआरसी को) मुसलमानों के ख़िलाफ़—खासकर बंगलाभाषी मुसलमानों के ख़िलाफ़—आक्रामक ढंग से मोड़ दिया है।

असम की कुल आबादी 3 करोड़ 29 लाख में कितने भारतीय हैं और कितने ग़ैर-भारतीय, यह पता लगाने और नागरिकों की सूची को अपडेट करने के लिए 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार (कांग्रेस सरकार) ने अत्यंत विवादास्पद, विभाजनकारी और यातनादायी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार करने के काम की फिर से शुरुआत की थी।

2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। नरेंद्र मोदी सरकार ने सोहराबुद्दीन-कौसर बी हत्याकांड में जेल में बंद और बाद में, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से, तड़ीपार किये गये भाजपा नेता अमित शाह के ऊपर दर्ज किये गये सारे आपराधिक मामलों को रफ़ा-दफ़ा कराया। कुछ समय के बाद अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। उनकी अगुवायी में, और नरेंद्र मोदी की देखरेख में, एनआरसी तैयार करने का काम आक्रामक ढंग से आगे बढ़ा और इसने मुस्लिम-विरोधी व विभाजनकारी सांप्रदायिक राजनीति का रूप ले लिया।

कांग्रेस की ओर से शुरू किये गये काम को भाजपा ने किस अंजाम तक पहुंचाया! कांग्रेस के शासनकाल में ही असम में नज़रबंदी केंद्र/यातना केंद्र बनने शुरू हो गये थे और उनमें ‘ग़ैर-भारतीय’ बताये गये लोगों को बंद करने/ठूंस देने का सिलसिला शुरू हो गया था। यह ज़रूर है कि उसमें इतनी तेज़ी व आक्रामकता नहीं थी, जितनी अब भाजपा के राज में है।

असम में एनआरसी हिंदुत्व फ़ासीवाद का औजार बन गया है। अमित शाह, जो अब केंद्र में गृहमंत्री हैं, कह चुके हैं कि एनआरसी पूरे देश में लागू किया जायेगा और ‘एक-एक घुसपैठिये’ को—यहां पढ़िये मुसलमान को—देश से बाहर निकाला जायेगा। अमित शाह घुसपैठियों की तुलना दीमक से कर चुके हैं और उन्हें नष्ट करने की मंशा जाहिर कर चुके हैं। वह कह चुके हैं : ‘हम घुसपैठियों को अपना वोट बैंक नहीं मानते। हमारे लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है। हम सुनिश्चित करेंगे कि प्रत्येक हिंदू और बौद्ध शरणार्थी को भारत की नागरिकता मिले।’

ग़ौर करने की बात है कि घुसपैठियों (यानी मुसलमानों) की तुलना दीमक से किये जाने और उन्हें ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा’ बताये जाने के बाद देश के कई हिस्सों में मुसलमानों पर जानलेवा हमले बढ़े हैं। अमित शाह या नरेंद्र मोदी या भाजपा की निगाह में बांग्लादेश से भारत आया हुआ हिंदू या बौद्ध घुसपैठिया नहीं,शरणार्थी है, और वह भारत की नागरिकता का हक़दार है। जबकि ऐसी ही स्थिति में बांग्लादेश से भारत आया हुआ मुसलमान शरणार्थी नहीं, घुसपैठिया है, और उसे निकाल बाहर किया जाना चाहिए। जिस तरह की हिंसक और डरावनी भाषा अमित शाह बोल रहे हैं, उससे हिटलर के नाज़ी जर्मनी-जैसा ख़ौफनाक नज़ारा दिखायी देने की आशंका पैदा हो गयी है। आज असम, कल पूरा देश!

असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने का काम लगभग पूरा हो चला है और इसे 31 जुलाई 2019 को अंतिम रूप से प्रकाशित कर दिया जायेगा। फिर यह बाध्यकारी सरकारी दस्तावेज़ बन जायेगा, जिसके आधार पर उन लोगों की धरपकड़, गिरफ्तारी और देश से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू होगी,जिनके नाम एनआरसी में नहीं हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से, जिसकी निगरानी में एनआरसी तैयार करने का काम चल रहा है, एनआरसी प्रकाशित करने की समय सीमा को और आगे बढ़ाने की मोहलत मांगी है।

क्या आपको पता है, एनआरसी में कितने लोगों के नाम नहीं शामिल हो पाये या छूट गये? 41 लाख से ऊपर! जी हां, असम की कुल आबादी 3 करोड़ 29 लाख में से 41 लाख से ज्यादा लोगों के नाम एनआरसी में नहीं हैं, ‘गायब’ हैं। यानी असम में एक ज़माने से रह रहे 41 लाख से ज़्यादा लोग नरेंद्र मोदी-अमित शाह-भाजपा की निगाह में भारत के नागरिक नहीं हैं और वे ग़ैर-कानूनी तरक़े से घुसपैठ करके असम में रह रहे हैं। असम के इन बाशिंदों को, जो सत्तर-अस्सी-सौ सालों से असम में रहते आये हैं, एक झटके में ग़ैर-मुल्की व ग़ैर-वतनी बता दिया गया है। इनकी जगह नज़रबंदी केंद्रों/यातना केंद्रों में है, जहां उनका इंतजार हो रहा है। असम में नज़रबंदी केंद्र (डिटेंशन सेंटर) बनाने का काम तेज़ी से चल रहा है। इन नज़रबंदी केंद्रों की नारकीय स्थितियां किसी नाज़ी यातना केंद्र से कम नहीं हैं। पिछले साल जुलाई से लेकर इस साल जून तक असम में कम-से-कम 40 लोग आत्महत्या कर चुके हैं, यह सोचकर कि एनआरसी में नाम न होने पर उन्हें कैसी यातना झेलनी होगी।

ऐसी स्थिति में नाज़ी जर्मनी के यातना केंद्रों (कंसंट्रेशन कैंप) की याद क्यों नहीं आयेगी! आज जो प्रयोग असम में हो रहा है, भाजपा उसे आने वाले दिनों में पूरे देश में दोहराने की तैयारी कर रही है। अपने लोकसभा चुनाव घोषणापत्र (2019) में वह कह चुकी है कि एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जायेगा। इससे गृहयुद्ध-जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, इसकी चिंता उसे नहीं है। देश के नागरिकों से सबूत मांगा जा रहा है कि साबित करो कि तुम देश के नागरिक हो! और अगर तुम मुसलमान हो, तो पक्के तौर पर संदेहास्पद हो!

पिछले साल 30 जुलाई को जब एनआरसी का आख़िरी मसौदा जारी किया गया था, तब उसमें असम के 40 लाख से ऊपर बाशिंदों के नाम नहीं थे। बाद में इसमें एक लाख से ऊपर और लोग जुड़े—‘गायब’ नामों की सूची में। ये ‘गायब’ या ‘ग़ुमशुदा’ लोग वे हैं, जो असम में अपने निवास के सबूत के तौर पर काग़ज़ का एक छोटा टुकड़ा नहीं दिखा पाये। इनमें 80 प्रतिशत से ज़्यादा लोग मुसलमान हैं, अत्यंत ग़रीब हैं और उनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा है। ये वे लोग हैं, जो आये दिन प्राकृतिक व मनुष्य-निर्मित विपत्तियों का सामना करते रहे हैं। इन अत्यंत ग़रीब और वंचित लोगों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे पचास-सत्तर-अस्सी साल तक अपने काग़ज़ात संभाल कर रखें! यह बात अमीरपरस्त सरकार व अमीरज़ादे कभी नहीं समझ सकते।

(लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

Assam
NRC Assam
Language Wars in Assam
BJP
modi sarkar

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Farmers
    भारत डोगरा
    किसानों की मांगें सही हैं: खाद्य क्षेत्र पर कॉर्पोरेट नियंत्रण बढ़ता जा रहा है
    04 Oct 2021
    पोषक तत्वों का संचार करना कृषि और खाद्य क्षेत्र पर कंपनियों के बढ़ते प्रभाव का एक और संकेत है। इससे उपभोक्ताओं और कृषकों को नुकसान पहुंचेगा।
  • Purvanchal in protest against Lakhimpur incident
    विजय विनीत
    लखीमपुर कांड के विरोध में पश्चिमी से लेकर पूर्वांचल तक आंदोलन, धरना-प्रदर्शन
    04 Oct 2021
    पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में संयुक्त किसान मोर्चा जमकर प्रदर्शन किया। किसानों को उपद्रवी करार देने पर बनारस से निकलने वाले अखबार की प्रतियां भी फूंकी। मोदी के गोद लिए गांव नागेपुर…
  • Abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसानों में आक्रोश, प्रियंका अखिलेश का हल्लाबोल
    04 Oct 2021
    'न्यूज चक्र' के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा, लखीमपुर खीरी में हुई 4 किसानों की हत्या पर बात कर रहे हैं, साथ ही बीजेपी के नेताओं के द्वारा किसानों के प्रति हिंसा के लिए उकसाए जाने और…
  • Analysing India’s Climate Change Policy
    सिद्धार्थ चतुर्वेदी
    भारत की जलवायु परिवर्तन नीति का विश्लेषण
    04 Oct 2021
    भारत की जलवायु परिवर्तन नीति की शुरुआत 2008 से मानी जा सकती है, जब जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री की परिषद (परिषद) द्वारा जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) की घोषणा की गई थी। 
  • Rakesh Tikait
    असद रिज़वी
    लखीमपुर कांड: किसानों के साथ विपक्ष भी उतरा सड़कों पर, सरकार बैकफुट पर आई, न्यायिक जांच और एफआईआर की शर्त पर समझौता
    04 Oct 2021
    कई घंटे चली बातचीत के बाद किसान नेता राकेश टिकैत की मौजूदगी में सरकार और किसानों के बीच समझौता हो गया है। प्रत्येक मृतक के परिवार को 45 लाख के मुआवजे के अलावा घटना की “न्यायिक जांच” और 8 दिन में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License