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भारत
राजनीति
असमः नागरिकता छीन जाने के डर लोग कर रहे आत्महत्या, एनआरसी की सूची 30 जुलाई तक होगी जारी
कार्यकर्ताओं ने लोगों को "संदिग्ध" की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया है और आरोप लगाया है कि कुछ लोगों को इसमें आसानी से शामिल कर दिया गया है।
तारिक अनवर
13 Jul 2018
NRC

असम के ग्रामीण और साथ ही साथ शहरी क्षेत्र के कई हिस्सों में सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक बेचैनी और मानसिक तथा भावनात्मक असुरक्षा कथित तौर पर बढ़ रही है क्योंकि यहां नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के अपडेट का दूसरा चरण और आख़िरी ड्राफ्ट 30 जुलाई तक जारी किया जाएगा। इसको लेकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अधिकारियों ने इन आत्महत्याओं के पीछे वास्तविक कारणों को बताने से इंकार कर दिया। मृतकों के परिवारों और रिश्तेदारों ने आरोप लगाया कि ये घटनाएं 'संदिग्ध मतदाता' (डी-मतदाता) या ग़ैर राष्ट्रीय या विदेशी घोषित होने या जेल भेजने के डर से जुड़ा मामला है। ख़ैर ऐसा लगता है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य में व्यक्तिगत, परिवार और सामाजिक ज़िंदगी हाशिए पर है।

बोंगाईगांव के जोगिगोपा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के ओडुबी गांव के निवासी अज़बहर अली (52) की पत्नी बलिजन बीबी (45) ने क़ानूनी लड़ाई और परिवार के ख़र्च में असमर्थता के चलते इस महीने आत्महत्या कर ली।

वर्ष 1985 से अजबहर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान कर रहा था। इसी साल से उसका नाम पहली बार चुनावी सूची में आया था। उसके नाम (अज़बहर के बजाए अज़हर) में लिपिकीय ग़लती के चलते उसे 'डी-मतदाता' के रूप में सूचीबद्ध किया गया था और साल 2012 में उसे विदेशी ट्रिब्यूनल से नोटिस मिला।

अज़बहर ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित हुआ था और 1985 से मतदाता सूची, मतदाता पहचान पत्र और 1951 का एनआरसी समेत सभी दस्तावेज जमा कर चुका था। इस एनआरसी में उसके दादा-दादी के नाम का उल्लेख था। जब उसके मामले की सुनवाई हो रही थी तो उसे दो और नोटिस मिला जिसमें उसे नागरिकता साबित करने के लिए कहा गया था। चूंकि मामले पर सुनवाई चल रही थी इसलिए उसने अन्य नोटिस का जवाब नहीं दिया। विडंबना यह है कि उसे कथित तौर पर विदेशी घोषित कर दिया गया और 16 जून, 2016 को जेल में डाल दिया गया।

अपने परिवार में ख़र्च उठाने वाला यह एकमात्र व्यक्ति था। उसके जेल में जाने के बाद परिवार का ख़र्च चलाने के लिए उसकी पत्नी घरेलू सहायिका के रूप में काम करने लगी। लेकिन वह इस ख़र्च के बोझ को नहीं उठा सकी और अपनी ज़िंदगी समाप्त कर ली। परिवार में चार नाबालिग बच्चे हैं।

लोगों को 'डी-मतदाता' के रूप में सूचीबद्ध करने के कथित रूप से दोषपूर्ण और पक्षपातपूर्ण कार्य साफ तौर पर परिवारों में दरार पैदा कर रहा है और संबंध तोड़ रहा है।

जब दुबरी ज़िले के बिद्यारडबरी गांव के अवला राय को 'डी-मतदाता' के रूप में शामिल किया गया और उसे नोटिस मिली तो उसके पास मुकदमा लड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। लेकिन उसका पति एक मजदूर था और आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी कि वह मुकदमा लड़ सके। इससे परिवार में एक लड़ाई होने लगी। वे अक्सर झगड़ते थे। 7 जुलाई को उसने गुस्से में अपनी पत्नी से झगड़ा किया और अगले दिन आत्महत्या कर लिया।

निसिलामरी गांव का रहने वाला गोपाल दास (65) 12 जून को अपने घर के पास के जंगल में मृत पाया गया था। स्थानीय लोगों ने कहा कि 'डी-मतदाता' उसे घोषित किए जाने के बाद वह परेशान था। उसने कथित तौर पर पहचान खोने के डर से आत्महत्या कर लिया।

मृतक के बेटे गणेश दास ने कहा कि "विदेशी ट्रिब्यूनल ने उन्हें एक नोटिस जारी किया था। इस नोटिस के जवाब के लिए एक वकील सहमत हुए और हमने उन्हें 300 रुपये का भुगतान किया। जब कार्यवाही शुरू हुई तो हमें तीसरे सुनवाई में हमारे वकील और मजिस्ट्रेट ने कहा कि किसी को ज़मानत के लिए तलाश करो क्योंकि हमारी गिरफ्तारी की संभावना थी। हमें हिरासत से बचने के लिए वैकल्पिक रूप से 15,000 रुपये का भुगतान करने के लिए कहा गया था।"

गोपाल की बेटी शेफाली (29 वर्ष) को भी एक नोटिस मिला जिसमें उसे भारतीय नागरिक के रूप में अपनी पहचान साबित करने के लिए कहा। अपनी इस परेशानियों में इज़ाफा करते हुए उसने कहा कि "यह मेरे पिता को और परेशान कर दिया और उन्होंने ये ख़तरनाक क़दम उठाया।"

तंगला पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई है जहां शिकायतकर्ता ने वकील और न्यायाधीश पर रिश्वत लेने के आरोप लगाया है।

पुलिस ने गोपाल के आत्महत्या करने की पुष्टि की लेकिन इस घटना की वजह पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया जिसने उसे आत्महत्या करने के लिए उकसाया था।

गोपाल का नाम 1966 में मतदाता सूची में शामिल किया गया था। उसके भारतीय नागरिकता स्थापित करने के लिए दस्तावेज होने के बावजूद 2016में मतदान से उसे रोक दिया गया था।

बारपेटा ज़िले के शतागांव के रहने वाले ललसन अली को 'डी-मतदाता' घोषित करने के बाद उसने 23 मार्च को फांसी लगा ली। बेटे मुकेशेद अली ने कहा, "पैतृक लीगेसी साबित करने के लिए लीगेसी डेटा, मतदाता पहचान पत्र और पैन कार्ड जैसे आवश्यक कागजात होने के बावजूद वह बहुत डर गया था। ऐसा लगता है कि उसको किसी ने बताया था कि वह अपनी राष्ट्रीयता खो देगा।"

खैरुल इस्लाम की पत्नी सहिमून बीबी ने कथित तौर पर 11 अप्रैल को फांसी लगा ली क्योंकि वह नागरिकता साबित करने के लिए ज़रूरी लीगेसी डेटा नहीं दे पाई थी। उसके पिता काम करने के लिए बिहार से असम प्रवास कर गए थे। अब उसके पांच भाई बहन और उसका परिवार भी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए भारी दबाव में है।

आत्महत्या की यह सूची यहीं खत्म नहीं होती है; पिछले कुछ महीनों में आत्महत्या की ऐसी कई घटनाएं सामने आई है।

अंतर्देशीय जल परिवहन विभाग के एक सरकारी कर्मचारी रतन राय ने गुवाहाटी के पांडु में कॉलोनी नं. 4 में फांसी लगा लिया। वह आवश्यक सभी कागजात पैश करने में नाकाम रहा था। उसे डर था कि उसका नाम आख़िरी ड्राफ्ट में शामिल नहीं किया जा सकता है।

दैनिक मज़दूरी करने वाला अनवर हुसैन (37) को 1 दिसंबर को एनआरसी सेवा केंद्र से एक नोटिस मिला और उसे 9 वर्षीय बेटी जहांरा खातुन का उचित जन्म प्रमाण पत्र जमा करने के लिए कहा गया था। वह खुद को असहाय महसूस किया क्योंकि उसे पता नहीं था कि जन्म प्रमाण पत्र कैसे हासिल किया जाए। वह प्राथमिक विद्यालय गए जहां उसकी बेटी चार साल पहले दाख़िला ली थी। लेकिन स्कूल ने उसे अन्य जानकारी जमा करने के लिए कहा ताकि वह प्रमाण पत्र जारी कर सके।

उसने कथित तौर पर कीटनाशक खाकर आत्महत्या कर लिया।

स्थानीय लोगों ने कहा कि उसके पास 1966 के चुनावी नामांकन में उसकी और उसकी पत्नी के पिता के नाम वाले दस्तावेज़ थे। लेकिन उसने सोचा कि उसकी बेटी को बांग्लादेश निर्वासित कर दिया जाएगा।

1 जनवरी को हनीफ खान (40) कचार ज़िले में काशीपुर (भाग -2) में अपने घर के पास एक पेड़ से लटका हुआ पाया गया। वह पेशे से ड्राइवर था और अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ एक किराए के घर में रह रहा था। वह मूल रूप से पेलापूल का रहने वाला था।

स्थानीय निवासियों के मुताबिक़, एनआरसी के पहले ड्राफ्ट में उसका नाम नहीं होने के बाद हनीफ ने आत्महत्या की। उसकी पत्नी रक्सा खान ने कहा कि उसका पति एनआरसी मामले को लेकर चिंतित था और हमेशा सोचता था कि क्या होगा अगर उसके नाम एनआरसी में शामिल नहीं होगा।

गांव में रक्सा एक फोटोस्टैट की दुकान में काम करती है। उसने कहा कि उसका पति हाल के दिनों में बाहर जाने से डरता था और अगर वह आसपास किसी भी पुलिस वाहन को देखता तो तुरंत घर लौट आता।

हनीफ 1 जनवरी को करीब 7 बजे गायब हो गया था और उसका शव अगले दिन सुबह 6.50 बजे मिला। कचार एसपी राकेश रौशन ने पुष्टि की कि यह आत्महत्या का मामला था।

अक्सर जो लोग पढ़ या लिख नहीं सकते हैं वे अफवाहों पर विश्वास करते हैं कि उन्हें बांग्लादेश भेजा जा सकता है यदि उनका नाम नागरिकों की रजिस्टर में नहीं पाए जाता है। ग़रीब और अशिक्षित लोगों में एक मनोविज्ञान स्थिति बन गई है क्योंकि कई ने महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेजों को नहीं रखा है या खो दिया है।

आम शिकायतें हैं कि चुनाव आयोग के अधिकारी और सीमा पुलिस - सत्यापन अधिकारी - पक्षपात करते हैं और अपनी ज़िम्मेदारी को सही तरीके से निर्वहन नहीं कर रहे हैं। उनके अधिकारी जांच प्रक्रिया के दौरान बांग्ला भाषी हिंदुओं और मुस्लिमों के नाम अचानक ले लेते हैं और उन्हें 'डी-मतदाता'के रूप में वर्गीकृत कर देते हैं।

इस पहचान प्रक्रिया ने असम में नागरिकों को वर्षों से परेशान किया है। साल 1997 में भारत के निर्वाचन आयोग ने राज्य में गैर-नागरिकों से नागरिकों को अलग करने की कोशिश में मतदाताओं की सूची की जांच शुरू कर दी। अक्षर 'डी' उन लोगों के ख़िलाफ़ चिह्नित किया गया था जिनके दस्तावेज विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए नियुक्त अधिकारियों द्वारा सत्यापन के लिए जारी करने में अपर्याप्त थे।

मतदाताओं की सूची से इस 'डी' को तब हटा दिया जाता है जब विदेशी ट्रिब्यूनल जांच के बाद घोषणा करती है कि उक्त व्यक्ति भारतीय नागरिक है। चुनाव आयोग संबंधित ज़िलों में सीमा पुलिस के अधीक्षक को इस 'डी' मामले को भेजता है जो उसे विदेशी ट्रिब्यूनल को भेजता है।

एनआरसी एक महत्वपूर्ण कार्य है जो असम में राज्य के नागरिकों की सूची बनाने के लिए चल रहा है। ये सूची आखिरी बार 1951 में बनाई गई थी और इसे अपडेट करने के लिए एक समझौता 2005 में फिर हुआ था। राज्य में पूर्व कांग्रेस सरकार ने आखिरकार 2015 में ये काम शुरू किया था। लेकिन बड़े चुनावी घमासान में अवैध आप्रवासियों की मदद से जीती बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार से एनआरसी को गति मिली है।

सुप्रीम कोर्ट असम में अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया की निगरानी कर रहा है। रजिस्टर पर काम करने वाले अधिकारियों को 21 मार्च, 1971 तक या उससे पहले राज्य में निवास को साबित करने की प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता के आधार पर असम में रहने वाले लोगों की नागरिकता का पता लगाना होगा।

कार्यकर्ताओं ने कुछ लोगों को 'संदिग्ध' के रूप में पहचानने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया है और आरोप लगाया है कि कुछ लोगों को आसानी से इसमें शामिल किया गया। विदेशियों पर श्वेत पत्र के अनुसार, 2006 और जुलाई 2012 के बीच 45,456 मामलों में से केवल 12, 913 लोग विदेशी पाए गए थे। इसका मतलब है कि क़रीब 75 प्रतिशत वास्तविक भारतीय होने का आकलन किया गया था। 2016 तक की अवधि में करीब 6,21,688 लोगों को'संदिग्ध मतदाता' के रूप में घोषित किया गया था। और फरवरी 2017 में असम के संसदीय मामलों के मंत्री चंद्र मोहन पटोवरी ने कहा कि 4,44,18 9 लोगों को उनकी स्थिति का आकलन करने के लिए ट्रिब्यूनल को भेजा गया था।

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला के खुलासे के बाद ये स्थिति और भयावह हो गई। उन्होंने कहा कि 50,000 लोगों को'संदिग्ध' सूची में शामिल किया गया है और विदेशी घोषित किया गया है और अंतिम मसौदे से हटा दिया जाएगा। इस साल 2 मई को एनआरसी कार्यालय ने सीमा पुलिस के अधीक्षक को उन लोगों के भाई बहनों को हटाने करने का निर्देश दिया जिन्हें अंतिम सूची से 'डी-मतदाता' या विदेशी घोषित किया गया है। वकीलों और कार्यकर्ताओं ने कहा कि इसका मतलब है कि 32 लाख लोगों को नागरिकता विवाद का सामना करना पड़ सकता है।

लगभग 68.21 लाख परिवारों के अब तक 3.27 करोड़ से अधिक लोगों ने एनआरसी में शामिल करने के लिए आवेदन जमा कर दिए हैं।

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