NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कृषि संकट के चलते बुरे हाल में एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला
सोनपुर का पशु मेला समाप्त हो रहे मवेशियों की कई नस्लों से अटा पड़ा है।
सौरव कुमार
21 Nov 2019
sonpur animal fair

बिहार के सारण ज़िले के सोनपुर में गंगा और गंडक के संगम पर लगने वाला हरिहर क्षेत्र मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। यह भारत के बड़े आयोजनों में से एक है। यहां दूर-दूर से किसान और पुशपालक आते हैं। लगभग हर किस्म के मवेशी की यहां ख़रीद-बिक्री होती।

कार्तिक महीने की 15 तारीख से शुरू होने वाले इस मेले का किसान और पशुपालक बेसब्री से इंतजार करते हैं। 25-30 दिनों तक चलने वाला ये मेला बिहार की राजधानी पटना से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। इस साल मेले का उद्घाटन 11 नवंबर को हुआ था और यह 11 दिसंबर तक चलेगा।

इस साल सोनपुर मेले में सबकुछ ठीक नहीं है। मेले में ख़रीदार नहीं हैं। सारण के एक पशु व्यापारी मोहम्मद राजा कहते हैं, वे अपने साथ दस गाय लाए हैं लेकिन शायद ही किसी ख़रीदार ने उनसे इन गायों की बिक्री के बारे में पूछताछ की है।

राजा कहते हैं कि कुछ साल पहले उन्होंने सोनपुर में पहले सात दिनों में कम से कम 50 गाय बेची थी। आज स्थिति बिल्कुल उलट गई है। वे कहते हैं, “अभी तक मैंने एक भी गाय नहीं बेची है। तेजी से आर्थिक गिरावट आई है जिसके कारण कोई भी न तो ख़रीद रहा है और न हीं पूछताछ कर रहा है”।

इस मेले में राजा ने 30,000 रुपये की जगह ली है वहीं तम्बू के लिए 10,000 रुपये अदा किया है। अगर उनकी गायें और बछड़े नहीं बिकते हैं तो उनको 1.5 या 2 लाख रुपये के उपर का नुकसान हो सकता है।
1_7.JPG
सोनपुर मेले में मौजूद मवेशी व्यापारी मोहम्मद राजा।

गो-रक्षकों की भीड़ का डर एक अन्य मामला है जिससे गायों की मांग में कमी आ रही है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें देखा गया है कि बिहार में व्यापारी जब गायों को ले रहे थे या चरा रहे थे तो भीड़ द्वारा कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। सभी प्रकार के दुधारू पशुओं का व्यापार हिंसक भीड़ और खरीदारों और विक्रेताओं के बीच पैदा हुए भय से बर्बाद हो गया है। राजा जैसे व्यापारी अगर अपने मवेशियों को बेचने में सक्षम नहीं हैं तो उन्हें अपने भारी बोझ के साथ मुश्किल वापसी का सामना करना पड़ेगा।

एक समय था जब सोनेपुर मेले में लगभग 35,000 बैल और 10,000 या इससे अधिक गाय और भैंस होते थे। आधुनिक उपकरणों ने बैलों को खेती के लिए अप्रासंगिक बना दिया है। इस तरह इसकी संख्या मेले में कम हो रही है। लेकिन अधिक दुग्ध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध पंजाब और हरियाणा की गायें सोनपुर मेले की शान थी।

नब्बे के दशक में कहा जाता था कि जब मेला लगता था तो दूध की दरिया बहती थी। यह दूध को लेकर एक संदर्भ था। जब ख़रीदार गाय ख़रीदने के लिए आते थे तो उन्हें मवेशी की उत्पादकता दिखाने के लिए दूध निकालते थे। आज गायों और गायों को बढ़ावा देने के तरीकों की दीवानगी दोनों ही लगभग गायब हो चुके हैं।

सोनपुर में दो एकड़ के भूखंड पर घोड़े बेचे जाते हैं जो अभी भी मौजूद है। इस साल यहां लगभग 1,500 घोड़े बिक्री के लिए आए हैं। सच कहें तो घोड़े का क्षेत्र लोगों को आकर्षित कर रहा है। पहले के वर्षों में 5,000 से 6,000 घोड़े यहां खरीदे या बेचे जाते थे, लेकिन अब मांग कम हो गई है।

सोनपुर के मेले में सबसे ज़्यादा कीमत वाला घोड़ा चेतक है जिसकी क़ीमत 10 लाख रुपये रखी गई है। वह खगड़िया ज़िले के परबत्ता से आने वाले मालिक परमानंद चौधरी के बगल में खड़ा है। वह पिछले चार सालों से चेतक के साथ मेले में आ रहे हैं जिसने बिहार में 85 से अधिक रेस जीती हैं। पिछले साल चेतक ने सोनपुर में आयोजित वार्षिक दौड़ में बाहुबली विधायक अनंत सिंह के घोड़े को हराया था। क़ीमत के बारे में बात करते हुए चौधरी कहते हैं, “मैंने कुछ साल पहले वडोदरा से चेतक ख़रीदा था। वह मुझे बहुत प्यारा है। उसने हमारे घर को पदकों और ट्राफियों से भर दिया है।'
3_3.JPG
चेतक के मालिक परमानंद चौधरी घोड़े के साथ खड़े हुए। यह सोनपुर मेले का सबसे महंगा घोड़ा है।

चौधरी के भतीजे छोटू अब चेतक की सवारी करते हैं। चेतक हर रोज़ चार किलो दूध, 1.5 किलो शुद्ध घी, 2.5 किलो चना, 100 बादाम और 100 ग्राम शहद पीता है। इस तरह हर महीने इस पर 50,000 रुपये खर्च होते हैं। वे कहते हैं कि अब चेतक जैसे घोड़े को रखना मालिक के स्टेटस का केवल एक छाप हो सकता है।

बकरी का बाजार तो किसी तरह बचा हुआ है। मध्य उत्तर प्रदेश के रायबरेली के एक बकरा व्यापारी सत्तार वारसी एक महीने से मेले में डेरा डाले हुए है। वे कहते हैं, "पिछले वर्षों की तुलना में बाज़ार धीमा है, लेकिन गायों या भैंसों की तुलना में बकरियों की मांग अभी भी ज़्यादा है।" सोनपुर मेले में ज़्यादा दिनों तक रुकने के चलते वे चाहते हैं कि जितना ज़्यादा से ज़्यादा हो सके कमाई हो जाए। इस तरह, वे जान पाएंगे कि अगले साल के मेले में आना सार्थक होगा या नहीं।
4_1.JPG
उत्तर प्रदेश रायबरेली के बकरा व्यापारी सत्तार वारसी।

प्रसिद्ध रहा सोनपुर मेला का हाथी बाज़ार इस साल शुरू होने के छह दिन बाद ही ख़त्म हो गया। हाथी बाज़ार के लिए अपनी ज़मीन देने वाले गोपाल शंकर सिंह कहते हैं ये व्यापार अपनी चमक-दमक खो रहा है। इसका कारण हाथियों की ख़रीद-बिक्री पर रोक लगाने वाला वन विभाग और स्थानीय प्रशासन है।

कहा जाता है कि 1,000 साल पुराना हाथियों का व्यापार मेले का एक पवित्र प्रतीक माना जाता है। 2003 तक सोनपुर मेला तभी शुरू होता था जब हाथियों को कार्तिक की शुरुआत के पहले पूर्णिमा के दिन औपचारिक स्नान कराया जाता था।

अब ये परंपराएं लगभग ख़त्म हो चुकी है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 को सख्ती से लागू किया जा रहा है। हाथियों के लिए स्वामित्व प्रमाणपत्र हस्तांतरित करने में रुकावट है।

गोपालगंज ज़िले के निवासी भूपेंद्र सिंह के स्वामित्व वाला हाथी राजा बाबू 17 नवंबर को मेला से जाने वाला आख़िरी हाथी था। सिंह ने न्यूज़़क्लिक से कहा, "यह स्वीकार करना दुखद है कि सोनपुर का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण का केंद्र रहे हाथी को महज़ एक हफ्ते में ही जाना पड़ा है।"
5_0.JPG
सोनपुर मेले का प्रवेश द्वार

मेले के दौरान सोनपुर आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए हाथी के दांत मुख्य आकर्षण होते थे। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस वर्ष विदेशी पर्यटकों की संख्या भी काफी कम है। 2001 में 92 विदेशी पर्यटक आए थें, 2015 में केवल 14 और इस साल हाथी देखने के लिए केवल सात पर्यटक आए थे। 12 से 16 नवंबर के बीच सोनपुर मेले में फ्रांस से आए 11 पर्यटक सहित 22 विदेशी पर्यटकों ने मेले का दर्शन किया।

सोनपुर मेले में बड़े समारोहों का प्रबंधन करना हमेशा कठिन था: मेले को सफल बनाने के लिए, सरकार से लेकर पंचायती राज संस्थाओं और सामुदायिक संगठनों के सभी हितधारकों को एक साथ आना होगा। इस मेले को आम तौर पर एक पारंपरिक मेला माना जाता है, लेकिन यह तीन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में दो से तीन मिलियन लोगों को आकर्षित करता है। अब सोनपुर के मेले का मूल चरित्र काफी बदल गया है। इसके पहले के ग्रामीण परिवेश खो गए हैं और यह अब सरकारी योजनाओं के प्रचार का एक मंच बन गया है। इसने अपनी ग्रामीण आकर्षण को भी खो दिया है और इसे सरकार को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक तकनीक और विरोधाभास से बदल दिया गया है।

लेखक बिहार के एक स्वतंत्र पत्रकार और शोधकर्ता हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Asia’s Largest Animal Fair Reels Under Agrarian Distress

Sonepur fair
Cattle Trade
Cow protection mobs
mob lynching in Bihar
Economic Downturn
BJP
RSS
Narendra modi
Nitish Kumar
jdu

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • Chhattisgarh
    रूबी सरकार
    छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय
    16 Feb 2022
    ‘अपना हक़ लेके रहेंगे, अभी नहीं तो कभी नहीं’ नारे के साथ अन्नदाताओं का डेढ़ महीने से सत्याग्रह’ जारी है।
  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License