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बाबरी मस्जिद विध्वंस : पहले कीचड़ में सूरज गिरा... गाँव के मचान गिरे... शहरों के आसमान गिरे
कैफ़ी का कहा ‘छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे’ इस दिन का एक स्थापित सत्य बन गया है। लेकिन वो पीढ़ी जो 6 दिसंबर, 1992 के बाद पैदा हुई वो बाबरी विध्वंस को किस तरह देखती-समझती है इसका बखूबी बयान किया है युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश ने।
न्यूज़क्लिक टीम
06 Dec 2018
babri masjid

मशहूर शायर मरहूम कैफ़ी आज़मी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस किस तरह देखा-समझा, वह आपने उनकी नज़्म (कविता) ‘दूसरा बनवास’ में पढ़ा होगा। उनका कहा- ‘छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे’ इस दिन का एक स्थापित सत्य बन गया है। ऐसा लगता है कि वाकई बाबरी विध्वंस पर बिल्कुल यही शब्द भक्तों के आराध्य राम ने कहे होंगे...। इस एक घटना ने देश का कितना बड़ा नुकसान किया उसका अंदाज़ा भी लगाना मुश्किल है। ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है। लेकिन वो पीढ़ी जो 6 दिसंबर, 1992 के बाद पैदा हुई वो नौजवान पीढ़ी इस सबको किस तरह देखती-समझती और समझाती है, इसका बेहद संजीदगी से बयान किया है भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से पुरस्कृत 1994 में बलिया में जन्में युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश ने। आइए पढ़ते हैं उनकी ये ज़रूरी कविता :-

 

सन् 1992

 

जब मैं पैदा हुआ 

अयोध्या में ढहाई जा चुकी थी एक क़दीम मुग़लिया मस्जिद 

जिसका नाम बाबरी मस्जिद था
ये एक महान सदी के अंत की सबसे भयानक घटना थी 
कहते हैं पहले मस्जिद का एक गुम्बद 
धम्म् की आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिरा था 
और फिर दूसरा और फिर तीसरा
और फिर गिरने का जैसे अनवरत् क्रम ही शुरू हो गया 
पहले कीचड़ में सूरज गिरा 
और मस्जिद की नींव से उठता ग़ुबार
और काले धुएँ में लिपटा अंधकार 
पूरे मुल्क पर छाता चला गया 
फिर नाली में हाजी हश्मतुल्लाह की टोपी गिरी 
सकीना के गर्भ से अजन्मा बच्चा गिरा
हाथ से धागे गिरे, रामनामी गमछे गिरे, खड़ाऊँ गिरे
बच्चों की पतंगे और खिलौने गिरे
बच्चों के मुलायम स्वप्नों से परियाँ चींख़तीं हुईं निकलकर भागीं 
और दंतकथाओं और लोककथाओं के नायक चुपचाप निर्वासित हुए 
एक के बाद एक 
फिर गाँव के मचान गिरे 
शहरों के आसमान गिरे 
बम और बारूद गिरे 
भाले और तलवारें गिरीं
गाँव का बूढ़ा बरगद गिरा 
एक चिड़िया का कच्चा घोंसला गिरा
गाढ़ा गरम ख़ून गिरा 
गंगा-जमुनी तहज़ीब गिरी 
नेता-परेता गिरे, सियासत गिरी 
और इस तरह एक के बाद एक नामालूम कितना कुछ 
भरभरा कर गिरता ही चला गया 
" जो गिरा था वो शायद एक इमारत से काफ़ी बड़ा था.."
कहते-कहते अब्बा की आवाज़ भर्राती है 
और गला रुँधने लगता है
इस बार पासबाँ नहीं मिले काबे को सनमख़ाने से
और एक सदियों से मुसलसल खड़ी मस्जिद 
देखते-देखते मलबे का ढेर बनती चली गयी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर 
हाँ, उसी हिन्द पर जिसकी सरज़मीं से मीर-ए-अरब को ठंडी हवाएँ आती थीं 
वे कहाँ हैं ?
मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि और कितने सालों तक गिरती रहेगी 
ये नामुराद मस्जिद
जिसका नाम बाबरी मस्जिद है 
और जो मेरे गाँव में नहीं 
बल्कि दूर अयोध्या में है
मेरे मुल्क़ के रहबरों और ज़िंदा बाशिंदों बतलाओ मुझे 
कि वो क्या चीज़ है जो इस मुल्क़ के हर मुसलमान के भीतर 
एक ख़फ़ीफ़ आवाज़ में न जाने कितने बरसों से 
मुसलसल गिर रही है 
जिसके ध्वंस की आवाज़ अब सिर्फ़ स्वप्न में ही सुनाई देती है ! 

  • अदनान कफ़ील दरवेश
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