NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
बढ़ती मंदी, जाता रोज़गार
देश में बढ़ती मंदी की वजह से नौकरियाँ जा रही हैं। विभिन्न क्षेत्रों में एक बड़ी आबादी का रोज़गार छिन चुका है, लेकिन मौजूदा सरकार इसे सिर्फ़ एक अफ़वाह का नाम दे रही है।
सुनील कुमार
23 Aug 2019
unemployment

आर्थिक मंदी की अफ़वाह फैलाना अर्थव्यवस्था को चौपट करने की साज़िश है।

- वित्त मंत्री, निर्मला सीतारमण (20 अगस्त, 2019)

जून 2019 के बाद आर्थिक गतिविधियों से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि

भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ रही है।

- भारतीय रिज़र्व बैंक गवर्नर  (7 अगस्त, 2019)

कुछ लोग मंदी की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह मंदी देखने को बेताब हैं।

- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

अगस्त, 2019 में दो लोगों का बयान आया। एक तो विश्व के ‘सुपर पावर’ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के द्वारा कहा गया कि अमेरिकी व्यवस्था मंदी में नहीं है और कुछ लोग मंदी की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह मंदी देखने को बेताब हैं। दूसरा वक्तव्य विश्व के सबसे बड़े ‘लोकतंत्र’ की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का, उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि देश में आर्थिक मंदी की अफ़वाह फैलाना अर्थव्यवस्था को चौपट करने कि साज़िश है बल्कि राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने की एक कुटिल चाल भी है।

एक तरफ़ तो ट्रंप 18 अगस्त को कहते हैं कि अमेरीकी इकॉनामी की सेहत अच्छी है लेकिन दूसरे दिन ही 19 अगस्त को कहते हैं कि अमेरीका फ़ेडरल रिज़र्व (अमेरीका का सेंट्रल बैंक) को संकट के दौरान चलाए जाने वाले ‘मनी-प्रीटिंग’ कार्यक्रम की तरफ़ लौटना चाहिए। ब्याज कम नहीं करने पर ट्रंप ने फ़ेडरल रिजर्व बैंक के प्रमुख जेरोम पॉवेल की आलोचना की है और एक ट्वीट में ‘क्लूसेस’ की संज्ञा दी है। 2.1 प्रतिशत की वार्षिक गति से बढ़ रही अमरीकी अर्थव्यवस्था बीती तिमाही में कम हुई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की बात पर हंसा ही जा सकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का वक्तव्य कि ‘'अर्थव्यवस्था को चौपट करने कि साज़िश है’’ ट्रम्प के बयान से भी ज़्यादा हास्यस्पद लगता है।

नेशनल सेंपल सर्वे (एनएसएसओ) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में बेरोज़गारी दर 45 साल में सबसे अधिक 6.1 प्रतिशत हो गई है जबकि कुछ शोध, बेरोज़गारी की दर 8 प्रतिशत से भी अधिक बता रहे हैं। ख़ुद रिज़र्व बैंक के गवर्नर 3-6 जून, 2019 की मौद्रिक नीति समिति की समीक्षा बैठक में कह चुके हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्पष्ट तौर पर अपनी रफ़्तार खो रही है। इसी बैठक में रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा कि ‘‘आर्थिक वृद्धि की तस्वीर मिली जुली है।

विकास दर को छह प्रतिशत से घटाकर 5.75 प्रतिशत करने के पक्ष में हूं’’ जिसका समर्थन समिति के अन्य तीन सदस्य रविंद्र एच. ढोलकिया, पामी दुआ और चेतन घाटे ने भी किया। 7 अगस्त, 2019 की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि ‘‘जून 2019 के बाद आर्थिक गतिविधियों से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ रही है।’’ वित्त मंत्री जी क्या आरबी आई के गवर्नर भी अफ़वाह फैला कर अर्थव्यवस्था चौपट करना चाहते हैं, आपकी नज़र में वह भी साज़िशकर्ता हैं?

मंदी की मार

कृषि क्षेत्र के बाद सबसे ज़्यादा (प्रत्यक्ष और अप्रत्क्ष रूप से 10 करोड़ लोगों को) रोज़गार मुहैया कराने वाले टेक्सटाइल (कपड़ा) सेक्टर की हालत ख़राब है। नॉर्दन इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन के मुताबिक़ भारतीय कपड़ा उद्योग सबसे बड़े संकट से गुज़र रहा है। केंद्रीय व राज्य जीएसटी और दूसरी टैक्सों की वजह से भारतीय धागा (यार्न) इंटरनेशनल मार्केट में प्रतिस्पर्धा के लायक नहीं रह गया है।

अप्रैल से जून की तिमाही में कॉटन धागा के निर्यात में साल दर साल 34.6 प्रतिशत की कमी हुई है। जून महीने में तो इसमें 50 प्रतिशत तक गिरावट आ चुकी है जिसके कारण कपड़ों के लिए धागा तैयार करने वाली एक तिहाई मिलें बंद हो गई हैं। इस मंदी से किसानों पर भी ख़तरा मंडरा रहा है, क्योंकि धागा तैयार करने वाली मिलों के पास कपास ख़रीदने के लिए पैसे नहीं हैं। ‘नॉर्दन इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन’ ने 20 अगस्त, 2019 को अख़बार में विज्ञापन देकर बताया है कि उनके व्यापार में 34.6 प्रतिशत की गिरावट आई है। टेक्सटाइल एसोसिएशन ने कहा है कि इसके कारण 25-50 लाख नौकरियां जायेंगी।

मोदी जी ने 7 फ़रवरी, 2019 को संसद में अपने सरकार का बचाव करते हुए कहा था कि ‘‘अकेले परिवहन सेक्टर में एक करोड़ 25 लाख लोगों को रोज़गार के नये अवसर मिले हैं। चार साल में 36 लाख ट्रक या व्यापारिक वाहन बिके हैं। डेढ़ करोड़ यात्री वाहन और 27 लाख से ज़्यादा ऑटो की बिक्री हुई है।’’ उन्होंने विपक्ष पर तंज़ कसते हुए कहा कि ‘‘ये सारी गाड़ियाँ ख़रीदने वालों ने शोभा के लिए तो इन्हें नहीं ख़रीदा होगा। किसी चालक को तो रोज़गार मिला होगा, किसी मैकेनिक को तो रोज़गार मिला होगा।’’

फ़ेडरेशन ऑफ़ आटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फ़ाडा) के अध्यक्ष आशीश हर्षराज काले कहते हैं कि "बिक्री में गिरावट की वजह से डीलरों के पास मज़दूरों की छंटनी का ही विकल्प बचा है। अप्रैल तक 18 माह की अवधि के दौरान 271 शहरों में 286 शोरूम बंद हुए हैं, जिसमें 32,000 लोगों की नौकरी गई है। अप्रैल के बाद तीन माह में डीलरशिप ने दो लाख मज़दूरों कि छंटनी की है।"

वाहन विनिर्माताओं के संगठन "सियाम" के आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में सभी श्रेणियों में वाहनों की बिक्री 12.35 प्रतिशत की कमी आई है। बिक्री नहीं होने के कारण टीवीएस ने दो दिन, हीरो मोटोकॉर्प चार दिन और वॉश लिमिटेड, टाटा मोटर्स और महिन्द्रा एंड महिन्द्रा कम्पनी भी मांग और उत्पादन में सामंजस्य बिठाने के लिए विनिर्माण कुछ दिनों के लिए बंद करने की घोषणा कर चुके हैं। जुलाई 2018 से जुलाई 2019 में वाहन के बिक्री में आई कमी इस प्रकार है- मारूति 36.29, हुंडई 10.28, टाटा 38.61, महिन्द्रा 14.91, होंडा48.67, टोयटा 23.79, टीवीएस 15.72, सुज़ुकी 16.96, बजाज 15.12, अशोक लिलेंड 28.89 प्रतिशत कमी आई है जिसके कारण क़रीब 10 लाख लोगों का रोज़गार जा चुका है। यही कारण है कि ऑटो सेक्टर के टॉप कम्पनी ‘बजाज’ के चेयरमैन राहुल बजाज शेयरधारकों की सालाना आम बैठक में कहते हैं कि ‘‘मुष्किल हालात से गुज़र रहे ऑटो सेक्टर के लिए क्या विकास आसमान से गिरेगा? सरकार कहे या न कहे लेकिन आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में विकास में कमी आई है।’’

केन्द्र व राज्य सरकार को करोड़ों का राजस्व देने वाला गिरडीह का लौह उद्योग आर्थिक मंदी को लेकर भयभीत है। लौह उद्योग का उत्पादन पिछले एक दशक की तुलना में सबसे अधिक निचले स्तर पर पहुंच चुका है। गिरडीह की हर टीएमटी फ़ैक्ट्री में जहां हर रोज़ 300 से 350 सौ टन का उत्पादन हुआ करता था। वह अब घटकर महज़ 100 से 160 टन तक ही रह गया है। इसी तरह के हालात रियल एस्टेट सेक्टर में है जहां 14 लाख मकान बनकर तैयार हैं लेकिन कोई ख़रीदार नहीं है।

पारले कंपनी के कैटेगरी हेड मयंक शाह ने कहा है कि ‘‘2017 में जीएसटी लागू होने के बाद से पारले के ‘पारले जी’ बिस्किट जैसे ब्रांड की बिक्री में कमी आई है। कर बढ़ने के कारण पारले को हर पैकेट में बिस्किटों की संख्या कम करनी पड़ रही है, जिसकी वजह से ग्रामीण भारत के निम्न आय वाले ग्राहकों की मांग पर असर पड़ रहा है। इसके कारण कंपनी के सबसे ज़्यादा बिकने वाले 5 रुपये के बिस्किट पर असर पड़ा है। '‘पारले बिस्किट की बिक्री में कटौती का सीधा मतलब है कि कंपनी को अपने उत्पादन में कटौती करनी पड़ेगी, जिसके कारण आठ से दस हज़ार लोगों की नौकरियां जा सकती हैं।’’

कार्वी स्टाक ब्रोकिंग के सीईओ राजीव सिंह ने कहा है कि देश की आर्थिक क्षेत्र में फ़िलहाल हर चीज़ ग़लत राह पर जाती दिख रही है चाहे वह शेयर बाज़ार हो अथवा अर्थव्यवस्था, बजट के बाद से निफ़्टी आठ फ़ीसदी लुढ़क चुका है। इस दौरान निवेशकों की क़रीब 12 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति डूब चुकी है। (स्रोत : राष्ट्रीय सहारा 18 अगस्त)

लार्सन एवं टुब्रो (एल एण्ड टी) के चेयरमैन और नेशनल स्किल डेवलपमेंट के हेड एएम नईक ने कहा है कि ‘‘सरकार की मेक इन इंडिया योजना के तहत ज़्यादा नौकरियां नहीं पैदा हो पायी हैं। हम सामान निर्यात करने की बजाय नौकरियां निर्यात कर रहे हैं। कम्पनियां देश में बने माल की बजाय विदेशों से माल आयात कर रही हैं।’’

इस तरह के वक्तव्य देने वाले लोग सरकार के दुश्मन नहीं हैं बल्कि ये मोदी सरकार के हितैषी रहे हैं। मंत्री महोदया आप सोच रही हैं कि कॉर्पोरेट कर को 30 प्रतिशत से घटाकर कर 25प्रतिशत कर दिया जाये। रिज़र्व बैंक के गवर्नर भी कहते हैं कि कम्पनियों की परिसंपत्ति गुणवत्ता की जांच नहीं कि जायेगी। 2016 के अंत और 2017 के शुरुआत में कई कम्पनियों की परिसंपत्ति गुणवत्ता की जांच की गई थी जिसके कारण 40 बड़े क़र्ज़दाताओं के खातों की एनपीए के रूप में पहचान की गई थी और बैंको को इन्हें दिवाला समाधान प्रक्रिया के लिए भेजने को कहा गया।

मंदी के कारण आत्महत्याएं

अर्थव्यवस्था की हालत यहां तक पहुंच गई है कि 2500 करोड़ के सलाना कारोबार करने वाले ‘कैफ़े कॉफी डे’ के मालिक वीजी सिद्धार्थ को अत्महत्या करनी पड़ी जिसका व्यापार विदेशों में भी फैला हुआ था। मंदी के कारण सम्पन्न वर्ग में भी आत्महत्याएं हो रही हैं।

जमशेदपुर में बीजेपी आईटी सेल के प्रभारी कुमार विश्वजीत के 25 वर्षीय बेटे आशीष कुमार नौकरी जाने के डर से आत्महत्या कर ली। आशीष खड़ंगझार की एक कम्पनी में काम करते थे जो कि टाटा मोटर्स के लिए पार्ट्स बनाने का काम करती थी। आशीष के पिता ने कहा है कि टाटा मोटर्स में प्रोडेक्शन काफ़ी समय से रुका हुआ था जिसका असर आशीष की कम्पनी पर पड़ रहा था इसके कारण वह काफ़ी समय से डरा सहमा रहता था।

देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र के धूलकोट में 2 अगस्त को पिज़्ज़ा की दुकान चलाने वाले कारोबारी ने आत्महत्या कर ली जिसका कारण व्यापार में घाटा होना बताया जा रहा है। क़र्ज़ से परेशान क्रिकेटर वी बी चन्द्रषेखर ने आत्महत्या कर ली। कर्नाटक के 36 साल के व्यापारी ओम प्रकाश ने परिवार के पांच लोगों के साथ आत्महत्या कर ली जिसका कारण व्यापार में घाटा था। 3अगस्त को ट्रक कि किस्तें नहीं चुका पाने के कारण हरियाणा निवासी 34 वर्षीय दलजीत सिंह ने अपने घर में आत्महत्या कर लिया।

आत्महत्या करने वालों में केवल साधारण आदमी या लघु रोज़गार के बंद हुए लोग हि नहीं हैं बल्कि औद्योगिक क्षेत्र के जाने माने दिग्गज भी हैं। लगातार बढ़ती जा रही यह लिस्ट यहीं नही थमने वाली है।

मंत्री महोदया, आप सरकार को आईना दिखाने वाले लोगों पर ही तोहमत लगा रही हैं कि आर्थिक मंदी की बात करने वाले अर्थव्यवस्था को चौपट करने की साज़िश कर रहे हैं जबकि सरकार ने 1 जुलाई, 2019 को लोकसभा मे जानकारी दी है कि देश में 6.8 लाख से अधिक कम्पनियां बंद हो गई हैं!

कम्पनियां बंद होना मंदी की निशानी नहीं है, क्या यह अर्थव्यवस्था चौपट करना और सरकार को राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने की एक कुटिल चाल है? जहां पहले नौकरियां जाना समाचार का हिस्सा होता था वहीं आपकी सरकार में यह विज्ञापन बन गया है। निर्मला सीतारमण जी अंत में आप से यही कहूंगा कि “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या”। आप तो वास्तविकता को जानती हैं लेकिन आप मुंह फेर लेना चाहती हैं ताकि यह समय निकल जाये। यह मंदी मुंह फेरने से नहीं निकलेगी, इस सच्चाई को क़बूल करना होगा।

economic crises
UNEMPLOYMENT IN INDIA
Rising recession
Finance minister Nirmala Sitharaman
RBI Governor
US President Donald Trump
farmer suicides

Related Stories

क्या भारत महामारी के बाद के रोज़गार संकट का सामना कर रहा है?

श्रीलंका का संकट सभी दक्षिण एशियाई देशों के लिए चेतावनी

रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

सरकार की रणनीति है कि बेरोज़गारी का हल डॉक्टर बनाकर नहीं बल्कि मज़दूर बनाकर निकाला जाए!

छात्रों-युवाओं का आक्रोश : पिछले तीन दशक के छलावे-भुलावे का उबाल

जेंडर बजट में कटौती, मोदी सरकार के ‘अमृतकाल’ में महिलाओं की नहीं कोई जगह

सरकारी नौकरियों का हिसाब किताब बताता है कि सरकार नौकरी ही देना नहीं चाहती!

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

रोजगार, स्वास्थ्य, जीवन स्तर, राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास का सह-संबंध

भारत की महामारी के बाद की आर्थिक रिकवरी अस्थिर है


बाकी खबरें

  • भाषा
    कांग्रेस की ‘‘महंगाई मैराथन’’ : विजेताओं को पेट्रोल, सोयाबीन तेल और नींबू दिए गए
    30 Apr 2022
    “दौड़ के विजेताओं को ये अनूठे पुरस्कार इसलिए दिए गए ताकि कमरतोड़ महंगाई को लेकर जनता की पीड़ा सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं तक पहुंच सके”।
  • भाषा
    मप्र : बोर्ड परीक्षा में असफल होने के बाद दो छात्राओं ने ख़ुदकुशी की
    30 Apr 2022
    मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षा का परिणाम शुक्रवार को घोषित किया गया था।
  • भाषा
    पटियाला में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहीं, तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का तबादला
    30 Apr 2022
    पटियाला में काली माता मंदिर के बाहर शुक्रवार को दो समूहों के बीच झड़प के दौरान एक-दूसरे पर पथराव किया गया और स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए पुलिस को हवा में गोलियां चलानी पड़ी।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    बर्बादी बेहाली मे भी दंगा दमन का हथकंडा!
    30 Apr 2022
    महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक विभाजन जैसे मसले अपने मुल्क की स्थायी समस्या हो गये हैं. ऐसे गहन संकट में अयोध्या जैसी नगरी को दंगा-फसाद में झोकने की साजिश खतरे का बड़ा संकेत है. बहुसंख्यक समुदाय के ऐसे…
  • राजा मुज़फ़्फ़र भट
    जम्मू-कश्मीर: बढ़ रहे हैं जबरन भूमि अधिग्रहण के मामले, नहीं मिल रहा उचित मुआवज़ा
    30 Apr 2022
    जम्मू कश्मीर में आम लोग नौकरशाहों के रहमोकरम पर जी रहे हैं। ग्राम स्तर तक के पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर जिला विकास परिषद सदस्य अपने अधिकारों का निर्वहन कर पाने में असमर्थ हैं क्योंकि उन्हें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License