NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बजट 2018: मोदी सरकार के पास कोई रोज़गार नीति नहीं
देश बेरोज़गारी के चंगुल में फँसता ही जा रहा है और 2018 का बजट हमारे सामने इससे उबरने का कोई उपाय नहीं रखताI
सुबोध वर्मा
01 Feb 2018
जेटली
Newsclick Image by Sumit

2018-19 का बजट पेश किया जा चुका है और जैसा कि अंदेशा था रोज़गार पैदा करने की तरफ मोदी सरकार ने ज़्यादा तवज्जो नहीं दी हैI वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक बड़ा ही बचकाना ‘विश्लेषण’ देते हुए देश में रोज़गार बढ़ाने के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाये गये छ: कदम गिनवायेI इनमें नयी भर्ति हुए कर्मचारियों के लिए उनके द्वारा दिए जाने वाला योगदान ख़त्म किया और आयकर में कुछ छूट, अप्प्रेंटिस के लिए वज़ीफ़ा देना और उनके प्रशिक्षण का आंशिक ख़र्च उठाना, कपड़ा और जूता उद्योग में ठेका मज़दूर रखने को मंज़ूरी देना और प्रसूति अवकाश बढ़ाना शामिल है I अपनी बात ख़त्म करते हुए जेटली ने कहा कि इन सब क़दमों की वजह से इस साल 70 लाख नये रोज़गार पैदा होंगेI

इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि मौजूदा सरकार रोज़गार के मुद्दे की तरफ बहुत बेरूख़ी रखती है, जो काफी खतरनाक है I इससे यह भी साफ़ दिखता है कि भारत जिस रोज़गार संकट से जूझ रहा है उसे मोदी, जेटली आदि कितनी बेशर्मी से नज़रअंदाज़ कर रहे हैंI जेटली के वक्तव्य से यही लगता है कि उनके मुताबिक लोग सिर्फ इसलिए काम नहीं कर रहे थे कि उन्हें ज़्यादा प्रोविडेंट फण्ड भरना पड़ता था, या फिर इसलिए कि आयकर की दरें बहुत ज़्यादा थीं, या फिर शायद इसलिए कि ठेके पर मिलने वाला काम कम उपलब्ध था! इस तरह के तर्कों पर कौन विश्वास करेगा और खासकर से कि एक देश का वित्तमंत्री ऐसी बातें कर रहा है?

वास्तविकता यह है कि CMIE के सैंपल सर्वे से पता चलता है कि साल 2017 में सिर्फ 20 लाख नयी नौकरियाँ ही पैदा हुईंI पूरे साल के हिसाब से यह बढ़ोत्तरी सिर्फ 0.5% ही रहीI जिस देश की स्थिति ऐसी हो जहाँ हर साल लगभग 250 लाख लोग कामकाजी आयु वर्ग (15-49 साल) में शामिल होते हैं और इनमें से कम-से-कम 44% (110 लाख) रोज़गार की तलाश में हैं, वहाँ क्या महज़ 20 लाख नए रोज़गार कोई बहुत बड़ी कामयाबी हो सकती है?

तो आखिरकार वित्तमंत्री जेटली किस बिनाह पर इस साल 70 लाख नयी नौकरियाँ पैदा करने का दावा कर रहे हैं? जेटली ने यह दावा दो अर्थशास्त्रियों के एक विवादास्पद अध्ययन के दम पर किया जिन्होंने EPF, ESIC और NPS (सामाजिक सुरक्षा की तीन परियोजनाएँ) में हुए एनरोलमेंट के आधार पर यह आँकड़ा दियाI इन दो अर्थशास्त्रियों के अनुमानों को बाकि कई अर्थशास्त्रियों झुठलाया है I इस अध्ययन में मन मुताबिक आयुवर्ग चुनना, दो बार गिनना और दूसरी कई खतरनाक खामियों को सामने लाया गया है I वित्तमंत्री ऐसे अध्ययन को देश की रोज़गार नीति का आधार बना रहे हैं, ऐसा हास्यास्पद कदम सिर्फ हमारी मौजूदा सरकार के ही बस की बात हैI  

सरकार अपने ही शब्दाडम्बर से इतनी अंधी हो चुकी है, या शायद उसे सूझ नहीं रहा कि आगे क्या करना है, कि वित्तमंत्री ने अपने भाषण में EPF भुगतान में छूट, सभी क्षेत्रों में फिक्स्ड टर्म के काम (मतलब ठेका प्रथा) को मंज़ूरी देना और सभी ज़िलों में ‘मॉडल एस्पिरेश्नल’ स्किल सेंटरों (जाने यह किस चिड़िया का नाम है!) की स्थापनाI कुल मिलाकर यही है सरकार की रोज़गार नीतिI  

औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है, घटते औद्योगिक निवेश को बचाने के लिए कोई उपाय नहीं हैं, उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी निवेश की कोई मंशा नहीं दिखाई देती, MSME क्षेत्र के लिए ऋण सपोर्ट, कैपिटल और ब्याज़ सब्सिडी और नई खोजों के लिए आबंटित 3,794 करोड़ रूपये की भारीभरकम रकम के अलावा कुछ नहीं दिया गयाI यह रकम भी बहुत ज़्यादा बड़ी नहीं है क्योंकि पिछले बजट में MSME मंत्रालय को 6,481.96 करोड़ रूपये (संशोधित आंकलन) के मुकाबले इस साल 6,552.61 करोड़ रूपये आबंटित किये गये हैं, यह महज़ 1% की ही वृद्धि है जो बढ़ती महँगाई के दौर में पलभर में गायब हो जाएगीI

कृषि क्षेत्र की बजट में क्या स्थिति रही? चूँकि भारतीय जनता का एक बहुत बड़ा तबका इस क्षेत्र में काम करता है इसलिए बहुत अच्छा होगा कि मौजूदा रोज़गार संकट से निबटने के लिए इस क्षेत्र के लिए ठोस कदम उठाये जायेंI हालांकि, जेटली ने अपने भाषण में बड़ी अलंकृत भाषा में कृषि और ग्रामीण इलाकों की महत्ता का बखान किया लेकिन नीतिगत तौर पर सबसे बड़ी घोषणा रही कि किसानों को उनकी लागत का 1.5 गुना दाम मिलेगा और यह भी बस घोषणा भर ही लगती हैI बजट दस्तावेज़ में ऊँचे समर्थन मूल्य देने का कोई ज़िक्र नहीं है जिससे कि इस घोषणा पर अमल हो सकेI दूसरे शब्दों में कहें तो यह सारे वायदे भी उन्हें वायदों जैसे हैं जो मोदी ने 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान देश की जनता से किये थे और जो आज भी पूरे किये जाने के इंतज़ार में हैंI

इस बजट में बाकि तमाम चीज़ों की ही तरह रोज़गार के दावे और कुछ नहीं बस खोखले वायदे हैंI सारी जनता को एक साथ ही धोखा नहीं दिया जा सकताI मोदी-जेटली गैंग को यह बात जल्दी ही समझ लेनी चाहिए वरना उन्हें जल्द ही इसका खामियाज़ा उठाना पड़ेगाI

बजट 2018
मोदी सरकार
अरुण जेटली
बेरोज़गारी

Related Stories

किसान आंदोलन के नौ महीने: भाजपा के दुष्प्रचार पर भारी पड़े नौजवान लड़के-लड़कियां

सत्ता का मन्त्र: बाँटो और नफ़रत फैलाओ!

जी.डी.पी. बढ़ोतरी दर: एक काँटों का ताज

5 सितम्बर मज़दूर-किसान रैली: सबको काम दो!

रोज़गार में तेज़ गिरावट जारी है

लातेहार लिंचिंगः राजनीतिक संबंध, पुलिसिया लापरवाही और तथ्य छिपाने की एक दुखद दास्तां

माब लिंचिंगः पूरे समाज को अमानवीय और बर्बर बनाती है

अविश्वास प्रस्ताव: दो बड़े सवालों पर फँसी सरकार!

क्यों बिफरी मोदी सरकार राफेल सौदे के नाम पर?

अविश्वास प्रस्ताव: विपक्षी दलों ने उजागर कीं बीजेपी की असफलताएँ


बाकी खबरें

  • sedition
    भाषा
    सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश
    11 May 2022
    पीठ ने कहा कि राजद्रोह के आरोप से संबंधित सभी लंबित मामले, अपील और कार्यवाही को स्थगित रखा जाना चाहिए। अदालतों द्वारा आरोपियों को दी गई राहत जारी रहेगी। उसने आगे कहा कि प्रावधान की वैधता को चुनौती…
  • बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    एम.ओबैद
    बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    11 May 2022
    "ख़ासकर बिहार में बड़ी संख्या में वैसे बच्चे जाते हैं जिनके घरों में खाना उपलब्ध नहीं होता है। उनके लिए कम से कम एक वक्त के खाने का स्कूल ही आसरा है। लेकिन उन्हें ये भी न मिलना बिहार सरकार की विफलता…
  • मार्को फ़र्नांडीज़
    लैटिन अमेरिका को क्यों एक नई विश्व व्यवस्था की ज़रूरत है?
    11 May 2022
    दुनिया यूक्रेन में युद्ध का अंत देखना चाहती है। हालाँकि, नाटो देश यूक्रेन को हथियारों की खेप बढ़ाकर युद्ध को लम्बा खींचना चाहते हैं और इस घोषणा के साथ कि वे "रूस को कमजोर" बनाना चाहते हैं। यूक्रेन
  • assad
    एम. के. भद्रकुमार
    असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की
    11 May 2022
    राष्ट्रपति बशर अल-असद का यह तेहरान दौरा इस बात का संकेत है कि ईरान, सीरिया की भविष्य की रणनीति का मुख्य आधार बना हुआ है।
  • रवि शंकर दुबे
    इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा यूपी में: कबीर और भारतेंदु से लेकर बिस्मिल्लाह तक के आंगन से इकट्ठा की मिट्टी
    11 May 2022
    इप्टा की ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा उत्तर प्रदेश पहुंच चुकी है। प्रदेश के अलग-अलग शहरों में गीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License