NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बजट 2019 : किसानों के लिए 0 बजट!
वित्त मंत्री ने अपने बजट को भले ही किसानों पर केंद्रित बताया है लेकिन कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने बजट पर निराशा जताई है। उनका कहना है कि इस बजट में किसानों को लेकर कुछ नहीं है।
अमित सिंह
05 Jul 2019
फाइल फोटो
(फोटो साभार: डीएनए)

निर्मला सीतारमण ने केंद्र की सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला और देश की पहली पूर्ण कालिक महिला वित्त मंत्री के रूप में अपना पहला बजट शुक्रवार को संसद में पेश किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि गांव, गरीब और किसान उनकी हर योजना का केंद्र बिंदु होगा। 

सीतारमण ने महात्मा गांधी की कही बात से शुरुआत की। उन्होंने कहा कि असल भारत गांव में बसता है और गांव और किसान उनकी हर योजना के फोकस में होंगे। किसानों का जीवन और व्यवसाय आसान बनाने के लिए काम किए जाएंगे। 

क्या कहा वित्त मंत्री ने?

सीतारमण ने कहा कि सरकार कृषि अवसरंचना में निवेश करेगी। आजादी की 75वीं सालगिरह तक किसान की आय दोगुनी करने की कोशिश की जाएगी।

बजट पेश करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा कि दस हजार नए किसान उत्पादक संगठन बनाए जाएंगे। भारत अब दाल में आत्म निर्भर हो गया है, इसके लिए देश के सभी किसानों को धन्यवाद देते हैं। हम किसानों से उम्मीद करते हैं कि ऐसी ही कामयाबी वे हमें तिलहन में भी दिलाएंगे। सरकार कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में जबरदस्त निवेश कर रही है। हमारा लक्ष्य आयात पर कम खर्च करना है, इसके साथ ही डेयरी के कार्यों को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि किसानों को उस स्थिति में पहुंचाना है जहां पर जीरो बजट खेती कर सकें। इस तरह की खेती में किसान को बाजार पर निर्भर नहीं होना पड़ता है और ये काफी सस्ती भी है।

सीतरमण ने कहा कि अन्नदाता को ऊर्जादाता बनाने पर काम होगा। किसानों के उत्पाद से जुड़े कामों में प्राइवेट आंत्रप्रेन्योरपिश को बढ़ावा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसानों को पहले से ही प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि दोहरी आय हासिल करने में किसानों की मदद की जा सके।

कृषि से जुड़े लोगों ने जताई निराशा 

वित्त मंत्री ने अपने बजट को भले ही किसानों पर केंद्रित बताया है लेकिन कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने बजट पर निराशा जताई है। उनका कहना है कि इस बजट में किसानों को लेकर किसी भी नई योजना के बारे में बात नहीं की गई। इसके अलावा स्वामीनाथन आयोग, आय को दुगुनी करने की बात, हर खेत को पानी, मनरेगा आदि की भी चर्चा नहीं की गई। 

किसान नेता और स्वराज पार्टी से जुड़े योगेंद्र यादव ने बजट को लेकर दो ट्वीट किए। बजट की खिंचाई करते हुए उन्होंने लिखा,'मोदीजी को झोली भर के वोट देने वाले किसान ने बजट सुनना शुरू करते हुए गुनगुनाया: आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे। बजट स्पीच के अंत में उसने निराश होकर बोला: आज की रात बचेंगे तो सहर (सुबह) देखेंगे।'

उन्होंने आगे लिखा,'कम से कम किसान के लिए तो यह ज़ीरो बजट स्पीच थी: न सूखे का जिक्र, न आय दोगुना करने की योजना, न किसान सम्मान निधि का विस्तार, न एमएसपी रेट किसान को दिलवाने की पुख्ता योजना, न आवारा पशु से निपटने की कोई तरकीब।'

कुछ ऐसा ही मानना अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) महासचिव हन्नान मोल्ला का है। वे कहते हैं, 'वास्तविकता में बजट में किसानों के लिए कुछ नहीं है। सिर्फ थोड़ी बहुत भाषणबाजी की गई है लेकिन पीड़ित किसानों की बेहतरी के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। किसानों की खुदकशी, फसल के दाम, एमएसपी, लोन, कृषि मजदूर खेती की लागत जैसी बातों पर चर्चा नहीं की गई है। उल्टा दस हजार नए किसान उत्पादक संगठन बनाकर कॉरपोरेट की इंट्री सरकार करा रही है। पिछले पांच साल सरकार ने किसानों को धोखा दिया है। इस बजट के जरिए वही धोखा एक बार फिर दिया गया है।'

सवाल और भी हैं

वहीं, भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धमेंद्र मलिक कहते हैं, 'देश की पहली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन जी द्वारा बजट पेश किए जाने से किसानों को काफी उम्मीदें थीं। किसानों को उम्मीद थी कि निर्मला सीतारमन द्वारा पिछली सरकार में वाणिज्य मंत्री के रूप में व्यापार को आसान बनाने के लिए 7000 कदम उठाए गए थे। कृषि को आसान बनाने के लिए कम से कम 5000 कदम सुझाए जाने की उम्मीद थी, लेकिन यह बजट किसानों की आशाओं के विपरीत है। वित्त मंत्री जी ने देश को दालों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों की सराहना करते हुए भगवान भरोसे छोड़ दिया। किसानों की फसलों की खरीद कम से कम समर्थन मूल्य पर सुनिश्चित हो। इसके लिए कोई उपाय नहीं किया गया। देश का सबसे बड़ा वित्त मंत्री मानसून है। आज आधा देश सूखे की चपेट में है, लेकिन वित्त मंत्री जी द्वारा इन किसानों के लिए न तो कोई चिन्ता जाहिर की गई और न ही कोई प्रतिबद्धता दिखाई गई।'

मलिक आगे कहते हैं, 'कृषि के सकल घरेलू उत्पाद में घटते योगदान को लेकर सरकार के सामने किसानों की आमदनी बढाए जाने की चुनौती है। देश के 17 राज्यों में किसानों की औसत आमदनी 20000 से भी कम है। देश में किसानों की आत्महत्याओं की प्रत्येक दिन खबर आ रही है। ऐसे में किसानों को बजट से निश्चित आमदनी तय किए जाने की अपेक्षा थी। वित्त मंत्री जी द्वारा दिए गए भाषण में किसानों के लिए चलायी गई योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री किसान, ई-नाम, ड्राप-मोर क्रोप, ग्रामीण हार्ट, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, खेत, तालाब जैसी योजनाओं का न तो जिक्र किया गया और न ही इनके लिए आबंटित धनराशि की कोई जानकारी दी गई।'

मलिक ने बताया,' पहली बार बजट भाषण में कृषि क्षेत्र के आबंटन की धनराशि का जिक्र तक नहीं किया गया। यह बजट गांव, गरीब और किसान के लिए जीरो बजट साबित होगा। बजट के अनुसार किसानों को अब सरकार की जीरो और भगवान का ही सहारा है।'

बजट में किसानों को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव वीजू कृष्णन कहते हैं, 'आप बजट में एग्रीकल्चर में हाईलाइट देखेंगे तो वह भी नहीं मिल रहा है। 2014 के मैनिफेस्टों में बीजेपी ने कहा था कि एग्रीकल्चर इज द इंजन आफ इकनॉमिक ग्रोथ लेकिन गुरुवार को आए आर्थिक सर्वे में कहा गया कि प्राइवेट इनवेस्ट इज द ड्राइवर आफ इकनॉमिक ग्रोथ। इसकी झलक इस बजट में भी दिख रही है। एमएसपी के निर्धारण में दिख रही है। किसानों का आय दोगुनी करने की जो बात थी उस तरफ सरकार कदम ही नहीं बढ़ा रही है। सरकार ने किसानों के लिए बजट में कोई ठोस निर्णय या कदम नहीं उठाया है। सिर्फ कुछ बातें कहकर वित्त मंत्री ने अपना भाषण खत्म कर दिया।'

Union Budget 2019
Budget 2019-20
Nirmala Sitharaman
Narendra Modi Government
Congress
yogendra yadav
MSP
MSP for farmers
farmer
farmer crises
anti farmer
farmers suicide
agricultural crises

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

छोटे-मझोले किसानों पर लू की मार, प्रति क्विंटल गेंहू के लिए यूनियनों ने मांगा 500 रुपये बोनस

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

कार्टून क्लिक: किसानों की दुर्दशा बताने को क्या अब भी फ़िल्म की ज़रूरत है!

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा


बाकी खबरें

  • AUKUS May put NATO’s Future into Question
    जेम्स डब्ल्यू कार्डेन
    नाटो के भविष्य को संकट में डाल सकता है एयूकेयूएस 
    25 Sep 2021
    इस डील के परिणामस्वरूप दो ऐतिहासिक साझीदारों, अमेरिका एवं फ्रांस के संबंधों में गंभीर दरार आ गई है। इससे नाटो को भी आनुषांगिक रूप से घाटा हो सकता है।
  • Tamil Nadu
    नीलाबंरन ए
    तमिलनाडु के मछुआरे समुद्री मत्स्य उद्योग विधेयक के ख़िलाफ़ अपना विरोध तेज़ करेंगे
    25 Sep 2021
    मछुआरे समुदाय का आरोप है कि विधेयक और ब्ल्यू इकॉनमी मसौदा नीति कॉर्पोरेट संस्थाओं के हितों का पक्षपोषण करती है।
  • Afghanistan
    एम. के. भद्रकुमार
    क्या शांति की ओर बढ़ रहा है अफ़ग़ानिस्तान?
    25 Sep 2021
    अफ़गान अर्थव्यवस्था को उबारने में चीन की तत्परता एक बिल्कुल नया कारक है। अब बाइडेन प्रशासन अफ़गानिस्तान और मध्य एशिया में और अधिक उलझावों में शामिल नहीं होना चाहता है, इन हालत में अफ़गानिस्तान के पड़ोसी…
  • Kannur University
    सुचिंतन दास
    नहीं पढ़ने का अधिकार
    25 Sep 2021
    नफ़रत और कट्टरता से भरी बातों को पढ़ने से इनकार कर के कन्नूर विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस सिलेबस की समीक्षा करने और इसके ज़रिये शासन की विस्तारात्मक नीति का  विरोध कर अहम राजनीतिक कार्य को अंजाम…
  • Harshil farmers
    वर्षा सिंह
    हर्षिल के सेब किसानों की समस्याओं का हल क्यों नहीं ढूंढ पायी उत्तराखंड सरकार
    25 Sep 2021
    हर्षिल के काश्तकारों ने इस महोत्सव का सीधे तौर पर बायकॉट कर दिया। महोत्सव शुरू होने के चार रोज़ पहले से ही हर्षिल में धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया था। महोत्सव के दिन हर्षिल में किसानों ने ढोल-दमाऊं जैसे…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License