NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बजट में कुछ बेचैन कर देने वाले रुझान
लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता को बौना बनाना, नवउदारवाद की सामान्य ज़रूरत है, वह तब ज्यादा बढ़ जाती है जब सरकार विदेशी लेनदारों के प्रति ऋणी हो जाती है।
प्रभात पटनायक
13 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
BUDGET 2019

अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्रीय बजट 2019-20 में दिए गए आंकड़े स्पष्ट रूप से निराधार हैं। बजट में 2018-19 में  वास्तविक प्राप्तियों और खर्च को छुपाया गया हैं, हालांकि ये आंकड़े उपलब्ध थे, लेकिन पेश किए गए आंकडे उस वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना में भारी कमी दिखाते हैं। जबकि 2019-20 के लिए सरकार ने सभी अनुमान 2018-19 के संशोधित अनुमानों के आधार पर दिए हैं, जो कि बजट अनुमानों के करीब हैं, और वास्तविकता में बहुत कम। इसलिए, आने वाले वर्ष के बजट के आंकड़ों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है। संपूर्ण बजट की हवा में सफेद झूठ व्याप्त है।

यद्यपि इसके आंकड़े बहुत कम हैं, लेकिन इस बजट में कुछ बेचैन करने वाले रुझान भी हैं जिन पर गंभीर ध्यान देने की ज़रूरत है। सरकार द्वारा इस बजट के जरिये एक घोषणा की गई है कि सरकार उधार के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी संपर्क करेगी। अब तक शायद ही ऐसा हुआ था, यही कारण है कि भारत की संप्रभुता (यानी सरकार) के सकल घरेलू उत्पाद में विदेशी कर्ज़ जीडीपी के अनुपात में केवल 5 प्रतिशत ही है, जो दुनिया के सभी देशों में सबसे कम है। यह स्थिति अब बदलने वाली है।

सरकार विदेशी बाजार से इसलिए संपर्क नहीं कर रही है क्योंकि वह ऐसा करने के लिए मजबूर है; ऐसा भी नहीं है कि घरेलू स्तर पर धन नहीं जुटाया जा सकता है। और न ही ऐसी स्थिति है कि विदेशी कर्ज़ को वित्तीय घाटे में नहीं गिना जाएगा, ऐसी स्थिति में विदेशी ऋण लेकर सरकार वित्तीय घाटे की सीमा से अधिक खर्च कर पाएगी जिसकी अभी अनुमति नहीं है; जबकि वास्तविकता यह है कि विदेशी ऋणों को भी ठीक उसी तरह से गिना जाता है जिस तरह से वित्तीय घाटे के हिस्से के रूप में घरेलू ऋणों को गिना जाता है। कोई यह भी दावा नहीं कर सकता कि विदेशी ऋण सस्ता है; और वैसे भी, ब्याज दर के अंतर को सामने रख कर विदेश से उधार लेने की सरकार की इच्छा को किसी स्पष्टीकरण के रूप में नहीं माना जा सकता है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि सरकार को इस बात का अंदाज़ा है कि जल्द ही ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी जब देश में वित्त की आमदनी के जरिये भुगतान घाटे के संतुलन (BoP) की अदायगी के लिए पर्याप्त विदेशी पूंजी नहीं होगी; और इसलिए सरकार अपने रुपये के खर्चों को वित्तपोषित करने के लिए विदेशी मुद्रा का उधार लेकर विदेशी मुद्रा भंडार का निर्माण कर रही है। लेकिन यह भी समझ से बाहर की बात है। यह तर्क इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि विदेशी मुद्रा में सरकार की स्वयं की ऋण-सेवा आवश्यकताओं के भुगतान संतुलन पर एक अतिरिक्त बोझ बन जाएगा।

एक गलत तर्क भी हवा में बह रहा है, जिसमें यह कहा जा रहा है कि सरकार विदेशों में धन का दोहन कर रही है क्योंकि यह घरेलू बचत की पहुंच से बाहर है। यह गलत है क्योंकि सरकार की उधारी कभी भी बचत के किसी भी निश्चित पूल से नहीं आती है। जब सरकार खर्च करने के लिए उधार लेती है, तो यह वास्तव में उन सभी  संसाधनों को निजी हाथों में डाल देती है, जिन्हे वह उधार लेती है, न कि सीधे या जानबूझकर दे देती है, बल्कि चल रही व्यवस्था के काम के माध्यम से वह ऐसा करती है। चूंकि सरकार खर्च करती रहती है, अतिरिक्त रोजगार, उत्पादन और आय, और इसलिए अतिरिक्त बचत, पैदा होती रहती है, और यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक कि कुल अतिरिक्त बचत बिल्कुल अतिरिक्त सरकारी खर्च के बराबर न हो जाए। सरकार केवल अपने द्वारा किए गए खर्च को वित्त करने के लिए इन अतिरिक्त बचतों को उधार ले सकती है। इसलिए, सरकार के पास उधार लेने के लिए बचत से बाहर जाने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है।

इसलिए, सरकार इनमें से किसी भी कारण के लिए विदेशी बाजार का दोहन नहीं कर रही है, बल्कि वह पूरी  तरह से इसे एक विकल्प के रूप में देख रही है, क्योंकि अभी तक इस मद में बहुत कम उधार लिया गया है। यह, हालांकि, खतरनाक कार्रवाई का सबब है क्योंकि यह भारतीय राज्य पर अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी द्वारा प्रयोग किए जाने वाली स्थिति को बढ़ाता है।

घरेलू वित्तीय क्षेत्र से कर्ज़ बनाम विदेशी कर्ज़

घरेलू वित्तीय क्षेत्र, जिससे सरकार सामान्य रूप से उधार लेती है, वह उसके नियंत्रण क्षेत्र के भीतर रहता है, विशेष रूप से भारत में, जहां बैंकिंग प्रणाली मुख्य रूप से राज्य के स्वामित्व में चलती है, और जहां, भारतीय रिजर्व बैंक को जो भी स्वायत्तता प्राप्त हो, वह इसे राज्य के दायरे से बाहर नहीं जाने देता है।

घरेलू वित्तीय क्षेत्र से उधार लेना, जो राज्य के नियंत्रण क्षेत्र में है, उसके भी दो निहितार्थ हैं: पहला, घरेलू वित्तीय क्षेत्र के ऋण की अदायगी न कर पाने की स्थिति में वह सरकार पर "अनैतिक" और मनमानी तौर-तरीके लागू नहीं कर सकता है; और दूसरा, रुपये के कर्ज़ को अदा न कर पाने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि सरकार को कराधान की संप्रभु शक्तियों पुरी तरह से हासिल है।

लेकिन अगर सरकार विदेशी बाजारों से ऋण लेती है, तो वे ऋण विदेशी मुद्रा में होंगे, इसलिए विदेशी मुद्रा की कमी की स्थिति में, घरेलू कराधान की कोई भी राशि संभवतः विदेशी ऋण की अदायगी में मदद नहीं कर सकेगी। और इस तरह की स्थिति में, विदेशी लेनदार सरकार पर "कठोर उपाय" उठाने के लिए दबाव बनाएंगे, जैसा कि वे उचित समझते हैं, जो आम तौर पर खाद्य सब्सिडी में कटौती, कल्याणकारी खर्च में कटौती, सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन में वृद्धि पर रोक, वेतन के आकार के खर्च को कम करने के लिए पे-रोल लागू करने को कहेगी - उदाहरण के लिए, सरकारी खर्च कम करने के लिए सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में स्थायी शिक्षकों की जगह तदर्थ शिक्षकों की नियुक्ति किए जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। इस तरह के कर्ज़ों के कई देशों के उदाहरण मौजूद हैं, जिन देशों की  सरकारें अपना ऋण नहीं दे पाई, ग्रीस इसका एक स्पष्ट और सुप्रसिद्ध उदाहरण है।

बेशक, यह तर्क दिया जाएगा कि सरकार जिस भी कारण से ऋण अदा नहीं कर पाती है और उसका विदेशी मुद्रा में आई कमी से लेना-देना तो है, और इस तरह की कमी की स्थिति में, वैसे भी सरकार "कठोर" उपायों को लागू कर सकती है फिर सरकार विदेश से उधार ले या न ले इससे क्या फर्क पड़ता है। फर्क ये है कि जब सरकार स्वयं विदेशी ऋण की घुड़सवारी करती है, तो वह सीधे अंतरराष्ट्रीय लेनदारों के अंगूठे के नीचे आ जाती है। विदेशी मुद्रा के एक्सचेंज के संकट को हल करने के लिए कई व्यापक आर्थिक नीति विकल्प मौजूद है जैसे आयात नियंत्रणों को लागू करना, जो इस स्थिति के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं, लेकिन लेनदारों के दबाव के कारण इन्हे लागू नहीं किया जा सकेगा।

संक्षेप में, विदेशी लेनदारों की सरकार पर सीधी पकड़ होती है, जो अन्यथा उनके पास नहीं होती। और जब ऐसा होता है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौनसी सरकार सत्ता में है, वह सभी सरकारों के हाथों में हथकड़ी लगा देती है। यह भी सच है, कि अगर श्रमिकों और किसानों द्वारा समर्थित सरकार सत्ता में आती है, जो देश को पूरी तरह से नवउदारवाद के हमले से बाहर निकालने की हिम्मत रखती है, तो वह विदेशी लेनदारों का सामना करने में भी सक्षम होगी; लेकिन ऐसी सरकार के लिए भी, विदेशी ऋण का बड़ा भंडार उनके काम को और अधिक कठिन बना देगा।

संक्षेप में, लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता को बौना बनाना, जो नवउदारवाद की सामान्य ज़रूरत है, जब सरकार विदेशी लेनदारों के प्रति ऋणी हो जाती है तो यह स्थिति और बढ़ जाती है। और फिर भी, एनडीए सरकार ऐसा करने की योजना काफी कृतज्ञतापूर्वक बना रही है।

दूसरी बेचैन करने वाली विशेषता, संसाधनों के केंद्रीकरण के मामले में है जिसका खुलासा इस बजट में किया गया है। जीएसटी संग्रह में आई कमी का असर केंद्र और राज्यों दोनों पर पड़ा है। इस स्थिति में, केंद्र ने सरचार्ज और उपकर (सेस) के माध्यम से चालू बजट में राजस्व बढ़ाने का विकल्प चुना है, जिसे राज्यों के साथ साझा  नहीं किया जाएगा। सुपर-रिच पर कर में वृद्धि, जिनकी आय 2 करोड़ रुपये से 5 करोड़ रुपये या 5 करोड़ रुपये से अधिक है, जो इस बजट में प्रस्तावित की गई है, उदाहरण के लिए अधिभार में वृद्धि के माध्यम से इसे उगाया जाएगा; और इसे राज्यों के साथ साझा किया जाएगा। नतीजतन, राज्य सरकारें, जोकि वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं, उनकी उस तरह से राजस्व तक पहुंच नहीं होगी जिस पर उनका हक़ होना चाहिए था।

जीएसटी ने ही राज्यों के अधिकारों का हनन किया है; और पर्याप्त राजस्व जुटाने में इसकी विफलता ने राज्यों की स्थिति को और भी बदतर बना दिया है, क्योंकि केंद्र के विपरीत, राज्यों के पास राजस्व जुटाने का कोई अन्य साधन शायद ही मौजूद हो। यदि इस स्थिति में केंद्र राजस्व को इस तरीके से बढ़ाने का फैसला करता है और जानबूझकर उन संसाधनों को अपने पास रखता है, जिन्हे उसे राज्यों के साथ साझा करने चाहिए थे, जो अब उनकी पहुंच से बाहर हो गए है, सरकार ने उन्हें एक कोने में धकेल देगी। जब ऐसी स्थिति पैदा होती है और वे मदद के लिए केंद्र के पास आते हैं, तो केंद्र अपना पसंदीदा खेल खेलता है, और उन राज्यों को दंडित करता है जो उनके अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के मामले में "भिन्न" होते हैं।

दक्षिणपंथी अधिनायकवाद के संक्रमण काल से गुजरते हुए, जिसे हम वर्तमान में देश में देख रहे हैं, उसकी राज्य सरकारों की शक्ति और संसाधनों के उन्मूलन में कोई भूमिका नहीं है। यह वही चलन है जिसे बजट के द्वारा प्रतिशोध के रूप में आगे बढ़ाया जा है।

Some Disquieting Trends in the Budget

union budget
Budget 2019-20
NDA Govt
Narendra Modi Government
Finance minister Nirmala Sitharaman
International Debts
Neoliberalism
Foreign Creditors
Reserve Bank of India

Related Stories

नगालैंड व कश्मीर : बंदूक को खुली छूट

सीएए : एक और केंद्रीय अधिसूचना द्वारा संविधान का फिर से उल्लंघन

तिरछी नज़र: बढ़ती महंगाई का मतलब है कि देश में बहुत ही अधिक विकास हो रहा है

अगर बजट से ज़रूरी संख्या में रोज़गार निर्माण नहीं होता तो बजट का क्या मतलब है!

बात बोलेगी: विपक्ष बुलाए शीत सत्र, दिल्ली बॉर्डर पर लगाई जाए जन संसद

प्रधानमंत्री मोदी की देन: देश में गृहयुद्ध और सीमा पर युद्ध जैसे हालात

आर्थिक मंदी का पंजाब में दिख रहा साफ असर

क्या है बजट? आइए आसान भाषा में समझते हैं इसके ख़ास पहलू

आपको मालूम है, मतगणना के वक़्त एग्ज़ाम रूम में बैठा युवा क्या सोच रहा था?

बीजेपी को भारी पड़ेंगी ये 5 गलतियां?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर
    30 Apr 2022
    मुज़फ़्फ़रपुर में सरकारी केंद्रों पर गेहूं ख़रीद शुरू हुए दस दिन होने को हैं लेकिन अब तक सिर्फ़ चार किसानों से ही उपज की ख़रीद हुई है। ऐसे में बिचौलिये किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे है।
  • श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 
    30 Apr 2022
    प्रदेश के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 22 अप्रैल 2022 को विधानसभा में घोषणा की कि ग्रामसभाओं की बैठक गणतंत्र दिवस, श्रम दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के अलावा, विश्व जल दिवस और स्थानीय शासन…
  • समीना खान
    लखनऊ: महंगाई और बेरोज़गारी से ईद का रंग फीका, बाज़ार में भीड़ लेकिन ख़रीदारी कम
    30 Apr 2022
    बेरोज़गारी से लोगों की आर्थिक स्थिति काफी कमज़ोर हुई है। ऐसे में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि ईद के मौक़े से कम से कम वे अपने बच्चों को कम कीमत का ही सही नया कपड़ा दिला सकें और खाने पीने की चीज़ ख़रीद…
  • अजय कुमार
    पाम ऑयल पर प्रतिबंध की वजह से महंगाई का बवंडर आने वाला है
    30 Apr 2022
    पाम ऑयल की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। मार्च 2021 में ब्रांडेड पाम ऑयल की क़ीमत 14 हजार इंडोनेशियन रुपये प्रति लीटर पाम ऑयल से क़ीमतें बढ़कर मार्च 2022 में 22 हजार रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गईं।
  • रौनक छाबड़ा
    LIC के कर्मचारी 4 मई को एलआईसी-आईपीओ के ख़िलाफ़ करेंगे विरोध प्रदर्शन, बंद रखेंगे 2 घंटे काम
    30 Apr 2022
    कर्मचारियों के संगठन ने एलआईसी के मूल्य को कम करने पर भी चिंता ज़ाहिर की। उनके मुताबिक़ यह एलआईसी के पॉलिसी धारकों और देश के नागरिकों के भरोसे का गंभीर उल्लंघन है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License