NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बजट से 1.7 लाख करोड़ की राशि गायब!
बजट और आर्थिक सर्वे के अध्ययन से यह निकलकर आया है कि साल 2018-19 लिए रेवेन्यू एस्टीमेट और वास्तविक स्थिति में 1.7 लाख करोड़ रुपये का अंतर है।
अजय कुमार
10 Jul 2019
budget and economic survey
image courtesy- daily express

बजट जारी होने से एक दिन पहले 4 जुलाई को न्यूज़क्लिक वेबसाइट के अंग्रेजी संस्करण पर वरिष्ठ पत्रकार सुबोध वर्मा का एक लेख छपा था। लेख का शीर्षक था- 'Budget 2019: As Tax Revenues Fall, Govt. Squeezes Expenditure ', इस लेख का हिंदी अनुवाद भी न्यूज़क्लिक हिंदी वेबसाइट पर 'बजट 2019: टैक्स रेवेन्यू में गिरावट, सरकार ने ख़र्च से हाथ खींचा' पर छपा है। इस लेख में सुबोध वर्मा ने कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स से जारी आंकड़ों से बताया था कि भारत के कर राजस्व में कमी हो रही है और बजट में इसका पर्दाफाश हो जाएगा। और यही हुआ है। इस साल के बजट से 1.7 लाख करोड़ रुपये की राशि गायब हो चुकी है। बजट से जुड़े डॉक्यूमेंट का ध्यान से अध्ययन करने के बाद यह तस्वीर निकलकर सामने आयी है।

बजट और इकोनॉमिक सर्वे का अध्ययन करने के बाद प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े सदस्य रतिन रॉय ने बिजनेस स्टैण्डर्ड में एक लेख लिखा है। लेख में कहा गया है कि बजट और इकोनॉमिक सर्वे का अध्ययन करने के बाद उन्होंने पाया कि साल 2018-19 लिए रेवेन्यू एस्टीमेट और वास्तविक स्थिति में 1.7 लाख करोड़ रुपये का अंतर है। दूसरे शब्दों में कहें तो साल 2018-19 में सरकार की जितनी एक्चुअल या वास्तविक कमाई हुई सरकार ने उससे 1.7 लाख करोड़ रुपये अधिक दिखाया। 


बजट में पिछले साल हुई कमाई और खर्चे के लिए रिवाइज्ड एस्टिमेट यानी संशोधित अनुमान दिखाए जाते हैं और इकोनॉमिक सर्वे में भी पिछले साल की कमाई और खर्चे के लिए प्रोविजनल एकाउंट में कमाई और खर्चे दिखाए जाते हैं। इकोनॉमिक सर्वे के प्रोविजनल एकाउंट में पिछले साल यानी 2018-19 के लिए 15 .6 लाख करोड़ रुपये की कमाई दिखाई गयी है और बजट में पिछले साल के लिए 17.3 लाख करोड़ रुपये की कमाई है। यानी बजट में पिछले साल के लिए भारत का जो राजस्व दिखाया जा रहा है वह वास्तव में हुई कमाई से 1.7 लाख करोड़  अधिक है। 


कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स सरकार की कमाई और खर्चे का ब्योरा रखता है। इससे ही आर्थिक सर्वे और बजट में कमाई और खर्चा प्रस्तुत किया जाता है। और कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स ने अपनी वेबसाइट पर सबकुछ पहले ही जारी कर दिया है। इसलिए सरकार भी इससे मुकर नहीं सकती और यह साफ़ है कि सरकार ने पिछले साल की कमाई के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपये की राशि अधिक दिखाई है या सरकार के पास इतनी बड़ी राशि का कोई हिसाब-किताब नहीं है या बजट से इतनी राशि गायब हो चुकी है!  
यही हाल पिछले साल के खर्चों का भी है। साल 2018 -19 में इकोनॉमिक सर्वे के प्रोविजनल एकाउंट में खर्चा 23.1  लाख करोड़ दिखाया गया और बजट के रिवाइज्ड एस्टीमेट में इसे बढ़ाकर 24 .6 लाख करोड़ रुपए दिखाया गया। यानी खर्चे में 1 .5 लाख करोड़ रुपये का अंतर है। 


अब इन खातों में अंतर दिखने की मुख्य वजह है कि टैक्स से होने वाले राजस्व में कमी आयी है। इकोनॉमिक सर्वे कहता है कि पिछले साल सरकार को टैक्स से केवल 13.2 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई जबकि बजट में टैक्स से 14.8 लाख करोड़ की कमाई दिखाई गयी। अब इससे सरकार के इन दावों पर सवाल उठता है कि पिछले साल उसे कर से बहुत अधिक कमाई हुई है। इससे यह भी सवाल उठता है कि क्या इस साल भी टैक्स से होने वाली कमाई को सही तरह से दिखाया जाएगा या टैक्स से होने वाली कमाई इस साल भी कम रहेगी ?
इस मुद्दे पर पूर्व चीफ स्टटेसियन प्रोनब सेन ने कहते हैं- यह कोई हिसाब-किताब जोड़ने में हुई गलती नहीं है। न ही यह कोई ऐसी गलती है कि हम कहें कि हिसाब किताब रखने वाला तंत्र कमजोर हैं। CGA यानी कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स मौजूदा समय में बहुत एडवांस्ड हो चुका है। इससे इतनी बड़ी गलती नहीं हो सकती है। यह बहुत बड़ी गलती है। कमाई कम होने की वजह से विभिन्न मंत्रालयों को किए गए आबंटनों में कमी लानी करनी पड़ेगी। विभिन्न योजनाओं में किये गए आबंटनों को कम करना पड़ेगा। राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने को लेकर जो लक्ष्य रखा जाता है, उस पर भी असर पड़ेगा। यह भी अचरज वाली बात है कि इकोनॉमिक सर्वे और बजट दोनों डिपार्टमेंट ऑफ़ इकनोमिक अफेयर्स  के अंतर्गत आते हैं तो यह गलती कैसे हो गयी। 


इस सवाल के जवाब में कि इस सरकार पर आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगते रहते हैं पर प्रोनब सेन ( Former Chief Statistician of India) ने कहा कि सांख्यिकी आंकड़ों में थोड़ी बहुत गलतियां हमेशा रहती हैं लेकिन अगर सारे रुझान दूसरे तरफ जा रहे हों और सांख्यिकी आंकड़ें दूसरी तरफ तो यह कहा जा सकता है कि सांख्यिकी आंकड़ों में छेड़छाड़ की जा रही है। (जैसा कि इस सरकार जीडीपी से जुड़े आकंड़ों में कोई मौकों ओर देखा गया) लेकिन यहां तो बात बजट के आय और व्यय की राशि से जुडी हुई है। इसमें इतनी बड़ी गलती कैसे हो सकती है। यदि इतना बड़ा अंतर किसी कम्पनी के खातों में आता तो कम्पनी के चीफ़ फाइनेंशियल ऑफिसर को बरखास्त कर दिया जाता। 


अर्थशास्त्री जयति घोष कहती हैं कि हमारा सारा ध्यान रिवाइज्ड एस्टीमेट की तरफ है, इसलिए इस साल के लिए जो अनुमानित किया गया है, उस पर हमारा ध्यान नहीं जा रहा है। इस साल के लिए टैक्स से कमाई में पिछले साल के मुकाबले 3.3 लाख करोड़ रुपये के इजाफे की बात की जा रही है। क्या यह संभव है? साफ तौर कहा जाए तो यह सच से बहुत दूर की गयी बात है। जब पिछले साल के एक्चुअल एकाउंट में कर की कमाई कम हुई है तो इस साल इतना अधिक इजाफा कैसे हो सकता है। अगर इतनी बड़ी राशि गायब हो चुकी है तो इस बजट का कोई फायदा नहीं। 


वित्त मंत्री ने नॉर्थ ब्लॉक में पत्रकारों के आने पर रोक लगा दी है। बजट प्रस्तुत करते समय किसी भी मद में कितना रुपये आबंटित किया गया, यह नहीं बताया गया। सब दस्तवेज में रखा गया। ये विडंबना है कि अब तक केवल भाषण झूठे साबित हुए हैं लेकिन अब दस्तावेज भी झूठे साबित हो रहे हैं। सरकार का आकलन गलत हुआ है। लेकिन जानबूझकर एकाउंटिंग में फेर-बदल करना देश की अर्थव्यस्था के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। जब जानबूझ कर छिपाया जा रहा हो कि कमाई कितनी हो रही हो तो खर्चे में सबसे पहले उन योजनाओं से कटौती की जाएगी जो वंचितों के लिए है, जो दबाव समूह नहीं बन पाते हैं। इसलिए निर्मला सीतारमण को जवाब देना चाहिए कि 1.7 लाख करोड़ रुपये की राशि कहाँ गयी ताकि मनरेगा जैसी योजनाओं में चुपचाप की जा सकने वाली कटौती को बचाया जा सके.

Union Budget 2019
economic survey
revenue shortfall in budget
gap in revised estimate and budget estimate tax shortfall

Related Stories

आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22: क्या महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था के संकटों पर नज़र डालता है  

आर्थिक सर्वे 2021: क्या सरकार ने अहम पहलुओं को छिपाया है?

एमएसएमई क्षेत्र को पुनर्जीवित किये बिना अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार संभव नहीं

बजट की फाँस – कुआँ भी, खाई भी!

आर्थिक सर्वे : दस नए-पुराने झूठ और एक संदेश

आर्थिक सर्वे: आंकड़े तो कुछ और कहते हैं

पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की तमन्ना और सातवें नंबर की फिसलन

विदेशी साव्रन बॉण्ड देश के लिए बड़ा जोख़िम?

मोदी 1.0 के दौरान, कॉरपोरेट्स को 4.3 लाख करोड़ की रियायतें दी गईं

बही-खाता 2019 : बधाई! सरकार अब साहूकार बन गई है


बाकी खबरें

  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध
    02 Feb 2022
    पिछले दिनों झारखंड सरकार के कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रदेश के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों की नियुक्तियों के लिए भोजपुरी, मगही व अंगिका भाषा को धनबाद और बोकारो जिला की स्थानीय भाषा का दर्जा…
  • ukraine
    पीपल्स डिस्पैच
    युद्धोन्माद फैलाना बंद करो कि यूक्रेन बारूद के ढेर पर बैठा है
    02 Feb 2022
    मॉर्निंग स्टार के संपादक बेन चाकों लिखते हैं सैन्य अस्थिरता बेहद जोखिम भरी होती है। डोंबास में नव-नाजियों, भाड़े के लड़ाकों और बंदूक का मनोरंजन पसंद करने वाले युद्ध पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ है।…
  • left candidates
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल
    02 Feb 2022
    “…वामदलों ने ये चुनौती ली है कि लूट-खसोट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ एक ध्रुव बनना चाहिए। ये ध्रुव भले ही छोटा ही क्यों न हो, लेकिन इस राजनीतिक शून्यता को खत्म करना चाहिए। इस लिहाज से वामदलों का…
  • health budget
    विकास भदौरिया
    महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
    02 Feb 2022
    कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो
  • 5 election state
    रवि शंकर दुबे
    बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन
    02 Feb 2022
    पूरा देश भारत सरकार के आम बजट पर ध्यान लगाए बैठा था, खास कर चुनावी राज्यों के लोग। लेकिन सरकार का ये बजट कल्पना मात्र से ज्यादा नहीं दिखता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License