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भागवत के हिंदू धर्म की पहेलियों
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हिंदू भारत की एक अखंड दृष्टि की वकालत करते हुए जाति, धर्मों की विविधता, संस्कृतियों और भाषाओं और आर्थिक विरोधाभासों के साथ कुश्ती जारी हैI
सुबोध वर्मा
27 Feb 2018
Translated by महेश कुमार
मोहन भागवत
Image Courtesy: Times of India

25 फरवरी 2018 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ में आरएसएस के स्वयंसेवक (सदस्यों) की रैली को संबोधित करते हुए, आरएसएस के सर्वोच्च नेता मोहन भागवत ने आरएसएस की विचारधारा में मौजूद सभी तरह के डर और विरोधाभासों को प्रदर्शित किया, जिसने स्थापना के समय से ही उसके अपने कदमों पर असर डाला है। वे वर्तमान में यूपी के दौरे पर हैं, वाराणसी और आगरा में इसी तरह की बैठकें संबोधित करेंगे। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि- जिसका सीधा कारण है कि भागवत आगामी 201 9 के आम चुनावों के लिए अपने हिंदू कट्टरपंथी और अल्ट्रा राष्ट्रवादी संगठन की बुनियाद को मज़बूत करने के मिशन पर हैं। हालांकि, उनके पास पुराने दावों को छोड़ कर कैडर को पेश करने के लिए नया कुछ नहीं था।

भारत की महानता पर बखान करने के बाद वे उसे हिंदुत्व के समान बताने लगे - और कहा कि केवल भारत ही दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, उन्होंने कहा कि सभी हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए। इसके बाद वे इसकी समस्या पर आये। वह क्या है आइये देखें?

"एकजुट होने के लिए सबसे बड़ी रोडब्लॉक/बाधा यह है कि हम जाति की तर्ज पर लड़ रहे हैं। हमें यह कहना है कि सभी हिंदू भाई हैं चाहे वे किसी भी समुदाय से हों", उन्होंने घोषित किया।

याद रखें: भागवत सहारनपुर से सिर्फ सौ किलोमीटर दूर से बोल रहे थे, जहाँ मई 2017 में उच्च  जाति के हिंदुओं की एक भीड़ ने संत रविदास मंदिर (दलित समुदाय द्वारा सम्मानित) को नष्ट कर दिया था, जिसने उनकी मूर्ति पर पेशाब किया (जैसा कि सुनने में आया) और दर्जनों दलित के घरों को जला दिया। शब्बीरपुर गांव में हिंसा लगभग एक महीने तक जारी रही। भीम आर्मी नामक एक दलित संगठन के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद को बाद में उठाया और उसे खतरनाक  राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत जेल में बंद कर दिया गया।

जाहिर है, भागवत पसंदीदा आरएसएस के सपने को फटे कपडे को एक साथ सिलाई करने की   कोशिश कर रहा है - एक 'संयुक्त' हिंदू राष्ट्र तो चाहिए लेकिन वह सहारानपुर या अन्य जगहों में ऊपरी जाति के अत्याचारों के पीड़ितों के लिए सहानुभूति या सहायता का एक शब्द भी नहीं बोल पा रहा है। पिछले कुछ सालों में दलितों पर इस तरह के हमले की बर्बर घटनाएँ हुई हैं। ऊना में, गुजरात, में चार दलित युवाओं को नंगा कर, बेरहमी से पीटा गया और ऊंची जाति के दंगाइयों ने इसका विडियो बनाया और सोशल मीडिया पर डाल दिया जिससे पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आ गई थी। वे मरे हुए पशुओं की खाल उतारने के अपने पारंपरिक व्यवसाय के सम्बन्ध में काम करने के 'अभियुक्त' थे, जो हिन्दू समाज में बहिष्कार के लिए आरक्षित एक कार्य था। तब से कम से कम 30 मवेशियों पर हमले हुए जो मरे पशुओं को ले जाने या उनको उठाने में शामिल थे, और यह सब पवित्र गाय के नाम पर हुआ हाल। उसके बाद हिंदू कट्टरपंथियों ने, भीमा कोरेगांव, महाराष्ट्र में दलितों पर भयानक हमला किया। कईं दलित छात्रों ने बेरहम भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली है - रोहिथ वेमुला से के. साईं. दीप्ति तक इसके शिकार हुए हैं। पुलिस के साथ दर्ज अत्याचारों में 2016 में 40,000 से अधिक मामलों की वृद्धि हुई है, एनसीआरबी आंकड़े बताते हैं।

और फिर भी, मोहन भागवत ने इन घटनाओं पर कोई आंसू नहीं बहाया और न ही दलितों के लिए कोई चिंता का शब्द कहा। उनका एकमात्र जुनून हिंदुओं को एकजुट करना है।

भागवत, निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के शासन का लाभ उठाते हुए, सरकार के रहते हुए जितना संभव हो, आरएसएस का ज़हर से भरा दृष्टिकोण फैलाने के लिए तक रहता है। और, वह आगामी चुनावों के लिए मैदान तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, क्या दलित समुदायों के घावों को यह कहते हुए ठीक किया जा सकता है कि "सभी हिन्दू भाई हैं फिर चाहे वे किसी भी समुदाय के हों"?

अपने भाषण में, भागवत मखमली दस्ताने के अंदर लौह मुट्ठी प्रदर्शित करने का विरोध नहीं कर सका। एक विचित्र सादृश्य का प्रयोग करके उन्होंने कथित तौर पर कहा कि "देवताओं ने भेड़ का बलिदान भी ग्रहण किया क्योंकि वह शक्तिहीन है यहां तक कि देवता उन शक्तियों का सम्मान नहीं करते हैं जो शक्ति के बिना होते हैं। यह ताकत का शो नहीं है आपको ताकत दिखाने की ज़रूरत नहीं है, यह तब दिखाई देता है जब वह वहाँ एक साथ है।"

भागवत आरएसएस दर्शन के मुख्य फासीवादी सिद्धांत को व्यक्त कर रहे हैं। सादा अंग्रेजी में इसका अर्थ है: हिंदुओं का इस देश में बहुमत है, यह उनकी ताकत है बशर्ते कि वे एकजुट हो जाएँ, यहाँ तक कि ईश्वर भी आपका सम्मान करेंगे यदि आप गर्व से हिन्दू हो और अन्य सभी हिंदुओं के साथ एक हो जाएँ। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस फंतासी का सबसे सीधा परिणाम यह होगा कि भाजपा सभी चुनावों को जीत जाएगा। अन्य परिणामों में अल्पसंख्यकों (धार्मिक, भाषाई, जातीय और अन्य) को समाप्त करने या उन्हें नीचा करने की कोशिश की जायेगी और साथ ही सभी तरह की असहमति का उन्मूलन भी इसमें शामिल होगा।

उन्होंने खुद की तार्किक विचित्रता को बेपर्दा किया: "पूरे समाज को आरएसएस बनना होगा, और कोई विकल्प नहीं है"। भागवत के लिए सबसे अच्छी स्थिति तब होगी जब पूरे देश को सैन्यवादी लाइनों पर संगठित किया जाएगा, एक ही धर्म द्वारा एकजुट होंगे, और एक फासीवादी विचारधारा के नेतृत्व में जुड़ें जो सभी 'दूसरों' से बेहतर होंगे और किसी भी असंतोष को खत्म करने के लिए तैयार रहेंगे।

यहाँ तक कि इन विलक्षण दृष्टान्तों पर ज़ोर देते हुए वह उन विभिन्न विरोधाभासों से भी भिड़ने  की कोशिश कर रहा था, जिनका वे खुद सामना कर रहे हैं। उन्होंने इस आरोप को एक सद्गुण बनाने की कोशिश की कि आरएसएस को कट्टरपंथी कहा जाता है जबकि यह "एक कट्टर हिंदू मतलब उदारता (उदार है)" और इसका मतलब कि "कट्टर अहिंसा है!

भागवत के अविश्वसनीय षड्यंत्र केवल यह दिखाता हैं कि आरएसएसएस गहराई से महसूस कर रहा है कि वे पीछे की और धकेले जा रहे हैं। उनकी हिंसक और उकसाने वाली गतिविधियों के विरुद्ध लगातार विरोध बढ़ रहा है- ये विरोध सशस्त्र जुलूस और उकसाने नारों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले, नफरत और जहर का प्रसार के विरुद्ध - उन्हें परेशान कर रहा है कि इससे चुनाव संभावनाओं को नुकसान होगा। इसलिए ये बचपने से भरे अपने प्रयासों से  शब्दों की जुगाली से इसे दूर करना चाहते हैं।

अपने लंबे 73 साल के इतिहास में, आरएसएस ने कभी भी नहीं सीखा, कभी भी बेहतर बदलाव की कोशिश नहीं की, और अपने सिद्धांतों पर कभी सवाल नहीं उठाया। वे एक समय के ताने-बाने  में रहते हैं - और भारत को पीछे की तरफ वापस खींचना चाहते हैं। यही मोहन भागवत का असली संदेश है।

मोहन भागवत
आरएसएस
हिन्दू राष्ट्र
सामाजिक-आर्थिक विरोधाभास

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